TET ki 2.30 pm wali geography ki class 8 may ko morning m 8 am par hogi
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Virendra sir के जीजा जी की आज सुबह death हो जाने के कारण 2-3 दिन App और Youtube की कोई class नहीं होगी।
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Kuch technical issue ke karan tet wali, 2.30 pm par class nhi ho payi, vo ab hogi 4 pm par
जब गांधी के शब्दों ने हिला दिया 'राजसी' सिंहासन: बीएचयू का वह ऐतिहासिक भाषण
4 फरवरी, 1916। स्थान: वाराणसी। अवसर था काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के शिलान्यास का। मंच पर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग, एनीबेसेंट और देश के दर्जनों महाराजा हीरे-जवाहरात से लदे बैठे थे। लेकिन उस दिन दक्षिण अफ्रीका से लौटा एक "दुबला-पतला बेरिस्टर" कुछ ऐसा कहने वाला था, जिससे ब्रिटिश हुकूमत की नींव और राजाओं का अहंकार दोनों हिलने वाले थे।
1. भाषा का स्वाभिमान और एनी बेसेंट से टकराव
समारोह की शुरुआत अंग्रेजी के भारी-भरकम भाषणों से हुई। जब गांधीजी की बारी आई, तो उन्होंने हिंदी में बोलना शुरू किया। श्रीमती एनी बेसेंट ने टोकने पर उन्हें अंग्रेजी में बोलना पडा , लेकिन गांधीजी ने मंच से ही उलाहना दिया कि अगर हम अपनी भाषा में अपनी बात नहीं कह सकते, तो स्वराज का अर्थ क्या है?
2. राजाओं के आभूषणों पर करारा प्रहार
गांधीजी ने सामने बैठे महाराजाओं की ओर इशारा करते हुए कहा- "मैं देख रहा हूं कि यहाँ उपस्थित राजा-महाराजाओं ने पेरिस के जौहरियों को भी मात देने वाले आभूषण पहन रखे हैं। लेकिन सच तो यह है कि जब तक आप इन रत्नों को उतारकर देश के गरीब किसानों की अमानत के रूप में उन्हें नहीं सौंप देते, तब तक भारत का उद्धार संभव नहीं है।" यह सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया। गांधीजी ने सीधे तौर पर यह स्थापित कर दिया कि राजाओं का यह वैभव असल में किसानों का खून-पसीना है।
3. जासूसी का आतंक और निडरता का पाठ
वाराणसी उस समय छावनी बना हुआ था। गांधीजी ने वायसराय की सुरक्षा व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा कि जिस सम्राट के एक प्रतिनिधि को अपने ही लोगों से इतना डर लगे कि उसे हर कोने पर जासूस खड़ा करना पड़े, वह शासन करने के योग्य नहीं है। गांधीजी ने खुलेआम घोषणा की- "यदि आप सोचते हैं कि मैं शिष्टाचार का उल्लंघन कर रहा हूं, तो मैं क्षमा चाहता हूं। लेकिन मैं वही कहूंगा जो मेरा अपना अंतर्मन कहता है। मैं स्वयं एक विप्लवी हूं और हमें न वायसराय से डरना चाहिए, न जासूसों से।"
4. सभापति का पलायन और गांधी का मौन
जैसे ही गांधीजी ने अराजकतावाद और ब्रिटिश दमन पर बोलना शुरू किया, मंच पर खलबली मच गई। एनी बेसेंट जोर-जोर से "Stop it, Stop it!" चिल्लाने लगीं। छात्र दीर्घा से आवाज़ें आईं— "बोलते रहिए, बोलते रहिए!"
तनाव इतना बढ़ गया कि सभा की अध्यक्षता कर रहे दरभंगा के महाराजा अपनी कुर्सी छोड़कर उठ गए और वहां से चले गए। सभापति के जाने का अर्थ था सभा की समाप्ति। गांधीजी को अपना भाषण अधूरा छोड़ना पड़ा, लेकिन उस आधे भाषण ने ही देश को बता दिया था कि अब भारत को एक नया और बेबाक नेतृत्व मिल चुका है।
मशहूर लेखक लुई फिशर ने इस भाषण को गांधी के जीवन का टर्निंग पॉइंट माना है। गांधीजी को समझे बिना 19 वीं सदी के उस भारत को समझना असंभव है जो अपनी पहचान की तलाश में था। वह भाषण केवल एक वक्तव्य नहीं था, बल्कि वह घोषणा थी कि अब भारत की आजादी की लड़ाई महलों से निकलकर खेतों और खलिहानों तक पहुँचने वाली है।
4 फरवरी, 1916। स्थान: वाराणसी। अवसर था काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के शिलान्यास का। मंच पर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग, एनीबेसेंट और देश के दर्जनों महाराजा हीरे-जवाहरात से लदे बैठे थे। लेकिन उस दिन दक्षिण अफ्रीका से लौटा एक "दुबला-पतला बेरिस्टर" कुछ ऐसा कहने वाला था, जिससे ब्रिटिश हुकूमत की नींव और राजाओं का अहंकार दोनों हिलने वाले थे।
1. भाषा का स्वाभिमान और एनी बेसेंट से टकराव
समारोह की शुरुआत अंग्रेजी के भारी-भरकम भाषणों से हुई। जब गांधीजी की बारी आई, तो उन्होंने हिंदी में बोलना शुरू किया। श्रीमती एनी बेसेंट ने टोकने पर उन्हें अंग्रेजी में बोलना पडा , लेकिन गांधीजी ने मंच से ही उलाहना दिया कि अगर हम अपनी भाषा में अपनी बात नहीं कह सकते, तो स्वराज का अर्थ क्या है?
2. राजाओं के आभूषणों पर करारा प्रहार
गांधीजी ने सामने बैठे महाराजाओं की ओर इशारा करते हुए कहा- "मैं देख रहा हूं कि यहाँ उपस्थित राजा-महाराजाओं ने पेरिस के जौहरियों को भी मात देने वाले आभूषण पहन रखे हैं। लेकिन सच तो यह है कि जब तक आप इन रत्नों को उतारकर देश के गरीब किसानों की अमानत के रूप में उन्हें नहीं सौंप देते, तब तक भारत का उद्धार संभव नहीं है।" यह सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया। गांधीजी ने सीधे तौर पर यह स्थापित कर दिया कि राजाओं का यह वैभव असल में किसानों का खून-पसीना है।
3. जासूसी का आतंक और निडरता का पाठ
वाराणसी उस समय छावनी बना हुआ था। गांधीजी ने वायसराय की सुरक्षा व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा कि जिस सम्राट के एक प्रतिनिधि को अपने ही लोगों से इतना डर लगे कि उसे हर कोने पर जासूस खड़ा करना पड़े, वह शासन करने के योग्य नहीं है। गांधीजी ने खुलेआम घोषणा की- "यदि आप सोचते हैं कि मैं शिष्टाचार का उल्लंघन कर रहा हूं, तो मैं क्षमा चाहता हूं। लेकिन मैं वही कहूंगा जो मेरा अपना अंतर्मन कहता है। मैं स्वयं एक विप्लवी हूं और हमें न वायसराय से डरना चाहिए, न जासूसों से।"
4. सभापति का पलायन और गांधी का मौन
जैसे ही गांधीजी ने अराजकतावाद और ब्रिटिश दमन पर बोलना शुरू किया, मंच पर खलबली मच गई। एनी बेसेंट जोर-जोर से "Stop it, Stop it!" चिल्लाने लगीं। छात्र दीर्घा से आवाज़ें आईं— "बोलते रहिए, बोलते रहिए!"
तनाव इतना बढ़ गया कि सभा की अध्यक्षता कर रहे दरभंगा के महाराजा अपनी कुर्सी छोड़कर उठ गए और वहां से चले गए। सभापति के जाने का अर्थ था सभा की समाप्ति। गांधीजी को अपना भाषण अधूरा छोड़ना पड़ा, लेकिन उस आधे भाषण ने ही देश को बता दिया था कि अब भारत को एक नया और बेबाक नेतृत्व मिल चुका है।
मशहूर लेखक लुई फिशर ने इस भाषण को गांधी के जीवन का टर्निंग पॉइंट माना है। गांधीजी को समझे बिना 19 वीं सदी के उस भारत को समझना असंभव है जो अपनी पहचान की तलाश में था। वह भाषण केवल एक वक्तव्य नहीं था, बल्कि वह घोषणा थी कि अब भारत की आजादी की लड़ाई महलों से निकलकर खेतों और खलिहानों तक पहुँचने वाली है।
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