आंधियों का ज़ोर है मैं ग़ज़ल कैसे कहूँ
हर तरफ ही शोर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
लफ्ज़ जो ढूंढे कहीं खो गए मिलते नहीं
तर्ज़ भी कमजोर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
रात आंखों में कटी ख़्वाब पर सोए रहे
धुंध चारों ओर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
बात सच है हम गज़ल यूँ बना पाए नहीं
सामने चितचोर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
आग सीने में दबी और हम चुपचाप थे
हो गई अब भोर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
हर तरफ ही शोर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
लफ्ज़ जो ढूंढे कहीं खो गए मिलते नहीं
तर्ज़ भी कमजोर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
रात आंखों में कटी ख़्वाब पर सोए रहे
धुंध चारों ओर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
बात सच है हम गज़ल यूँ बना पाए नहीं
सामने चितचोर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
आग सीने में दबी और हम चुपचाप थे
हो गई अब भोर है मैं गज़ल कैसे कहूँ
❤4
ठहरी ठहरी सी तबीयत में रवानी आई,
आज फिर याद मोहब्बत की कहानी आई!!
आज फिर नीँद को आँखों से बिछड़ते देखा,
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई!!!
मुद्दतों बाद चला उनपे हमारा जादू
मुद्दतों बाद हमें बात बनानी आई!!!!
मुद्दतों बाद पशेमाँ हुआ दरिया हम से
मुद्दतों बाद हमें प्यास छुपानी आई!!!!
आज फिर याद मोहब्बत की कहानी आई!!
आज फिर नीँद को आँखों से बिछड़ते देखा,
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई!!!
मुद्दतों बाद चला उनपे हमारा जादू
मुद्दतों बाद हमें बात बनानी आई!!!!
मुद्दतों बाद पशेमाँ हुआ दरिया हम से
मुद्दतों बाद हमें प्यास छुपानी आई!!!!
❤2
इश्क ना सही कम से कम नफरत के ही लायक समझ लो ,
प्यार ना सही कम से कम गुस्से के ही काबिल समझ लो ,
सच्ची ना सही कम से कम हमे झूठी ही कह दो ,
अच्छी ना सही कम से कम बुरी ही ठहरा दो ,
अब मुझे फर्क नही पडता मैं कैसी हूँ ,
तुम जो कहोगे आज से मैं वैसी ही हूँ .. ✨🤍
प्यार ना सही कम से कम गुस्से के ही काबिल समझ लो ,
सच्ची ना सही कम से कम हमे झूठी ही कह दो ,
अच्छी ना सही कम से कम बुरी ही ठहरा दो ,
अब मुझे फर्क नही पडता मैं कैसी हूँ ,
तुम जो कहोगे आज से मैं वैसी ही हूँ .. ✨🤍
❤3👏1
तुम मुझे उस कदर प्रिय हो
जैसे भंवरे को प्रिय होते हैं फूल,
जैसे मानो चंद्रमा को प्रिय है सूरज,
और सूरज को प्रिय है उसकी चमक,
तुम मुझे इंद्रधनुष के रंगों की तरह ,
समुद्र की लहरों में घुले खारेपन की तरह प्रिय हो।
जैसे शरीर को प्रिय है रक्त,
और रक्त को प्रिय हैं शरीर के अंग,
तुम मुझे उस रक्त से भरे एक अंग की तरह प्रिय हो।
तुम मुझे उस कदर प्रिय हो,
जिसे कवि अपने शब्दों में सजा कर रखते है
जिनके बारे में लिखी जाती हैं कविताएँ,
और जिनके लिए बनाए जाते हैं मधुर गीत।
तुम मुझे बिल्कुल उस कदर प्रिय हो।
जैसे भंवरे को प्रिय होते हैं फूल,
जैसे मानो चंद्रमा को प्रिय है सूरज,
और सूरज को प्रिय है उसकी चमक,
तुम मुझे इंद्रधनुष के रंगों की तरह ,
समुद्र की लहरों में घुले खारेपन की तरह प्रिय हो।
जैसे शरीर को प्रिय है रक्त,
और रक्त को प्रिय हैं शरीर के अंग,
तुम मुझे उस रक्त से भरे एक अंग की तरह प्रिय हो।
तुम मुझे उस कदर प्रिय हो,
जिसे कवि अपने शब्दों में सजा कर रखते है
जिनके बारे में लिखी जाती हैं कविताएँ,
और जिनके लिए बनाए जाते हैं मधुर गीत।
तुम मुझे बिल्कुल उस कदर प्रिय हो।
तुम्हारे जाने की ज़िद रोज़ थोड़ा-थोड़ा मारती रही,
तुम्हारे संग बिताए लम्हे अंदर ही अंदर खा गए मुझे।
अब तुम्हारी बाँहों में कोई और चैन की नींद लेगा,
और मैं हर रात तकिए में डूब कर रो जाऊंगी।
तुम आए थे जैसे कभी लौट कर जाओगे ही नहीं,
और चले ऐसे जैसे फिर कभी लौटकर आओगे ही नहीं।
तुम्हारा आना सुबह की पहली किरण जैसा था,
और जाना जैसे सांझ की बुझती आख़िरी उम्मीद।
तुम्हारे संग बिताए लम्हे अंदर ही अंदर खा गए मुझे।
अब तुम्हारी बाँहों में कोई और चैन की नींद लेगा,
और मैं हर रात तकिए में डूब कर रो जाऊंगी।
तुम आए थे जैसे कभी लौट कर जाओगे ही नहीं,
और चले ऐसे जैसे फिर कभी लौटकर आओगे ही नहीं।
तुम्हारा आना सुबह की पहली किरण जैसा था,
और जाना जैसे सांझ की बुझती आख़िरी उम्मीद।
😡1
हुआ ही क्या जो वो हमे मिला नहीं
बदन ही सिर्फ एक रास्ता नहीं
यह पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो
मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं।
मैं दस्तकों पर दस्तकें दिया गया
मगर वो एक दर कभी खुला नहीं
अज़हर इक़बाल
बदन ही सिर्फ एक रास्ता नहीं
यह पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो
मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं।
मैं दस्तकों पर दस्तकें दिया गया
मगर वो एक दर कभी खुला नहीं
अज़हर इक़बाल
❤3
रात गहरी है,याद तेरी हैं,
चांद भी शरमा के बैठा है,
जब से सुनी बात तेरी हैं।।
तारें दिल संभाले बैठे हैं अपना
क्यूंकि महफ़िल तेरी हैं।।
धरती भी नशें में है आज
सुना है!फिज़ा में सांसे तेरी हैं।।
सारे आलम,सारे किस्से सो गये,
मेरे संग जागी याद तेरी हैं ।।
जमाने को सुलाने को लोरिया है
मेरी लोरियों में बात तेरी हैं।।
चांद भी शरमा के बैठा है,
जब से सुनी बात तेरी हैं।।
तारें दिल संभाले बैठे हैं अपना
क्यूंकि महफ़िल तेरी हैं।।
धरती भी नशें में है आज
सुना है!फिज़ा में सांसे तेरी हैं।।
सारे आलम,सारे किस्से सो गये,
मेरे संग जागी याद तेरी हैं ।।
जमाने को सुलाने को लोरिया है
मेरी लोरियों में बात तेरी हैं।।
❤17👍2
परो का ज़ोम ऊंचाई पर जाकर टूट जाता है,,
हवाएं जब घेर लेती हैं तो सेपर्ड टूट जाता हैं,,
किनारे तो मजे से बैठकर फ़ेराक में होते है,,
मगर लहरों को ढोने में समंदर टूट जाता है..!!
कही नजरे मिलाऊ तो जलन होती हैं आंखों में ,,
जरा पलके झपकता हू तो मंजर टूट जाता हैं ,,
कभी इंसान के हालात ऐसे भी बिगड़ते हैं की,,
बिगड़ी को बनाने में मुकद्दर टूट जाता हैं..!!
मुसीबत में बुजुर्गों के दिलासे काम आते हैं ,,
अगर सेनापती टूटे तो लश्कर टूट जाता हैं ,,
मेरा दुश्मन परेशान है मेरी मां की दुवाओं से,,
जब भी वार करता है तो खंजर टूट जाता हैं..!!
हवाएं जब घेर लेती हैं तो सेपर्ड टूट जाता हैं,,
किनारे तो मजे से बैठकर फ़ेराक में होते है,,
मगर लहरों को ढोने में समंदर टूट जाता है..!!
कही नजरे मिलाऊ तो जलन होती हैं आंखों में ,,
जरा पलके झपकता हू तो मंजर टूट जाता हैं ,,
कभी इंसान के हालात ऐसे भी बिगड़ते हैं की,,
बिगड़ी को बनाने में मुकद्दर टूट जाता हैं..!!
मुसीबत में बुजुर्गों के दिलासे काम आते हैं ,,
अगर सेनापती टूटे तो लश्कर टूट जाता हैं ,,
मेरा दुश्मन परेशान है मेरी मां की दुवाओं से,,
जब भी वार करता है तो खंजर टूट जाता हैं..!!
❤2
दोस्त अपना बनाया था तूने हमें
अब नज़रें हमसे चुराते क्यों हो ।
सुना कड़वी बातें रोज हमें तुम
इस कद्र तड़पाते सताते क्यों हो।
हमसे आँखें मिलाकर चलते थे
अब छिपकर निकल जाते क्यों हो।
फूल तोहफ़ों में देते आए हो सदा
अब दिल में काँटे चुभोते क्यों हो।
सुनाएँ किसे ग़म की दास्ताँ हम
रूठे हुए से नज़र आते क्यों हो।
बदल जाओगे ऐसे सोचा न था
तुम अजनबी नजर आते क्यों हो।
दर्पण
अब नज़रें हमसे चुराते क्यों हो ।
सुना कड़वी बातें रोज हमें तुम
इस कद्र तड़पाते सताते क्यों हो।
हमसे आँखें मिलाकर चलते थे
अब छिपकर निकल जाते क्यों हो।
फूल तोहफ़ों में देते आए हो सदा
अब दिल में काँटे चुभोते क्यों हो।
सुनाएँ किसे ग़म की दास्ताँ हम
रूठे हुए से नज़र आते क्यों हो।
बदल जाओगे ऐसे सोचा न था
तुम अजनबी नजर आते क्यों हो।
दर्पण
❤7
दोस्त अपना बनाया था तूने हमें
अब नज़रें हमसे चुराते क्यों हो ।
सुना कड़वी बातें रोज हमें तुम
इस कद्र तड़पाते सताते क्यों हो।
हमसे आँखें मिलाकर चलते थे
अब छिपकर निकल जाते क्यों हो।
फूल तोहफ़ों में देते आए हो सदा
अब दिल में काँटे चुभोते क्यों हो।
सुनाएँ किसे ग़म की दास्ताँ हम
रूठे हुए से नज़र आते क्यों हो।
बदल जाओगे ऐसे सोचा न था
तुम अजनबी नजर आते क्यों हो।
दर्पण
अब नज़रें हमसे चुराते क्यों हो ।
सुना कड़वी बातें रोज हमें तुम
इस कद्र तड़पाते सताते क्यों हो।
हमसे आँखें मिलाकर चलते थे
अब छिपकर निकल जाते क्यों हो।
फूल तोहफ़ों में देते आए हो सदा
अब दिल में काँटे चुभोते क्यों हो।
सुनाएँ किसे ग़म की दास्ताँ हम
रूठे हुए से नज़र आते क्यों हो।
बदल जाओगे ऐसे सोचा न था
तुम अजनबी नजर आते क्यों हो।
दर्पण
❤3
अगर मिलती मुझको दो दिन की बादशाही साहेब।
तो मेरी सियासत में तेरी तस्वीर के सिक्के चलते।
तो मेरी सियासत में तेरी तस्वीर के सिक्के चलते।
मोहब्बत करना गुनाह तो नही
फिर मोहब्बत के बदले सजा क्यों
मोहब्बत करना गुनाह तो नही
फिर मरहम की जगह जख्म क्यो
मोहब्बत करना गुनाह तो नही
फिर खुशी के बदले दर्द क्यों
....✍️✍️✍️
फिर मोहब्बत के बदले सजा क्यों
मोहब्बत करना गुनाह तो नही
फिर मरहम की जगह जख्म क्यो
मोहब्बत करना गुनाह तो नही
फिर खुशी के बदले दर्द क्यों
....✍️✍️✍️