सर्वविघ्न-विनाशन भगवान्
श्रीनृसिंहदेव
मंगलाचरण
“वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि।
यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहं भजे॥
प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्।
शरदिन्दु-रुचिं वन्दे पारीन्द्र-वदनं हरिम्॥”
अर्थात्, जिनके मुख में वाग्देवी श्रीसरस्वती, वक्ष में श्रीलक्ष्मी देवी एवं हृदय में सम्वित् (ज्ञान) विराजमान हैं, उन श्रीनृसिंहदेव का भजन करता हूँ। जो प्रह्लाद के हृदय के आह्लाद स्वरूप हैं, भक्तों की अविद्या को दूर करने वाले हैं, उन शरत्-कालीन चन्द्र के समान अंग-शोभा-युक्त सिंह-वदन श्रीहरि की वन्दना करता हूँ।
श्रीहरि ही एकमात्र विघ्न-विनाशन हैं। कहते हैं--“राखे हरि, मारे के?" (अर्थात् जिनकी रक्षा स्वयं श्रीहरि करते हैं, उन्हें कौन मार सकता हैं?” अतः विघ्न-विपत्ती से उद्धार का एकमात्र उपाय--श्रीहरि का आश्रय हैं। ब्रह्मा-शिव आदि देवता जगत के कई लोगों के अभाव को पूरा कर सकते हैं, किन्तु वे भी घोर विपत्ती में फँसने पर “त्राहि मधुसूदन” पुकारते हुए संकट-नाशन श्रीहरि की शरण ग्रहण करते हैं। तो वहाँ मनुष्य क्या कहना?
विघ्न-विनाशन के रूप में श्रीहरि का एक विशेष स्वरूप हुआ हैं--भगवान श्रीनरहरि। “केशव-धृत नरहरि-रूप जय जगदीश हरे।” इन श्रीनरहरि का स्मरण करने से कैसे भी विघ्न क्यों न हों, दूर हो जाता हैं। उनके नाम के उच्चारण से यमदूत तक डर के मारे चिल्लाने लगते हैं और खुद को ही विपत्ति में फँसा फँसा अनुभव करने लगते हैं--अन्य किसी की बात और क्या कहें।
श्रीनृसिंहदेव
मंगलाचरण
“वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि।
यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहं भजे॥
प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्।
शरदिन्दु-रुचिं वन्दे पारीन्द्र-वदनं हरिम्॥”
अर्थात्, जिनके मुख में वाग्देवी श्रीसरस्वती, वक्ष में श्रीलक्ष्मी देवी एवं हृदय में सम्वित् (ज्ञान) विराजमान हैं, उन श्रीनृसिंहदेव का भजन करता हूँ। जो प्रह्लाद के हृदय के आह्लाद स्वरूप हैं, भक्तों की अविद्या को दूर करने वाले हैं, उन शरत्-कालीन चन्द्र के समान अंग-शोभा-युक्त सिंह-वदन श्रीहरि की वन्दना करता हूँ।
श्रीहरि ही एकमात्र विघ्न-विनाशन हैं। कहते हैं--“राखे हरि, मारे के?" (अर्थात् जिनकी रक्षा स्वयं श्रीहरि करते हैं, उन्हें कौन मार सकता हैं?” अतः विघ्न-विपत्ती से उद्धार का एकमात्र उपाय--श्रीहरि का आश्रय हैं। ब्रह्मा-शिव आदि देवता जगत के कई लोगों के अभाव को पूरा कर सकते हैं, किन्तु वे भी घोर विपत्ती में फँसने पर “त्राहि मधुसूदन” पुकारते हुए संकट-नाशन श्रीहरि की शरण ग्रहण करते हैं। तो वहाँ मनुष्य क्या कहना?
विघ्न-विनाशन के रूप में श्रीहरि का एक विशेष स्वरूप हुआ हैं--भगवान श्रीनरहरि। “केशव-धृत नरहरि-रूप जय जगदीश हरे।” इन श्रीनरहरि का स्मरण करने से कैसे भी विघ्न क्यों न हों, दूर हो जाता हैं। उनके नाम के उच्चारण से यमदूत तक डर के मारे चिल्लाने लगते हैं और खुद को ही विपत्ति में फँसा फँसा अनुभव करने लगते हैं--अन्य किसी की बात और क्या कहें।
सर्वविघ्न-विनाशन भगवान्
श्रीनृसिंहदेव
मंगलाचरण
“वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि।
यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहं भजे॥
प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्।
शरदिन्दु-रुचिं वन्दे पारीन्द्र-वदनं हरिम्॥”
अर्थात्, जिनके मुख में वाग्देवी श्रीसरस्वती, वक्ष में श्रीलक्ष्मी देवी एवं हृदय में सम्वित् (ज्ञान) विराजमान हैं, उन श्रीनृसिंहदेव का भजन करता हूँ। जो प्रह्लाद के हृदय के आह्लाद स्वरूप हैं, भक्तों की अविद्या को दूर करने वाले हैं, उन शरत्-कालीन चन्द्र के समान अंग-शोभा-युक्त सिंह-वदन श्रीहरि की वन्दना करता हूँ।
श्रीहरि ही एकमात्र विघ्न-विनाशन हैं। कहते हैं--“राखे हरि, मारे के?" (अर्थात् जिनकी रक्षा स्वयं श्रीहरि करते हैं, उन्हें कौन मार सकता हैं?” अतः विघ्न-विपत्ती से उद्धार का एकमात्र उपाय--श्रीहरि का आश्रय हैं। ब्रह्मा-शिव आदि देवता जगत के कई लोगों के अभाव को पूरा कर सकते हैं, किन्तु वे भी घोर विपत्ती में फँसने पर “त्राहि मधुसूदन” पुकारते हुए संकट-नाशन श्रीहरि की शरण ग्रहण करते हैं। तो वहाँ मनुष्य क्या कहना?
विघ्न-विनाशन के रूप में श्रीहरि का एक विशेष स्वरूप हुआ हैं--भगवान श्रीनरहरि। “केशव-धृत नरहरि-रूप जय जगदीश हरे।” इन श्रीनरहरि का स्मरण करने से कैसे भी विघ्न क्यों न हों, दूर हो जाता हैं। उनके नाम के उच्चारण से यमदूत तक डर के मारे चिल्लाने लगते हैं और खुद को ही विपत्ति में फँसा फँसा अनुभव करने लगते हैं--अन्य किसी की बात और क्या कहें।
भगवान् श्रीनरहरि--परव्योम में अवस्थित असंख्य वैकुण्ठों में से एक वैकुण्ठ लोक के अधीश्वर हैं, वहाँ वे सरस्वती तथा लक्ष्मी-पति के रूप में प्रह्लाद आदि पार्षदों के साथ नित्य विराजमान हैं। वे चतुर्भुज विष्णुमूर्ति हैं, उनके दक्षिण भाग के नीचे के हाथ में--चक्र, उनके उपर वाले हाथ में पद्म तथा बायीं ओर ऊपर के हाथ में--गदा और नीचे के हाथ में शंख, सुशोभित हैं। चन्द्र की किरण के समान परम स्निग्ध और उज्ज्वल उनकी अंग कान्ति हैं। उनका श्रीमुखारविन्द--सिंह की मुख आकृति जैसा हैं और बाकी श्रीअंग--नर आकृति के हैं। इसीलिए वे ‘नरहरि’ अर्थात् ‘नर’ तथा ‘हरि’ हैं। ‘हरि’ कहने पर यहाँ ‘सिंह’ समझा जाता हैं। इसी कारण से उनके अन्य नाम--नरसिंह, नृसिंह, नृहरि, नृपंचास्य आदि हैं।
‘सिंह’ कहने से ही एक भयंकर प्राणी का चित्र मन में उदित हो जाता हैं। स्वभाव से वह अत्यन्त गंभीर और हिंसक-स्वभाव का होने पर भी बाकी सब पशुंओं की अपेक्षा उसका वैशिष्ट्य अधिक हैं, इसीलिए उसे ‘पशुराज’ (पशुओं के राजा) के रूप में सम्मान दिया जाता हैं। सिंह बाकी सब प्राणियों के पर प्रति उग्र होता हैं, किन्तु अपनी संतान के प्रति उसकी वह उग्रता लेश मात्र भी नही रहती--इसी तरह भगवान् श्रीनृसिंहदेव हैं; वे अभक्तों के लिए भयंकर महाकाल-स्वरूप हैं, साक्षात् ‘मृत्यु’ हैं, किन्तु भक्तों के प्रति उनका अत्यन्त वात्सल्य हैं। इसीलिए उनकें सम्बन्ध में कहा जाता हैं--
“उग्रोऽप्यनुग्र एवायं स्वभक्तानां नृकेशरी।
केशरीव स्वपोतानामन्येषामुग्रविग्रहः॥”
अब विचार किया जाय कि, विघ्न कहाँ से आता हैं, किस तरह से आता हैं? तभी समझा जा सकेगा कि विघ्न किस तरह से दूर होता है। एक शब्द में--हरिभक्ति का अभाव होने के कारण ही सभी प्रकार के विघ्नों की उत्पत्ति होती हैं। क्यों? उसे कहता हूँ--जैसे, प्रकाश के स्त्रोत से दूर चले आने पर ही अंधेरा जकड़ लेता हैं, उसी प्रकार श्रीहरि ही मात्र ‘अभय-अशोक-अमृत आधार हैं’--उनका आश्रय त्यागकर चलने की इच्छा करने पर ही विघ्न आकर घेर लेते हैं। इसी प्रकार ‘विघ्न’-- स्वयं के अभक्तिपर कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। फिर कभी किसी अभक्त के द्वारा ईर्ष्या-हिंसा के कारण उत्पन्न होते हैं। अत: दोनों ही क्षेत्रों में विघ्न-विनाशन श्रीनरसिंहदेव ही जीव के एकमात्र सहायक हैं। प्रकाश के पास आने से अंधेरा जिस प्रकार अपने आप ही मिट जाता हैं, ठीक उसी प्रकार ही उनके स्मरण से, उनकी कृपा से अभक्तिपर कर्मों का सारा फल नष्ट हो जाता हैं और दूसरी ओर कोई अभक्त भी पास में फटक नहीं सकता--अतः ‘निर्विघ्न’ उनके प्रत्येक प्रत्येक क्षण में साथी बन जाते हैं। होंगे भी क्यों नहीं? “यद्विभेति स्वयं भयम्” (भा: १/११/१४)--भय स्वयं जिनसे डरता हो, उनके आश्रय में किस विघ्न का भय होगा?
श्रीनृसिंहदेव को सर्वदा इस रूप में प्रणाम किया जाता हैं--
“ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिहं भीषणं भद्रं मृत्युर्मृत्युं नमाम्यहम्॥”
श्रीनृसिंहदेव
मंगलाचरण
“वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि।
यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहं भजे॥
प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्।
शरदिन्दु-रुचिं वन्दे पारीन्द्र-वदनं हरिम्॥”
अर्थात्, जिनके मुख में वाग्देवी श्रीसरस्वती, वक्ष में श्रीलक्ष्मी देवी एवं हृदय में सम्वित् (ज्ञान) विराजमान हैं, उन श्रीनृसिंहदेव का भजन करता हूँ। जो प्रह्लाद के हृदय के आह्लाद स्वरूप हैं, भक्तों की अविद्या को दूर करने वाले हैं, उन शरत्-कालीन चन्द्र के समान अंग-शोभा-युक्त सिंह-वदन श्रीहरि की वन्दना करता हूँ।
श्रीहरि ही एकमात्र विघ्न-विनाशन हैं। कहते हैं--“राखे हरि, मारे के?" (अर्थात् जिनकी रक्षा स्वयं श्रीहरि करते हैं, उन्हें कौन मार सकता हैं?” अतः विघ्न-विपत्ती से उद्धार का एकमात्र उपाय--श्रीहरि का आश्रय हैं। ब्रह्मा-शिव आदि देवता जगत के कई लोगों के अभाव को पूरा कर सकते हैं, किन्तु वे भी घोर विपत्ती में फँसने पर “त्राहि मधुसूदन” पुकारते हुए संकट-नाशन श्रीहरि की शरण ग्रहण करते हैं। तो वहाँ मनुष्य क्या कहना?
विघ्न-विनाशन के रूप में श्रीहरि का एक विशेष स्वरूप हुआ हैं--भगवान श्रीनरहरि। “केशव-धृत नरहरि-रूप जय जगदीश हरे।” इन श्रीनरहरि का स्मरण करने से कैसे भी विघ्न क्यों न हों, दूर हो जाता हैं। उनके नाम के उच्चारण से यमदूत तक डर के मारे चिल्लाने लगते हैं और खुद को ही विपत्ति में फँसा फँसा अनुभव करने लगते हैं--अन्य किसी की बात और क्या कहें।
भगवान् श्रीनरहरि--परव्योम में अवस्थित असंख्य वैकुण्ठों में से एक वैकुण्ठ लोक के अधीश्वर हैं, वहाँ वे सरस्वती तथा लक्ष्मी-पति के रूप में प्रह्लाद आदि पार्षदों के साथ नित्य विराजमान हैं। वे चतुर्भुज विष्णुमूर्ति हैं, उनके दक्षिण भाग के नीचे के हाथ में--चक्र, उनके उपर वाले हाथ में पद्म तथा बायीं ओर ऊपर के हाथ में--गदा और नीचे के हाथ में शंख, सुशोभित हैं। चन्द्र की किरण के समान परम स्निग्ध और उज्ज्वल उनकी अंग कान्ति हैं। उनका श्रीमुखारविन्द--सिंह की मुख आकृति जैसा हैं और बाकी श्रीअंग--नर आकृति के हैं। इसीलिए वे ‘नरहरि’ अर्थात् ‘नर’ तथा ‘हरि’ हैं। ‘हरि’ कहने पर यहाँ ‘सिंह’ समझा जाता हैं। इसी कारण से उनके अन्य नाम--नरसिंह, नृसिंह, नृहरि, नृपंचास्य आदि हैं।
‘सिंह’ कहने से ही एक भयंकर प्राणी का चित्र मन में उदित हो जाता हैं। स्वभाव से वह अत्यन्त गंभीर और हिंसक-स्वभाव का होने पर भी बाकी सब पशुंओं की अपेक्षा उसका वैशिष्ट्य अधिक हैं, इसीलिए उसे ‘पशुराज’ (पशुओं के राजा) के रूप में सम्मान दिया जाता हैं। सिंह बाकी सब प्राणियों के पर प्रति उग्र होता हैं, किन्तु अपनी संतान के प्रति उसकी वह उग्रता लेश मात्र भी नही रहती--इसी तरह भगवान् श्रीनृसिंहदेव हैं; वे अभक्तों के लिए भयंकर महाकाल-स्वरूप हैं, साक्षात् ‘मृत्यु’ हैं, किन्तु भक्तों के प्रति उनका अत्यन्त वात्सल्य हैं। इसीलिए उनकें सम्बन्ध में कहा जाता हैं--
“उग्रोऽप्यनुग्र एवायं स्वभक्तानां नृकेशरी।
केशरीव स्वपोतानामन्येषामुग्रविग्रहः॥”
अब विचार किया जाय कि, विघ्न कहाँ से आता हैं, किस तरह से आता हैं? तभी समझा जा सकेगा कि विघ्न किस तरह से दूर होता है। एक शब्द में--हरिभक्ति का अभाव होने के कारण ही सभी प्रकार के विघ्नों की उत्पत्ति होती हैं। क्यों? उसे कहता हूँ--जैसे, प्रकाश के स्त्रोत से दूर चले आने पर ही अंधेरा जकड़ लेता हैं, उसी प्रकार श्रीहरि ही मात्र ‘अभय-अशोक-अमृत आधार हैं’--उनका आश्रय त्यागकर चलने की इच्छा करने पर ही विघ्न आकर घेर लेते हैं। इसी प्रकार ‘विघ्न’-- स्वयं के अभक्तिपर कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। फिर कभी किसी अभक्त के द्वारा ईर्ष्या-हिंसा के कारण उत्पन्न होते हैं। अत: दोनों ही क्षेत्रों में विघ्न-विनाशन श्रीनरसिंहदेव ही जीव के एकमात्र सहायक हैं। प्रकाश के पास आने से अंधेरा जिस प्रकार अपने आप ही मिट जाता हैं, ठीक उसी प्रकार ही उनके स्मरण से, उनकी कृपा से अभक्तिपर कर्मों का सारा फल नष्ट हो जाता हैं और दूसरी ओर कोई अभक्त भी पास में फटक नहीं सकता--अतः ‘निर्विघ्न’ उनके प्रत्येक प्रत्येक क्षण में साथी बन जाते हैं। होंगे भी क्यों नहीं? “यद्विभेति स्वयं भयम्” (भा: १/११/१४)--भय स्वयं जिनसे डरता हो, उनके आश्रय में किस विघ्न का भय होगा?
श्रीनृसिंहदेव को सर्वदा इस रूप में प्रणाम किया जाता हैं--
“ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिहं भीषणं भद्रं मृत्युर्मृत्युं नमाम्यहम्॥”
वे श्रीनृसिंहदेव किस प्रकार के हैं? ‘वे उग्र, वीर, महाविष्णु ज्वलंत (आग की लौ युक्त), सभी ओर मुखविशिष्ट, भीषण, फिर भद्र और मृत्यु के भी मृत्यु-स्वरूप हैं, मैं उन्हीं को नमस्कार करता हूँ।’ वास्तव में वे भक्तों के विघ्नों को सहन नहीं कर पाते हैं--इसीलिए उनका इस प्रकार का भीषण उग्र रूप हैं। यह उनका भक्त-वात्सल्य हैं। नहीं तो वे फूल से भी अधिक कोमल हैं। वे भक्त तथा भक्ति की मर्यादा-रक्षा के अधिदेवता-रूप में जगत में प्रकाशित हैं। जहाँ-जहाँ भक्त तथा भक्ति के ऊपर विद्वेष या प्रतिकूल-चेष्टा होती हैं, उन्हीं-उन्हीं स्थानों पर श्रीनृसिंहदेव का अवतार होता हैं। जय भक्त-वत्सल भगवान् श्रीनृसिंहदेव की जय!
इस सत्ययुग में भक्तप्रवार प्रह्लाद-महाराज के चरित्र में इसका ज्वलन्त देख सकते हैं। भगवान् श्रीनृसिंहदेव ने श्रीप्रह्लाद जी के माध्यम से जगत को दिखाया हैं कि--‘शुद्ध-भक्ति’ वास्तव में क्या होती हैं, उस भक्ति की क्या महिमा हैं और वे अपने शुद्ध भक्तों की हर क्षण किस प्रकार रक्षा करते हैं। इसी से वे सभी शुद्ध भक्तों के लिए तथा शुद्ध-भक्ति का प्रचार करने वालों के लिए ‘सर्वविघ्न-विनाशन” के रूप में परम आश्रय-स्वरूप हुए हैं। उनकी इस परमपावनी कथा का श्रवण, कीर्तन या स्मरण करने से, यहाँ तक कि, समर्थन करने से भी जीव सहसा विघ्न-मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि श्रीनृसिंहदेव तथा श्रीनृसिंह-कथा--एक ही वस्तु हैं।
इस सत्ययुग में भक्तप्रवार प्रह्लाद-महाराज के चरित्र में इसका ज्वलन्त देख सकते हैं। भगवान् श्रीनृसिंहदेव ने श्रीप्रह्लाद जी के माध्यम से जगत को दिखाया हैं कि--‘शुद्ध-भक्ति’ वास्तव में क्या होती हैं, उस भक्ति की क्या महिमा हैं और वे अपने शुद्ध भक्तों की हर क्षण किस प्रकार रक्षा करते हैं। इसी से वे सभी शुद्ध भक्तों के लिए तथा शुद्ध-भक्ति का प्रचार करने वालों के लिए ‘सर्वविघ्न-विनाशन” के रूप में परम आश्रय-स्वरूप हुए हैं। उनकी इस परमपावनी कथा का श्रवण, कीर्तन या स्मरण करने से, यहाँ तक कि, समर्थन करने से भी जीव सहसा विघ्न-मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि श्रीनृसिंहदेव तथा श्रीनृसिंह-कथा--एक ही वस्तु हैं।
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