सड़कें तो बस रास्ते देती रहीं,
मुसाफ़िर अपनी मंज़िलें ढूँढ़ता रहा।
कभी धूप में जलता रहा, कभी बारिश में चलता रहा,
कभी गिरता रहा, फिर भी ख़ुद को संभालता रहा।
कुछ रास्ते अपने थे, कुछ अजनबी निकले,
कुछ लोग साथ चले, कुछ बीच सफ़र ही बिछड़ निकले।
कोई मंज़िल तक पहुँचा, कोई रास्ते में ठहर गया,
कोई किसी मोड़ पर मिला और उम्र भर का सफ़र बन गया।
अजीब है ये ज़िंदगी भी,
हर मोड़ पर नया इम्तिहान देती है,
कभी मंज़िल से मिलाती है,
तो कभी मंज़िल से ज़्यादा ख़ूबसूरत रास्ते दे जाती है।
शायद मुसाफ़िर होना ही ज़िंदगी का फ़लसफ़ा है,
क्योंकि ठहर जाने में कहाँ कोई कहानी होती है।
रास्ते बदलते रहें तो बदलने दो,
कुछ सफ़र मंज़िल के लिए नहीं, ख़ुद को पाने के लिए होते हैं।
मुसाफ़िर अपनी मंज़िलें ढूँढ़ता रहा।
कभी धूप में जलता रहा, कभी बारिश में चलता रहा,
कभी गिरता रहा, फिर भी ख़ुद को संभालता रहा।
कुछ रास्ते अपने थे, कुछ अजनबी निकले,
कुछ लोग साथ चले, कुछ बीच सफ़र ही बिछड़ निकले।
कोई मंज़िल तक पहुँचा, कोई रास्ते में ठहर गया,
कोई किसी मोड़ पर मिला और उम्र भर का सफ़र बन गया।
अजीब है ये ज़िंदगी भी,
हर मोड़ पर नया इम्तिहान देती है,
कभी मंज़िल से मिलाती है,
तो कभी मंज़िल से ज़्यादा ख़ूबसूरत रास्ते दे जाती है।
शायद मुसाफ़िर होना ही ज़िंदगी का फ़लसफ़ा है,
क्योंकि ठहर जाने में कहाँ कोई कहानी होती है।
रास्ते बदलते रहें तो बदलने दो,
कुछ सफ़र मंज़िल के लिए नहीं, ख़ुद को पाने के लिए होते हैं।
❤8
मुलाक़ात हो तो ऐसी हो,
जहाँ वक़्त को भी ठहरने की चाह हो।
न कोई जल्दबाज़ी, न कोई सवाल हो,
बस आँखों में आँखें और दिल में ख़याल हो।
कुछ बातें लफ़्ज़ों से कही जाएँ,
कुछ ख़ामोशी में समझी जाएँ।
हँसी की वजह भी वही हो,
और उस पल की फ़िज़ा भी नई हो।
न कल की फ़िक्र, न कल का हिसाब हो,
बस उस एक पल में पूरा-सा एहसास हो।
मुलाक़ात छोटी हो या लंबी, फ़र्क़ नहीं पड़ता—
बस सामने वाला ऐसा हो,
जिसके साथ वक़्त गुज़रे नहीं... महसूस हो।
जहाँ वक़्त को भी ठहरने की चाह हो।
न कोई जल्दबाज़ी, न कोई सवाल हो,
बस आँखों में आँखें और दिल में ख़याल हो।
कुछ बातें लफ़्ज़ों से कही जाएँ,
कुछ ख़ामोशी में समझी जाएँ।
हँसी की वजह भी वही हो,
और उस पल की फ़िज़ा भी नई हो।
न कल की फ़िक्र, न कल का हिसाब हो,
बस उस एक पल में पूरा-सा एहसास हो।
मुलाक़ात छोटी हो या लंबी, फ़र्क़ नहीं पड़ता—
बस सामने वाला ऐसा हो,
जिसके साथ वक़्त गुज़रे नहीं... महसूस हो।
❤9👏1
मैं घूँघट के खिलाफ हूं, क्योंकि सम्मान चेहरे छुपाने से नहीं, नीयत साफ रखने से मिलता है।
मैं कन्यादान के खिलाफ हूं, क्योंकि बेटियाँ वस्तु नहीं होतीं, वे किसी घर की धड़कन होती हैं।
मैं ऐसी शादी के खिलाफ हूं, जहाँ फेरे तो हों, मगर प्रेम और सम्मान न हो।
मैं ऐसे पुरुष के खिलाफ हूं, जिसकी मर्दानगी रसोई के दरवाज़े पर दम तोड़ देती है।
मैं उस परवरिश के खिलाफ हूं, जो बेटों को अधिकार सिखाती है, और बेटियों को सिर्फ समझौते।
मैं ऐसे समाज के खिलाफ हूं, जो इंसान की कीमत उसके दिल से नहीं, उसकी उम्र, लिंग और हैसियत से तय करता है।
क्योंकि रिश्ते बराबरी से चलते हैं, अहंकार से नहीं... और सम्मान हर इंसान का हक है, किसी का एहसान नहीं।
मैं कन्यादान के खिलाफ हूं, क्योंकि बेटियाँ वस्तु नहीं होतीं, वे किसी घर की धड़कन होती हैं।
मैं ऐसी शादी के खिलाफ हूं, जहाँ फेरे तो हों, मगर प्रेम और सम्मान न हो।
मैं ऐसे पुरुष के खिलाफ हूं, जिसकी मर्दानगी रसोई के दरवाज़े पर दम तोड़ देती है।
मैं उस परवरिश के खिलाफ हूं, जो बेटों को अधिकार सिखाती है, और बेटियों को सिर्फ समझौते।
मैं ऐसे समाज के खिलाफ हूं, जो इंसान की कीमत उसके दिल से नहीं, उसकी उम्र, लिंग और हैसियत से तय करता है।
क्योंकि रिश्ते बराबरी से चलते हैं, अहंकार से नहीं... और सम्मान हर इंसान का हक है, किसी का एहसान नहीं।
❤9
शहर रोशन बहुत है, मगर दिलों में अँधेरा क्यों है,
चेहरे इतने हैं यहाँ, फिर इंसान इतना अकेला क्यों है।
मज़हब, जात और दौलत ने दीवारें तो खड़ी कर दीं,
मगर गिरते हुए इंसान को थामने वाला हाथ कहाँ है?
भूख से कोई सोए, तो महलों में नींद कैसी,
किसी की आँख नम हो, तो अपनी ख़ुशी कैसी।
हम मंदिरों-मस्जिदों में सुकून ढूँढ़ते रहे उम्रभर,
मगर किसी भूखे के सामने रोटी रखकर देखा ही नहीं।
अजीब दौर है— इंसान की कीमत भी तय होती है,
जेब भारी हो तो इज़्ज़त, ख़ाली हो तो पहचान खोती है।
कभी इतना भी मत गिरना कि आईना शर्मिंदा हो जाए,
किसी की मजबूरी देखकर तुम्हारा ज़मीर ज़िंदा हो जाए।
क्योंकि दुनिया बदलने के बड़े दावे तो सब करते हैं,
मगर असली इंसान वही है—
जो किसी के अँधेरे में ख़ुद एक छोटा-सा उजाला बन जाए।
चेहरे इतने हैं यहाँ, फिर इंसान इतना अकेला क्यों है।
मज़हब, जात और दौलत ने दीवारें तो खड़ी कर दीं,
मगर गिरते हुए इंसान को थामने वाला हाथ कहाँ है?
भूख से कोई सोए, तो महलों में नींद कैसी,
किसी की आँख नम हो, तो अपनी ख़ुशी कैसी।
हम मंदिरों-मस्जिदों में सुकून ढूँढ़ते रहे उम्रभर,
मगर किसी भूखे के सामने रोटी रखकर देखा ही नहीं।
अजीब दौर है— इंसान की कीमत भी तय होती है,
जेब भारी हो तो इज़्ज़त, ख़ाली हो तो पहचान खोती है।
कभी इतना भी मत गिरना कि आईना शर्मिंदा हो जाए,
किसी की मजबूरी देखकर तुम्हारा ज़मीर ज़िंदा हो जाए।
क्योंकि दुनिया बदलने के बड़े दावे तो सब करते हैं,
मगर असली इंसान वही है—
जो किसी के अँधेरे में ख़ुद एक छोटा-सा उजाला बन जाए।
🔥10
एक पुरानी तस्वीर थी, धूल में दबी हुई,
मगर उसमें एक पूरी ज़िंदगी थी जमी हुई।
चेहरे वही थे, मगर वक़्त बदल चुका था,
जो कल अपना था, आज यादों में ढल चुका था।
तस्वीर में हँसी थी, आँखों में उजाला था,
तब कहाँ पता था—ये पल ही आख़िरी निवाला था।
कुछ लोग अब साथ नहीं, कुछ रास्ते अब पास नहीं,
कुछ रिश्ते हैं मगर उनमें पहले जैसी बात नहीं।
तस्वीर को देखा तो एक सवाल दिल में आया,
वक़्त ने हमें बदला, या हमने ख़ुद को बदल पाया?
फिर तस्वीर रख दी उसी पुराने दराज़ में,
मगर वो पल रह गया दिल की किसी आवाज़ में।
तस्वीरें पुरानी होती हैं, यादें नहीं,
वक़्त गुज़र जाता है, मगर कुछ पल कभी गुज़रते नहीं।
मगर उसमें एक पूरी ज़िंदगी थी जमी हुई।
चेहरे वही थे, मगर वक़्त बदल चुका था,
जो कल अपना था, आज यादों में ढल चुका था।
तस्वीर में हँसी थी, आँखों में उजाला था,
तब कहाँ पता था—ये पल ही आख़िरी निवाला था।
कुछ लोग अब साथ नहीं, कुछ रास्ते अब पास नहीं,
कुछ रिश्ते हैं मगर उनमें पहले जैसी बात नहीं।
तस्वीर को देखा तो एक सवाल दिल में आया,
वक़्त ने हमें बदला, या हमने ख़ुद को बदल पाया?
फिर तस्वीर रख दी उसी पुराने दराज़ में,
मगर वो पल रह गया दिल की किसी आवाज़ में।
तस्वीरें पुरानी होती हैं, यादें नहीं,
वक़्त गुज़र जाता है, मगर कुछ पल कभी गुज़रते नहीं।
❤8
पहले तो मौसम भी अपना-सा लगा करता था,
एक ही छाँव में बैठकर दिल हँसा करता था।
फिर जाने किस मोड़ पर हवाएँ बदलने लगीं,
कुछ ख़ामोशियाँ थीं जो दूरियाँ कहने लगीं।
वही चेहरे, वही रास्ते, वही मुलाक़ातें रहीं,
बस आँखों में पहले जैसी वो बात न रही।
एक पौधा था, जिसे रोज़ मोहब्बत से सींचा था,
मौसम बदला तो उसकी मिट्टी ने रंग बदल लिया।
अब न कोई शिकायत है, न कोई इल्ज़ाम बाकी है,
बस एक ठंडी-सी ख़ामोशी है, और कुछ शामें बाकी हैं।
शायद कुछ रिश्ते टूटते नहीं, बस बदल जाते हैं,
फूलों से ख़ुशबू की तरह... धीरे-धीरे निकल जाते हैं।
एक ही छाँव में बैठकर दिल हँसा करता था।
फिर जाने किस मोड़ पर हवाएँ बदलने लगीं,
कुछ ख़ामोशियाँ थीं जो दूरियाँ कहने लगीं।
वही चेहरे, वही रास्ते, वही मुलाक़ातें रहीं,
बस आँखों में पहले जैसी वो बात न रही।
एक पौधा था, जिसे रोज़ मोहब्बत से सींचा था,
मौसम बदला तो उसकी मिट्टी ने रंग बदल लिया।
अब न कोई शिकायत है, न कोई इल्ज़ाम बाकी है,
बस एक ठंडी-सी ख़ामोशी है, और कुछ शामें बाकी हैं।
शायद कुछ रिश्ते टूटते नहीं, बस बदल जाते हैं,
फूलों से ख़ुशबू की तरह... धीरे-धीरे निकल जाते हैं।
❤10