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یہاں روزانہ اسلامی تاریخ اور بزرگانِ دین و علمائے ربانیین کی تاریخ ولادت و تاریخ وفات اور دینی باتیں (فوٹو،پوسٹ) تاریخ اور مہینے کی مناسبت سے مع کتابوں کی لِنکس بھیجی جاتی ہیں
طالب دعا 🤲
محمد جمال الدین خان قادری رضوی عفی عنہ
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बाबरीनामा / By: ग़ुलाम मुस्तफा नईमी https://www.facebook.com/share/p/1EjtHm6rVK/ बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 ईस्वी में अयोध्या में किया गया था। बाबर के कमांडर मीर बाकी ने मस्जिद का निर्माण किया और इसका नाम अपने राजा बाबर के नाम पर रखा। यह वह समय था जब मुगल…
बाबरी नामा 📜 क़िस्त़ - 2
तह़रीर: अ़ल्लामा ग़ुलाम मुस़्त़फ़ा नई़मी
रौशन मुस्तक़बिल दिल्ली
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____मुग़ल शहन्शाह जलालुद्दीन मुह़म्मद अकबर
[1542-1605 ई़स्वी] तमाम मुग़ल बादशाहों में सबसे ज़्यादह लिबरल और आज़ाद ख़याल वाक़ेअ़् हुआ था, कुछ उसकी ना ख़्वानदगी (illiteracy) और कुछ दरबारी उ़ल्मा के निफाक़, (Hypocrisy) ह़िर्स़ और त़मअ़् (लालच) ने उसे मज़हब बेज़ार बनाने में अहम रोल अदा किया, अकबर के तब्दीली मिज़ाज में उसकी चौथी बीवी हरखा बाई (यही ख़ातून जोधा बाई के नाम से मशहूर है) ने भी अहम रोल अदा किया, हरखा बाई आमेर के राजा भारमल सिंह की बेटी थी, यही वो ख़ातून (औ़रत) है जो अकबर के निकाह़ में आने के बावजूद हिन्दू धर्म पर ही क़ाइम रही, जिसकी बुनियाद पर अकबर का रुजह़ान हिन्दू मज़हब और बुत परस्ती की जानिब भी बढ़ता गया, हिन्दू मज़हब में दिल-चस्पी के बाइ़स अकबर ने हिन्दुओं के मुक़द्दस ग्रन्थ रामायण और महाभारत का फ़ारसी ज़बान (भाषा) में तर्जुमा (Translation) कराया, दरबार में मुसलमानों से ज़्यादह हिन्दुओं को ओ़हदे (पद) दिए, हिन्दुओं की खुशनूदी की ख़ात़िर जिज़्यह (यअ़्नी वोह शरई़ मह़स़ूल जो इस्लामी ह़ुकूमत कुफ़्फ़ार से उनकी जान व माल के तह़फ़्फ़ुज़ के बदले में वस़ूल करे) खत्म किया, हरखा बाई (जोधा बाई) की मुह़ब्बत में शहंशाह अकबर इस क़दर फ़रेफ़्ता (आ़शिक़) थे कि उन्होंने गाय का गोश्त तक खाना छोड़ दिया था।

_अकबर ही के ज़माने में हिन्दू मज़हब के दो बड़े फ़ाज़िल (विद्वान) और अअ़्ला दर्जे के मज़हबी मिज़ाज रखने वाले अफ़राद मौजूद थे, एक तानसेन (1500-1589) थे, जो अकबर के नौ-रतनों मैं शामिल थे, जबकि दूसरे सूरदास [1478-1583] थे जो एक मअ़्रूफ़ मूसीक़ार (संगीतकार) और श्री कृष्णा के बड़े भक्त थे। तानसेन की त़रह़ बादशाह अकबर सूरदास के भी बड़े मद्दाह़ थे, यहाँ तक कि स़िर्फ़ सूरदास के भजन सुनने के लिए मथुरा तक का सफ़र किया और सूरदास को बड़े इनआ़म व इकराम से भी नवाज़ा। हिन्दू मज़हब में अकबर की ग़ैर मअ़्मूली दिल-चस्पी और हिन्दू बाबाओं से अकबर की मिसाली वाबस्तगी (मेल जोल) के बावजूद किसी एक हिन्दू ऋषि मुनि ने कभी भी येह शिकायत नहीं की कि आपके दादा बाबर ने हमारे भगवान राम का जन्म-स्थान तोड़कर मस्जिद बनाई है। अगर किसी हिन्दू बाबा ने झूठ मूट भी येह शिकायत की होती तो अकबर जैसा बादशाह पहली फ़ुरस़त में बाबरी मस्जिद हिन्दुओं को सौंप देता, लेकिन तान-सेन से लेकर सूर-दास तक, मान-सिंह से लेकर बीरबल तक सारे हिन्दू राजा और पंडित ख़ामोश थे, इसका मत़लब स़ाफ़ है कि उनकी निगाह में ऐसा कोई मुआ़मला सिरे से था ही नहीं जिसकी शिकायत वोह अकबर से करते, कोई और करता न करता लेकिन अकबर की बीवी हरखा बाई ज़रूर अकबर से येह काम कराती कि जो बीवी अकबर से गाय का गोश्त छुड़ा सकती थी वोह अपने मन्दिर का मुत़ालबा क्यूँ नहीं कर सकती थी?

_अकबर ही के ज़माने में मशहूर हिन्दू ऋषि स्वामी तुलसीदास (1511-1623 ई़स्वी) भी मौजूद थे। तुल्सीदास सोरों ज़िला कासगंज के रहाइशी (रहने वाले) थे। तुलसीदास ही ने श्री रामचंद्र की सवानेह़ उ़मरी (Biography) लिखने का बेड़ा उठाया। इस काम का आग़ाज़ तुलसीदास ने अयोध्या ही में किया। सन 1554 ई़स्वी में रामायण लिखना शुरूअ़् की, दो साल सात महीने 26 दिन में येह काम मुकम्मल हुआ और 1556 ई़स्वी में येह काम मुकम्मल हो गया, इसी ग्रन्थ का नाम "राम चरित्र मानस" है और अ़वामी त़ौर पर इसे रामायण के नाम से जाना जाता है, रामायण सात कांड (अबवाब, पाठ, chapter's) पर मुश्तमिल (आधारित) है लेकिन किसी एक बाब (पाठ) में भी तुलसी दास जैसे राम भक्त ने इस बात का स़राह़त तो क्या, इशारों में भी ज़िक्र नहीं किया कि बाबरी मस्जिद राम जन्म स्थान और मन्दिर तोड़कर बनाई गई है, जबकि उस वक़्त बाबरी मस्जिद को बने हुए 26 साल ही हुए थे, अगर वाक़ई़ मस्जिद’ मन्दिर तोड़कर बनी होती तो तुलसीदास इस ह़ादसह का ज़िक्र अपनी किताब में ज़रूर करते। 26 साल का ज़माना कोई बड़ा ज़माना नहीं होता कि लोग पूरी त़रह़ भूल जायें, ख़ुस़ूस़न ऐसे ह़ादसात को तो लोग स़दियों तक नहीं भूलते, तो तुलसीदास जैसे राम भक्त ज्ञानी पंडित से येह उम्मीद कौन कर सकता है कि वोह इस ह़ादसे को भूल गये होंगे या मुग़ल बादशाह के ख़ौफ़ से छोड़ दिया होगा? वोह भी अकबर जैसा बादशाह, जो हिन्दू मज़हब के बहुत क़रीब और इस्लाम से बहुत दूर था, तुलसीदास का इस अहम मुआ़मले पर कुछ न लिखना ही इस बात को स़ाफ़ कर देता है कि ऐसा कोई वाक़िअ़ह तारीख़ में हुआ ही नहीं था।
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बाबरी नामा 📜 क़िस्त़ - 2 तह़रीर: अ़ल्लामा ग़ुलाम मुस़्त़फ़ा नई़मी रौशन मुस्तक़बिल दिल्ली ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ یہ تحریر اردو Urdu उर्दू مِیں ↶ https://whatsapp.com/channel/0029Va4xNTcBlHpj2ZXcdA3J/385 ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ येह तह़रीर फ़ेसबुक FaceBook पर↷ https://www.facebo…
_जिस ज़माने में बाबरी मस्जिद तअ़्मीर हुई उस वक़्त तुलसीदास की उ़म्र तक़रीबन (लगभग) 17 साल रही होगी, क्यूँकि तुलसीदास 1511 ई़स्वी मैं पैदा हुए जबकि बाबरी मस्जिद 1528 ई़स्वी में तअ़्मीर हुई इस हिसाब से तअ़्मीरे मस्जिद के वक़्त तुलसीदास की उ़म्र 17 साल बनती है, 17 साल का लड़का इतना ना-समझ नहीं होता कि इतने बडे ह़ादसे की उसे ख़बर ही न मिली हो, 1554 ई़स्वी में तुलसीदास ने रामायण लिखना शुरूअ़् की उस वक़्त तुलसीदास की 43 साल के पुख़्तह उ़म्र (पक्की उ़म्र, दानाई व बालिग़ नज़री का ज़माना, उ़म्र का वोह ह़िस़्स़ह जो तजरिबात के दौर के बअ़्द हो, अधेड़ उ़म्र या उसके बअ़्द ज़माना, मंझी हुई पुख़्तह उ़म्र) शख़्स़ थे, जबकि बाबरी मस्जिद को बने हुए 26 साल हो चुके थे, उस वक़्त यक़ीनन अयोध्या में ऐसे सैकडों लोग मौजूद रहे होंगे जिन्होंने बाबरी मस्जिद को बनते हुए अपनी आँखों से देखा होगा, अगर वाक़िअ़तन मस्जिद’ राम मन्दिर तोड़कर बनी होती तो वोह लोग तुलसीदास से इस वाक़िए़ का ज़िक्र ज़रूर करते और तुलसीदास उसे रामायण में ज़रूर लिखते ताकि आने वाली नसलों के लिए सनद रहे, लेकिन किसी हिन्दू ने न ऐसा कहा न तुलसीदास ने ऐसा लिखा, क्यूँकि ऐसा कुछ कभी हुआ ही नहीं था, बाबरी मस्जिद निहायत दयानत-दारी के साथ एक स़ाफ़ सुथरी ज़मीन पर बग़ैर किसी मन्दिर को तोड़े तअ़्मीर हुई जिस पर उस अ़हद के हिन्दू पंडितों ओर हिन्दू अ़वाम की ख़ामोश गवाही भी चीख़ चीख़ कर गवाही दे रही है।

9 रजबुल मुरज्जब, 1445 हिजरी
21 जनवरी 2024 ई़. दिन- इतवार
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