🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹
22-04-1446 ᴴ | 26-10-2024 ᴱ ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
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عقیدت کی بنیاد جہالت پر اور حقیقت کی بنیاد ماخذ و حوالہ پر ہوتی ہے ـ محمد ندیم نوری
अ़क़ीदत की बुनियाद जहालत पर और ह़क़ीक़त की बुनियाद माख़ज़ व ह़वाला पर होती है। मुह़म्मद नदीम नूरी
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عقیدت کی بنیاد جہالت پر اور حقیقت کی بنیاد ماخذ و حوالہ پر ہوتی ہے ـ محمد ندیم نوری
अ़क़ीदत की बुनियाद जहालत पर और ह़क़ीक़त की बुनियाद माख़ज़ व ह़वाला पर होती है। मुह़म्मद नदीम नूरी
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इमामुल औलिया, सरकारे ग़ौसुल अअ़्ज़म رضی الله تعالٰی عنہ की जानिब मन्सूब कुछ वाक़िआ़त से मुतअ़ल्लिक़ अकाबिर उ़ल्माए अहले सुन्नत के इरशादात: امام الاولیاء، سرکار غوث الاعظم رضی الله تبارک و تعالٰی عنہ کی جانب منسوب کُچھ واقعات سے متعلق اکابِر علمائے اہلسنت کے…
सरकारे ग़ौसुल अअ़्ज़म رضی الله عنہ या दूसरे बुज़ुर्गों علیہم الرحمہ के नाम के चराग़ जलाना कैसा है ?
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ह़ज़रत मौलाना सय्यिद कामरान मदनी स़ाह़ब से येह मस्अलह पूछा गया कि जुमेअ़्रात को जो घर में चराग़ जलाया जाता है कोई एक जलाता, कोई दस, कोई बारह मुख़्तलिफ़ तअ़्दाद (अलग अलग गिन्ती) में ग़ौस पाक के नाम का, दाता स़ाह़ब के नाम और दीगर बुज़ुर्गों के नाम का, शरई़ लिह़ाज़ से इस का क्या ह़ुक्म है, जाइज़ है या नाजाइज़ ? रहनुमाई फ़रमा दें!
अल्-जवाब: मुरव्वज अन्दाज़ में जो घर के एक कोने में चराग़ जलाए जाते हैं, उन से मक़स़ूद रौशनी नहीं होती, इस अन्दाज़ से घरों में बुज़ुर्गों के नाम पर चराग़ जलाना नाजाइज़ व इसराफ़ है। लिहाज़ा चराग़ न जलाएं, बल्कि बुज़ुर्गों के ईस़ाले सवाब के लिए नवाफ़िल या स़दक़ा वग़ैरह का एहतिमाम किया जाए, ताकि आप को भी सवाब मिले। والله اعلم ﷻ و رسوله اعلم ﷺ [सय्यिद कामरान अ़त़्त़ारी मदनी]
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ह़ज़रत मौलाना तत़हीर अह़मद रज़वी बरेलवी स़ाह़ब क़िब्ला तह़रीर फ़रमाते हैं: आज कल इस का काफ़ी रिवाज हो गया, किसी बुज़ुर्ग के नाम का चिराग़ जला कर उस के सामने बैठते हैं, येह ग़लत़ है। हाँ अगर इस चिराग़ जलाने का कोई मक़स़द हो, इस से किसी राहगीर वग़ैरा को फ़ाइदह पहुँचे, या दीनी तअ़्लीम ह़ास़िल करने पढ़ने पढ़ाने वालों को राह़त मिले, या किसी जगह ज़िक्र व शुक्र, इ़बादत व तिलावत करने वालों को इस से नफ़अ़् पहुँचे तो ऐसी रौशनियाँ करना बिला-शुबा जाइज़ बल्कि कारे सवाब (सवाब का काम) है। और जब इस में सवाब है तो उस से किसी बुज़ुर्ग की रूह़े पाक को सवाब पहुँचाने की नियत भी की जा सकती है। (नोट:) अअ़्माल और वज़ाइफ़ की किताबों में जो आसेब वग़ैरा के इ़लाज के लिए छोटा चिराग़ और बड़ा चिराग़ रौशन करने के लिए लिखा है वोह अलग चीज़ है वोह किसी बुज़ुर्ग के नाम से नहीं रौशन किया जाता।
ख़ुलास़ा येह है कि येह जो ह़ुज़ूर ग़ौसे पाक वग़ैरह किसी बुज़ुर्ग के नाम के चिराग़ जला कर उस के सामने बैठने का मअ़्मूल है येह बे सनद, बे सुबूत, बे मक़स़द और बे अस़ल है।
ह़दीसे पाक में है ह़ुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया:
من احدث فی امرنا ھٰذا ما لیس منه فھو رد ـ
जो हमारे दीन में कोई ऐसी बात निकाले जिस की उस में अस़ल न हो तो वोह मरदूद है। (इब्ने माजह 3 / ह़दीस:17) ـ [ग़लत़ फ़हमियाँ और उनकी इस़्लाह़, पेज¹⁹⁶-¹⁹⁷]
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फ़तावा रज़विय्यह शरीफ़ में है: क़ब्रों की त़रफ़ शम्एं ले जाना बिदअ़त और माल ज़ाएअ़् करना है, येह सब उस स़ूरत में है कि बिल्कुल फ़ाइदह से ख़ाली हो, और अगर शम्एं रौशन करने में फ़ाइदह हो कि मौज़ए़ क़ुबूर में मस्जिद है या क़ुबूर सरे राह हैं या वहाँ कोई शख़्स़ बैठा है या मज़ार किसी वलिय्युल्लाह या मुह़क़्क़िक़ीन उ़ल्मा में से किसी आ़लिम का है वहाँ शम्एं रौशन करें उनकी रूह़े मुबारक की तअ़्ज़ीम के लिए जो अपने बदन की ख़ाक पर ऐसी तजल्ली डाल रही है जैसे आफ़ताब ज़मीन पर, ताकि उस रौशनी करने से लोग जानें कि येह वली का मज़ारे पाक है ताकि उस से तबर्रुक करें और वहाँ अल्लाह से दुआ़ मांगें कि उनकी दुआ़ क़ुबूल हो तो येह अम्र जाइज़ है इस से अस़्लन मुमानअ़त नहीं, और अअ़्माल का मदार निय्यतों पर है। [फ़तावा रज़विय्यह शरीफ़, जिल्द⁹, पेज⁴⁹¹]
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फ़तावा रज़विय्यह शरीफ़ ही में है: अब जिस त़रह़ यहाँ जुह्हाल (यअ़्नी जाहिलों) में रिवाज है कि मुर्दह की जहाँ कुछ ज़मीन खोद कर नहलाते हैं जिसे अ़वाम लह़द कहते हैं, चालीस रात चराग़ जलाते और येह ख़याल करते हैं कि चालीस शब (यअ़्नी 40 रात) रूह़ लह़द पर आती है अंधेरा देख कर पलट जाती है, यूँही अगर वहाँ जुह्हाल (यअ़्नी जाहिलों) में रिवाज हो कि मौत से चन्द रात तक घरों से शम्एं जला कर क़ब्रों के सिरहाने रख आते हों और येह ख़याल करते हों कि नए घर में बे रौशनी के घबराएगा। तो इस के बिदअ़त होने में क्या शुबा है। [फ़तावा रज़विय्यह शरीफ़, जिल्द⁹, पेज⁵⁰³]
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🎤 مفتی خوشنود عالم احسنی رضوی
🎤मुफ़्ती ख़ुशनूद आ़लम अह़सनी रज़वी
https://www.youtube.com/watch?v=LofLJUfB5p4
🎤 حضرت سید سکندر وارثی صاحب
🎤ह़ज़रत सय्यिद सिकन्दर वारिसी स़ाह़ब
https://youtu.be/8mvXtAlP3vI?si=uXCiI1bHIgyx_srg
🎤 مولانا الیاس عطار قادری رضوی
🎤मौलाना इलयास अ़त़्त़ार क़ादिरी रज़वी
https://youtu.be/DZ0tqfORyhc?si=0vLiaO_0MiKc4Yg2
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حوالے 📚 ह़वाले 📚 Hawaale ↶
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ह़ज़रत मौलाना सय्यिद कामरान मदनी स़ाह़ब से येह मस्अलह पूछा गया कि जुमेअ़्रात को जो घर में चराग़ जलाया जाता है कोई एक जलाता, कोई दस, कोई बारह मुख़्तलिफ़ तअ़्दाद (अलग अलग गिन्ती) में ग़ौस पाक के नाम का, दाता स़ाह़ब के नाम और दीगर बुज़ुर्गों के नाम का, शरई़ लिह़ाज़ से इस का क्या ह़ुक्म है, जाइज़ है या नाजाइज़ ? रहनुमाई फ़रमा दें!
अल्-जवाब: मुरव्वज अन्दाज़ में जो घर के एक कोने में चराग़ जलाए जाते हैं, उन से मक़स़ूद रौशनी नहीं होती, इस अन्दाज़ से घरों में बुज़ुर्गों के नाम पर चराग़ जलाना नाजाइज़ व इसराफ़ है। लिहाज़ा चराग़ न जलाएं, बल्कि बुज़ुर्गों के ईस़ाले सवाब के लिए नवाफ़िल या स़दक़ा वग़ैरह का एहतिमाम किया जाए, ताकि आप को भी सवाब मिले। والله اعلم ﷻ و رسوله اعلم ﷺ [सय्यिद कामरान अ़त़्त़ारी मदनी]
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ह़ज़रत मौलाना तत़हीर अह़मद रज़वी बरेलवी स़ाह़ब क़िब्ला तह़रीर फ़रमाते हैं: आज कल इस का काफ़ी रिवाज हो गया, किसी बुज़ुर्ग के नाम का चिराग़ जला कर उस के सामने बैठते हैं, येह ग़लत़ है। हाँ अगर इस चिराग़ जलाने का कोई मक़स़द हो, इस से किसी राहगीर वग़ैरा को फ़ाइदह पहुँचे, या दीनी तअ़्लीम ह़ास़िल करने पढ़ने पढ़ाने वालों को राह़त मिले, या किसी जगह ज़िक्र व शुक्र, इ़बादत व तिलावत करने वालों को इस से नफ़अ़् पहुँचे तो ऐसी रौशनियाँ करना बिला-शुबा जाइज़ बल्कि कारे सवाब (सवाब का काम) है। और जब इस में सवाब है तो उस से किसी बुज़ुर्ग की रूह़े पाक को सवाब पहुँचाने की नियत भी की जा सकती है। (नोट:) अअ़्माल और वज़ाइफ़ की किताबों में जो आसेब वग़ैरा के इ़लाज के लिए छोटा चिराग़ और बड़ा चिराग़ रौशन करने के लिए लिखा है वोह अलग चीज़ है वोह किसी बुज़ुर्ग के नाम से नहीं रौशन किया जाता।
ख़ुलास़ा येह है कि येह जो ह़ुज़ूर ग़ौसे पाक वग़ैरह किसी बुज़ुर्ग के नाम के चिराग़ जला कर उस के सामने बैठने का मअ़्मूल है येह बे सनद, बे सुबूत, बे मक़स़द और बे अस़ल है।
ह़दीसे पाक में है ह़ुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया:
من احدث فی امرنا ھٰذا ما لیس منه فھو رد ـ
जो हमारे दीन में कोई ऐसी बात निकाले जिस की उस में अस़ल न हो तो वोह मरदूद है। (इब्ने माजह 3 / ह़दीस:17) ـ [ग़लत़ फ़हमियाँ और उनकी इस़्लाह़, पेज¹⁹⁶-¹⁹⁷]
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फ़तावा रज़विय्यह शरीफ़ में है: क़ब्रों की त़रफ़ शम्एं ले जाना बिदअ़त और माल ज़ाएअ़् करना है, येह सब उस स़ूरत में है कि बिल्कुल फ़ाइदह से ख़ाली हो, और अगर शम्एं रौशन करने में फ़ाइदह हो कि मौज़ए़ क़ुबूर में मस्जिद है या क़ुबूर सरे राह हैं या वहाँ कोई शख़्स़ बैठा है या मज़ार किसी वलिय्युल्लाह या मुह़क़्क़िक़ीन उ़ल्मा में से किसी आ़लिम का है वहाँ शम्एं रौशन करें उनकी रूह़े मुबारक की तअ़्ज़ीम के लिए जो अपने बदन की ख़ाक पर ऐसी तजल्ली डाल रही है जैसे आफ़ताब ज़मीन पर, ताकि उस रौशनी करने से लोग जानें कि येह वली का मज़ारे पाक है ताकि उस से तबर्रुक करें और वहाँ अल्लाह से दुआ़ मांगें कि उनकी दुआ़ क़ुबूल हो तो येह अम्र जाइज़ है इस से अस़्लन मुमानअ़त नहीं, और अअ़्माल का मदार निय्यतों पर है। [फ़तावा रज़विय्यह शरीफ़, जिल्द⁹, पेज⁴⁹¹]
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