Forwarded from Abde Mustafa Organisation
नबी की तरफ बद्दुआ की निस्बत
हुज़ूर -ए- अकरम सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम की तरफ बद्दुआ की निस्बत करना सही नहीं है।
अगर आप ने किसी के खिलाफ दुआ की है तो भी उसे बद्दुआ कहना बेअदबी है।
आपका कोई फेल बद नहीं है।
बुखारी शरीफ की एक रिवायत की शरह में देवबंदीयों ने सराहत के साथ बद्दुआ की निस्बत हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैहि वसल्लम की तरफ की है यह हरगिज़ दुरुस्त नहीं।
अल्लामा गुलाम रसूल सईदी रहिमहुल्लाहू त'आला ने बुखारी शरीफ की शरह करते हुए कई जगह इस पर बहस की है
पहेली जिल्द सफाह 705 पर और इससे पहले भी फिर जिल्द 13 सफाह 806 और चंद मकामात पर लिखते हैं की हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम का कोई अमल बद नहीं बल्कि हर अमल हसन है लिहाज़ा हुज़ूर ने जो दुआ -ए- ज़रर फरमाई उसे बद्दुआ कहना नाजायज़ है।
(انظر: نعم الباری)
इससे मालूम हुआ के अगर ऐसी रिवायात मिलती हैं जिन में आक़ा -ए- करीम ने गुस्ताखों के लिए दुआ -ए- ज़रर फरमाई तो उसे बद्दुआ नहीं कहेंगे बल्कि इस तरह कहेंगे कि उनके खिलाफ दुआ की या दुआ -ए- ज़रर फरमाई।
अब्दे मुस्तफ़ा
हुज़ूर -ए- अकरम सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम की तरफ बद्दुआ की निस्बत करना सही नहीं है।
अगर आप ने किसी के खिलाफ दुआ की है तो भी उसे बद्दुआ कहना बेअदबी है।
आपका कोई फेल बद नहीं है।
बुखारी शरीफ की एक रिवायत की शरह में देवबंदीयों ने सराहत के साथ बद्दुआ की निस्बत हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैहि वसल्लम की तरफ की है यह हरगिज़ दुरुस्त नहीं।
अल्लामा गुलाम रसूल सईदी रहिमहुल्लाहू त'आला ने बुखारी शरीफ की शरह करते हुए कई जगह इस पर बहस की है
पहेली जिल्द सफाह 705 पर और इससे पहले भी फिर जिल्द 13 सफाह 806 और चंद मकामात पर लिखते हैं की हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम का कोई अमल बद नहीं बल्कि हर अमल हसन है लिहाज़ा हुज़ूर ने जो दुआ -ए- ज़रर फरमाई उसे बद्दुआ कहना नाजायज़ है।
(انظر: نعم الباری)
इससे मालूम हुआ के अगर ऐसी रिवायात मिलती हैं जिन में आक़ा -ए- करीम ने गुस्ताखों के लिए दुआ -ए- ज़रर फरमाई तो उसे बद्दुआ नहीं कहेंगे बल्कि इस तरह कहेंगे कि उनके खिलाफ दुआ की या दुआ -ए- ज़रर फरमाई।
अब्दे मुस्तफ़ा
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نبی کی طرف بددعا کی نسبت
حضور اکرم ﷺ کی طرف بددعا کی نسبت کرنا صحیح نہیں ہے۔
اگر آپ نے کسی کے خلاف دعا کی ہے تو بھی اسے بددعا کہنا بے ادبی ہے۔
آپ کا کوئی فعل بد نہیں ہے۔
بخاری شریف کی ایک روایت کی شرح میں دیوبندیوں نے صراحت کے ساتھ بددعا کی نسبت حضور ﷺ کی طرف کی ہے، یہ ہرگز درست نہیں.
علامہ غلام رسول سعیدی رحمہ اللہ تعالى نے بخاری شریف کی شرح کرتے ہوئے کئی جگہ اس پر بحث کی ہے۔
پہلی جلد، صفحہ 705 پر اور اس سے پہلے بھی پھر جلد 13، صفحہ 806 اور چند مقامات پر لکھتے ہیں کہ حضور ﷺ کا کوئی عمل بد نہیں بلکہ ہر عمل حسن ہے لہذا حضور ﷺ نے جو دعاے ضرر فرمائی اسے بددعا کہنا ناجائز ہے۔
(انظر: نعم الباری)
اس سے معلوم ہوا کہ اگر ایسی روایات ملتی ہیں جن میں آقاے کریم نے گستاخوں کے لیے بددعا فرمائی تو اسے بددعا نہیں کہیں گے بلکہ اس طرح کہیں گے کہ ان کے خلاف دعا کی ہے یا دعاے ضرر فرمائی۔
عبد مصطفیٰ
حضور اکرم ﷺ کی طرف بددعا کی نسبت کرنا صحیح نہیں ہے۔
اگر آپ نے کسی کے خلاف دعا کی ہے تو بھی اسے بددعا کہنا بے ادبی ہے۔
آپ کا کوئی فعل بد نہیں ہے۔
بخاری شریف کی ایک روایت کی شرح میں دیوبندیوں نے صراحت کے ساتھ بددعا کی نسبت حضور ﷺ کی طرف کی ہے، یہ ہرگز درست نہیں.
علامہ غلام رسول سعیدی رحمہ اللہ تعالى نے بخاری شریف کی شرح کرتے ہوئے کئی جگہ اس پر بحث کی ہے۔
پہلی جلد، صفحہ 705 پر اور اس سے پہلے بھی پھر جلد 13، صفحہ 806 اور چند مقامات پر لکھتے ہیں کہ حضور ﷺ کا کوئی عمل بد نہیں بلکہ ہر عمل حسن ہے لہذا حضور ﷺ نے جو دعاے ضرر فرمائی اسے بددعا کہنا ناجائز ہے۔
(انظر: نعم الباری)
اس سے معلوم ہوا کہ اگر ایسی روایات ملتی ہیں جن میں آقاے کریم نے گستاخوں کے لیے بددعا فرمائی تو اسے بددعا نہیں کہیں گے بلکہ اس طرح کہیں گے کہ ان کے خلاف دعا کی ہے یا دعاے ضرر فرمائی۔
عبد مصطفیٰ
Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
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रैप सौंग्स और नात
नात सुनने से इश्के रसूल में इजाफ़ा होता और ये एक इबादत भी है पर इसे भी कुछ लोगों ने खेल कूद का सामान बना लिया है!
कुछ नात पढ़ने वाले गानों की तर्ज़ को अपनाते हैं और कुछ रैप स्टाइल में नात पढ़ते हैं।
इनसे परहेज करना जरूरी है।
बहरुल उलूम अल्लामा मुफ्ती अब्दुल मन्नान आज़मी रहिमहुल्लाहु त्आला लिखते है के अशआर और गीतों के मुख्तलफ वजन और बहरें होती है जिनमें हर किस्म के मज़मून को नज़्म किया जा सकता है और मुखतलफ लहजे और धुन में गाया जा सकता है इसलिए कोई कायदा ए कुल्लिया नहीं बताया जा सकता के फुला फुला तर्ज़ पर नात पढ़नी चाहिए और फुला पर नहीं।
हर नात शरीफ के लिए पुर वक़ार और संजीदा लबो लेहजा होना चाहिए और गैर मुहज्जब लबो लहजे से परहेज़ करना चाहिए।
(فتاوی بحر العلوم، ج5، ص329)
मुफ्ती मुहम्मद क़ासिम जियाउल क़ादरी लिखते है के मशहूर गानों की तर्ज़ पर नात पढ़ना मना है लिहाजा इससे एहतिराज किया जाए।
हां अगर किसी ने नात पर कोई तर्ज़ लगाई और बाद में किसी ने उसी तर्ज पर गाना गाया तो अब उस तर्ज़ पर नात पढ़ने में हरज नहीं।
(فتاوی یورپ و برطانیہ، ص 385)
अब्दे मुस्तफा
नात सुनने से इश्के रसूल में इजाफ़ा होता और ये एक इबादत भी है पर इसे भी कुछ लोगों ने खेल कूद का सामान बना लिया है!
कुछ नात पढ़ने वाले गानों की तर्ज़ को अपनाते हैं और कुछ रैप स्टाइल में नात पढ़ते हैं।
इनसे परहेज करना जरूरी है।
बहरुल उलूम अल्लामा मुफ्ती अब्दुल मन्नान आज़मी रहिमहुल्लाहु त्आला लिखते है के अशआर और गीतों के मुख्तलफ वजन और बहरें होती है जिनमें हर किस्म के मज़मून को नज़्म किया जा सकता है और मुखतलफ लहजे और धुन में गाया जा सकता है इसलिए कोई कायदा ए कुल्लिया नहीं बताया जा सकता के फुला फुला तर्ज़ पर नात पढ़नी चाहिए और फुला पर नहीं।
हर नात शरीफ के लिए पुर वक़ार और संजीदा लबो लेहजा होना चाहिए और गैर मुहज्जब लबो लहजे से परहेज़ करना चाहिए।
(فتاوی بحر العلوم، ج5، ص329)
मुफ्ती मुहम्मद क़ासिम जियाउल क़ादरी लिखते है के मशहूर गानों की तर्ज़ पर नात पढ़ना मना है लिहाजा इससे एहतिराज किया जाए।
हां अगर किसी ने नात पर कोई तर्ज़ लगाई और बाद में किसी ने उसी तर्ज पर गाना गाया तो अब उस तर्ज़ पर नात पढ़ने में हरज नहीं।
(فتاوی یورپ و برطانیہ، ص 385)
अब्दे मुस्तफा
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ریپ سانگس (Rap Songs) اور نعت
نعت سننے سے عشق رسول میں اضافہ ہوتا ہے اور یہ ایک عبادت بھی ہے پر اسے بھی کچھ لوگوں نے کھیل کود کا سامان بنا لیا ہے!
کچھ نعت پڑھنے والے گانوں کی طرز کو اپناتے ہیں اور کچھ ریپ (Style) میں نعت پڑتے ہیں؛ ان سے پرہیز کرنا ضروری ہے۔
بحرالعلوم علامہ مفتی عبدالمنان اعظمی رحمہ اللہ لکھتے ہیں کہ اشعار اور گیتوں کے مختلف وزن اور بحریں ہوتی ہیں جن میں ہر قسم کے مضمون کو نظم کیا جا سکتا ہے اور مختلف لہجے اور دھن میں گایا جاسکتا ہے اس لیے کوئی قاعدۂ کلیہ نہیں بتایا جا سکتا کہ فلاں فلاں طرز پر نعت پڑھنی چاہیے اور فلاں پر نہیں!
ہاں نعت شریف کے لیے پروقار اور سنجیدہ لب و لہجہ ہونا چاہیے اور غیر مہذب لب و لہجے سے پرہیز کرنا چاہیے۔
(فتاوی بحر العلوم، ج5، ص329)
مفتی محمد قاسم ضیاء القادری لکھتے ہیں کہ مشہور گانوں کی طرز پر نعت پڑھنا منع ہے لہٰذا اس سے احتراز کیا جائے
ہاں اگر کسی نے نعت پر کوئی اور طرز لگائی اور بعد میں کسی نے اسی طرز پر گانا گایا تو اب اس طرز پر نعت پڑھنے میں ہرج نہیں۔
(فتاوی یورپ و برطانیہ، ص385)
عبد مصطفی
نعت سننے سے عشق رسول میں اضافہ ہوتا ہے اور یہ ایک عبادت بھی ہے پر اسے بھی کچھ لوگوں نے کھیل کود کا سامان بنا لیا ہے!
کچھ نعت پڑھنے والے گانوں کی طرز کو اپناتے ہیں اور کچھ ریپ (Style) میں نعت پڑتے ہیں؛ ان سے پرہیز کرنا ضروری ہے۔
بحرالعلوم علامہ مفتی عبدالمنان اعظمی رحمہ اللہ لکھتے ہیں کہ اشعار اور گیتوں کے مختلف وزن اور بحریں ہوتی ہیں جن میں ہر قسم کے مضمون کو نظم کیا جا سکتا ہے اور مختلف لہجے اور دھن میں گایا جاسکتا ہے اس لیے کوئی قاعدۂ کلیہ نہیں بتایا جا سکتا کہ فلاں فلاں طرز پر نعت پڑھنی چاہیے اور فلاں پر نہیں!
ہاں نعت شریف کے لیے پروقار اور سنجیدہ لب و لہجہ ہونا چاہیے اور غیر مہذب لب و لہجے سے پرہیز کرنا چاہیے۔
(فتاوی بحر العلوم، ج5، ص329)
مفتی محمد قاسم ضیاء القادری لکھتے ہیں کہ مشہور گانوں کی طرز پر نعت پڑھنا منع ہے لہٰذا اس سے احتراز کیا جائے
ہاں اگر کسی نے نعت پر کوئی اور طرز لگائی اور بعد میں کسی نے اسی طرز پر گانا گایا تو اب اس طرز پر نعت پڑھنے میں ہرج نہیں۔
(فتاوی یورپ و برطانیہ، ص385)
عبد مصطفی
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औरत चाहे तो
हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदीअल्लाहु त'आला अन्हु की साहिबज़ादी हज़रते असमा रदिअल्लाहु त'आला अन्हा का ये वाकिया तमाम औरतों के लिए सबक है।
जब मदीने की तरफ हिजरत के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के साथ हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदीअल्लाहु त'आला अन्हु रवाना होने लगे तो अपना सारा माल ले लिए जो हज़ारों दिरहम पर मुश्तमिल था।
जब आपने सारा माल ले लिया तो हज़रते अस्मा फरमाती है कि मेरे दादा हज़रत अबू कुहाफ़ा तशरीफ लाए आप उस वक्त देख नहीं पाते थे और मुझसे कहने लगे कि मेरा ख्याल है कि अबू बकर ने तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा है और सब कुछ ले लिया है।
हज़रते असमा उन्हें घर के अंदर ले गई और कहा ऐसा नहीं है दादा जान! उन्होंने काफी माल छोड़ा है और फिर आपने पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े जमा कर के उस पर कपड़ा रख दिया और जहां हज़रत अबू बकर माल रखते थे वहां रख कर अपने दादा को ले गई और उनका हाथ उस पर रखवा कर कहा की देखीए हमारे लिए काफी माल छोड़कर गए हैं! (अल्लाहु अकबर)
दादा ने कहा कि कोई बात नहीं, जब इतना माल है तो आराम से तुम्हारा गुज़ारा हो सकता है।
आप फरमाती है के अल्लाह की कसम मेरे वालिद ने कुछ भी नहीं छोड़ा था लेकिन मैंने ये हिला सिर्फ दादा को तसल्ली देने के लिए किया था
(حلیۃ الاولیاء و طبقات الاصفیاء، ج2، ص97 و مسند احمد بن حنبل)
अगर औरत चाहे तो अपने शौहर, अपने बाप और अपनी भाई की इज़्ज़त की मुहाफिज़ बन सकती है अगर वह शिकायतें करना शुरू कर दें तो ईज़्ज़त का जनाजा भी निकाल सकती हैं।
सही कहते हैं की कामयाब मर्द के पीछे कहीं ना कहीं औरत का भी हाथ होता है।
अब्दे मुस्तफ़ा
हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदीअल्लाहु त'आला अन्हु की साहिबज़ादी हज़रते असमा रदिअल्लाहु त'आला अन्हा का ये वाकिया तमाम औरतों के लिए सबक है।
जब मदीने की तरफ हिजरत के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के साथ हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदीअल्लाहु त'आला अन्हु रवाना होने लगे तो अपना सारा माल ले लिए जो हज़ारों दिरहम पर मुश्तमिल था।
जब आपने सारा माल ले लिया तो हज़रते अस्मा फरमाती है कि मेरे दादा हज़रत अबू कुहाफ़ा तशरीफ लाए आप उस वक्त देख नहीं पाते थे और मुझसे कहने लगे कि मेरा ख्याल है कि अबू बकर ने तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा है और सब कुछ ले लिया है।
हज़रते असमा उन्हें घर के अंदर ले गई और कहा ऐसा नहीं है दादा जान! उन्होंने काफी माल छोड़ा है और फिर आपने पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े जमा कर के उस पर कपड़ा रख दिया और जहां हज़रत अबू बकर माल रखते थे वहां रख कर अपने दादा को ले गई और उनका हाथ उस पर रखवा कर कहा की देखीए हमारे लिए काफी माल छोड़कर गए हैं! (अल्लाहु अकबर)
दादा ने कहा कि कोई बात नहीं, जब इतना माल है तो आराम से तुम्हारा गुज़ारा हो सकता है।
आप फरमाती है के अल्लाह की कसम मेरे वालिद ने कुछ भी नहीं छोड़ा था लेकिन मैंने ये हिला सिर्फ दादा को तसल्ली देने के लिए किया था
(حلیۃ الاولیاء و طبقات الاصفیاء، ج2، ص97 و مسند احمد بن حنبل)
अगर औरत चाहे तो अपने शौहर, अपने बाप और अपनी भाई की इज़्ज़त की मुहाफिज़ बन सकती है अगर वह शिकायतें करना शुरू कर दें तो ईज़्ज़त का जनाजा भी निकाल सकती हैं।
सही कहते हैं की कामयाब मर्द के पीछे कहीं ना कहीं औरत का भी हाथ होता है।
अब्दे मुस्तफ़ा
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عورت چاہے تو
حضرت ابو بکر صدیق رضی اللہ عنہ کی صاحبزادی حضرت اسما رضی اللہ تعالی عنھا کا یہ واقعہ تمام عورتوں کے لیے ایک سبق ہے۔
جب مدینہ کی طرف ہجرت کے لیے حضور ﷺ کے ساتھ حضرت ابو بکر صدیق رضی اللہ تعالی عنہ روانہ ہونے لگے تو اپنا سارا مال لے لیا جو ہزاروں درہم پر مشتمل تھا۔ جب آپ نے سارا مال لے لیا تو حضرت اسما فرماتی ہیں کہ میرے دادا حضرت ابو قحافہ تشریف لائے (آپ اس وقت دیکھ نہیں پاتے تھے) اور مجھ سے کہنے لگے کہ میرا خیال ہے کہ ابو بکر نے تمھارے لیے کچھ بھی نہیں چھوڑا ہے اور سب کچھ لے لیا ہے۔
حضرت اسما انھیں گھر کہ اندر لے گئیں اور کہا ایسا نہیں ہے دادا جان! انھوں نے کافی مال چھوڑا ہے اور پھر آپ نے پتھر کے چھوٹے چھوٹے ٹکڑے جمع کر کے اس پر کپڑا رکھ دیا اور جہاں حضرت ابو بکر مال رکھتے تھے وہاں رکھ کر اپنے دادا کو لے گئی اور ان کا ہاتھ اس پر رکھوا کر کہا کہ دیکھیے ہمارے لیے کافی مال چھوڑ گئے ہیں! (اللہ اکبر)
دادا نے کہا کہ کوئی بات نہیں، جب اتنا مال ہے تو آرام سے تمھارا گزارا ہو سکتا ہے۔
آپ فرماتی ہیں کہ اللہ کی قسم میرے والد نے کچھ بھی نہیں چھوڑا تھا لیکن میں نے یہ حیلہ صرف دادا کو تسلی دینے کے لیے کیا تھا۔
(حلیۃ الاولیاء و طبقات الاصفیاء، ج2، ص97 و مسند احمد بن حنبل)
اگر عورت چاہے تو اپنے شوہر، اپنے باپ اور اپنے بھائی کی عزت کی محافظ بن سکتی ہے۔
اگر وہ شکایتیں کرنا شروع کر دے تو عزت کا جنازہ بھی نکال سکتی ہیں۔
صحیح کہتے ہیں کہ کامیاب مرد کے پیچھے کہیں نا کہیں عورت کا بھی ہاتھ ہوتا ہے۔
عبد مصطفی
حضرت ابو بکر صدیق رضی اللہ عنہ کی صاحبزادی حضرت اسما رضی اللہ تعالی عنھا کا یہ واقعہ تمام عورتوں کے لیے ایک سبق ہے۔
جب مدینہ کی طرف ہجرت کے لیے حضور ﷺ کے ساتھ حضرت ابو بکر صدیق رضی اللہ تعالی عنہ روانہ ہونے لگے تو اپنا سارا مال لے لیا جو ہزاروں درہم پر مشتمل تھا۔ جب آپ نے سارا مال لے لیا تو حضرت اسما فرماتی ہیں کہ میرے دادا حضرت ابو قحافہ تشریف لائے (آپ اس وقت دیکھ نہیں پاتے تھے) اور مجھ سے کہنے لگے کہ میرا خیال ہے کہ ابو بکر نے تمھارے لیے کچھ بھی نہیں چھوڑا ہے اور سب کچھ لے لیا ہے۔
حضرت اسما انھیں گھر کہ اندر لے گئیں اور کہا ایسا نہیں ہے دادا جان! انھوں نے کافی مال چھوڑا ہے اور پھر آپ نے پتھر کے چھوٹے چھوٹے ٹکڑے جمع کر کے اس پر کپڑا رکھ دیا اور جہاں حضرت ابو بکر مال رکھتے تھے وہاں رکھ کر اپنے دادا کو لے گئی اور ان کا ہاتھ اس پر رکھوا کر کہا کہ دیکھیے ہمارے لیے کافی مال چھوڑ گئے ہیں! (اللہ اکبر)
دادا نے کہا کہ کوئی بات نہیں، جب اتنا مال ہے تو آرام سے تمھارا گزارا ہو سکتا ہے۔
آپ فرماتی ہیں کہ اللہ کی قسم میرے والد نے کچھ بھی نہیں چھوڑا تھا لیکن میں نے یہ حیلہ صرف دادا کو تسلی دینے کے لیے کیا تھا۔
(حلیۃ الاولیاء و طبقات الاصفیاء، ج2، ص97 و مسند احمد بن حنبل)
اگر عورت چاہے تو اپنے شوہر، اپنے باپ اور اپنے بھائی کی عزت کی محافظ بن سکتی ہے۔
اگر وہ شکایتیں کرنا شروع کر دے تو عزت کا جنازہ بھی نکال سکتی ہیں۔
صحیح کہتے ہیں کہ کامیاب مرد کے پیچھے کہیں نا کہیں عورت کا بھی ہاتھ ہوتا ہے۔
عبد مصطفی
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बुरी सोहबत का बुरा नतीजा
हज़रत अ़ल्लामा मुहम्मद बिन अहमद ज़हबी रहमतुल्लाह अ़लैह फरमाते हैं : एक शख्स शराबियो की सोहबत में बैठा था। जब उसकी मौत का वक़्त क़रीब आया तो किसी ने कलिमा शरीफ पढ़ने की तलकीन की तो कहने लगा : "तुम पियो और मुझे भी पिलाओ।"
मआज़ अल्लाह बगैर कलमा पढ़े मर गया।
(کتاب الکبائر،ص١٠٣، فیضانِ سنت،ص۴۳۵)
बुरी सोहबत वाक़ई दुनिया व आखिरत में नुक़्सान का बाइस है और अच्छी सोहबत दुनिया व आखिरत दोनों के लिए फाइदेमंद।
जो लोग ये कहते हैं कि हम थोड़ी ये बुराई कर रहे हैं हम तो बस उनके साथ बैठ रहे, वो बड़े धोके में है कि आज ना सही मगर एक दिन वो भी इस बुराई में मुलव्विस हो ही जायेगा जिस बुराई करने वालों के साथ वो बैठे उठे हैं।
इंसान कोइले की भट्टी के क़रीब से भी गुज़रे तो कपड़े ख़राब हो जाते है। ऐसे ही बुरी सोहबतें है जो आप पर अपना बुरा रंग चढ़ा देती है और आप को अंदाज़ा भी नहीं होता।
इसीलिये इंसान अगर दुनिया व आखिरत की भलाई चाहता है तो अच्छों की मजलिस में बैठे और बुरी सोहबतों से परहेज़ करे।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
हज़रत अ़ल्लामा मुहम्मद बिन अहमद ज़हबी रहमतुल्लाह अ़लैह फरमाते हैं : एक शख्स शराबियो की सोहबत में बैठा था। जब उसकी मौत का वक़्त क़रीब आया तो किसी ने कलिमा शरीफ पढ़ने की तलकीन की तो कहने लगा : "तुम पियो और मुझे भी पिलाओ।"
मआज़ अल्लाह बगैर कलमा पढ़े मर गया।
(کتاب الکبائر،ص١٠٣، فیضانِ سنت،ص۴۳۵)
बुरी सोहबत वाक़ई दुनिया व आखिरत में नुक़्सान का बाइस है और अच्छी सोहबत दुनिया व आखिरत दोनों के लिए फाइदेमंद।
जो लोग ये कहते हैं कि हम थोड़ी ये बुराई कर रहे हैं हम तो बस उनके साथ बैठ रहे, वो बड़े धोके में है कि आज ना सही मगर एक दिन वो भी इस बुराई में मुलव्विस हो ही जायेगा जिस बुराई करने वालों के साथ वो बैठे उठे हैं।
इंसान कोइले की भट्टी के क़रीब से भी गुज़रे तो कपड़े ख़राब हो जाते है। ऐसे ही बुरी सोहबतें है जो आप पर अपना बुरा रंग चढ़ा देती है और आप को अंदाज़ा भी नहीं होता।
इसीलिये इंसान अगर दुनिया व आखिरत की भलाई चाहता है तो अच्छों की मजलिस में बैठे और बुरी सोहबतों से परहेज़ करे।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
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بری صحبت کا برا نتیجہ
حضرت علامہ محمد بن احمد ذہبی رحمۃ اللہ علیہ فرماتے ہیں:
ایک شخص شرابیوں کی صحبت میں بیٹھتا تھا جب اس کی موت کا وقت قریب آیا تو کسی نے کلمہ شریف کی تلقین کی تو کہنے لگا :
"تم بھی پیو اور مجھے بھی پلاؤ "
معاذاللہ بغیر کلمہ پڑھے مرگیا۔
(کتاب الکبائر، ص103، فیضان سنت، ص425)
بری صحبت واقعی دنیا و آخرت میں نقصان کا باعث ہے اور اچھی صحبت دنیا و آخرت دونوں کے لیے فائدے مند۔
جو لوگ یہ کہتے ہیں کہ ہم تھوڑی یہ برائی کررہے ہیں ہم تو بس ان کے ساتھ بیٹھ رہے ہیں وہ بڑے دھوکے میں ہیں کہ آج نہ سہی مگر ایک دن وہ بھی اس برائی میں ملوث ہوہی جائیں گے جس برائی کے کرنے والوں کے ساتھ وہ بیٹھتے اٹھتے ہیں ۔
انسان کوئلے کی بھٹی کے قریب سے بھی گزرے تو کپڑے خراب ہوہی جاتے ہیں۔ ایسے ہی بری صحبتیں ہیں جو آپ پر اپنا برا رنگ چڑھادیتی ہیں اور آپ کو اندازہ بھی نہیں ہوتا۔
اس لیے انسان اگر دنیا و آخرت کی بھلائی چاہتا ہے تو اچھوں کی مجلس میں بیٹھے اور بری صحبتوں سے پرہیز کریں۔
عبدِ مصطفی
حضرت علامہ محمد بن احمد ذہبی رحمۃ اللہ علیہ فرماتے ہیں:
ایک شخص شرابیوں کی صحبت میں بیٹھتا تھا جب اس کی موت کا وقت قریب آیا تو کسی نے کلمہ شریف کی تلقین کی تو کہنے لگا :
"تم بھی پیو اور مجھے بھی پلاؤ "
معاذاللہ بغیر کلمہ پڑھے مرگیا۔
(کتاب الکبائر، ص103، فیضان سنت، ص425)
بری صحبت واقعی دنیا و آخرت میں نقصان کا باعث ہے اور اچھی صحبت دنیا و آخرت دونوں کے لیے فائدے مند۔
جو لوگ یہ کہتے ہیں کہ ہم تھوڑی یہ برائی کررہے ہیں ہم تو بس ان کے ساتھ بیٹھ رہے ہیں وہ بڑے دھوکے میں ہیں کہ آج نہ سہی مگر ایک دن وہ بھی اس برائی میں ملوث ہوہی جائیں گے جس برائی کے کرنے والوں کے ساتھ وہ بیٹھتے اٹھتے ہیں ۔
انسان کوئلے کی بھٹی کے قریب سے بھی گزرے تو کپڑے خراب ہوہی جاتے ہیں۔ ایسے ہی بری صحبتیں ہیں جو آپ پر اپنا برا رنگ چڑھادیتی ہیں اور آپ کو اندازہ بھی نہیں ہوتا۔
اس لیے انسان اگر دنیا و آخرت کی بھلائی چاہتا ہے تو اچھوں کی مجلس میں بیٹھے اور بری صحبتوں سے پرہیز کریں۔
عبدِ مصطفی
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चार शादी के नुक़्सानात
ऐसा हो सकता है कि किसी काम के आगाज़ में हमें कुछ मनफ़ी अ़सरात (Side Effects) नज़र आयें पर ये भी देखना चाहिये कि आगे उस से फाइदा कितना बड़ा है।
जिहाद को ले लीजिये तो इस में लोगों को क़त्ल किया जाता है, खून बहता है और घर बल्कि इलाक़े बरबाद हो जाते हैं लेकिन यही आगे चल कर अमन का सबब बनता है और फितने खत्म होते हैं।
चार शादी का मामला भी ऐसा ही है।
एक तरह से हम अभी सिर्फ आगाज़ करने की ही बात कर रहे हैं क्योंकि तक़रीबन इसका नामो निशान मिट चुका है और ऐसा ही चलता रहा तो ना जाने क्या होगा।
अब चूँकि हालात ऐसे हैं तो ये अजीब क्या बड़ा अजीब लगेगा पर यही हल (Solution) है शादी ब्याह के सिस्टम को सुधारने का वरना लोगों ने सब कुछ कर के देख लिया कुछ खास फ़र्क़ नहीं पड़ा।
इस में पहले उलमा, हुफ्फाज़, मुबल्लिगीन वग़ैरह अहले इल्म हज़रात को आगे आना होगा ताकि वो दूसरों के लिये मिसाल और नमूना बन सकें।
आगे आने का मतलब खुद भी एक से ज़्यादा शादियाँ कीजिये और अपने बच्चों को भी तरगीब दीजिये।
गुर्बत, अद्ल, हुक़ूक़, मुआशरे वग़ैरह की बात जिस तरह की जाती है तो उस हिसाब से एक निकाह भी करने से बचना चाहिये।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
ऐसा हो सकता है कि किसी काम के आगाज़ में हमें कुछ मनफ़ी अ़सरात (Side Effects) नज़र आयें पर ये भी देखना चाहिये कि आगे उस से फाइदा कितना बड़ा है।
जिहाद को ले लीजिये तो इस में लोगों को क़त्ल किया जाता है, खून बहता है और घर बल्कि इलाक़े बरबाद हो जाते हैं लेकिन यही आगे चल कर अमन का सबब बनता है और फितने खत्म होते हैं।
चार शादी का मामला भी ऐसा ही है।
एक तरह से हम अभी सिर्फ आगाज़ करने की ही बात कर रहे हैं क्योंकि तक़रीबन इसका नामो निशान मिट चुका है और ऐसा ही चलता रहा तो ना जाने क्या होगा।
अब चूँकि हालात ऐसे हैं तो ये अजीब क्या बड़ा अजीब लगेगा पर यही हल (Solution) है शादी ब्याह के सिस्टम को सुधारने का वरना लोगों ने सब कुछ कर के देख लिया कुछ खास फ़र्क़ नहीं पड़ा।
इस में पहले उलमा, हुफ्फाज़, मुबल्लिगीन वग़ैरह अहले इल्म हज़रात को आगे आना होगा ताकि वो दूसरों के लिये मिसाल और नमूना बन सकें।
आगे आने का मतलब खुद भी एक से ज़्यादा शादियाँ कीजिये और अपने बच्चों को भी तरगीब दीजिये।
गुर्बत, अद्ल, हुक़ूक़, मुआशरे वग़ैरह की बात जिस तरह की जाती है तो उस हिसाब से एक निकाह भी करने से बचना चाहिये।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
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4 شادی کے نقصانات
ایسا ہو سکتا ہے کہ کسی کام کے آغاز میں ہمیں کُچھ منفی اثرات (Side Effects) نظر آئیں پر یہ بھی دیکھنا چاہیے کہ آگے اُس سے فائدہ کتنا بڑا ہے۔
جہاد کو لے لیجیے تو اِس میں لوگوں کو قتل کیا جاتا ہے، خون بہتا ہے اور گھر بلکہ علاقے تباہ ہو جاتے ہیں لیکن یہی آگے چل کر امن کا سبب بنتا ہے اور فتنے ختم ہوتے ہیں۔
چار شادی کا معاملہ بھی ایسا ہی ہے۔
ایک طرح سے ہم ابھی آغاز کرنے کی ہی بات کر رہے ہیں کیونکہ تقریباً اس کا نام و نشان مٹ چکا ہے اور ایسا ہی چلتا رہا تو نہ جانے کیا ہوگا۔
اب چوں کہ حالات ایسے ہیں تو یہ عجیب کیا بڑا عجیب لگے گا پر یہی حل (Solution) ہے شادی بیاہ کے سسٹم کو سدھارنے کا ورنہ لوگوں نے سب کچھ کر کے دیکھ لیا کچھ خاص فرق نہیں پڑا۔
اس میں پہلے علما، حفاظ، مبلغین وغیرہ اہلِ علم حضرات کو آگے آنا ہوگا تاکہ وہ دوسروں کے لیے مثال اور نمونہ بن سکیں۔
آگے آنے کا مطلب خود بھی ایک سے زیادہ شادیاں کیجیے اور اپنے بچّوں کو بھی ترغیب دیجیے۔
غربت، عدل، حقوق، معاشرے وغیرہ کی بات جس طرح کی جاتی ہے تو اس حساب سے ایک نکاح بھی کرنے سے بچنا چاہیے۔
عبد مصطفی
ایسا ہو سکتا ہے کہ کسی کام کے آغاز میں ہمیں کُچھ منفی اثرات (Side Effects) نظر آئیں پر یہ بھی دیکھنا چاہیے کہ آگے اُس سے فائدہ کتنا بڑا ہے۔
جہاد کو لے لیجیے تو اِس میں لوگوں کو قتل کیا جاتا ہے، خون بہتا ہے اور گھر بلکہ علاقے تباہ ہو جاتے ہیں لیکن یہی آگے چل کر امن کا سبب بنتا ہے اور فتنے ختم ہوتے ہیں۔
چار شادی کا معاملہ بھی ایسا ہی ہے۔
ایک طرح سے ہم ابھی آغاز کرنے کی ہی بات کر رہے ہیں کیونکہ تقریباً اس کا نام و نشان مٹ چکا ہے اور ایسا ہی چلتا رہا تو نہ جانے کیا ہوگا۔
اب چوں کہ حالات ایسے ہیں تو یہ عجیب کیا بڑا عجیب لگے گا پر یہی حل (Solution) ہے شادی بیاہ کے سسٹم کو سدھارنے کا ورنہ لوگوں نے سب کچھ کر کے دیکھ لیا کچھ خاص فرق نہیں پڑا۔
اس میں پہلے علما، حفاظ، مبلغین وغیرہ اہلِ علم حضرات کو آگے آنا ہوگا تاکہ وہ دوسروں کے لیے مثال اور نمونہ بن سکیں۔
آگے آنے کا مطلب خود بھی ایک سے زیادہ شادیاں کیجیے اور اپنے بچّوں کو بھی ترغیب دیجیے۔
غربت، عدل، حقوق، معاشرے وغیرہ کی بات جس طرح کی جاتی ہے تو اس حساب سے ایک نکاح بھی کرنے سے بچنا چاہیے۔
عبد مصطفی
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हज़रत अय्यूब के वाक़िये पर तहक़ीक़ (क़िस्त 1)
हज़रत अय्यूब अ़लैहिस्सलाम अल्लाह के नबी हैं। आप हज़रत इस्हाक़ अ़लैहिस्सलाम की औलाद में से हैं। अल्लाह तआला ने आप को कसरते माल और औलाद से नवाज़ा था। आप पर एक वक़्त ऐसा आया कि अल्लाह पाक ने आप को आज़माइश में डाला और आप की औलाद और माल वग़ैरह आप से दूर हो गये।
अल्लाह की राह में उसके नेक बंदो की आज़माइश होती है और चूँकि अंबिया -ए- किराम ज़्यादा महबूब होते हैं तो उन की आज़माइश आम लोगों के मुक़ाबिल बड़ी होती हैं और फिर उनके दरजात को बे-हिसाब बुलंदी अ़ता की जाती है।
हज़रत अय्यूब अ़लैहिस्सलाम के सब्र की मिसाल दी जाती है। सब्रे अय्यूब का वाक़िया बहुत मशहूर है। अक्सर मुसलमानों को ना सिर्फ ये मालूम है बल्कि वो अपने मुश्किल वक़्त में इसे याद कर के इस से मदद भी लेते है। इस वाक़िये से मुतल्लिक़ कई बातें ऐसी मशहूर हो गई हैं जो दुरुस्त नहीं है। दुरुस्त ना होने के साथ ये बाते अंबिया -ए- किराम की शान के ख़िलाफ़ भी है। वो बातें कुछ इस तरह हैं कि आप के जिस्म में कीड़े पड़ गये थे जिस की वजह से लोग आप से दूर होने लगे और आप को गाँव से बाहर निकाल दिया गया।
एक क़व्वाल ने ये तक कहा कि लोगों ने आप को वहाँ फेंक दिया जहाँ कूड़ा फेंका जाता है।
و لا حول ولا قوۃ الا باللہ العلی العظیم
हम ने इस वाक़िये के बारे में बाज़ उलमा-ए- अहले सुन्नत की तहक़ीक़ को जमा किया है ताकि इन बे-अस्ल बातों का रद्द हो सके और साथ में अस्ल वाक़िये से लोगो को रोशनास कराया जाये।
इस का जानना बहुत ज़रूरी है वरना अंबिया -ए- किराम की तरफ ऐसी बातें मंसूब करना एक मुसलमान के लिए उस के ईमान पर असर अंदाज़ हो सकता है।
जारी..........
अ़ब्दे मुस्तफा
हज़रत अय्यूब अ़लैहिस्सलाम अल्लाह के नबी हैं। आप हज़रत इस्हाक़ अ़लैहिस्सलाम की औलाद में से हैं। अल्लाह तआला ने आप को कसरते माल और औलाद से नवाज़ा था। आप पर एक वक़्त ऐसा आया कि अल्लाह पाक ने आप को आज़माइश में डाला और आप की औलाद और माल वग़ैरह आप से दूर हो गये।
अल्लाह की राह में उसके नेक बंदो की आज़माइश होती है और चूँकि अंबिया -ए- किराम ज़्यादा महबूब होते हैं तो उन की आज़माइश आम लोगों के मुक़ाबिल बड़ी होती हैं और फिर उनके दरजात को बे-हिसाब बुलंदी अ़ता की जाती है।
हज़रत अय्यूब अ़लैहिस्सलाम के सब्र की मिसाल दी जाती है। सब्रे अय्यूब का वाक़िया बहुत मशहूर है। अक्सर मुसलमानों को ना सिर्फ ये मालूम है बल्कि वो अपने मुश्किल वक़्त में इसे याद कर के इस से मदद भी लेते है। इस वाक़िये से मुतल्लिक़ कई बातें ऐसी मशहूर हो गई हैं जो दुरुस्त नहीं है। दुरुस्त ना होने के साथ ये बाते अंबिया -ए- किराम की शान के ख़िलाफ़ भी है। वो बातें कुछ इस तरह हैं कि आप के जिस्म में कीड़े पड़ गये थे जिस की वजह से लोग आप से दूर होने लगे और आप को गाँव से बाहर निकाल दिया गया।
एक क़व्वाल ने ये तक कहा कि लोगों ने आप को वहाँ फेंक दिया जहाँ कूड़ा फेंका जाता है।
و لا حول ولا قوۃ الا باللہ العلی العظیم
हम ने इस वाक़िये के बारे में बाज़ उलमा-ए- अहले सुन्नत की तहक़ीक़ को जमा किया है ताकि इन बे-अस्ल बातों का रद्द हो सके और साथ में अस्ल वाक़िये से लोगो को रोशनास कराया जाये।
इस का जानना बहुत ज़रूरी है वरना अंबिया -ए- किराम की तरफ ऐसी बातें मंसूब करना एक मुसलमान के लिए उस के ईमान पर असर अंदाज़ हो सकता है।
जारी..........
अ़ब्दे मुस्तफा
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حضرت ایوب کے واقعے پر تحقیق (قسط 1)
حضرت ایوب علیہ السلام اللہ کے نبی ہیں۔ آپ حضرت اسحاق علیہ السلام کی اولاد میں سے ہیں۔ اللہ تعالی نے آپ کو کثرت مال اور اولاد سے نوازا تھا۔ آپ پر ایک وقت ایسا آیا کہ اللہ تعالی نے آپ کو آزمائش میں ڈالا اور آپ کی اولاد اور مال وغیرہ آپ سے دور ہو گئے۔
اللہ کی راہ میں اس کے نیک بندوں کی آزمائش ہوتی ہے اور چوں کہ انبیاے کرام زیادہ محبوب ہوتے ہیں تو ان کی آزمائش عام لوگوں کے مقابل بڑی ہوتی ہے اور پھر ان کے درجات کو بے حساب بلندی عطا کی جاتی ہے۔
حضرت ایوب علیہ السلام کے صبر کی مثال دی جاتی ہے۔ صبر ایوب کا واقعہ بہت مشہور ہے۔ اکثر مسلمانوں کو نہ صرف یہ معلوم ہے بلکہ وہ اپنے مشکل وقت میں اسے یاد کر کے اس سے مدد بھی لیتے ہیں۔ اس واقعے سے متعلق کئی باتیں ایسی مشہور ہو گئی ہیں جو درست نہیں ہیں۔ درست نہ ہونے کے ساتھ یہ باتیں انبیاے کرام کے شان کے خلاف بھی ہیں۔ وہ باتیں کچھ اس طرح ہیں کہ آپ کے جسم میں کیڑے پڑ گئے تھے جس کی وجہ سے لوگ آپ سے دور ہونے لگے اور آپ کو گاؤں سے باہر نکال دیا گیا!
ایک قوال نے یہ تک کہا کہ لوگوں نے آپ کو وہاں پھینک دیا جہاں کوڑا پھینکا جاتا ہے۔
ولا حول ولا قوۃ الا باللہ العلی العظیم
ہم نے اس واقعے کے بارے میں بعض علماے اہل سنت کی تحقیقات کو جمع کیا ہے تاکہ ان بے اصل باتوں کا رد ہو سکے اور ساتھ میں اصل واقعے سے لوگوں کو روشناس کرایا جائے۔
اس کا جاننا بہت ضروری ہے ورنہ انبیاے کرام کی طرف ایسی باتیں منسوب کرنا ایک مسلمان کے لیے اس کے ایمان پر اثر انداز ہو سکتا ہے۔
جاری...
عبد مصطفی
حضرت ایوب علیہ السلام اللہ کے نبی ہیں۔ آپ حضرت اسحاق علیہ السلام کی اولاد میں سے ہیں۔ اللہ تعالی نے آپ کو کثرت مال اور اولاد سے نوازا تھا۔ آپ پر ایک وقت ایسا آیا کہ اللہ تعالی نے آپ کو آزمائش میں ڈالا اور آپ کی اولاد اور مال وغیرہ آپ سے دور ہو گئے۔
اللہ کی راہ میں اس کے نیک بندوں کی آزمائش ہوتی ہے اور چوں کہ انبیاے کرام زیادہ محبوب ہوتے ہیں تو ان کی آزمائش عام لوگوں کے مقابل بڑی ہوتی ہے اور پھر ان کے درجات کو بے حساب بلندی عطا کی جاتی ہے۔
حضرت ایوب علیہ السلام کے صبر کی مثال دی جاتی ہے۔ صبر ایوب کا واقعہ بہت مشہور ہے۔ اکثر مسلمانوں کو نہ صرف یہ معلوم ہے بلکہ وہ اپنے مشکل وقت میں اسے یاد کر کے اس سے مدد بھی لیتے ہیں۔ اس واقعے سے متعلق کئی باتیں ایسی مشہور ہو گئی ہیں جو درست نہیں ہیں۔ درست نہ ہونے کے ساتھ یہ باتیں انبیاے کرام کے شان کے خلاف بھی ہیں۔ وہ باتیں کچھ اس طرح ہیں کہ آپ کے جسم میں کیڑے پڑ گئے تھے جس کی وجہ سے لوگ آپ سے دور ہونے لگے اور آپ کو گاؤں سے باہر نکال دیا گیا!
ایک قوال نے یہ تک کہا کہ لوگوں نے آپ کو وہاں پھینک دیا جہاں کوڑا پھینکا جاتا ہے۔
ولا حول ولا قوۃ الا باللہ العلی العظیم
ہم نے اس واقعے کے بارے میں بعض علماے اہل سنت کی تحقیقات کو جمع کیا ہے تاکہ ان بے اصل باتوں کا رد ہو سکے اور ساتھ میں اصل واقعے سے لوگوں کو روشناس کرایا جائے۔
اس کا جاننا بہت ضروری ہے ورنہ انبیاے کرام کی طرف ایسی باتیں منسوب کرنا ایک مسلمان کے لیے اس کے ایمان پر اثر انداز ہو سکتا ہے۔
جاری...
عبد مصطفی
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100 साल की सहाबिया को धमकी
ज़ालिम हज्जाज बिन यूसुफ ने हज़रते अ़ब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर को शहीद किया और उनकी लाश को सूली पर लटका दिया। फिर उनकी वालिदा हज़रते अस्मा बिन्ते अबू बकर सिद्दीक़ को बुलावा भेजा तो आप रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हा ने साफ इंकार कर दिया।
उसने दोबारा पैगाम भेजा कि मेरे पास चली आओ वरना किसी ऐसे शख्स को भेजूँगा जो तुम्हारे बाल पकड़ कर घसीट कर ले आयेगा।
हज़रते अस्मा ने इंकार कर दिया और कहा कि कह दो कि अब मुझे कोई सर के बालों से ही घसीट कर ले जायेगा!
हज्जाज को खुद हज़रते अस्मा के पास आना पड़ा और उस वक़्त हज़रते अस्मा की उम्र तक़रीबन 100 साल थी पर कोई दांत ना गिरा था और ना अ़क्लो दनिश में कोई कमी थी।
हज्जाज ने कहा तूने देखा मैंने कैसे (तेरे बेटे) अल्लाह के दुश्मन (म'आज़ अल्लाह) को क़त्ल किया तो हज़रते अस्मा ने फ़रमाया कि तूने उसकी दुनिया खराब की और उसने तेरी आखिरत बर्बाद कर दी!
फिर आपने बे खौफ़ हज्जाज को जवाब देते हुये कहा कि हुज़ूर ﷺ से हमने एक कज़्ज़ाब और एक ज़ालिम के बारे में सुना था, कज़्ज़ाब तो हमने देख लिया (जिसने नबी होने का झूठा दावा किया) और वो ज़ालिम तू ही हो सकता है!
इसके बाद हज्जाज को बिना जवाब दिये वहाँ से जाना पड़ा और कहता भी क्या कि सामने एक ऐसी बहादुर खातून मौजूद थी जिन्होंने कई जंगे देखी और लड़ी थी।
(انظر: صحیح مسلم، کتاب فضائل صحابہ، باب ذکر کذاب... الخ، ح6373)
ये वो औरतें थी जिन की नस्लें बहादुर पैदा होती थी।
ज़ालिम बादशाह के सामने भी हक़ कहने से नहीं डरती थी।
आज जो औरतें अपने ही दीन के खिलाफ़ बोलती हुई नज़र आती है, उन्हें अपनी क़िस्मत पर रोना चाहिये कि इन ख़वातीन से फ़ैज़ ना ले सकी।
अल्लाह त'आला मुस्लिम खवातीन को ऐसा जज़्बा अ़ता फरमाये और हमारी नस्लों को मुजाहिदीन की सफ़ में खड़ा होने की तौफ़ीक़ अ़ता फरमाये जो इस्लाम, मुसलमान और मज़लूमों के दिफ़ा के लिये अपनी जान क़ुरबान कर दें।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
ज़ालिम हज्जाज बिन यूसुफ ने हज़रते अ़ब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर को शहीद किया और उनकी लाश को सूली पर लटका दिया। फिर उनकी वालिदा हज़रते अस्मा बिन्ते अबू बकर सिद्दीक़ को बुलावा भेजा तो आप रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हा ने साफ इंकार कर दिया।
उसने दोबारा पैगाम भेजा कि मेरे पास चली आओ वरना किसी ऐसे शख्स को भेजूँगा जो तुम्हारे बाल पकड़ कर घसीट कर ले आयेगा।
हज़रते अस्मा ने इंकार कर दिया और कहा कि कह दो कि अब मुझे कोई सर के बालों से ही घसीट कर ले जायेगा!
हज्जाज को खुद हज़रते अस्मा के पास आना पड़ा और उस वक़्त हज़रते अस्मा की उम्र तक़रीबन 100 साल थी पर कोई दांत ना गिरा था और ना अ़क्लो दनिश में कोई कमी थी।
हज्जाज ने कहा तूने देखा मैंने कैसे (तेरे बेटे) अल्लाह के दुश्मन (म'आज़ अल्लाह) को क़त्ल किया तो हज़रते अस्मा ने फ़रमाया कि तूने उसकी दुनिया खराब की और उसने तेरी आखिरत बर्बाद कर दी!
फिर आपने बे खौफ़ हज्जाज को जवाब देते हुये कहा कि हुज़ूर ﷺ से हमने एक कज़्ज़ाब और एक ज़ालिम के बारे में सुना था, कज़्ज़ाब तो हमने देख लिया (जिसने नबी होने का झूठा दावा किया) और वो ज़ालिम तू ही हो सकता है!
इसके बाद हज्जाज को बिना जवाब दिये वहाँ से जाना पड़ा और कहता भी क्या कि सामने एक ऐसी बहादुर खातून मौजूद थी जिन्होंने कई जंगे देखी और लड़ी थी।
(انظر: صحیح مسلم، کتاب فضائل صحابہ، باب ذکر کذاب... الخ، ح6373)
ये वो औरतें थी जिन की नस्लें बहादुर पैदा होती थी।
ज़ालिम बादशाह के सामने भी हक़ कहने से नहीं डरती थी।
आज जो औरतें अपने ही दीन के खिलाफ़ बोलती हुई नज़र आती है, उन्हें अपनी क़िस्मत पर रोना चाहिये कि इन ख़वातीन से फ़ैज़ ना ले सकी।
अल्लाह त'आला मुस्लिम खवातीन को ऐसा जज़्बा अ़ता फरमाये और हमारी नस्लों को मुजाहिदीन की सफ़ में खड़ा होने की तौफ़ीक़ अ़ता फरमाये जो इस्लाम, मुसलमान और मज़लूमों के दिफ़ा के लिये अपनी जान क़ुरबान कर दें।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
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100 سال کی صحابیہ کو دھمکی
ظالم حجاج بن یوسف نے حضرت عبداللہ بن زبیر کو شہید کیا اور ان کی لاش کو سولی پر لٹکا دیا پھر ان کی والدہ حضرت اسما بنت ابو بکر صدیق کو بلاوا بھیجا تو آپ رضی اللہ عنھا نے صاف انکار کر دیا۔
اُس نے دوبارہ پیغام بھیجا کہ میرے پاس چلی آؤ ورنہ کسی ایسے شخص کو بھیجوں گا جو تمھارے بال پکڑ کر گھسیٹ کر لے آئے گا۔
حضرت اسما نے انکار کر دیا اور کہا، کَہ دو کہ اب مجھے کوئی سر کے بالوں سے ہی گھسیٹ کر لے جائے گا!
حجاج کو خود حضرت اسما کے پاس آنا پڑا اور اس وقت حضرت اسما کی عمر تقریباً 100 سال تھی پر کوئی دانت نہ گرا تھا اور نہ عقل و دانش میں کوئی کمی تھی۔
حجاج نے کہا تو نے دیکھا میں نے کیسے (تیرے بیٹے) اللہ کے دشمن (معاذ اللہ) کو قتل کیا تو حضرت اسما نے فرمایا کہ تو نے اُس کی دنیا خراب کی اور اُس نے تیری آخرت برباد کر دی!
پھر آپ نے بے خوف حجاج کو جواب دیتے ہوئے کہا کہ حضور صلی اللہ علیہ وسلم سے ہم نے ایک کذاب اور ایک ظالم کے بارے میں سنا تھا، کذاب تو ہم نے دیکھ کیا (جس نے نبی ہونے کا جھوٹا دعوی کیا) اور وہ ظالم تو ہی ہو سکتا ہے!
اُس کے بعد حجاج کو بغیر جواب دیے وہاں سے جانا پڑا اور کہتا بھی کیا کہ سامنے ایسی بہادر خاتون موجود تھی جنھوں نے کئی جنگیں دیکھی اور لڑیں تھی۔
(انظر : صحیح المسلم، کتاب فضائل صحابہ، باب ذکرِ کذاب... الخ، حدیث: ۶۳۷۳)
یہ وہ عورتیں تھیں جن کی نسلیں بہادر پیدا ہوتی تھی۔
ظالم بادشاہ کے سامنے بھی حق کہنے سے ڈرتی نہیں تھیں۔
آج جو عورتیں اپنے ہی دین کے خلاف بولتی ہوئی نظر آتی ہیں، انھیں اپنی قسمت پر رونا چاہیے کہ ان خواتین سے فیض نہ لے سکیں۔
اللہ تعالی مسلم خواتین کو ایسا جذبہ عطا فرمائے اور ہماری نسلوں کو مجاہدین کی صف میں کھڑا ہونے کی توفیق عطا فرمائے جو اسلام، مسلمان اور مظلوموں کے دفاع کے لیے اپنی جان قربان کر دیں۔
عبد مصطفی
ظالم حجاج بن یوسف نے حضرت عبداللہ بن زبیر کو شہید کیا اور ان کی لاش کو سولی پر لٹکا دیا پھر ان کی والدہ حضرت اسما بنت ابو بکر صدیق کو بلاوا بھیجا تو آپ رضی اللہ عنھا نے صاف انکار کر دیا۔
اُس نے دوبارہ پیغام بھیجا کہ میرے پاس چلی آؤ ورنہ کسی ایسے شخص کو بھیجوں گا جو تمھارے بال پکڑ کر گھسیٹ کر لے آئے گا۔
حضرت اسما نے انکار کر دیا اور کہا، کَہ دو کہ اب مجھے کوئی سر کے بالوں سے ہی گھسیٹ کر لے جائے گا!
حجاج کو خود حضرت اسما کے پاس آنا پڑا اور اس وقت حضرت اسما کی عمر تقریباً 100 سال تھی پر کوئی دانت نہ گرا تھا اور نہ عقل و دانش میں کوئی کمی تھی۔
حجاج نے کہا تو نے دیکھا میں نے کیسے (تیرے بیٹے) اللہ کے دشمن (معاذ اللہ) کو قتل کیا تو حضرت اسما نے فرمایا کہ تو نے اُس کی دنیا خراب کی اور اُس نے تیری آخرت برباد کر دی!
پھر آپ نے بے خوف حجاج کو جواب دیتے ہوئے کہا کہ حضور صلی اللہ علیہ وسلم سے ہم نے ایک کذاب اور ایک ظالم کے بارے میں سنا تھا، کذاب تو ہم نے دیکھ کیا (جس نے نبی ہونے کا جھوٹا دعوی کیا) اور وہ ظالم تو ہی ہو سکتا ہے!
اُس کے بعد حجاج کو بغیر جواب دیے وہاں سے جانا پڑا اور کہتا بھی کیا کہ سامنے ایسی بہادر خاتون موجود تھی جنھوں نے کئی جنگیں دیکھی اور لڑیں تھی۔
(انظر : صحیح المسلم، کتاب فضائل صحابہ، باب ذکرِ کذاب... الخ، حدیث: ۶۳۷۳)
یہ وہ عورتیں تھیں جن کی نسلیں بہادر پیدا ہوتی تھی۔
ظالم بادشاہ کے سامنے بھی حق کہنے سے ڈرتی نہیں تھیں۔
آج جو عورتیں اپنے ہی دین کے خلاف بولتی ہوئی نظر آتی ہیں، انھیں اپنی قسمت پر رونا چاہیے کہ ان خواتین سے فیض نہ لے سکیں۔
اللہ تعالی مسلم خواتین کو ایسا جذبہ عطا فرمائے اور ہماری نسلوں کو مجاہدین کی صف میں کھڑا ہونے کی توفیق عطا فرمائے جو اسلام، مسلمان اور مظلوموں کے دفاع کے لیے اپنی جان قربان کر دیں۔
عبد مصطفی
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