🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹
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یہاں روزانہ اسلامی تاریخ اور بزرگانِ دین و علمائے ربانیین کی تاریخ ولادت و تاریخ وفات اور دینی باتیں (فوٹو،پوسٹ) تاریخ اور مہینے کی مناسبت سے مع کتابوں کی لِنکس بھیجی جاتی ہیں
طالب دعا 🤲
محمد جمال الدین خان قادری رضوی عفی عنہ
🆔 @Muhammad_Jamaluddin_Khan
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आँखें नम कर देने वाली यादें

नबी -ए- करीम ﷺ की लाडली बेटी हज़रते सय्यिदा ज़ैनब रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हु का निकाह हज़रते अबुल आस रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हु से हुआ था। हज़रते अबुल आस जंगे बद्र में मुशरिकीन तरफ़ से थे और जंग के बाद क़ैद किये गये।

मक्का वाले अपने लोगों को रिहा कराने के लिये फिदया भेज रहे थे तो हज़रते सय्यिदा आइशा रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हा फ़रमाती हैं कि हज़रते ज़ैनब ने भी अपने शौहर के फिदये में कुछ माल भिजवाया और उस में वो हार भी था जो हज़रते खदीजा ने उन्हें शादी के मौक़े पर दिया था।

हज़रते आइशा कहती हैं कि जब हुज़ूर ﷺ ने वो हार देखा तो आप पर रिक़्क़त तारी हो गई।
आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अगर तुम सब मुनासिब समझो तो इस क़ैदी को रिहा कर दो और ये हार भी इसे वापस कर दो (अल्लाह, अल्लाह ज़रा तसव्वुर करें कि क्या मंज़र होगा)

लोगों ने अ़र्ज़ की कि या रसूलल्लाह! क्यों नहीं, आप का हुक्म सर आँखों पर!
फिर उन्हें रिहा कर दिया गया और हुज़ूर ﷺ ने उन से अहद लिया कि हज़रते ज़ैनब को मदीना आने देंगे और फिर कुछ अर्से बाद हुज़ूर ने अपनी प्यारी बेटी को मदीना बुलवा लिया।

(ملخصاً: ابو داؤد، کتاب الجہاد، حدیث2692)

ज़रा गौर करें कि हक़ की राह में कैसे-कैसे हालात सामने आते हैं।
आज का अगर कोई अमन परस्त शख्स कहता है कि हमें लड़ने झगड़ने की ज़रूरत नहीं बल्कि मिल कर रहना है और सब को अपने दीन पर छोड़ देना है तो वो बिल्कुल गलत कहता है।
ये हक़ की राह है, इस में सिर्फ खुद को नहीं बल्कि अपनो को भी तकलीफ़ उठानी पड़ती है। जो इस राह पर चलते हैं उन्हें बहुत कुछ देखना पड़ता है।

अ़ब्दे मुस्तफ़ा
آنکھیں نم کر دینے والی یادیں

نبئ کریم ﷺ کی لاڈلی بیٹی حضرت سیدہ زینب رضی اللہ تعالی عنھا کا نکاح حضرت ابو العاص رضی اللہ تعالی عنہ سے ہوا تھا۔
حضرت ابو العاص جنگ بدر میں مشرکین کی طرف سے تھے اور جنگ کے بعد قید کیے گئے۔

مکہ والے اپنے لوگوں کو رہا کرانے کے لیے فدیہ بھیج رہے تھے تو حضرت سیدہ عائشہ رضی اللہ تعالی عنھا فرماتی ہیں کہ حضرت زینب نے بھی اپنے شوہر کے فدیے میں کچھ مال بھجوایا اور اس میں وہ ہار بھی تھا جو حضرت خدیجہ نے انھیں شادی کے موقعے پر دیا تھا۔

حضرتِ عائشہ کہتی ہیں کہ جب حضور ﷺ نے وہ ہار دیکھا تو آپ پر رقت طاری ہوگئی۔
آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا کہ اگر تم سب مناسب سمجھو تو اس قیدی کو رہا کر دو اور یہ ہار بھی اسے واپس کر دو۔
(اللہ اللہ ذرا تصور کریں کہ کیا منظر ہوگا)

لوگوں نے عرض کی کہ یا رسول اللہ کیوں نہیں، آپ کا حکم سر آنکھوں پر!

پھر انھیں رہا کر دیا گیا اور حضور ﷺ نے ان سے عہد لیا کہ وہ حضرت زینب کو مدینہ آنے دیں گے اور پھر کچھ عرصے بعد حضور نے اپنی پیاری بیٹی کو مدینہ بلوا لیا۔

(ملخصاً: ابو داؤد، کتاب الجہاد، حدیث 2692)

ذرا غور کریں کہ حق کی راہ میں کیسے کیسے حالات سامنے آتے ہیں۔
آج کا اگر کوئی امن پرست شخص کہتا ہے کہ ہمیں لڑنے جھگڑنے کی ضرورت نہیں بلکہ مل کر رہنا ہے اور سب کو اپنے دین پر چھوڑ دینا ہے تو وہ بالکل غلط کہتا ہے۔ یہ حق کی راہ ہے اس میں صرف خود کو نہیں بلکہ اپنوں کو بھی تکلیف اٹھانی پڑتی ہے۔
جو اس راہ پر چلتے ہیں انھیں بہت کچھ دیکھنا پڑتا ہے۔

عبد مصطفی
Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
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एक बीवी संभलती नहीं, तो चार कैसे?

ये जुमला बिल्कुल ऐसा है कि एक चक्के से गाड़ी चलती नहीं, तो चार से कैसे चलेगी?
चलिए, जब एक नहीं संभलती तो एक शादी भी क्यूँ करते हैं?
होना तो ये चाहिए कि आप भी उन औलिया की सीरत पर अ़मल करें, जिन्होंने औरतों के ह़ुक़ूक़ के ख़ौफ़ से निकाह़ न किया, जैसा कि हज़रत बिश्-र बिन ह़ारिस़ (रह़िमहुल्लाहु तआ़ला) फरमाते हैं कि मुझे किताबुल्लाह की एक आयत ने निकाह़ से रोक रखा है, कि 'औरतों के ह़ुक़ूक़ हैं', और शायद मैं इसे अदा न कर सकूं!

(देखें: "क़ूतुल् क़ुलूब़", जिल्द: 2, सफ़ा: 816)

अगर एक नहीं संभलती, जिसका मतलब है ह़ुक़ूक़ अदा नहीं हो पाते, तो फिर क्यूँ आप अपने लिए अ़ज़ाब का सामान तैयार कर रहे हैं? आपको तो चाहिए कि इन सूफ़िया की सीरत पर अ़मल करें. अब आप कहेंगे कि हम उन जैसे नहीं हैं, और जब चार शादियों की बात आती है तो भी यही कहा जाता है कि हम पहले वालों जैसे नहीं हैं।
आपको तय कर लेना चाहिए कि आप हैं क्या? और अगर आप बिल्कुल अलग हैं तो क्या आपने अपना दीन भी अलग कर लिया है?

अस्ल में बात ह़ुक़ूक़ की नहीं, क्यूंकि कसरत से ऐसे लोग मौजूद हैं जो 4 बीवियों के ह़ुक़ूक़ आसानी से अदा कर सकते हैं, यहां बात है मुआ़शरे के बनाए हुए बेबुनियाद उसूलों की।
आज अगर हिंदो पाक के अक्सर इलाक़ों में दूसरी शादी की जाए, तो लोग उसे अ़जीब नज़र से देखते हैं, और तरह तरह की बातें करते हैं, आख़िर ऐसा क्यूँ?
इसे ख़त्म करना होगा, ताकि एक मर्द फ़ितरत के मुत़ाबिक़ जाइज़ तरीक़े से फ़ायदा उठा सके, और निकाह़ को आ़म और आसान किया जा सके।
अगर ये न हुआ, तो औरतों की तादाद वैसे भी ज़्यादा है और आगे मज़ीद ज़्यादा हो जाएगी, फिर ज़िना की कसरत होगी, और हम कुछ न कर सकेंगे।

अ़ब्दे मुस्त़फ़ा
ایک بیوی سنبھلتی نہیں تو 4 کیسے؟

یہ جملہ بالکل ایسا ہے کہ ایک چکّے سے گاڑی چلتی نہیں تو 4 سے کیسے چلے گی؟
چلیے جب ایک نہیں سنبھلتی تو آپ ایک شادی بھی کیوں کرتے ہیں؟

ہونا تو یہ چاہیے کہ آپ بھی ان اولیا کی سیرت پر عمل کریں جنھوں نے عورتوں کے حقوق کے خوف سے نکاح نہ کیا جیسا کہ حضرت بشر بن حارث رحمۃ اللہ علیہ فرماتے ہیں کہ مجھے کتاب اللہ کی ایک آیت نے نکاح سے روک رکھا ہے کہ عورتوں کے حقوق ہیں اور شاید میں ادا نہ کر سکوں!

(انظر :قوت القلوب، ج2،ص81)

اگر ایک نہیں سنبھلتی جس کا مطلب ہے کہ حقوق ادا نہیں ہو پاتے تو پھر کیوں آپ اپنے لیے عذاب کا سامان تیار کر رہے ہیں آپ کو تو چاہیے کہ ان صوفیا کی سیرت پر عمل کریں!
اب آپ کہیں گے کہ ہم ان جیسے نہیں ہیں اور جب چار شادیوں کی بات آتی ہے تو بھی یہی کہا جاتا ہے کہ ہم پہلے والوں جیسے نہیں ہیں، اب آپ کو طے کر لینا چاہیے کہ آپ ہیں کیا؟
اور اگر آپ بالکل الگ ہیں تو کیا آپ نے اپنا دین بھی الگ کرلیا ہے؟

اصل میں بات حقوق کی نہیں کیونکہ کثرت سے ایسے لوگ موجود ہیں جو چار بیویوں کے حقوق آسانی سے ادا کر سکتے ہیں۔ یہاں بات ہے معاشرے کے بنائے ہوئے بے بنیادی اصولوں کی!
آج اگر ہند و پاک کے اکثر علاقوں میں دوسری شادی کی جائے تو لوگ اسے عجیب نظروں سے دیکھتے ہیں اور طرح طرح کی باتیں کرتے ہیں، آخر ایسا کیوں؟

اسے ختم کرنا ہوگا تاکہ ایک مرد فطرت کے مطابق جائز طریقے سے فائدہ اٹھا سکے اور نکاح کو عام اور آسان کیا جاسکے۔ اگر یہ نہ ہوا تو عورتوں کی تعداد ویسے بھی زیادہ ہے اور آگے مزید زیادہ ہو جائیں گی پھر زنا کی کثرت ہوگی اور ہم کچھ نہ کر سکیں گے!

عبد مصطفی
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अ़ब्दे मुस्तफ़ा : बस एक नाम नहीं पहचान है।

अ़ब्दे मुस्तफ़ा, ये नाम किसी शख्स या किसी तन्ज़ीम के लिये खास नहीं बल्कि हर सुन्नी अ़ब्दे मुस्तफ़ा है।
जिस जिस के आक़ा मुस्तफ़ा करीम हैं वो अ़ब्दे मुस्तफ़ा है।

जैसे सब का खुदा एक है वैसे ही
इनका उनका तुम्हारा हमारा नबी

अ़ब्दे मुस्तफ़ा एक नाम ही नहीं बल्कि हक़ और बातिल के दरमियान एक पहचान है। खुद को अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहने से कतराने वाले और इस में शिर्क का पहलू ढूँढने वाले खुद की निशान देही कर देते हैं कि वो किस तरफ हैं।

आप खुद को अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहें, अ़ब्दे मुस्तफ़ा लिखें, हर सुन्नी फख्र के साथ कहे कि हाँ मैं हूँ अ़ब्दे मुस्तफ़ा!

देव के बन्दों से हम को क्या गर्ज़
हम हैं अ़ब्दे मुस्तफ़ा फिर तुझ को क्या

जो सिर्फ़ अ़ब्दुल्लाह होने का दावा करते हैं और अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहलाने में जिन्हें शिर्क नज़र आता है वो जान लें कि जब तक कोई हुज़ूर ﷺ को अपना मालिक ना माने तब तक वो ईमान की मिठास नहीं पा सकता।

खौफ़ ना रख रज़ा ज़रा, तू तो है अ़ब्दे मुस्तफ़ा
तेरे लिये अमान है, तेरे लिये अमान है

इबादतें ज़रूरी हैं इंकार नहीं पर जब हम अ़ब्दे मुस्तफ़ा हैं तो,

हम रसूलुल्लाह के, जन्नत रसूलुल्लाह की

हम सब अ़ब्दे मुस्तफ़ा हैं, ये नाम हमारा अ़क़ीदा है, ये नाम हमारी पहचान है और ये नाम हमन दूसरों से अलग करता है।

अ़ब्दे मुस्तफ़ा
عبد مصطفی : بس ایک نام نہیں پہچان ہے

عبد مصطفی، یہ نام کسی شخص یا تنظیم کے لیے خاص نہیں بلکہ ہر سنی عبد مصطفٰی ہے۔
جس جس کے آقا مصطفی کریم ہیں وہ عبد مصطفی ہے۔

جیسے سب کہ خدا ایک ہے ویسے ہی
ان کا اُن کا تمھارا ہمارا نبی

عبد مصطفی ایک نام نہیں بلکہ حق اور باطل کے درمیان پہچان ہے۔
خود کو عبد مصطفی کہنے سے کترانے والے اور اس میں شرک کا پہلو ڈھونڈنے والے خود ہی نشان دہی کر دیتے ہیں کہ وہ کس طرف ہیں۔

آپ خود کو عبد مصطفی کہیں، عبد مصطفی لکھیں، ہر سنی فخر کے ساتھ کہے کے ہاں میں عبد مصطفی ہوں۔

دیو کے بندوں سے ہمکو کیا غرض
ہم ہیں عبد مصطفی پھر تُجھ کو کیا

جو صرف عبداللہ ہونے کا دعویٰ کرتے ہیں اور عبد مصطفی کہلانے میں جنھیں شرک نظر آتا ہے وہ جان لیکن کہ جب تک کوئی حضور صلی اللہ علیہ وسلم کو اپنا مالک نہ مانے تب تک وہ ایمان کی مٹھاس نہیں پا سکتا ہے۔

خوف نہ رکھ رضا ذرا، تُو تو ہے عبد مصطفٰی
تیرے لیے امان ہے تیرے لیے امان ہے

عبادتیں ضروری ہیں، انکار نہیں پر جب ہم عبد مصطفٰی ہیں تو،

ہم رسول اللہ کے جنت رسول اللہ کی

ہم سب عبد مصطفی ہیں، یہ نام ہمارا عقیدہ ہے، یہ نام ہماری پہچان ہے اور یہ نام ہمیں دوسروں سے الگ الگ کرتا ہے۔

عبد مصطفیٰ
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नबी की तरफ बद्दुआ की निस्बत

हुज़ूर -ए- अकरम सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम की तरफ बद्दुआ की निस्बत करना सही नहीं है।
अगर आप ने किसी के खिलाफ दुआ की है तो भी उसे बद्दुआ कहना बेअदबी है।
आपका कोई फेल बद नहीं है।

बुखारी शरीफ की एक रिवायत की शरह में देवबंदीयों ने सराहत के साथ बद्दुआ की निस्बत हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैहि वसल्लम की तरफ की है यह हरगिज़ दुरुस्त नहीं।

अल्लामा गुलाम रसूल सईदी रहिमहुल्लाहू त'आला ने बुखारी शरीफ की शरह करते हुए कई जगह इस पर बहस की है
पहेली जिल्द सफाह 705 पर और इससे पहले भी फिर जिल्द 13 सफाह 806 और चंद मकामात पर लिखते हैं की हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम का कोई अमल बद नहीं बल्कि हर अमल हसन है लिहाज़ा हुज़ूर ने जो दुआ -ए- ज़रर फरमाई उसे बद्दुआ कहना नाजायज़ है।

(انظر: نعم الباری)

इससे मालूम हुआ के अगर ऐसी रिवायात मिलती हैं जिन में आक़ा -ए- करीम ने गुस्ताखों के लिए दुआ -ए- ज़रर फरमाई तो उसे बद्दुआ नहीं कहेंगे बल्कि इस तरह कहेंगे कि उनके खिलाफ दुआ की या दुआ -ए- ज़रर फरमाई।

अब्दे मुस्तफ़ा
نبی کی طرف بددعا کی نسبت

حضور اکرم ﷺ کی طرف بددعا کی نسبت کرنا صحیح نہیں ہے۔
اگر آپ نے کسی کے خلاف دعا کی ہے تو بھی اسے بددعا کہنا بے ادبی ہے۔
آپ کا کوئی فعل بد نہیں ہے۔

بخاری شریف کی ایک روایت کی شرح میں دیوبندیوں نے صراحت کے ساتھ بددعا کی نسبت حضور ﷺ کی طرف کی ہے، یہ ہرگز درست نہیں.

علامہ غلام رسول سعیدی رحمہ اللہ تعالى نے بخاری شریف کی شرح کرتے ہوئے کئی جگہ اس پر بحث کی ہے۔
پہلی جلد، صفحہ 705 پر اور اس سے پہلے بھی پھر جلد 13، صفحہ 806 اور چند مقامات پر لکھتے ہیں کہ حضور ﷺ کا کوئی عمل بد نہیں بلکہ ہر عمل حسن ہے لہذا حضور ﷺ نے جو دعاے ضرر فرمائی اسے بددعا کہنا ناجائز ہے۔

(انظر: نعم الباری)

اس سے معلوم ہوا کہ اگر ایسی روایات ملتی ہیں جن میں آقاے کریم نے گستاخوں کے لیے بددعا فرمائی تو اسے بددعا نہیں کہیں گے بلکہ اس طرح کہیں گے کہ ان کے خلاف دعا کی ہے یا دعاے ضرر فرمائی۔

عبد مصطفیٰ
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रैप सौंग्स और नात

नात सुनने से इश्के रसूल में इजाफ़ा होता और ये एक इबादत भी है पर इसे भी कुछ लोगों ने खेल कूद का सामान बना लिया है!
कुछ नात पढ़ने वाले गानों की तर्ज़ को अपनाते हैं और कुछ रैप स्टाइल में नात पढ़ते हैं।
इनसे परहेज करना जरूरी है।

बहरुल उलूम अल्लामा मुफ्ती अब्दुल मन्नान आज़मी रहिमहुल्लाहु त्आला लिखते है के अशआर और गीतों के मुख्तलफ वजन और बहरें होती है जिनमें हर किस्म के मज़मून को नज़्म किया जा सकता है और मुखतलफ लहजे और धुन में गाया जा सकता है इसलिए कोई कायदा ए कुल्लिया नहीं बताया जा सकता के फुला फुला तर्ज़ पर नात पढ़नी चाहिए और फुला पर नहीं।
हर नात शरीफ के लिए पुर वक़ार और संजीदा लबो लेहजा होना चाहिए और गैर मुहज्जब लबो लहजे से परहेज़ करना चाहिए।

(فتاوی بحر العلوم، ج5، ص329)

मुफ्ती मुहम्मद क़ासिम जियाउल क़ादरी लिखते है के मशहूर गानों की तर्ज़ पर नात पढ़ना मना है लिहाजा इससे एहतिराज किया जाए।
हां अगर किसी ने नात पर कोई तर्ज़ लगाई और बाद में किसी ने उसी तर्ज पर गाना गाया तो अब उस तर्ज़ पर नात पढ़ने में हरज नहीं।

(فتاوی یورپ و برطانیہ، ص 385)

अब्दे मुस्तफा
ریپ سانگس (Rap Songs) اور نعت

نعت سننے سے عشق رسول میں اضافہ ہوتا ہے اور یہ ایک عبادت بھی ہے پر اسے بھی کچھ لوگوں نے کھیل کود کا سامان بنا لیا ہے!
کچھ نعت پڑھنے والے گانوں کی طرز کو اپناتے ہیں اور کچھ ریپ (Style) میں نعت پڑتے ہیں؛ ان سے پرہیز کرنا ضروری ہے۔

بحرالعلوم علامہ مفتی عبدالمنان اعظمی رحمہ اللہ لکھتے ہیں کہ اشعار اور گیتوں کے مختلف وزن اور بحریں ہوتی ہیں جن میں ہر قسم کے مضمون کو نظم کیا جا سکتا ہے اور مختلف لہجے اور دھن میں گایا جاسکتا ہے اس لیے کوئی قاعدۂ کلیہ نہیں بتایا جا سکتا کہ فلاں فلاں طرز پر نعت پڑھنی چاہیے اور فلاں پر نہیں!
ہاں نعت شریف کے لیے پروقار اور سنجیدہ لب و لہجہ ہونا چاہیے اور غیر مہذب لب و لہجے سے پرہیز کرنا چاہیے۔

(فتاوی بحر العلوم، ج5، ص329)

مفتی محمد قاسم ضیاء القادری لکھتے ہیں کہ مشہور گانوں کی طرز پر نعت پڑھنا منع ہے لہٰذا اس سے احتراز کیا جائے
ہاں اگر کسی نے نعت پر کوئی اور طرز لگائی اور بعد میں کسی نے اسی طرز پر گانا گایا تو اب اس طرز پر نعت پڑھنے میں ہرج نہیں۔

(فتاوی یورپ و برطانیہ، ص385)

عبد مصطفی
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औरत चाहे तो

हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदीअल्लाहु त'आला अन्हु की साहिबज़ादी हज़रते असमा रदिअल्लाहु त'आला अन्हा का ये वाकिया तमाम औरतों के लिए सबक है।

जब मदीने की तरफ हिजरत के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के साथ हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदीअल्लाहु त'आला अन्हु रवाना होने लगे तो अपना सारा माल ले लिए जो हज़ारों दिरहम पर मुश्तमिल था।
जब आपने सारा माल ले लिया तो हज़रते अस्मा फरमाती है कि मेरे दादा हज़रत अबू कुहाफ़ा तशरीफ लाए आप उस वक्त देख नहीं पाते थे और मुझसे कहने लगे कि मेरा ख्याल है कि अबू बकर ने तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा है और सब कुछ ले लिया है।

हज़रते असमा उन्हें घर के अंदर ले गई और कहा ऐसा नहीं है दादा जान! उन्होंने काफी माल छोड़ा है और फिर आपने पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े जमा कर के उस पर कपड़ा रख दिया और जहां हज़रत अबू बकर माल रखते थे वहां रख कर अपने दादा को ले गई और उनका हाथ उस पर रखवा कर कहा की देखीए हमारे लिए काफी माल छोड़कर गए हैं! (अल्लाहु अकबर)

दादा ने कहा कि कोई बात नहीं, जब इतना माल है तो आराम से तुम्हारा गुज़ारा हो सकता है।
आप फरमाती है के अल्लाह की कसम मेरे वालिद ने कुछ भी नहीं छोड़ा था लेकिन मैंने ये हिला सिर्फ दादा को तसल्ली देने के लिए किया था

(حلیۃ الاولیاء و طبقات الاصفیاء، ج2، ص97 و مسند احمد بن حنبل)

अगर औरत चाहे तो अपने शौहर, अपने बाप और अपनी भाई की इज़्ज़त की मुहाफिज़ बन सकती है अगर वह शिकायतें करना शुरू कर दें तो ईज़्ज़त का जनाजा भी निकाल सकती हैं।
सही कहते हैं की कामयाब मर्द के पीछे कहीं ना कहीं औरत का भी हाथ होता है।

अब्दे मुस्तफ़ा
عورت چاہے تو

حضرت ابو بکر صدیق رضی اللہ عنہ کی صاحبزادی حضرت اسما رضی اللہ تعالی عنھا کا یہ واقعہ تمام عورتوں کے لیے ایک سبق ہے۔

جب مدینہ کی طرف ہجرت کے لیے حضور ﷺ کے ساتھ حضرت ابو بکر صدیق رضی اللہ تعالی عنہ روانہ ہونے لگے تو اپنا سارا مال لے لیا جو ہزاروں درہم پر مشتمل تھا۔ جب آپ نے سارا مال لے لیا تو حضرت اسما فرماتی ہیں کہ میرے دادا حضرت ابو قحافہ تشریف لائے (آپ اس وقت دیکھ نہیں پاتے تھے) اور مجھ سے کہنے لگے کہ میرا خیال ہے کہ ابو بکر نے تمھارے لیے کچھ بھی نہیں چھوڑا ہے اور سب کچھ لے لیا ہے۔

حضرت اسما انھیں گھر کہ اندر لے گئیں اور کہا ایسا نہیں ہے دادا جان! انھوں نے کافی مال چھوڑا ہے اور پھر آپ نے پتھر کے چھوٹے چھوٹے ٹکڑے جمع کر کے اس پر کپڑا رکھ دیا اور جہاں حضرت ابو بکر مال رکھتے تھے وہاں رکھ کر اپنے دادا کو لے گئی اور ان کا ہاتھ اس پر رکھوا کر کہا کہ دیکھیے ہمارے لیے کافی مال چھوڑ گئے ہیں! (اللہ اکبر)

دادا نے کہا کہ کوئی بات نہیں، جب اتنا مال ہے تو آرام سے تمھارا گزارا ہو سکتا ہے۔
آپ فرماتی ہیں کہ اللہ کی قسم میرے والد نے کچھ بھی نہیں چھوڑا تھا لیکن میں نے یہ حیلہ صرف دادا کو تسلی دینے کے لیے کیا تھا۔

(حلیۃ الاولیاء و طبقات الاصفیاء، ج2، ص97 و مسند احمد بن حنبل)

اگر عورت چاہے تو اپنے شوہر، اپنے باپ اور اپنے بھائی کی عزت کی محافظ بن سکتی ہے۔
اگر وہ شکایتیں کرنا شروع کر دے تو عزت کا جنازہ بھی نکال سکتی ہیں۔
صحیح کہتے ہیں کہ کامیاب مرد کے پیچھے کہیں نا کہیں عورت کا بھی ہاتھ ہوتا ہے۔

عبد مصطفی
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बुरी सोहबत का बुरा नतीजा

हज़रत अ़ल्लामा मुहम्मद बिन अहमद ज़हबी रहमतुल्लाह अ़लैह फरमाते हैं : एक शख्स शराबियो की सोहबत में बैठा था। जब उसकी मौत का वक़्त क़रीब आया तो किसी ने कलिमा शरीफ पढ़ने की तलकीन की तो कहने लगा : "तुम पियो और मुझे भी पिलाओ।"

मआज़ अल्लाह बगैर कलमा पढ़े मर गया।

(کتاب الکبائر،ص١٠٣، فیضانِ سنت،ص۴۳۵)

बुरी सोहबत वाक़ई दुनिया व आखिरत में नुक़्सान का बाइस है और अच्छी सोहबत दुनिया व आखिरत दोनों के लिए फाइदेमंद।

जो लोग ये कहते हैं कि हम थोड़ी ये बुराई कर रहे हैं हम तो बस उनके साथ बैठ रहे, वो बड़े धोके में है कि आज ना सही मगर एक दिन वो भी इस बुराई में मुलव्विस हो ही जायेगा जिस बुराई करने वालों के साथ वो बैठे उठे हैं।

इंसान कोइले की भट्टी के क़रीब से भी गुज़रे तो कपड़े ख़राब हो जाते है। ऐसे ही बुरी सोहबतें है जो आप पर अपना बुरा रंग चढ़ा देती है और आप को अंदाज़ा भी नहीं होता।

इसीलिये इंसान अगर दुनिया व आखिरत की भलाई चाहता है तो अच्छों की मजलिस में बैठे और बुरी सोहबतों से परहेज़ करे।

अ़ब्दे मुस्तफ़ा
بری صحبت کا برا نتیجہ

حضرت علامہ محمد بن احمد ذہبی رحمۃ اللہ علیہ فرماتے ہیں:
ایک شخص شرابیوں کی صحبت میں بیٹھتا تھا جب اس کی موت کا وقت قریب آیا تو کسی نے کلمہ شریف کی تلقین کی تو کہنے لگا :
"تم بھی پیو اور مجھے بھی پلاؤ "

معاذاللہ بغیر کلمہ پڑھے مرگیا۔

(کتاب الکبائر، ص103، فیضان سنت، ص425)

بری صحبت واقعی دنیا و آخرت میں نقصان کا باعث ہے اور اچھی صحبت دنیا و آخرت دونوں کے لیے فائدے مند۔

جو لوگ یہ کہتے ہیں کہ ہم تھوڑی یہ برائی کررہے ہیں ہم تو بس ان کے ساتھ بیٹھ رہے ہیں وہ بڑے دھوکے میں ہیں کہ آج نہ سہی مگر ایک دن وہ بھی اس برائی میں ملوث ہوہی جائیں گے جس برائی کے کرنے والوں کے ساتھ وہ بیٹھتے اٹھتے ہیں ۔

انسان کوئلے کی بھٹی کے قریب سے بھی گزرے تو کپڑے خراب ہوہی جاتے ہیں۔ ایسے ہی بری صحبتیں ہیں جو آپ پر اپنا برا رنگ چڑھادیتی ہیں اور آپ کو اندازہ بھی نہیں ہوتا۔

اس لیے انسان اگر دنیا و آخرت کی بھلائی چاہتا ہے تو اچھوں کی مجلس میں بیٹھے اور بری صحبتوں سے پرہیز کریں۔

عبدِ مصطفی
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