Forwarded from Abde Mustafa Organisation
सूफी के लिये भी शरीअत है
इमाम शारानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है के ऐक ऐसा शख्स मेरे पास आया जिसके साथ इसके मुअतक़ीदीन की एक जमाअत थी, वो शख्स बे इल्म था.
उस को फना व बका मे कोई ज़ौक़ हासिल ना था, मेरे पास चंद रोज़ ठहरा, मेने उससे एक दीन पुछा के वुज़ू और नमाज की शर्ते बताओ क्या है?
कहने लगा के मेने इल्म हासिल नहीं किया.
मेने कहा : भाई, क़ुरानो सुन्नत के जाहिर पर इबादत का सही करना लाजिम है।
जो शख्स वाजिब और मुस्तहब, हराम और मकरुह मे फर्क़ नही जानता वो तो जाहिल है और जाहिल की इक़्तेदा ना जाहिर मे दुरुस्त है ना बातिन मे, उस ने इसका कोई जवाब ना दिया और चला गया; अल्लाह तआला ने मुझे उसके शर से बचाया।
(تنبيه المغترین، الباب الاول، شروعہ فی المقصود، ص19)
मालुम हुआ की लोग तसव्वुफ को क़ुरानो सुन्नत के खिलाफ समझते है, वो शख्स गलती पर है बल्के तसव्वुफ में इत्तेबा ए क़ुरानो सुन्नत निहायत ही जरुरी अम्र है।
अब्दे मुस्तफा
इमाम शारानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है के ऐक ऐसा शख्स मेरे पास आया जिसके साथ इसके मुअतक़ीदीन की एक जमाअत थी, वो शख्स बे इल्म था.
उस को फना व बका मे कोई ज़ौक़ हासिल ना था, मेरे पास चंद रोज़ ठहरा, मेने उससे एक दीन पुछा के वुज़ू और नमाज की शर्ते बताओ क्या है?
कहने लगा के मेने इल्म हासिल नहीं किया.
मेने कहा : भाई, क़ुरानो सुन्नत के जाहिर पर इबादत का सही करना लाजिम है।
जो शख्स वाजिब और मुस्तहब, हराम और मकरुह मे फर्क़ नही जानता वो तो जाहिल है और जाहिल की इक़्तेदा ना जाहिर मे दुरुस्त है ना बातिन मे, उस ने इसका कोई जवाब ना दिया और चला गया; अल्लाह तआला ने मुझे उसके शर से बचाया।
(تنبيه المغترین، الباب الاول، شروعہ فی المقصود، ص19)
मालुम हुआ की लोग तसव्वुफ को क़ुरानो सुन्नत के खिलाफ समझते है, वो शख्स गलती पर है बल्के तसव्वुफ में इत्तेबा ए क़ुरानो सुन्नत निहायत ही जरुरी अम्र है।
अब्दे मुस्तफा
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صوفی کے لیے بھی شریعت ہے
امام شعرانی رحمة اللہ تعالی علیہ فرماتے ہیں کہ ایک ایسا شخص میرے پاس آیا جس کے ساتھ اس کے معتقدین کی ایک جماعت تھی، وہ شخص بے علم تھا۔
اس کو فناوبقا میں کوئی ذوق حاصل نہ تھا۔ میرے پاس چند روز ٹھہرامیں نے اسے ایک دن پوچھا کہ وضو اور نماز کی شرطیں بتاؤ کیا ہیں؟
کہنے لگا: میں نے علم حاصل نہیں کیا۔
میں نے کہا: بھائی قرآن و سنت کے ظاہر پر عبادات کا صحیح کرنا لازم ہے جو شخص واجب اور مستحب، حرام اور مکروہ میں فرق نہیں جانتا وہ تو جاہل ہے اور جاہل کی اقتدا نہ ظاہر میں درست ہے نہ باطن میں۔ اس نے اس کا کوئی جواب نہ دیا اور چلا گیا؛ اللہ تعالی نے مجھے اس کے شر سے بچالیا۔
(تنبيه المغترین، الباب الاول، شروعہ فی المقصود، ص19)
معلوم ہواجو لوگ تصوف کو قرآن وسنت کے خلاف سمجھتے ہیں، وہ سخت غلطی پر ہیں بلکہ تصوف میں اتباع قرآن و سنت نہایت ضروری امر ہے۔
عبد مصطفی
امام شعرانی رحمة اللہ تعالی علیہ فرماتے ہیں کہ ایک ایسا شخص میرے پاس آیا جس کے ساتھ اس کے معتقدین کی ایک جماعت تھی، وہ شخص بے علم تھا۔
اس کو فناوبقا میں کوئی ذوق حاصل نہ تھا۔ میرے پاس چند روز ٹھہرامیں نے اسے ایک دن پوچھا کہ وضو اور نماز کی شرطیں بتاؤ کیا ہیں؟
کہنے لگا: میں نے علم حاصل نہیں کیا۔
میں نے کہا: بھائی قرآن و سنت کے ظاہر پر عبادات کا صحیح کرنا لازم ہے جو شخص واجب اور مستحب، حرام اور مکروہ میں فرق نہیں جانتا وہ تو جاہل ہے اور جاہل کی اقتدا نہ ظاہر میں درست ہے نہ باطن میں۔ اس نے اس کا کوئی جواب نہ دیا اور چلا گیا؛ اللہ تعالی نے مجھے اس کے شر سے بچالیا۔
(تنبيه المغترین، الباب الاول، شروعہ فی المقصود، ص19)
معلوم ہواجو لوگ تصوف کو قرآن وسنت کے خلاف سمجھتے ہیں، وہ سخت غلطی پر ہیں بلکہ تصوف میں اتباع قرآن و سنت نہایت ضروری امر ہے۔
عبد مصطفی
Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
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एक सह़ाबी को बुज़दिल कहा!
हज़रते उम्मे ऐमन (रद़ियल्लाहु तआ़ला अ़न्हा) जिहाद का ख़ूब शौक़ रखती थीं।
आप ने जंगे उह़ुद में हिस्सा लिया, और ज़ख़्मियों की मरहम-पट्टी किया करती थीं। आप ग़ज़्व-ए-ख़ैबर में भी शरीक हुईं।
आपके बेटे हज़रत ऐमन (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ग़ज़्व-ए-ख़ैबर में शरीक न हो सके, तो ये आपको नागवार गुज़रा; और आपने उन्हें आ़र दिलाने के लिए, बुज़दिल और डरपोक कहा!
(अल्लाहु अक्बर)
हज़रत ऐमन शहसवारे सह़ाबा में से थे, और बड़े बहादुर व निडर जंगजू थे। दरअस्ल आपका घोड़ा बीमार हो गया था जिसकी वजह से आप शरीक न हो सके।
हज़रत ह़स्सान इब्ने स़ाबित (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने अपने अश़्आ़र में इसका ज़िक्र किया:
"على حين أن قالت لأيمن أمه،
جبنت ولم تشهد فوارس خيبر"،
"وأيمن لم يجبن ولكن مهره،
أضرّ به شرب المديد المخمر"،
"ولولا الذي قد كان من شأن مهره،
لقاتل فيهم فارسا غير أعسر."
ख़ुलासा: उम्मे ऐमन ने कहा कि तुम बुज़दिल हो, तुम ने ख़ैबर में हिस्सा न लिया, तो हज़रत ऐमन का घोड़ा बीमार था, वो बुज़दिल नहीं थे (वालिदह ने आ़र दिलाने के लिए कहा था), और इनके घोड़े ने आटा मिला हुआ पानी पी लिया। अगर घोड़े की ये हालत न होती, तो वो ज़रूर बहादुरी के जौहर दिखाते।
(دیکھیے اسد الغابہ، الاصابہ، طبقات ابن سعد وغیرہ)
ये थीं मांएं कि ख़ुद भी जिहाद में शरीक होतीं और अपने बच्चों को भी तरग़ीब दिलातीं।
आज तो जिहाद का नाम लेने में भी कुछ लोगों को डर लगता है और यही वजह है कि हम डर डर कर जी रहे हैं।
अल्लाह तआ़ला हमें बुज़दिली से दूर करे, और शौक़े जिहाद अ़त़ा फरमाए!
अ़ब्दे मुस्त़फ़ा
हज़रते उम्मे ऐमन (रद़ियल्लाहु तआ़ला अ़न्हा) जिहाद का ख़ूब शौक़ रखती थीं।
आप ने जंगे उह़ुद में हिस्सा लिया, और ज़ख़्मियों की मरहम-पट्टी किया करती थीं। आप ग़ज़्व-ए-ख़ैबर में भी शरीक हुईं।
आपके बेटे हज़रत ऐमन (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ग़ज़्व-ए-ख़ैबर में शरीक न हो सके, तो ये आपको नागवार गुज़रा; और आपने उन्हें आ़र दिलाने के लिए, बुज़दिल और डरपोक कहा!
(अल्लाहु अक्बर)
हज़रत ऐमन शहसवारे सह़ाबा में से थे, और बड़े बहादुर व निडर जंगजू थे। दरअस्ल आपका घोड़ा बीमार हो गया था जिसकी वजह से आप शरीक न हो सके।
हज़रत ह़स्सान इब्ने स़ाबित (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने अपने अश़्आ़र में इसका ज़िक्र किया:
"على حين أن قالت لأيمن أمه،
جبنت ولم تشهد فوارس خيبر"،
"وأيمن لم يجبن ولكن مهره،
أضرّ به شرب المديد المخمر"،
"ولولا الذي قد كان من شأن مهره،
لقاتل فيهم فارسا غير أعسر."
ख़ुलासा: उम्मे ऐमन ने कहा कि तुम बुज़दिल हो, तुम ने ख़ैबर में हिस्सा न लिया, तो हज़रत ऐमन का घोड़ा बीमार था, वो बुज़दिल नहीं थे (वालिदह ने आ़र दिलाने के लिए कहा था), और इनके घोड़े ने आटा मिला हुआ पानी पी लिया। अगर घोड़े की ये हालत न होती, तो वो ज़रूर बहादुरी के जौहर दिखाते।
(دیکھیے اسد الغابہ، الاصابہ، طبقات ابن سعد وغیرہ)
ये थीं मांएं कि ख़ुद भी जिहाद में शरीक होतीं और अपने बच्चों को भी तरग़ीब दिलातीं।
आज तो जिहाद का नाम लेने में भी कुछ लोगों को डर लगता है और यही वजह है कि हम डर डर कर जी रहे हैं।
अल्लाह तआ़ला हमें बुज़दिली से दूर करे, और शौक़े जिहाद अ़त़ा फरमाए!
अ़ब्दे मुस्त़फ़ा
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ایک صحابی کو بزدل کہا!
حضرت ام ایمن رضی اللہ تعالی عنھا جہاد کا خوب شوق رکھتی تھیں۔
آپ نے جنگ احد میں حصہ لیا اور زخمیوں کی مرہم پٹی کیا کرتی تھیں۔ آپ غزوۂ خیبر میں بھی شریک ہوئیں۔
آپ کے بیٹے حضرت ایمن رضی اللہ عنہ غزوۂ خیبر میں شریک نہ ہو سکے تو یہ آپ کو ناگوار گزرا اور آپ نے انھیں عار دلانے کے لیے بزدل اور ڈرپوک کہا! (اللہ اکبر)
حضرت ایمن شہسوار صحابہ میں سے تھے اور بڑے بہادر اور نڈر جنگجو تھے۔ در اصل آپ کا گھوڑا بیمار ہو گیا تھا جس کی وجہ سے آپ شریک نہ ہو سکے۔
حضرت حسان بن ثابت نے اپنے اشعار میں اس کا ذکر کیا ہے:
علی حین ان قالت لایمن امہ
جبنت ولم تشھد فوارس خیبر
وایمن لم یجبن ولکن مھرہ
اضربہ شرب المدید المخمر
فلو لا الذی قد کان من شان مھرہ
لقاتل فیھا فارس غیر اعسر
ولکنہ قد صدہ فعل مھرہ
و ما کان منہ غیر ایسر
خلاصہ : ام ایمن نے کہا کہ تم بزدل ہو، تم نے خیبر میں حصہ نہ لیا تو حضرت ایمن کا گھوڑا بیمار تھا، وہ بزدل نہیں تھے (والدہ نے عار دلانے کے لیے کہا تھا) اور ان کے گھوڑے نے آٹا ملا ہوا پانی پی لیا تھا۔ اگر گھوڑے کی یہ حالت نہ ہوتی تو وہ ضرور بہادری کے جوہر دکھاتے۔
(دیکھیے اسد الغابہ، الاصابہ، طبقات ابن سعد وغیرہ)
یہ تھیں مائیں کہ خود بھی جہاد میں شریک ہوتیں اور اپنے بچوں کو بھی ترغیب دلاتیں۔
آج تو جہاد کا نام لینے میں بھی کچھ لوگوں کو ڈر لگتا ہے اور یہی وجہ ہے کہ ہم ڈر ڈر کر جی رہے ہیں۔
اللہ تعالی ہمیں بزدلی سے دور کرے اور شوق جہاد عطا فرمائے۔
عبد مصطفی
حضرت ام ایمن رضی اللہ تعالی عنھا جہاد کا خوب شوق رکھتی تھیں۔
آپ نے جنگ احد میں حصہ لیا اور زخمیوں کی مرہم پٹی کیا کرتی تھیں۔ آپ غزوۂ خیبر میں بھی شریک ہوئیں۔
آپ کے بیٹے حضرت ایمن رضی اللہ عنہ غزوۂ خیبر میں شریک نہ ہو سکے تو یہ آپ کو ناگوار گزرا اور آپ نے انھیں عار دلانے کے لیے بزدل اور ڈرپوک کہا! (اللہ اکبر)
حضرت ایمن شہسوار صحابہ میں سے تھے اور بڑے بہادر اور نڈر جنگجو تھے۔ در اصل آپ کا گھوڑا بیمار ہو گیا تھا جس کی وجہ سے آپ شریک نہ ہو سکے۔
حضرت حسان بن ثابت نے اپنے اشعار میں اس کا ذکر کیا ہے:
علی حین ان قالت لایمن امہ
جبنت ولم تشھد فوارس خیبر
وایمن لم یجبن ولکن مھرہ
اضربہ شرب المدید المخمر
فلو لا الذی قد کان من شان مھرہ
لقاتل فیھا فارس غیر اعسر
ولکنہ قد صدہ فعل مھرہ
و ما کان منہ غیر ایسر
خلاصہ : ام ایمن نے کہا کہ تم بزدل ہو، تم نے خیبر میں حصہ نہ لیا تو حضرت ایمن کا گھوڑا بیمار تھا، وہ بزدل نہیں تھے (والدہ نے عار دلانے کے لیے کہا تھا) اور ان کے گھوڑے نے آٹا ملا ہوا پانی پی لیا تھا۔ اگر گھوڑے کی یہ حالت نہ ہوتی تو وہ ضرور بہادری کے جوہر دکھاتے۔
(دیکھیے اسد الغابہ، الاصابہ، طبقات ابن سعد وغیرہ)
یہ تھیں مائیں کہ خود بھی جہاد میں شریک ہوتیں اور اپنے بچوں کو بھی ترغیب دلاتیں۔
آج تو جہاد کا نام لینے میں بھی کچھ لوگوں کو ڈر لگتا ہے اور یہی وجہ ہے کہ ہم ڈر ڈر کر جی رہے ہیں۔
اللہ تعالی ہمیں بزدلی سے دور کرے اور شوق جہاد عطا فرمائے۔
عبد مصطفی
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तुम घर बैठो, तलवार हमें दे दो
हज़रत उम्मे ऐमन, जिनके बारे में हुज़ूरे अकरम (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) ने इरशाद फ़रमाया कि: "मेरी ह़क़ीक़ी मां के बाद, उम्मे ऐमन मेरी माँ हैं."
आप रद़ियल्लाहु अ़न्हा जज़्ब-ए-जिहाद से सरशार थीं, आपने ग़ज़्व-ए-उह़ुद में अहम किरदार अदा किया.
जब ये अफवाह फैली कि नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) को शहीद कर दिया गया है, तो लोग मैदान छोड़ कर वापस होने लगे, और कुछ तो मदीने में अपने घर तक पहुंच गए. इनकी बीवियों ने कहा कि अफ़सोस है कि आप मैदान छोड़कर भाग निकले.
हज़रत उम्मे ऐमन ने जब ये देखा तो बहुत ग़ुस्सा हुईं, और मैदान से जाने वालों के चेहरे पर मिट्टी डालने लगीं, और कहती कि ये तुम क्या कर रहे हो? मैदान छोड़कर भागना मर्दों का काम नहीं. तुम घरों में बैठो और चरख़ा कातो, और तलवारें हमें दे दो. हम मैदान में दुश्मनों का मुक़ाबला करेंगी!
(देखें 'दलाइलुन् नुबुव्वह' व दीगर कुतुबे सीरत)
ये थीं वो औरतें कि जब तक ज़िंदा रहीं तब तक इस्लाम के नाम से आ़लमे कुफ़्र कांपता रहा। बड़े बड़े बादशाह सिर्फ गिनती के मुसलमानों का नाम सुनकर ख़ौफ़ खाते थे; क्यूंकि उनमें मर्द तो थे ही, साथ में ऐसी औरतें मौजूद थीं।
आज मर्दों का हाल तो अपनी जगह है, और औरतें बजाय इस्लाम को तक़्वियत पहुंचाने के इसे बदनाम करने पर तुली हुई हैं।
आज़ादी के नाम पर दीन व शरीअ़त के खिलाफ़ ज़ुबान चलाती हैं।
अल्लाह तआ़ला हमें अपने घर की औरतों को इस्लाम का सही मफ़्हूम समझाने और तअ़लीमाते नबवी को आम करने की तौफ़ीक़ अ़त़ा फरमाए!
अ़ब्दे मुस्त़फ़ा
हज़रत उम्मे ऐमन, जिनके बारे में हुज़ूरे अकरम (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) ने इरशाद फ़रमाया कि: "मेरी ह़क़ीक़ी मां के बाद, उम्मे ऐमन मेरी माँ हैं."
आप रद़ियल्लाहु अ़न्हा जज़्ब-ए-जिहाद से सरशार थीं, आपने ग़ज़्व-ए-उह़ुद में अहम किरदार अदा किया.
जब ये अफवाह फैली कि नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) को शहीद कर दिया गया है, तो लोग मैदान छोड़ कर वापस होने लगे, और कुछ तो मदीने में अपने घर तक पहुंच गए. इनकी बीवियों ने कहा कि अफ़सोस है कि आप मैदान छोड़कर भाग निकले.
हज़रत उम्मे ऐमन ने जब ये देखा तो बहुत ग़ुस्सा हुईं, और मैदान से जाने वालों के चेहरे पर मिट्टी डालने लगीं, और कहती कि ये तुम क्या कर रहे हो? मैदान छोड़कर भागना मर्दों का काम नहीं. तुम घरों में बैठो और चरख़ा कातो, और तलवारें हमें दे दो. हम मैदान में दुश्मनों का मुक़ाबला करेंगी!
(देखें 'दलाइलुन् नुबुव्वह' व दीगर कुतुबे सीरत)
ये थीं वो औरतें कि जब तक ज़िंदा रहीं तब तक इस्लाम के नाम से आ़लमे कुफ़्र कांपता रहा। बड़े बड़े बादशाह सिर्फ गिनती के मुसलमानों का नाम सुनकर ख़ौफ़ खाते थे; क्यूंकि उनमें मर्द तो थे ही, साथ में ऐसी औरतें मौजूद थीं।
आज मर्दों का हाल तो अपनी जगह है, और औरतें बजाय इस्लाम को तक़्वियत पहुंचाने के इसे बदनाम करने पर तुली हुई हैं।
आज़ादी के नाम पर दीन व शरीअ़त के खिलाफ़ ज़ुबान चलाती हैं।
अल्लाह तआ़ला हमें अपने घर की औरतों को इस्लाम का सही मफ़्हूम समझाने और तअ़लीमाते नबवी को आम करने की तौफ़ीक़ अ़त़ा फरमाए!
अ़ब्दे मुस्त़फ़ा
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تم گھر پر بیٹھو، تلوار ہمیں دے دو
حضرت ام ایمن، جن کے بارے میں حضور اکرم صلی اللہ علیہ والہ وسلم نے ارشاد فرمایا کہ "میری حقیقی ماں کے بعد ام ایمن میری ماں ہے"۔
آپ رضی اللہ تعالی عنھا جذبۂ جہاد سے سرشار تھیں۔ آپ نے غزوۂ احد میں اہم کردار ادا کیا ہے۔
جب یہ افواہ پھیلی کہ نبی کریم صلی اللہ علیہ والہ وسلم کو شہید کر دیا گیا ہے تو لوگ میدان چھوڑ کر واپس ہونے لگے اور کچھ تو مدینے میں اپنے گھر تک پہنچ گئے۔ ان کی بیویوں نے کہا کہ افسوس ہے کہ آپ لوگ میدان چھوڑ کر بھاگ نکلے۔
حضرت ام ایمن نے جب یہ سب دیکھا تو بہت غصہ ہوئیں اور میدان سے جانے والوں کے چہرے پر مٹی ڈالنے لگیں اور کہتیں کہ یہ تم کیا کر رہے ہو؟ میدان چھوڑ کر بھاگنا مردوں کا کام نہیں ہے۔ تم گھروں میں بیٹھو اور چرخہ کاتو اور تلواریں ہمیں دے دو! ہم میدان میں دشمن کا مقابلہ کریں گی!
(دیکھیں دلائل النبوۃ و دیگر کتب سیرت)
یہ تھی وہ عورتیں کہ جب تک زندہ رہیں تب تک اسلام کے نام سے عالم کفر کانپتا رہا۔
بڑے بڑے بادشاہ صرف گنتی کے مسلمانوں کا نام سن کر خوف کھاتے تھے کیوں کہ ان میں مرد تو تھے ہی، ساتھ میں ایسی عورتیں موجود تھیں۔
آج مردوں کا حال تو اپنی جگہ ہے اور عورتیں بجائے دین اسلام کو تقویت پہنچانے کے اسے بدنام کرنے پر تلی ہوئی ہیں۔
آزادی کے نام پر دین و شریعت کے خلاف زبان چلاتی ہیں۔
اللہ تعالی ہمیں اپنے گھر کی عورتوں کو اسلام کا صحیح مفہوم سمجھانے اور تعلیمات نبوی کو عام کرنے کی توفیق عطا فرمائے۔
عبد مصطفی
حضرت ام ایمن، جن کے بارے میں حضور اکرم صلی اللہ علیہ والہ وسلم نے ارشاد فرمایا کہ "میری حقیقی ماں کے بعد ام ایمن میری ماں ہے"۔
آپ رضی اللہ تعالی عنھا جذبۂ جہاد سے سرشار تھیں۔ آپ نے غزوۂ احد میں اہم کردار ادا کیا ہے۔
جب یہ افواہ پھیلی کہ نبی کریم صلی اللہ علیہ والہ وسلم کو شہید کر دیا گیا ہے تو لوگ میدان چھوڑ کر واپس ہونے لگے اور کچھ تو مدینے میں اپنے گھر تک پہنچ گئے۔ ان کی بیویوں نے کہا کہ افسوس ہے کہ آپ لوگ میدان چھوڑ کر بھاگ نکلے۔
حضرت ام ایمن نے جب یہ سب دیکھا تو بہت غصہ ہوئیں اور میدان سے جانے والوں کے چہرے پر مٹی ڈالنے لگیں اور کہتیں کہ یہ تم کیا کر رہے ہو؟ میدان چھوڑ کر بھاگنا مردوں کا کام نہیں ہے۔ تم گھروں میں بیٹھو اور چرخہ کاتو اور تلواریں ہمیں دے دو! ہم میدان میں دشمن کا مقابلہ کریں گی!
(دیکھیں دلائل النبوۃ و دیگر کتب سیرت)
یہ تھی وہ عورتیں کہ جب تک زندہ رہیں تب تک اسلام کے نام سے عالم کفر کانپتا رہا۔
بڑے بڑے بادشاہ صرف گنتی کے مسلمانوں کا نام سن کر خوف کھاتے تھے کیوں کہ ان میں مرد تو تھے ہی، ساتھ میں ایسی عورتیں موجود تھیں۔
آج مردوں کا حال تو اپنی جگہ ہے اور عورتیں بجائے دین اسلام کو تقویت پہنچانے کے اسے بدنام کرنے پر تلی ہوئی ہیں۔
آزادی کے نام پر دین و شریعت کے خلاف زبان چلاتی ہیں۔
اللہ تعالی ہمیں اپنے گھر کی عورتوں کو اسلام کا صحیح مفہوم سمجھانے اور تعلیمات نبوی کو عام کرنے کی توفیق عطا فرمائے۔
عبد مصطفی
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आँखें नम कर देने वाली यादें
नबी -ए- करीम ﷺ की लाडली बेटी हज़रते सय्यिदा ज़ैनब रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हु का निकाह हज़रते अबुल आस रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हु से हुआ था। हज़रते अबुल आस जंगे बद्र में मुशरिकीन तरफ़ से थे और जंग के बाद क़ैद किये गये।
मक्का वाले अपने लोगों को रिहा कराने के लिये फिदया भेज रहे थे तो हज़रते सय्यिदा आइशा रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हा फ़रमाती हैं कि हज़रते ज़ैनब ने भी अपने शौहर के फिदये में कुछ माल भिजवाया और उस में वो हार भी था जो हज़रते खदीजा ने उन्हें शादी के मौक़े पर दिया था।
हज़रते आइशा कहती हैं कि जब हुज़ूर ﷺ ने वो हार देखा तो आप पर रिक़्क़त तारी हो गई।
आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अगर तुम सब मुनासिब समझो तो इस क़ैदी को रिहा कर दो और ये हार भी इसे वापस कर दो (अल्लाह, अल्लाह ज़रा तसव्वुर करें कि क्या मंज़र होगा)
लोगों ने अ़र्ज़ की कि या रसूलल्लाह! क्यों नहीं, आप का हुक्म सर आँखों पर!
फिर उन्हें रिहा कर दिया गया और हुज़ूर ﷺ ने उन से अहद लिया कि हज़रते ज़ैनब को मदीना आने देंगे और फिर कुछ अर्से बाद हुज़ूर ने अपनी प्यारी बेटी को मदीना बुलवा लिया।
(ملخصاً: ابو داؤد، کتاب الجہاد، حدیث2692)
ज़रा गौर करें कि हक़ की राह में कैसे-कैसे हालात सामने आते हैं।
आज का अगर कोई अमन परस्त शख्स कहता है कि हमें लड़ने झगड़ने की ज़रूरत नहीं बल्कि मिल कर रहना है और सब को अपने दीन पर छोड़ देना है तो वो बिल्कुल गलत कहता है।
ये हक़ की राह है, इस में सिर्फ खुद को नहीं बल्कि अपनो को भी तकलीफ़ उठानी पड़ती है। जो इस राह पर चलते हैं उन्हें बहुत कुछ देखना पड़ता है।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
नबी -ए- करीम ﷺ की लाडली बेटी हज़रते सय्यिदा ज़ैनब रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हु का निकाह हज़रते अबुल आस रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हु से हुआ था। हज़रते अबुल आस जंगे बद्र में मुशरिकीन तरफ़ से थे और जंग के बाद क़ैद किये गये।
मक्का वाले अपने लोगों को रिहा कराने के लिये फिदया भेज रहे थे तो हज़रते सय्यिदा आइशा रदिअल्लाहु त'आला अ़न्हा फ़रमाती हैं कि हज़रते ज़ैनब ने भी अपने शौहर के फिदये में कुछ माल भिजवाया और उस में वो हार भी था जो हज़रते खदीजा ने उन्हें शादी के मौक़े पर दिया था।
हज़रते आइशा कहती हैं कि जब हुज़ूर ﷺ ने वो हार देखा तो आप पर रिक़्क़त तारी हो गई।
आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अगर तुम सब मुनासिब समझो तो इस क़ैदी को रिहा कर दो और ये हार भी इसे वापस कर दो (अल्लाह, अल्लाह ज़रा तसव्वुर करें कि क्या मंज़र होगा)
लोगों ने अ़र्ज़ की कि या रसूलल्लाह! क्यों नहीं, आप का हुक्म सर आँखों पर!
फिर उन्हें रिहा कर दिया गया और हुज़ूर ﷺ ने उन से अहद लिया कि हज़रते ज़ैनब को मदीना आने देंगे और फिर कुछ अर्से बाद हुज़ूर ने अपनी प्यारी बेटी को मदीना बुलवा लिया।
(ملخصاً: ابو داؤد، کتاب الجہاد، حدیث2692)
ज़रा गौर करें कि हक़ की राह में कैसे-कैसे हालात सामने आते हैं।
आज का अगर कोई अमन परस्त शख्स कहता है कि हमें लड़ने झगड़ने की ज़रूरत नहीं बल्कि मिल कर रहना है और सब को अपने दीन पर छोड़ देना है तो वो बिल्कुल गलत कहता है।
ये हक़ की राह है, इस में सिर्फ खुद को नहीं बल्कि अपनो को भी तकलीफ़ उठानी पड़ती है। जो इस राह पर चलते हैं उन्हें बहुत कुछ देखना पड़ता है।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
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آنکھیں نم کر دینے والی یادیں
نبئ کریم ﷺ کی لاڈلی بیٹی حضرت سیدہ زینب رضی اللہ تعالی عنھا کا نکاح حضرت ابو العاص رضی اللہ تعالی عنہ سے ہوا تھا۔
حضرت ابو العاص جنگ بدر میں مشرکین کی طرف سے تھے اور جنگ کے بعد قید کیے گئے۔
مکہ والے اپنے لوگوں کو رہا کرانے کے لیے فدیہ بھیج رہے تھے تو حضرت سیدہ عائشہ رضی اللہ تعالی عنھا فرماتی ہیں کہ حضرت زینب نے بھی اپنے شوہر کے فدیے میں کچھ مال بھجوایا اور اس میں وہ ہار بھی تھا جو حضرت خدیجہ نے انھیں شادی کے موقعے پر دیا تھا۔
حضرتِ عائشہ کہتی ہیں کہ جب حضور ﷺ نے وہ ہار دیکھا تو آپ پر رقت طاری ہوگئی۔
آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا کہ اگر تم سب مناسب سمجھو تو اس قیدی کو رہا کر دو اور یہ ہار بھی اسے واپس کر دو۔
(اللہ اللہ ذرا تصور کریں کہ کیا منظر ہوگا)
لوگوں نے عرض کی کہ یا رسول اللہ کیوں نہیں، آپ کا حکم سر آنکھوں پر!
پھر انھیں رہا کر دیا گیا اور حضور ﷺ نے ان سے عہد لیا کہ وہ حضرت زینب کو مدینہ آنے دیں گے اور پھر کچھ عرصے بعد حضور نے اپنی پیاری بیٹی کو مدینہ بلوا لیا۔
(ملخصاً: ابو داؤد، کتاب الجہاد، حدیث 2692)
ذرا غور کریں کہ حق کی راہ میں کیسے کیسے حالات سامنے آتے ہیں۔
آج کا اگر کوئی امن پرست شخص کہتا ہے کہ ہمیں لڑنے جھگڑنے کی ضرورت نہیں بلکہ مل کر رہنا ہے اور سب کو اپنے دین پر چھوڑ دینا ہے تو وہ بالکل غلط کہتا ہے۔ یہ حق کی راہ ہے اس میں صرف خود کو نہیں بلکہ اپنوں کو بھی تکلیف اٹھانی پڑتی ہے۔
جو اس راہ پر چلتے ہیں انھیں بہت کچھ دیکھنا پڑتا ہے۔
عبد مصطفی
نبئ کریم ﷺ کی لاڈلی بیٹی حضرت سیدہ زینب رضی اللہ تعالی عنھا کا نکاح حضرت ابو العاص رضی اللہ تعالی عنہ سے ہوا تھا۔
حضرت ابو العاص جنگ بدر میں مشرکین کی طرف سے تھے اور جنگ کے بعد قید کیے گئے۔
مکہ والے اپنے لوگوں کو رہا کرانے کے لیے فدیہ بھیج رہے تھے تو حضرت سیدہ عائشہ رضی اللہ تعالی عنھا فرماتی ہیں کہ حضرت زینب نے بھی اپنے شوہر کے فدیے میں کچھ مال بھجوایا اور اس میں وہ ہار بھی تھا جو حضرت خدیجہ نے انھیں شادی کے موقعے پر دیا تھا۔
حضرتِ عائشہ کہتی ہیں کہ جب حضور ﷺ نے وہ ہار دیکھا تو آپ پر رقت طاری ہوگئی۔
آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا کہ اگر تم سب مناسب سمجھو تو اس قیدی کو رہا کر دو اور یہ ہار بھی اسے واپس کر دو۔
(اللہ اللہ ذرا تصور کریں کہ کیا منظر ہوگا)
لوگوں نے عرض کی کہ یا رسول اللہ کیوں نہیں، آپ کا حکم سر آنکھوں پر!
پھر انھیں رہا کر دیا گیا اور حضور ﷺ نے ان سے عہد لیا کہ وہ حضرت زینب کو مدینہ آنے دیں گے اور پھر کچھ عرصے بعد حضور نے اپنی پیاری بیٹی کو مدینہ بلوا لیا۔
(ملخصاً: ابو داؤد، کتاب الجہاد، حدیث 2692)
ذرا غور کریں کہ حق کی راہ میں کیسے کیسے حالات سامنے آتے ہیں۔
آج کا اگر کوئی امن پرست شخص کہتا ہے کہ ہمیں لڑنے جھگڑنے کی ضرورت نہیں بلکہ مل کر رہنا ہے اور سب کو اپنے دین پر چھوڑ دینا ہے تو وہ بالکل غلط کہتا ہے۔ یہ حق کی راہ ہے اس میں صرف خود کو نہیں بلکہ اپنوں کو بھی تکلیف اٹھانی پڑتی ہے۔
جو اس راہ پر چلتے ہیں انھیں بہت کچھ دیکھنا پڑتا ہے۔
عبد مصطفی
Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
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एक बीवी संभलती नहीं, तो चार कैसे?
ये जुमला बिल्कुल ऐसा है कि एक चक्के से गाड़ी चलती नहीं, तो चार से कैसे चलेगी?
चलिए, जब एक नहीं संभलती तो एक शादी भी क्यूँ करते हैं?
होना तो ये चाहिए कि आप भी उन औलिया की सीरत पर अ़मल करें, जिन्होंने औरतों के ह़ुक़ूक़ के ख़ौफ़ से निकाह़ न किया, जैसा कि हज़रत बिश्-र बिन ह़ारिस़ (रह़िमहुल्लाहु तआ़ला) फरमाते हैं कि मुझे किताबुल्लाह की एक आयत ने निकाह़ से रोक रखा है, कि 'औरतों के ह़ुक़ूक़ हैं', और शायद मैं इसे अदा न कर सकूं!
(देखें: "क़ूतुल् क़ुलूब़", जिल्द: 2, सफ़ा: 816)
अगर एक नहीं संभलती, जिसका मतलब है ह़ुक़ूक़ अदा नहीं हो पाते, तो फिर क्यूँ आप अपने लिए अ़ज़ाब का सामान तैयार कर रहे हैं? आपको तो चाहिए कि इन सूफ़िया की सीरत पर अ़मल करें. अब आप कहेंगे कि हम उन जैसे नहीं हैं, और जब चार शादियों की बात आती है तो भी यही कहा जाता है कि हम पहले वालों जैसे नहीं हैं।
आपको तय कर लेना चाहिए कि आप हैं क्या? और अगर आप बिल्कुल अलग हैं तो क्या आपने अपना दीन भी अलग कर लिया है?
अस्ल में बात ह़ुक़ूक़ की नहीं, क्यूंकि कसरत से ऐसे लोग मौजूद हैं जो 4 बीवियों के ह़ुक़ूक़ आसानी से अदा कर सकते हैं, यहां बात है मुआ़शरे के बनाए हुए बेबुनियाद उसूलों की।
आज अगर हिंदो पाक के अक्सर इलाक़ों में दूसरी शादी की जाए, तो लोग उसे अ़जीब नज़र से देखते हैं, और तरह तरह की बातें करते हैं, आख़िर ऐसा क्यूँ?
इसे ख़त्म करना होगा, ताकि एक मर्द फ़ितरत के मुत़ाबिक़ जाइज़ तरीक़े से फ़ायदा उठा सके, और निकाह़ को आ़म और आसान किया जा सके।
अगर ये न हुआ, तो औरतों की तादाद वैसे भी ज़्यादा है और आगे मज़ीद ज़्यादा हो जाएगी, फिर ज़िना की कसरत होगी, और हम कुछ न कर सकेंगे।
अ़ब्दे मुस्त़फ़ा
ये जुमला बिल्कुल ऐसा है कि एक चक्के से गाड़ी चलती नहीं, तो चार से कैसे चलेगी?
चलिए, जब एक नहीं संभलती तो एक शादी भी क्यूँ करते हैं?
होना तो ये चाहिए कि आप भी उन औलिया की सीरत पर अ़मल करें, जिन्होंने औरतों के ह़ुक़ूक़ के ख़ौफ़ से निकाह़ न किया, जैसा कि हज़रत बिश्-र बिन ह़ारिस़ (रह़िमहुल्लाहु तआ़ला) फरमाते हैं कि मुझे किताबुल्लाह की एक आयत ने निकाह़ से रोक रखा है, कि 'औरतों के ह़ुक़ूक़ हैं', और शायद मैं इसे अदा न कर सकूं!
(देखें: "क़ूतुल् क़ुलूब़", जिल्द: 2, सफ़ा: 816)
अगर एक नहीं संभलती, जिसका मतलब है ह़ुक़ूक़ अदा नहीं हो पाते, तो फिर क्यूँ आप अपने लिए अ़ज़ाब का सामान तैयार कर रहे हैं? आपको तो चाहिए कि इन सूफ़िया की सीरत पर अ़मल करें. अब आप कहेंगे कि हम उन जैसे नहीं हैं, और जब चार शादियों की बात आती है तो भी यही कहा जाता है कि हम पहले वालों जैसे नहीं हैं।
आपको तय कर लेना चाहिए कि आप हैं क्या? और अगर आप बिल्कुल अलग हैं तो क्या आपने अपना दीन भी अलग कर लिया है?
अस्ल में बात ह़ुक़ूक़ की नहीं, क्यूंकि कसरत से ऐसे लोग मौजूद हैं जो 4 बीवियों के ह़ुक़ूक़ आसानी से अदा कर सकते हैं, यहां बात है मुआ़शरे के बनाए हुए बेबुनियाद उसूलों की।
आज अगर हिंदो पाक के अक्सर इलाक़ों में दूसरी शादी की जाए, तो लोग उसे अ़जीब नज़र से देखते हैं, और तरह तरह की बातें करते हैं, आख़िर ऐसा क्यूँ?
इसे ख़त्म करना होगा, ताकि एक मर्द फ़ितरत के मुत़ाबिक़ जाइज़ तरीक़े से फ़ायदा उठा सके, और निकाह़ को आ़म और आसान किया जा सके।
अगर ये न हुआ, तो औरतों की तादाद वैसे भी ज़्यादा है और आगे मज़ीद ज़्यादा हो जाएगी, फिर ज़िना की कसरत होगी, और हम कुछ न कर सकेंगे।
अ़ब्दे मुस्त़फ़ा
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ایک بیوی سنبھلتی نہیں تو 4 کیسے؟
یہ جملہ بالکل ایسا ہے کہ ایک چکّے سے گاڑی چلتی نہیں تو 4 سے کیسے چلے گی؟
چلیے جب ایک نہیں سنبھلتی تو آپ ایک شادی بھی کیوں کرتے ہیں؟
ہونا تو یہ چاہیے کہ آپ بھی ان اولیا کی سیرت پر عمل کریں جنھوں نے عورتوں کے حقوق کے خوف سے نکاح نہ کیا جیسا کہ حضرت بشر بن حارث رحمۃ اللہ علیہ فرماتے ہیں کہ مجھے کتاب اللہ کی ایک آیت نے نکاح سے روک رکھا ہے کہ عورتوں کے حقوق ہیں اور شاید میں ادا نہ کر سکوں!
(انظر :قوت القلوب، ج2،ص81)
اگر ایک نہیں سنبھلتی جس کا مطلب ہے کہ حقوق ادا نہیں ہو پاتے تو پھر کیوں آپ اپنے لیے عذاب کا سامان تیار کر رہے ہیں آپ کو تو چاہیے کہ ان صوفیا کی سیرت پر عمل کریں!
اب آپ کہیں گے کہ ہم ان جیسے نہیں ہیں اور جب چار شادیوں کی بات آتی ہے تو بھی یہی کہا جاتا ہے کہ ہم پہلے والوں جیسے نہیں ہیں، اب آپ کو طے کر لینا چاہیے کہ آپ ہیں کیا؟
اور اگر آپ بالکل الگ ہیں تو کیا آپ نے اپنا دین بھی الگ کرلیا ہے؟
اصل میں بات حقوق کی نہیں کیونکہ کثرت سے ایسے لوگ موجود ہیں جو چار بیویوں کے حقوق آسانی سے ادا کر سکتے ہیں۔ یہاں بات ہے معاشرے کے بنائے ہوئے بے بنیادی اصولوں کی!
آج اگر ہند و پاک کے اکثر علاقوں میں دوسری شادی کی جائے تو لوگ اسے عجیب نظروں سے دیکھتے ہیں اور طرح طرح کی باتیں کرتے ہیں، آخر ایسا کیوں؟
اسے ختم کرنا ہوگا تاکہ ایک مرد فطرت کے مطابق جائز طریقے سے فائدہ اٹھا سکے اور نکاح کو عام اور آسان کیا جاسکے۔ اگر یہ نہ ہوا تو عورتوں کی تعداد ویسے بھی زیادہ ہے اور آگے مزید زیادہ ہو جائیں گی پھر زنا کی کثرت ہوگی اور ہم کچھ نہ کر سکیں گے!
عبد مصطفی
یہ جملہ بالکل ایسا ہے کہ ایک چکّے سے گاڑی چلتی نہیں تو 4 سے کیسے چلے گی؟
چلیے جب ایک نہیں سنبھلتی تو آپ ایک شادی بھی کیوں کرتے ہیں؟
ہونا تو یہ چاہیے کہ آپ بھی ان اولیا کی سیرت پر عمل کریں جنھوں نے عورتوں کے حقوق کے خوف سے نکاح نہ کیا جیسا کہ حضرت بشر بن حارث رحمۃ اللہ علیہ فرماتے ہیں کہ مجھے کتاب اللہ کی ایک آیت نے نکاح سے روک رکھا ہے کہ عورتوں کے حقوق ہیں اور شاید میں ادا نہ کر سکوں!
(انظر :قوت القلوب، ج2،ص81)
اگر ایک نہیں سنبھلتی جس کا مطلب ہے کہ حقوق ادا نہیں ہو پاتے تو پھر کیوں آپ اپنے لیے عذاب کا سامان تیار کر رہے ہیں آپ کو تو چاہیے کہ ان صوفیا کی سیرت پر عمل کریں!
اب آپ کہیں گے کہ ہم ان جیسے نہیں ہیں اور جب چار شادیوں کی بات آتی ہے تو بھی یہی کہا جاتا ہے کہ ہم پہلے والوں جیسے نہیں ہیں، اب آپ کو طے کر لینا چاہیے کہ آپ ہیں کیا؟
اور اگر آپ بالکل الگ ہیں تو کیا آپ نے اپنا دین بھی الگ کرلیا ہے؟
اصل میں بات حقوق کی نہیں کیونکہ کثرت سے ایسے لوگ موجود ہیں جو چار بیویوں کے حقوق آسانی سے ادا کر سکتے ہیں۔ یہاں بات ہے معاشرے کے بنائے ہوئے بے بنیادی اصولوں کی!
آج اگر ہند و پاک کے اکثر علاقوں میں دوسری شادی کی جائے تو لوگ اسے عجیب نظروں سے دیکھتے ہیں اور طرح طرح کی باتیں کرتے ہیں، آخر ایسا کیوں؟
اسے ختم کرنا ہوگا تاکہ ایک مرد فطرت کے مطابق جائز طریقے سے فائدہ اٹھا سکے اور نکاح کو عام اور آسان کیا جاسکے۔ اگر یہ نہ ہوا تو عورتوں کی تعداد ویسے بھی زیادہ ہے اور آگے مزید زیادہ ہو جائیں گی پھر زنا کی کثرت ہوگی اور ہم کچھ نہ کر سکیں گے!
عبد مصطفی
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अ़ब्दे मुस्तफ़ा : बस एक नाम नहीं पहचान है।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा, ये नाम किसी शख्स या किसी तन्ज़ीम के लिये खास नहीं बल्कि हर सुन्नी अ़ब्दे मुस्तफ़ा है।
जिस जिस के आक़ा मुस्तफ़ा करीम हैं वो अ़ब्दे मुस्तफ़ा है।
जैसे सब का खुदा एक है वैसे ही
इनका उनका तुम्हारा हमारा नबी
अ़ब्दे मुस्तफ़ा एक नाम ही नहीं बल्कि हक़ और बातिल के दरमियान एक पहचान है। खुद को अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहने से कतराने वाले और इस में शिर्क का पहलू ढूँढने वाले खुद की निशान देही कर देते हैं कि वो किस तरफ हैं।
आप खुद को अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहें, अ़ब्दे मुस्तफ़ा लिखें, हर सुन्नी फख्र के साथ कहे कि हाँ मैं हूँ अ़ब्दे मुस्तफ़ा!
देव के बन्दों से हम को क्या गर्ज़
हम हैं अ़ब्दे मुस्तफ़ा फिर तुझ को क्या
जो सिर्फ़ अ़ब्दुल्लाह होने का दावा करते हैं और अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहलाने में जिन्हें शिर्क नज़र आता है वो जान लें कि जब तक कोई हुज़ूर ﷺ को अपना मालिक ना माने तब तक वो ईमान की मिठास नहीं पा सकता।
खौफ़ ना रख रज़ा ज़रा, तू तो है अ़ब्दे मुस्तफ़ा
तेरे लिये अमान है, तेरे लिये अमान है
इबादतें ज़रूरी हैं इंकार नहीं पर जब हम अ़ब्दे मुस्तफ़ा हैं तो,
हम रसूलुल्लाह के, जन्नत रसूलुल्लाह की
हम सब अ़ब्दे मुस्तफ़ा हैं, ये नाम हमारा अ़क़ीदा है, ये नाम हमारी पहचान है और ये नाम हमन दूसरों से अलग करता है।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
अ़ब्दे मुस्तफ़ा, ये नाम किसी शख्स या किसी तन्ज़ीम के लिये खास नहीं बल्कि हर सुन्नी अ़ब्दे मुस्तफ़ा है।
जिस जिस के आक़ा मुस्तफ़ा करीम हैं वो अ़ब्दे मुस्तफ़ा है।
जैसे सब का खुदा एक है वैसे ही
इनका उनका तुम्हारा हमारा नबी
अ़ब्दे मुस्तफ़ा एक नाम ही नहीं बल्कि हक़ और बातिल के दरमियान एक पहचान है। खुद को अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहने से कतराने वाले और इस में शिर्क का पहलू ढूँढने वाले खुद की निशान देही कर देते हैं कि वो किस तरफ हैं।
आप खुद को अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहें, अ़ब्दे मुस्तफ़ा लिखें, हर सुन्नी फख्र के साथ कहे कि हाँ मैं हूँ अ़ब्दे मुस्तफ़ा!
देव के बन्दों से हम को क्या गर्ज़
हम हैं अ़ब्दे मुस्तफ़ा फिर तुझ को क्या
जो सिर्फ़ अ़ब्दुल्लाह होने का दावा करते हैं और अ़ब्दे मुस्तफ़ा कहलाने में जिन्हें शिर्क नज़र आता है वो जान लें कि जब तक कोई हुज़ूर ﷺ को अपना मालिक ना माने तब तक वो ईमान की मिठास नहीं पा सकता।
खौफ़ ना रख रज़ा ज़रा, तू तो है अ़ब्दे मुस्तफ़ा
तेरे लिये अमान है, तेरे लिये अमान है
इबादतें ज़रूरी हैं इंकार नहीं पर जब हम अ़ब्दे मुस्तफ़ा हैं तो,
हम रसूलुल्लाह के, जन्नत रसूलुल्लाह की
हम सब अ़ब्दे मुस्तफ़ा हैं, ये नाम हमारा अ़क़ीदा है, ये नाम हमारी पहचान है और ये नाम हमन दूसरों से अलग करता है।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
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عبد مصطفی : بس ایک نام نہیں پہچان ہے
عبد مصطفی، یہ نام کسی شخص یا تنظیم کے لیے خاص نہیں بلکہ ہر سنی عبد مصطفٰی ہے۔
جس جس کے آقا مصطفی کریم ہیں وہ عبد مصطفی ہے۔
جیسے سب کہ خدا ایک ہے ویسے ہی
ان کا اُن کا تمھارا ہمارا نبی
عبد مصطفی ایک نام نہیں بلکہ حق اور باطل کے درمیان پہچان ہے۔
خود کو عبد مصطفی کہنے سے کترانے والے اور اس میں شرک کا پہلو ڈھونڈنے والے خود ہی نشان دہی کر دیتے ہیں کہ وہ کس طرف ہیں۔
آپ خود کو عبد مصطفی کہیں، عبد مصطفی لکھیں، ہر سنی فخر کے ساتھ کہے کے ہاں میں عبد مصطفی ہوں۔
دیو کے بندوں سے ہمکو کیا غرض
ہم ہیں عبد مصطفی پھر تُجھ کو کیا
جو صرف عبداللہ ہونے کا دعویٰ کرتے ہیں اور عبد مصطفی کہلانے میں جنھیں شرک نظر آتا ہے وہ جان لیکن کہ جب تک کوئی حضور صلی اللہ علیہ وسلم کو اپنا مالک نہ مانے تب تک وہ ایمان کی مٹھاس نہیں پا سکتا ہے۔
خوف نہ رکھ رضا ذرا، تُو تو ہے عبد مصطفٰی
تیرے لیے امان ہے تیرے لیے امان ہے
عبادتیں ضروری ہیں، انکار نہیں پر جب ہم عبد مصطفٰی ہیں تو،
ہم رسول اللہ کے جنت رسول اللہ کی
ہم سب عبد مصطفی ہیں، یہ نام ہمارا عقیدہ ہے، یہ نام ہماری پہچان ہے اور یہ نام ہمیں دوسروں سے الگ الگ کرتا ہے۔
عبد مصطفیٰ
عبد مصطفی، یہ نام کسی شخص یا تنظیم کے لیے خاص نہیں بلکہ ہر سنی عبد مصطفٰی ہے۔
جس جس کے آقا مصطفی کریم ہیں وہ عبد مصطفی ہے۔
جیسے سب کہ خدا ایک ہے ویسے ہی
ان کا اُن کا تمھارا ہمارا نبی
عبد مصطفی ایک نام نہیں بلکہ حق اور باطل کے درمیان پہچان ہے۔
خود کو عبد مصطفی کہنے سے کترانے والے اور اس میں شرک کا پہلو ڈھونڈنے والے خود ہی نشان دہی کر دیتے ہیں کہ وہ کس طرف ہیں۔
آپ خود کو عبد مصطفی کہیں، عبد مصطفی لکھیں، ہر سنی فخر کے ساتھ کہے کے ہاں میں عبد مصطفی ہوں۔
دیو کے بندوں سے ہمکو کیا غرض
ہم ہیں عبد مصطفی پھر تُجھ کو کیا
جو صرف عبداللہ ہونے کا دعویٰ کرتے ہیں اور عبد مصطفی کہلانے میں جنھیں شرک نظر آتا ہے وہ جان لیکن کہ جب تک کوئی حضور صلی اللہ علیہ وسلم کو اپنا مالک نہ مانے تب تک وہ ایمان کی مٹھاس نہیں پا سکتا ہے۔
خوف نہ رکھ رضا ذرا، تُو تو ہے عبد مصطفٰی
تیرے لیے امان ہے تیرے لیے امان ہے
عبادتیں ضروری ہیں، انکار نہیں پر جب ہم عبد مصطفٰی ہیں تو،
ہم رسول اللہ کے جنت رسول اللہ کی
ہم سب عبد مصطفی ہیں، یہ نام ہمارا عقیدہ ہے، یہ نام ہماری پہچان ہے اور یہ نام ہمیں دوسروں سے الگ الگ کرتا ہے۔
عبد مصطفیٰ
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नबी की तरफ बद्दुआ की निस्बत
हुज़ूर -ए- अकरम सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम की तरफ बद्दुआ की निस्बत करना सही नहीं है।
अगर आप ने किसी के खिलाफ दुआ की है तो भी उसे बद्दुआ कहना बेअदबी है।
आपका कोई फेल बद नहीं है।
बुखारी शरीफ की एक रिवायत की शरह में देवबंदीयों ने सराहत के साथ बद्दुआ की निस्बत हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैहि वसल्लम की तरफ की है यह हरगिज़ दुरुस्त नहीं।
अल्लामा गुलाम रसूल सईदी रहिमहुल्लाहू त'आला ने बुखारी शरीफ की शरह करते हुए कई जगह इस पर बहस की है
पहेली जिल्द सफाह 705 पर और इससे पहले भी फिर जिल्द 13 सफाह 806 और चंद मकामात पर लिखते हैं की हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम का कोई अमल बद नहीं बल्कि हर अमल हसन है लिहाज़ा हुज़ूर ने जो दुआ -ए- ज़रर फरमाई उसे बद्दुआ कहना नाजायज़ है।
(انظر: نعم الباری)
इससे मालूम हुआ के अगर ऐसी रिवायात मिलती हैं जिन में आक़ा -ए- करीम ने गुस्ताखों के लिए दुआ -ए- ज़रर फरमाई तो उसे बद्दुआ नहीं कहेंगे बल्कि इस तरह कहेंगे कि उनके खिलाफ दुआ की या दुआ -ए- ज़रर फरमाई।
अब्दे मुस्तफ़ा
हुज़ूर -ए- अकरम सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम की तरफ बद्दुआ की निस्बत करना सही नहीं है।
अगर आप ने किसी के खिलाफ दुआ की है तो भी उसे बद्दुआ कहना बेअदबी है।
आपका कोई फेल बद नहीं है।
बुखारी शरीफ की एक रिवायत की शरह में देवबंदीयों ने सराहत के साथ बद्दुआ की निस्बत हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैहि वसल्लम की तरफ की है यह हरगिज़ दुरुस्त नहीं।
अल्लामा गुलाम रसूल सईदी रहिमहुल्लाहू त'आला ने बुखारी शरीफ की शरह करते हुए कई जगह इस पर बहस की है
पहेली जिल्द सफाह 705 पर और इससे पहले भी फिर जिल्द 13 सफाह 806 और चंद मकामात पर लिखते हैं की हुज़ूर सल्लल्लाहु त'आला अलैही वसल्लम का कोई अमल बद नहीं बल्कि हर अमल हसन है लिहाज़ा हुज़ूर ने जो दुआ -ए- ज़रर फरमाई उसे बद्दुआ कहना नाजायज़ है।
(انظر: نعم الباری)
इससे मालूम हुआ के अगर ऐसी रिवायात मिलती हैं जिन में आक़ा -ए- करीम ने गुस्ताखों के लिए दुआ -ए- ज़रर फरमाई तो उसे बद्दुआ नहीं कहेंगे बल्कि इस तरह कहेंगे कि उनके खिलाफ दुआ की या दुआ -ए- ज़रर फरमाई।
अब्दे मुस्तफ़ा
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نبی کی طرف بددعا کی نسبت
حضور اکرم ﷺ کی طرف بددعا کی نسبت کرنا صحیح نہیں ہے۔
اگر آپ نے کسی کے خلاف دعا کی ہے تو بھی اسے بددعا کہنا بے ادبی ہے۔
آپ کا کوئی فعل بد نہیں ہے۔
بخاری شریف کی ایک روایت کی شرح میں دیوبندیوں نے صراحت کے ساتھ بددعا کی نسبت حضور ﷺ کی طرف کی ہے، یہ ہرگز درست نہیں.
علامہ غلام رسول سعیدی رحمہ اللہ تعالى نے بخاری شریف کی شرح کرتے ہوئے کئی جگہ اس پر بحث کی ہے۔
پہلی جلد، صفحہ 705 پر اور اس سے پہلے بھی پھر جلد 13، صفحہ 806 اور چند مقامات پر لکھتے ہیں کہ حضور ﷺ کا کوئی عمل بد نہیں بلکہ ہر عمل حسن ہے لہذا حضور ﷺ نے جو دعاے ضرر فرمائی اسے بددعا کہنا ناجائز ہے۔
(انظر: نعم الباری)
اس سے معلوم ہوا کہ اگر ایسی روایات ملتی ہیں جن میں آقاے کریم نے گستاخوں کے لیے بددعا فرمائی تو اسے بددعا نہیں کہیں گے بلکہ اس طرح کہیں گے کہ ان کے خلاف دعا کی ہے یا دعاے ضرر فرمائی۔
عبد مصطفیٰ
حضور اکرم ﷺ کی طرف بددعا کی نسبت کرنا صحیح نہیں ہے۔
اگر آپ نے کسی کے خلاف دعا کی ہے تو بھی اسے بددعا کہنا بے ادبی ہے۔
آپ کا کوئی فعل بد نہیں ہے۔
بخاری شریف کی ایک روایت کی شرح میں دیوبندیوں نے صراحت کے ساتھ بددعا کی نسبت حضور ﷺ کی طرف کی ہے، یہ ہرگز درست نہیں.
علامہ غلام رسول سعیدی رحمہ اللہ تعالى نے بخاری شریف کی شرح کرتے ہوئے کئی جگہ اس پر بحث کی ہے۔
پہلی جلد، صفحہ 705 پر اور اس سے پہلے بھی پھر جلد 13، صفحہ 806 اور چند مقامات پر لکھتے ہیں کہ حضور ﷺ کا کوئی عمل بد نہیں بلکہ ہر عمل حسن ہے لہذا حضور ﷺ نے جو دعاے ضرر فرمائی اسے بددعا کہنا ناجائز ہے۔
(انظر: نعم الباری)
اس سے معلوم ہوا کہ اگر ایسی روایات ملتی ہیں جن میں آقاے کریم نے گستاخوں کے لیے بددعا فرمائی تو اسے بددعا نہیں کہیں گے بلکہ اس طرح کہیں گے کہ ان کے خلاف دعا کی ہے یا دعاے ضرر فرمائی۔
عبد مصطفیٰ
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