Forwarded from फ़ैज़ाने मस्लके आ़ला ह़ज़रत 📚 (محمد جمال الدين خان قادری)
Qurbani Ke Masail MasAle
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अपने रब के लिये नमाज़ क़ुर्बानी...
क़ुर्बानी मह़बूब अ़मल है!
दस दिन तक बाल नाख़ुन न काटें
स़ाह़िबे निस़ाब औ़रत पर क़ुर्बानी
ईमान और कुफ़्र में कोई वास्त़ा नहीं
ह़राम माल से पला बढ़ा जिस्म ...
सात ह़िस़्स़ों में एक भी बद मज़हब
⁷ह़िस़्स़ों में एक भी वहाबी शामिल...
क़ुर्बानी के बड़े जानवर में अ़क़ीक़ा
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अपने रब के लिये नमाज़ क़ुर्बानी...
क़ुर्बानी मह़बूब अ़मल है!
दस दिन तक बाल नाख़ुन न काटें
स़ाह़िबे निस़ाब औ़रत पर क़ुर्बानी
ईमान और कुफ़्र में कोई वास्त़ा नहीं
ह़राम माल से पला बढ़ा जिस्म ...
सात ह़िस़्स़ों में एक भी बद मज़हब
⁷ह़िस़्स़ों में एक भी वहाबी शामिल...
क़ुर्बानी के बड़े जानवर में अ़क़ीक़ा
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Forwarded from फ़ैज़ाने मस्लके आ़ला ह़ज़रत 📚 (محمد جمال الدين خان قادری)
मसाइले क़ुर्बानी क़ुर्बानी के मसाइल
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क़ुरबानी का वक़्त ...
क़ुर्बानी के जानवर की उ़म्र उ़मर
गर्दन अलग हो गई तो ...
गले में चार रग होते हैं!
ह़लाल जानवर के बाईस आ़ज़ा
उझड़ी खाना मकरूहे तह़रीमी है!
पहले कलेजी खाना सुन्नत है!
क़ुर्बानी का गोश्त काफ़िर को न दें!
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क़ुरबानी का वक़्त ...
क़ुर्बानी के जानवर की उ़म्र उ़मर
गर्दन अलग हो गई तो ...
गले में चार रग होते हैं!
ह़लाल जानवर के बाईस आ़ज़ा
उझड़ी खाना मकरूहे तह़रीमी है!
पहले कलेजी खाना सुन्नत है!
क़ुर्बानी का गोश्त काफ़िर को न दें!
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Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
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کرونا کے خطرناک دور میں! عید
الاضحیٰ عید قرباں کے تین دن
@islaamic_Knowledge
مالک نصاب وہ شخص ہے جو 653.184 گرام چاندی یا اس کے دام کا مالک ہو - آج کی تاریخ (²⁹جولائی۰۲۰۲ء) میں اس کا دام 42457.00 روپئے ہے!
@islaamic_Knowledge
✍ محقق مسائل جدیدہ حضرت
#مفتی_نظام_الدین_رضوی
صَاحَبۡ قِبۡلَہۡ دَامَتۡ بَرَکَاتُہُمُ الۡعَالِیَہۡ
الاضحیٰ عید قرباں کے تین دن
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مالک نصاب وہ شخص ہے جو 653.184 گرام چاندی یا اس کے دام کا مالک ہو - آج کی تاریخ (²⁹جولائی۰۲۰۲ء) میں اس کا دام 42457.00 روپئے ہے!
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صَاحَبۡ قِبۡلَہۡ دَامَتۡ بَرَکَاتُہُمُ الۡعَالِیَہۡ
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Abde Mustafa Organisation
ہم 4 شادی پر کب تک لکھیں گے؟ ہم اس وقت تک اس ٹاپک پر لکھیں گے جب تک یہ (Common) عام نہ ہو جائے۔ یوں سمجھیں کہ ایک عرصے پہلے جب کہیں کسی لڑکی کے ساتھ کچھ غلط ہوتا تھا تو سن کر بڑا عجیب لگتا تھا اورایک ہنگامہ سا ہو جاتا تھا لوگ ہر طرف باتیں کرتے ہوئے حیران…
एक मजबूर मर्द
मै एक मजबूर मर्द बोल रहा हूँ,
मेरा दम घुट रहा है पर फिर भी बोल रहा हूँ।
मै चाहता हूँ कि कुछ करूँ पर मुआशरे ने मजबूर कर रखा है।
कुछ अच्छा करना चाहता हूँ पर लोगों ने अपनी नाक के चक्कर में मेरे हाथ बांध रखे हैं।
मै भी उन्हीं जैसा बन चुका हूँ।
मै चाहूँ तो एक बेवा लड़की से शादी करूँ पर नहीं कर सकता, मेरे अपने बीच में आ जायेंगे और अगर ना भी आयें तो मै तो उन जैसा बन ही चुका हूँ, मै खुद ऐसा नहीं करूँगा।
लड़की खूबसूरत ना हो, मुझे भी पसंद नहीं आयेगी क्योंकि मै भी अलग नहीं हूँ, इन्हीं में से हूँ।
मै चाहता हूँ कि किसी ऐसे को क़ुबूल करूँ जिस की क़ीमत दुनिया पहचानने से क़ासिर है पर मै भी तो अब इन्हीं में से हूँ।
मै मजबूर हूँ, अपनी सोच से भी और अपने मुआशरे से भी।
मुझसे ज़्यादा उम्र की लड़की है, मै चाहता हूँ कि निकाह कर लूँ पर क्या मै चाहता हूँ? लोग नहीं चाहते तो मै भी पीछे हट जाता हूँ फिर मै भी अलग नहीं, मै इन्हीं में से हूँ।
मै 4 शादियाँ करना चाहता हूँ पर कैसे? मै मजबूर हूँ लोगों से मै मुआशरे के तानों की ज़न्जीर से बंधा हुआ हूँ, मै एक मजबूर मर्द बोल रहा हूँ शायद अब बोलना भी पसंद ना आयेगा तो अब खामोश होना पड़ेगा।
✍ अ़ब्दे मुस्तफ़ा
मै एक मजबूर मर्द बोल रहा हूँ,
मेरा दम घुट रहा है पर फिर भी बोल रहा हूँ।
मै चाहता हूँ कि कुछ करूँ पर मुआशरे ने मजबूर कर रखा है।
कुछ अच्छा करना चाहता हूँ पर लोगों ने अपनी नाक के चक्कर में मेरे हाथ बांध रखे हैं।
मै भी उन्हीं जैसा बन चुका हूँ।
मै चाहूँ तो एक बेवा लड़की से शादी करूँ पर नहीं कर सकता, मेरे अपने बीच में आ जायेंगे और अगर ना भी आयें तो मै तो उन जैसा बन ही चुका हूँ, मै खुद ऐसा नहीं करूँगा।
लड़की खूबसूरत ना हो, मुझे भी पसंद नहीं आयेगी क्योंकि मै भी अलग नहीं हूँ, इन्हीं में से हूँ।
मै चाहता हूँ कि किसी ऐसे को क़ुबूल करूँ जिस की क़ीमत दुनिया पहचानने से क़ासिर है पर मै भी तो अब इन्हीं में से हूँ।
मै मजबूर हूँ, अपनी सोच से भी और अपने मुआशरे से भी।
मुझसे ज़्यादा उम्र की लड़की है, मै चाहता हूँ कि निकाह कर लूँ पर क्या मै चाहता हूँ? लोग नहीं चाहते तो मै भी पीछे हट जाता हूँ फिर मै भी अलग नहीं, मै इन्हीं में से हूँ।
मै 4 शादियाँ करना चाहता हूँ पर कैसे? मै मजबूर हूँ लोगों से मै मुआशरे के तानों की ज़न्जीर से बंधा हुआ हूँ, मै एक मजबूर मर्द बोल रहा हूँ शायद अब बोलना भी पसंद ना आयेगा तो अब खामोश होना पड़ेगा।
✍ अ़ब्दे मुस्तफ़ा
Forwarded from Abde Mustafa Organisation
ایک مجبور مرد
میں ایک مجبور مرد بول رہا ہوں،
میرا دم گھٹ رہا ہے پر پھر بھی بول رہا ہوں
میں چاہتا ہوں کہ کچھ کروں پر معاشرے نے مجبور کر رکھا ہے۔
کچھ اچھا کرنا چاہتا ہوں پر لوگوں نے اپنی ناک کے چکر میں میرے ہاتھ باندھ رکھے ہیں۔
میں بھی انھی جیسا بن چکا ہوں۔
میں چاہوں تو ایک بیوہ لڑکی سے شادی کروں پر نہیں کر سکتا، میرے اپنے بیچ میں آ جائیں گے اور اگر نہ بھی آئیں تو میں تو ان جیسا بن ہی چکا ہوں، میں خود ایسا نہیں کروں گا۔
لڑکی خوب صورت نہ ہو، مجھے بھی پسند نہیں آئے گی کیونکہ میں بھی الگ نہیں ہوں، انھی میں سے ہوں۔
میں چاہتا ہوں کہ کسی ایسے کو قبول کروں جس کی قیمت دنیا پہچاننے سے قاصر ہے پر میں بھی تو اب انھی میں سے ہوں۔
میں مجبور ہوں اپنی سوچ سے بھی اور اپنے معاشرے سے بھی۔
مجھ سے زیادہ عمر کی لڑکی ہے، میں چاہتا ہوں کہ نکاح کر لوں پر کیا میں چاہتا ہوں؟
لوگ نہیں چاہتے تو میں بھی پیچھے ہٹ جاتا ہوں پھر میں بھی الگ نہیں، میں انھی میں سے ہوں۔
میں چار شادیاں کرنا چاہتا ہوں پر کیسے؟
میں مجبور ہوں لوگوں سے
میں معاشرے کے طعنوں کی زنجیر سے بندھا ہوا ہوں، میں ایک مجبور مرد بول رہا ہوں پر شاید اب بولنا بھی پسند نہ آئے گا تو اب خاموش ہونا پڑے گا۔
عبد مصطفی
میں ایک مجبور مرد بول رہا ہوں،
میرا دم گھٹ رہا ہے پر پھر بھی بول رہا ہوں
میں چاہتا ہوں کہ کچھ کروں پر معاشرے نے مجبور کر رکھا ہے۔
کچھ اچھا کرنا چاہتا ہوں پر لوگوں نے اپنی ناک کے چکر میں میرے ہاتھ باندھ رکھے ہیں۔
میں بھی انھی جیسا بن چکا ہوں۔
میں چاہوں تو ایک بیوہ لڑکی سے شادی کروں پر نہیں کر سکتا، میرے اپنے بیچ میں آ جائیں گے اور اگر نہ بھی آئیں تو میں تو ان جیسا بن ہی چکا ہوں، میں خود ایسا نہیں کروں گا۔
لڑکی خوب صورت نہ ہو، مجھے بھی پسند نہیں آئے گی کیونکہ میں بھی الگ نہیں ہوں، انھی میں سے ہوں۔
میں چاہتا ہوں کہ کسی ایسے کو قبول کروں جس کی قیمت دنیا پہچاننے سے قاصر ہے پر میں بھی تو اب انھی میں سے ہوں۔
میں مجبور ہوں اپنی سوچ سے بھی اور اپنے معاشرے سے بھی۔
مجھ سے زیادہ عمر کی لڑکی ہے، میں چاہتا ہوں کہ نکاح کر لوں پر کیا میں چاہتا ہوں؟
لوگ نہیں چاہتے تو میں بھی پیچھے ہٹ جاتا ہوں پھر میں بھی الگ نہیں، میں انھی میں سے ہوں۔
میں چار شادیاں کرنا چاہتا ہوں پر کیسے؟
میں مجبور ہوں لوگوں سے
میں معاشرے کے طعنوں کی زنجیر سے بندھا ہوا ہوں، میں ایک مجبور مرد بول رہا ہوں پر شاید اب بولنا بھی پسند نہ آئے گا تو اب خاموش ہونا پڑے گا۔
عبد مصطفی
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Forwarded from Abde Mustafa Organisation
सूफी के लिये भी शरीअत है
इमाम शारानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है के ऐक ऐसा शख्स मेरे पास आया जिसके साथ इसके मुअतक़ीदीन की एक जमाअत थी, वो शख्स बे इल्म था.
उस को फना व बका मे कोई ज़ौक़ हासिल ना था, मेरे पास चंद रोज़ ठहरा, मेने उससे एक दीन पुछा के वुज़ू और नमाज की शर्ते बताओ क्या है?
कहने लगा के मेने इल्म हासिल नहीं किया.
मेने कहा : भाई, क़ुरानो सुन्नत के जाहिर पर इबादत का सही करना लाजिम है।
जो शख्स वाजिब और मुस्तहब, हराम और मकरुह मे फर्क़ नही जानता वो तो जाहिल है और जाहिल की इक़्तेदा ना जाहिर मे दुरुस्त है ना बातिन मे, उस ने इसका कोई जवाब ना दिया और चला गया; अल्लाह तआला ने मुझे उसके शर से बचाया।
(تنبيه المغترین، الباب الاول، شروعہ فی المقصود، ص19)
मालुम हुआ की लोग तसव्वुफ को क़ुरानो सुन्नत के खिलाफ समझते है, वो शख्स गलती पर है बल्के तसव्वुफ में इत्तेबा ए क़ुरानो सुन्नत निहायत ही जरुरी अम्र है।
अब्दे मुस्तफा
इमाम शारानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है के ऐक ऐसा शख्स मेरे पास आया जिसके साथ इसके मुअतक़ीदीन की एक जमाअत थी, वो शख्स बे इल्म था.
उस को फना व बका मे कोई ज़ौक़ हासिल ना था, मेरे पास चंद रोज़ ठहरा, मेने उससे एक दीन पुछा के वुज़ू और नमाज की शर्ते बताओ क्या है?
कहने लगा के मेने इल्म हासिल नहीं किया.
मेने कहा : भाई, क़ुरानो सुन्नत के जाहिर पर इबादत का सही करना लाजिम है।
जो शख्स वाजिब और मुस्तहब, हराम और मकरुह मे फर्क़ नही जानता वो तो जाहिल है और जाहिल की इक़्तेदा ना जाहिर मे दुरुस्त है ना बातिन मे, उस ने इसका कोई जवाब ना दिया और चला गया; अल्लाह तआला ने मुझे उसके शर से बचाया।
(تنبيه المغترین، الباب الاول، شروعہ فی المقصود، ص19)
मालुम हुआ की लोग तसव्वुफ को क़ुरानो सुन्नत के खिलाफ समझते है, वो शख्स गलती पर है बल्के तसव्वुफ में इत्तेबा ए क़ुरानो सुन्नत निहायत ही जरुरी अम्र है।
अब्दे मुस्तफा
Forwarded from Abde Mustafa Organisation
صوفی کے لیے بھی شریعت ہے
امام شعرانی رحمة اللہ تعالی علیہ فرماتے ہیں کہ ایک ایسا شخص میرے پاس آیا جس کے ساتھ اس کے معتقدین کی ایک جماعت تھی، وہ شخص بے علم تھا۔
اس کو فناوبقا میں کوئی ذوق حاصل نہ تھا۔ میرے پاس چند روز ٹھہرامیں نے اسے ایک دن پوچھا کہ وضو اور نماز کی شرطیں بتاؤ کیا ہیں؟
کہنے لگا: میں نے علم حاصل نہیں کیا۔
میں نے کہا: بھائی قرآن و سنت کے ظاہر پر عبادات کا صحیح کرنا لازم ہے جو شخص واجب اور مستحب، حرام اور مکروہ میں فرق نہیں جانتا وہ تو جاہل ہے اور جاہل کی اقتدا نہ ظاہر میں درست ہے نہ باطن میں۔ اس نے اس کا کوئی جواب نہ دیا اور چلا گیا؛ اللہ تعالی نے مجھے اس کے شر سے بچالیا۔
(تنبيه المغترین، الباب الاول، شروعہ فی المقصود، ص19)
معلوم ہواجو لوگ تصوف کو قرآن وسنت کے خلاف سمجھتے ہیں، وہ سخت غلطی پر ہیں بلکہ تصوف میں اتباع قرآن و سنت نہایت ضروری امر ہے۔
عبد مصطفی
امام شعرانی رحمة اللہ تعالی علیہ فرماتے ہیں کہ ایک ایسا شخص میرے پاس آیا جس کے ساتھ اس کے معتقدین کی ایک جماعت تھی، وہ شخص بے علم تھا۔
اس کو فناوبقا میں کوئی ذوق حاصل نہ تھا۔ میرے پاس چند روز ٹھہرامیں نے اسے ایک دن پوچھا کہ وضو اور نماز کی شرطیں بتاؤ کیا ہیں؟
کہنے لگا: میں نے علم حاصل نہیں کیا۔
میں نے کہا: بھائی قرآن و سنت کے ظاہر پر عبادات کا صحیح کرنا لازم ہے جو شخص واجب اور مستحب، حرام اور مکروہ میں فرق نہیں جانتا وہ تو جاہل ہے اور جاہل کی اقتدا نہ ظاہر میں درست ہے نہ باطن میں۔ اس نے اس کا کوئی جواب نہ دیا اور چلا گیا؛ اللہ تعالی نے مجھے اس کے شر سے بچالیا۔
(تنبيه المغترین، الباب الاول، شروعہ فی المقصود، ص19)
معلوم ہواجو لوگ تصوف کو قرآن وسنت کے خلاف سمجھتے ہیں، وہ سخت غلطی پر ہیں بلکہ تصوف میں اتباع قرآن و سنت نہایت ضروری امر ہے۔
عبد مصطفی
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एक सह़ाबी को बुज़दिल कहा!
हज़रते उम्मे ऐमन (रद़ियल्लाहु तआ़ला अ़न्हा) जिहाद का ख़ूब शौक़ रखती थीं।
आप ने जंगे उह़ुद में हिस्सा लिया, और ज़ख़्मियों की मरहम-पट्टी किया करती थीं। आप ग़ज़्व-ए-ख़ैबर में भी शरीक हुईं।
आपके बेटे हज़रत ऐमन (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ग़ज़्व-ए-ख़ैबर में शरीक न हो सके, तो ये आपको नागवार गुज़रा; और आपने उन्हें आ़र दिलाने के लिए, बुज़दिल और डरपोक कहा!
(अल्लाहु अक्बर)
हज़रत ऐमन शहसवारे सह़ाबा में से थे, और बड़े बहादुर व निडर जंगजू थे। दरअस्ल आपका घोड़ा बीमार हो गया था जिसकी वजह से आप शरीक न हो सके।
हज़रत ह़स्सान इब्ने स़ाबित (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने अपने अश़्आ़र में इसका ज़िक्र किया:
"على حين أن قالت لأيمن أمه،
جبنت ولم تشهد فوارس خيبر"،
"وأيمن لم يجبن ولكن مهره،
أضرّ به شرب المديد المخمر"،
"ولولا الذي قد كان من شأن مهره،
لقاتل فيهم فارسا غير أعسر."
ख़ुलासा: उम्मे ऐमन ने कहा कि तुम बुज़दिल हो, तुम ने ख़ैबर में हिस्सा न लिया, तो हज़रत ऐमन का घोड़ा बीमार था, वो बुज़दिल नहीं थे (वालिदह ने आ़र दिलाने के लिए कहा था), और इनके घोड़े ने आटा मिला हुआ पानी पी लिया। अगर घोड़े की ये हालत न होती, तो वो ज़रूर बहादुरी के जौहर दिखाते।
(دیکھیے اسد الغابہ، الاصابہ، طبقات ابن سعد وغیرہ)
ये थीं मांएं कि ख़ुद भी जिहाद में शरीक होतीं और अपने बच्चों को भी तरग़ीब दिलातीं।
आज तो जिहाद का नाम लेने में भी कुछ लोगों को डर लगता है और यही वजह है कि हम डर डर कर जी रहे हैं।
अल्लाह तआ़ला हमें बुज़दिली से दूर करे, और शौक़े जिहाद अ़त़ा फरमाए!
अ़ब्दे मुस्त़फ़ा
हज़रते उम्मे ऐमन (रद़ियल्लाहु तआ़ला अ़न्हा) जिहाद का ख़ूब शौक़ रखती थीं।
आप ने जंगे उह़ुद में हिस्सा लिया, और ज़ख़्मियों की मरहम-पट्टी किया करती थीं। आप ग़ज़्व-ए-ख़ैबर में भी शरीक हुईं।
आपके बेटे हज़रत ऐमन (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ग़ज़्व-ए-ख़ैबर में शरीक न हो सके, तो ये आपको नागवार गुज़रा; और आपने उन्हें आ़र दिलाने के लिए, बुज़दिल और डरपोक कहा!
(अल्लाहु अक्बर)
हज़रत ऐमन शहसवारे सह़ाबा में से थे, और बड़े बहादुर व निडर जंगजू थे। दरअस्ल आपका घोड़ा बीमार हो गया था जिसकी वजह से आप शरीक न हो सके।
हज़रत ह़स्सान इब्ने स़ाबित (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने अपने अश़्आ़र में इसका ज़िक्र किया:
"على حين أن قالت لأيمن أمه،
جبنت ولم تشهد فوارس خيبر"،
"وأيمن لم يجبن ولكن مهره،
أضرّ به شرب المديد المخمر"،
"ولولا الذي قد كان من شأن مهره،
لقاتل فيهم فارسا غير أعسر."
ख़ुलासा: उम्मे ऐमन ने कहा कि तुम बुज़दिल हो, तुम ने ख़ैबर में हिस्सा न लिया, तो हज़रत ऐमन का घोड़ा बीमार था, वो बुज़दिल नहीं थे (वालिदह ने आ़र दिलाने के लिए कहा था), और इनके घोड़े ने आटा मिला हुआ पानी पी लिया। अगर घोड़े की ये हालत न होती, तो वो ज़रूर बहादुरी के जौहर दिखाते।
(دیکھیے اسد الغابہ، الاصابہ، طبقات ابن سعد وغیرہ)
ये थीं मांएं कि ख़ुद भी जिहाद में शरीक होतीं और अपने बच्चों को भी तरग़ीब दिलातीं।
आज तो जिहाद का नाम लेने में भी कुछ लोगों को डर लगता है और यही वजह है कि हम डर डर कर जी रहे हैं।
अल्लाह तआ़ला हमें बुज़दिली से दूर करे, और शौक़े जिहाद अ़त़ा फरमाए!
अ़ब्दे मुस्त़फ़ा