Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
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Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ एक आ़लिम का फ़र्ज़ ⚠
जब राफ़िज़िय्यत का फ़ितना मुँह उठाने लगे, ख़ास तौर पर तब, अफ़्ज़लुल् बशर बअ़दल् अम्बिया सय्यिदुना अबू बक्रे सिद्-दीक़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) की अफ़्ज़लिय्यत का ज़िक्र डंके की चोट पर किया जाएगा,
इन्-शा अल्लाह;
ख़ुस़ूस़न् शैख़ैन करीमैन व सय्यिदुना अमीरे मुआ़वियह (रद़ियल्लाहु अ़न्हुम्), और उ़मूमन् दूसरे स़ह़ाबा की शान में भौंकने वाले किलाबुर् रफ़द़ह (राफ़िज़ी कुत्ते), और इनकी इस ख़बासत पर ख़ामोश बैठने वाले अपने लोग, ज़रा देखें तो, कि आक़ा (ﷺ 💚) ने क्या इरशाद फ़रमाया:
"إِذَا ظَهَرَتِ الْفِتَنُ، أَوْ قَالَ: الْبِدَعُ، وَسُبَّ أَصْحَابِي، فَلْيُظْهِرِ الْعَالِمُ عِلْمَهُ، فَمَنْ لَمْ يَفْعَلْ ذَلِكَ فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ، لَا يَقْبَلُ اللَّهُ لَهُ صَرْفًا وَلَا عَدْلًا"،
"जब फ़ितने (या बिद्अ़तें) सर उठा लें, और मेरे स़ह़ाबा को बुरा कहा जाने लगे, तो आ़लिम को चाहिए कि अपना इ़ल्म ज़ाहिर करे; और जिस (आ़लिम) ने ऐसा नहीं किया, तो उसपर अल्लाह, फरिश्तों, और तमाम लोगों की लअ़नत है. अल्लाह उसकी न कोई नेकी क़ुबूल करेगा, न कोई स़दक़ा."
📙अल् जामिअ़ लि अख़्लाक़िर् रावी व आदाबिस् सामिअ़ (लिल्-इमाम ख़त़ीब अल्-बग़दादी), ह़दीस नं. 1354, जिल्द नं. 2, पेज नं. 118, पब्लिकेशन: मक्-तबतुल् मआ़रिफ़ (रियाद़)
______
मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
01/02/21 ई.
जब राफ़िज़िय्यत का फ़ितना मुँह उठाने लगे, ख़ास तौर पर तब, अफ़्ज़लुल् बशर बअ़दल् अम्बिया सय्यिदुना अबू बक्रे सिद्-दीक़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) की अफ़्ज़लिय्यत का ज़िक्र डंके की चोट पर किया जाएगा,
इन्-शा अल्लाह;
ख़ुस़ूस़न् शैख़ैन करीमैन व सय्यिदुना अमीरे मुआ़वियह (रद़ियल्लाहु अ़न्हुम्), और उ़मूमन् दूसरे स़ह़ाबा की शान में भौंकने वाले किलाबुर् रफ़द़ह (राफ़िज़ी कुत्ते), और इनकी इस ख़बासत पर ख़ामोश बैठने वाले अपने लोग, ज़रा देखें तो, कि आक़ा (ﷺ 💚) ने क्या इरशाद फ़रमाया:
"إِذَا ظَهَرَتِ الْفِتَنُ، أَوْ قَالَ: الْبِدَعُ، وَسُبَّ أَصْحَابِي، فَلْيُظْهِرِ الْعَالِمُ عِلْمَهُ، فَمَنْ لَمْ يَفْعَلْ ذَلِكَ فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ، لَا يَقْبَلُ اللَّهُ لَهُ صَرْفًا وَلَا عَدْلًا"،
"जब फ़ितने (या बिद्अ़तें) सर उठा लें, और मेरे स़ह़ाबा को बुरा कहा जाने लगे, तो आ़लिम को चाहिए कि अपना इ़ल्म ज़ाहिर करे; और जिस (आ़लिम) ने ऐसा नहीं किया, तो उसपर अल्लाह, फरिश्तों, और तमाम लोगों की लअ़नत है. अल्लाह उसकी न कोई नेकी क़ुबूल करेगा, न कोई स़दक़ा."
📙अल् जामिअ़ लि अख़्लाक़िर् रावी व आदाबिस् सामिअ़ (लिल्-इमाम ख़त़ीब अल्-बग़दादी), ह़दीस नं. 1354, जिल्द नं. 2, पेज नं. 118, पब्लिकेशन: मक्-तबतुल् मआ़रिफ़ (रियाद़)
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
01/02/21 ई.
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Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ हमारा सरमाया लुट गया ⚠
'बैतुल् ह़िक्मत (House of wisdom)', हमारी उस आ़लमी लाइब्रेरी का नाम है, जो ख़िलाफ़ते अ़ब्बासिय्यह के दौर में बग़दाद शरीफ़ में थी. जिसे 'Grand Library of Baghdad' के नाम से भी याद किया जाता है. जिसे मंगोल व तातार कुफ़्फ़ार ने अपने 1258 ई. के ह़मले में जला दिया था. जब भी इसके बारे में पढ़ता हूं, बहुत रोता हूं. 💔
8वीं सदी ईस्वी में 'हारुन रशीद' ने, इस बड़ी हैअत पर, इसकी बुनियाद रखी, और 'मामून' के दौर में ये पूरी दुनिया के हर मज़हब और फ़िक्र के मुफ़क्किरीन, वैज्ञानिकों, मनात़िक़ह और फ़लासिफ़ह के लिए मरकज़ी लायब्रेरी बन गयी थी. हर माहिर, इसकी तरफ रुजूअ़ करता था;
इसमें लाखों किताबें थीं. इमामी शीआ़ का बहुत बड़ा मौलवी, जिसे 'शैख़ुत़् त़ाइफ़ह' के लक़ब से शीओ़ं में याद किया जाता है: 'अबू जअ़्फ़र, ख़्वाजा नस़ीरुद्-दीन त़ूसी', जिसे, दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों में से एक माना जाता है, इसे हमले की भनक लगते ही, इसने लायब्रेरी पर हमले से पहले ही, चार लाख मख़्त़ूत़ों (manuscripts) को बचा लिया था, और मराग़ह की आॅब्ज़रबेटरी (Maragheh observatory) में मुन्तक़िल कर दिया था;
मुअर्रिख़ीन ने अपने लरज़ते व कांपते कलमों से लिखा है कि:
"जब इस लायब्रेरी की किताबों को जलाकर, दजला नदी (Tigris River) में फैंक दिया गया, तो नदी का पानी किताबों की सियाही से काला पड़ गया था."
__
मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
15/01/22 ई.
'बैतुल् ह़िक्मत (House of wisdom)', हमारी उस आ़लमी लाइब्रेरी का नाम है, जो ख़िलाफ़ते अ़ब्बासिय्यह के दौर में बग़दाद शरीफ़ में थी. जिसे 'Grand Library of Baghdad' के नाम से भी याद किया जाता है. जिसे मंगोल व तातार कुफ़्फ़ार ने अपने 1258 ई. के ह़मले में जला दिया था. जब भी इसके बारे में पढ़ता हूं, बहुत रोता हूं. 💔
8वीं सदी ईस्वी में 'हारुन रशीद' ने, इस बड़ी हैअत पर, इसकी बुनियाद रखी, और 'मामून' के दौर में ये पूरी दुनिया के हर मज़हब और फ़िक्र के मुफ़क्किरीन, वैज्ञानिकों, मनात़िक़ह और फ़लासिफ़ह के लिए मरकज़ी लायब्रेरी बन गयी थी. हर माहिर, इसकी तरफ रुजूअ़ करता था;
इसमें लाखों किताबें थीं. इमामी शीआ़ का बहुत बड़ा मौलवी, जिसे 'शैख़ुत़् त़ाइफ़ह' के लक़ब से शीओ़ं में याद किया जाता है: 'अबू जअ़्फ़र, ख़्वाजा नस़ीरुद्-दीन त़ूसी', जिसे, दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों में से एक माना जाता है, इसे हमले की भनक लगते ही, इसने लायब्रेरी पर हमले से पहले ही, चार लाख मख़्त़ूत़ों (manuscripts) को बचा लिया था, और मराग़ह की आॅब्ज़रबेटरी (Maragheh observatory) में मुन्तक़िल कर दिया था;
मुअर्रिख़ीन ने अपने लरज़ते व कांपते कलमों से लिखा है कि:
"जब इस लायब्रेरी की किताबों को जलाकर, दजला नदी (Tigris River) में फैंक दिया गया, तो नदी का पानी किताबों की सियाही से काला पड़ गया था."
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
15/01/22 ई.
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ ख़्वाजा का एक अनोखा आ़शिक़ ⚠
राफ़िज़ी मुजाविरों, और नाम निहाद चिश्तियों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा:
मैं आपको एक ऐसे आ़शिक़े ग़रीब नवाज़ की बारगाह में ले चलता हूँ, जिसकी ज़िन्दगी का एक-एक लम्ह़ा ख़िदमते दीन, व इश्क़े रसूल (ﷺ ❤️) का आईना, आ़शिक़ाने रसूल (ﷺ ❤️) के लिए ख़ज़ीना, और दुश्मनों के लिए शम्शीरे बरहना है. जिसे दुनिया 'इमामे अहले सुन्नत', व 'मुजद्दिदे दीनो मिल्लत' के अल्क़ाब से याद करती है. यानी:
आ़ला ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा खा़न ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अलैहिर्रह़मह) की बारगाह में;
जिनके सामने एक इस्तिफ़्ता पेश किया गया कि:
"क्या अजमेर के साथ 'शरीफ़' न लिखना, और असली नाम 'ग़ुलामे मुई़नुद्दीन' पर 'ग़ुलाम' न लिखना, ख़िलाफ़े अ़क़ीद-ए-अहले सुन्नत है, या नहीं?"
आपने जवाब में इरशाद फ़रमाया:
"अजमेर शरीफ़ के नामे पाक के साथ लफ्ज़े 'शरीफ़' न लिखना, और इन तमाम मवाक़िअ़ में इसका इल्तिज़ाम करना, अगर इस बिना पर है कि हुज़ूर सय्यिदुना ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) की जलवा अफरोज़ी, ह़याते ज़ाहिरी, व मज़ारे पुर-अनवार को (जिस के सबब मुसलमान अजमेर शरीफ़ कहते हैं), वज्हे शराफ़त नहीं जानता, तो वो गुमराह, बल्कि अ़दुव्वुल्लाह (अल्लाह का दुश्मन) है. स़ह़ीह़ बुख़ारी शरीफ़ में है कि रसूलुल्लाह (ﷺ ❤️) इरशाद फरमाते हैं कि:
"अल्लाह (ﷻ) इरशाद फ़रमाता है:
"مَنْ عَادَى لِي وَلِيًّا فَقَدْ آذَنْتُهُ بِالحَرْبِ..."،
"जिसने मेरे वली से दुश्मनी मोल ली, मेरी जानिब से उसके लिए ऐलाने जंग है....",
और अगर ये नापाक इल्तिज़ाम, बर बिनाए कसल, व कोताहे क़लमी है, तो सख़्त बे-बरकता, और फ़ज़्ले अ़ज़ीम व ख़ैरे जसीम से मह़रूम है;
और अगर इसका मबना, वह्हाबिय्यत है, तो वह्हाबिय्यत कुफ़्र है, इसके बाद ऐसी बातों की क्या शिकायत?
अपने नाम से 'ग़ुलाम' का ह़ज़्फ़ अगर इस बिना पर है, कि ह़ुज़ूर ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगां (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) का ग़ुलाम बनने से इंकार व इस्तिक्बार रखता है, तो बदस्तूर गुमराह, और बह़ुक्मे ह़दीसे मज़्कूर, अ़दुव्वुल्लाह (अल्लाह का दुश्मन) है, और इसका ठिकाना जहन्नम है. अल्लाह (ﷻ) ने फ़रमाया:
"أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِلْمُتَكَبِّرِينَ"،
"क्या मग़रूर का ठिकाना जहन्नम नहीं ?"
[क़ुरआन, 39:60]
और अगर बर बिनाए वह्हाबियत है, कि ग़ुलामे औलिया-ए-किराम बनने वालों को मुशरिक, और 'ग़ुलामे मुह़िय्युद्दीन', व 'ग़ुलामे मुई़नुद्दीन' को शिर्क जानता है, तो वह्हाबिय्यह ख़ुद ज़िन्दीक़, बेदीन, कुफ़्फ़ार, व मुर्तद्दीन हैं;
"وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ"،
"और काफिरों के लिए ख़्वारी का अज़ाब है."
[क़ुरआन, 2:90]
📙फ़तावा रज़विय्यह, 6:187-188, रज़ा अकैडमी (मुम्बई)
_____
दूसरी जगह अपने ग़ौस व ख़्वाजा की ग़ुलामी का सुबूत देते हुए लिखते हैं:
"हुज़ूर सय्यिदुना ग़ौसे आ़ज़म (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ज़रूर दस्तगीर हैं, और ह़ज़रत सुल्त़ानुल् हिन्द मुई़नुल्-हक़्क़ि वद्-दीन, ज़रूर ग़रीब नवाज़."
📙फ़तावा रज़विय्यह, 11:43, रज़ा अकैडमी (मुंबई)
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
14/03/19 ई.
राफ़िज़ी मुजाविरों, और नाम निहाद चिश्तियों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा:
मैं आपको एक ऐसे आ़शिक़े ग़रीब नवाज़ की बारगाह में ले चलता हूँ, जिसकी ज़िन्दगी का एक-एक लम्ह़ा ख़िदमते दीन, व इश्क़े रसूल (ﷺ ❤️) का आईना, आ़शिक़ाने रसूल (ﷺ ❤️) के लिए ख़ज़ीना, और दुश्मनों के लिए शम्शीरे बरहना है. जिसे दुनिया 'इमामे अहले सुन्नत', व 'मुजद्दिदे दीनो मिल्लत' के अल्क़ाब से याद करती है. यानी:
आ़ला ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा खा़न ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अलैहिर्रह़मह) की बारगाह में;
जिनके सामने एक इस्तिफ़्ता पेश किया गया कि:
"क्या अजमेर के साथ 'शरीफ़' न लिखना, और असली नाम 'ग़ुलामे मुई़नुद्दीन' पर 'ग़ुलाम' न लिखना, ख़िलाफ़े अ़क़ीद-ए-अहले सुन्नत है, या नहीं?"
आपने जवाब में इरशाद फ़रमाया:
"अजमेर शरीफ़ के नामे पाक के साथ लफ्ज़े 'शरीफ़' न लिखना, और इन तमाम मवाक़िअ़ में इसका इल्तिज़ाम करना, अगर इस बिना पर है कि हुज़ूर सय्यिदुना ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) की जलवा अफरोज़ी, ह़याते ज़ाहिरी, व मज़ारे पुर-अनवार को (जिस के सबब मुसलमान अजमेर शरीफ़ कहते हैं), वज्हे शराफ़त नहीं जानता, तो वो गुमराह, बल्कि अ़दुव्वुल्लाह (अल्लाह का दुश्मन) है. स़ह़ीह़ बुख़ारी शरीफ़ में है कि रसूलुल्लाह (ﷺ ❤️) इरशाद फरमाते हैं कि:
"अल्लाह (ﷻ) इरशाद फ़रमाता है:
"مَنْ عَادَى لِي وَلِيًّا فَقَدْ آذَنْتُهُ بِالحَرْبِ..."،
"जिसने मेरे वली से दुश्मनी मोल ली, मेरी जानिब से उसके लिए ऐलाने जंग है....",
और अगर ये नापाक इल्तिज़ाम, बर बिनाए कसल, व कोताहे क़लमी है, तो सख़्त बे-बरकता, और फ़ज़्ले अ़ज़ीम व ख़ैरे जसीम से मह़रूम है;
और अगर इसका मबना, वह्हाबिय्यत है, तो वह्हाबिय्यत कुफ़्र है, इसके बाद ऐसी बातों की क्या शिकायत?
अपने नाम से 'ग़ुलाम' का ह़ज़्फ़ अगर इस बिना पर है, कि ह़ुज़ूर ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगां (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) का ग़ुलाम बनने से इंकार व इस्तिक्बार रखता है, तो बदस्तूर गुमराह, और बह़ुक्मे ह़दीसे मज़्कूर, अ़दुव्वुल्लाह (अल्लाह का दुश्मन) है, और इसका ठिकाना जहन्नम है. अल्लाह (ﷻ) ने फ़रमाया:
"أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِلْمُتَكَبِّرِينَ"،
"क्या मग़रूर का ठिकाना जहन्नम नहीं ?"
[क़ुरआन, 39:60]
और अगर बर बिनाए वह्हाबियत है, कि ग़ुलामे औलिया-ए-किराम बनने वालों को मुशरिक, और 'ग़ुलामे मुह़िय्युद्दीन', व 'ग़ुलामे मुई़नुद्दीन' को शिर्क जानता है, तो वह्हाबिय्यह ख़ुद ज़िन्दीक़, बेदीन, कुफ़्फ़ार, व मुर्तद्दीन हैं;
"وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ"،
"और काफिरों के लिए ख़्वारी का अज़ाब है."
[क़ुरआन, 2:90]
📙फ़तावा रज़विय्यह, 6:187-188, रज़ा अकैडमी (मुम्बई)
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दूसरी जगह अपने ग़ौस व ख़्वाजा की ग़ुलामी का सुबूत देते हुए लिखते हैं:
"हुज़ूर सय्यिदुना ग़ौसे आ़ज़म (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ज़रूर दस्तगीर हैं, और ह़ज़रत सुल्त़ानुल् हिन्द मुई़नुल्-हक़्क़ि वद्-दीन, ज़रूर ग़रीब नवाज़."
📙फ़तावा रज़विय्यह, 11:43, रज़ा अकैडमी (मुंबई)
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
14/03/19 ई.
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Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ मुल्ह़िदीन का वसवसा ⚠
आक़ा (ﷺ 💚) ने इरशाद फ़रमाया:
"يَأْتِي الشَّيْطَانُ أَحَدَكُمْ، فَيَقُولَ: 'مَنْ خَلَقَ كَذَا وَكَذَا؟' حَتَّى يَقُولَ لَهُ: 'مَنْ خَلَقَ رَبَّكَ؟' فَإِذَا بَلَغَ ذَلِكَ، فَلْيَسْتَعِذْ بِاللهِ وَلْيَنْتَهِ."
"तुम में से किसी के पास शैतान आएगा, तो पूछेगा: 'फ़ुलां-फ़ुलां चीज़ को किसने पैदा किया?'
यहां तक कि ये (सवाल) भी पूछेगा: 'तुम्हारे रब को किसने पैदा किया?'
तो जिसके साथ ऐसा हो, तो वो अऊ़ज़ु-बिल्लाह पढ़े, और (ऐसे वसवसों की तरफ़) तवज्जुह न दे."
📙स़ह़ीह़ मुस्लिम, किताबुल् ईमान, बाब: बयानुल् वस्वसह फ़िल् ईमान, ह़दीस न. 214, जिल्द न. 1, पेज न. 120, पब्लिकेशन: दारु इह़्याइत् तुरासिल् अ़रबिय्यि (बेरूत)
______
मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
20/12/20 ई.
आक़ा (ﷺ 💚) ने इरशाद फ़रमाया:
"يَأْتِي الشَّيْطَانُ أَحَدَكُمْ، فَيَقُولَ: 'مَنْ خَلَقَ كَذَا وَكَذَا؟' حَتَّى يَقُولَ لَهُ: 'مَنْ خَلَقَ رَبَّكَ؟' فَإِذَا بَلَغَ ذَلِكَ، فَلْيَسْتَعِذْ بِاللهِ وَلْيَنْتَهِ."
"तुम में से किसी के पास शैतान आएगा, तो पूछेगा: 'फ़ुलां-फ़ुलां चीज़ को किसने पैदा किया?'
यहां तक कि ये (सवाल) भी पूछेगा: 'तुम्हारे रब को किसने पैदा किया?'
तो जिसके साथ ऐसा हो, तो वो अऊ़ज़ु-बिल्लाह पढ़े, और (ऐसे वसवसों की तरफ़) तवज्जुह न दे."
📙स़ह़ीह़ मुस्लिम, किताबुल् ईमान, बाब: बयानुल् वस्वसह फ़िल् ईमान, ह़दीस न. 214, जिल्द न. 1, पेज न. 120, पब्लिकेशन: दारु इह़्याइत् तुरासिल् अ़रबिय्यि (बेरूत)
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
20/12/20 ई.
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
उनका, आज का ख़ुश होना, कल के रोने का वादा कर रहा है. क़ुरआन 26:91-102 ने, इनपर कारी ज़र्ब लगाई:
"وَ بُرِّزَتِ الْجَحِیْمُ لِلْغٰوِیْنَ وَ قِیْلَ لَهُمْ اَیْنَمَا كُنْتُمْ تَعْبُدُوْنَ مِنْ دُوْنِ اللّٰهِؕ هَلْ یَنْصُرُوْنَكُمْ اَوْ یَنْتَصِرُوْنَ فَكُبْكِبُوْا فِیْهَا هُمْ وَ الْغَاوٗنَ وَ جُنُوْدُ اِبْلِیْسَ اَجْمَعُوْنَ قَالُوْا وَ هُمْ فِیْهَا یَخْتَصِمُوْنَ تَاللّٰهِ اِنْ كُنَّا لَفِیْ ضَلٰلٍ مُّبِیْنٍ اِذْ نُسَوِّیْكُمْ بِرَبِّ الْعٰلَمِیْنَ وَ مَاۤ اَضَلَّنَاۤ اِلَّا الْمُجْرِمُوْنَ فَمَا لَنَا مِنْ شَافِعِیْنَ وَ لَا صَدِیْقٍ حَمِیْمٍ فَلَوْ اَنَّ لَنَا كَرَّةً فَنَكُوْنَ مِنَ الْمُؤْمِنِیْنَ"،
"और ज़ाहिर की जाएगी दोज़ख़, गुमराहों के लिए;
और उनसे कहा जाएगा:
'कहाँ हैं वो, जिन को तुम पूजते थे, अल्लाह के सिवा. क्या वो तुम्हारी मदद करेंगे, या बदला लेंगे?'
तो औंधा दिए गए जहन्नम में,
वो और सब गुमराह,
और इब्लीस के लश्कर सारे;
कहेंगे, और वो उसमें बाहम झगड़ते होंगे:
'ख़ुदा की क़सम! बेशक हम खुली गुमराही में थे,
जब, कि तुम्हें 'रब्बुल् आ़लमीन' के बराबर ठहराते थे;
और हमें न बहकाया, मगर मुजरिमों ने;
तो अब हमारा कोई सिफ़ारिशी नहीं;
और न कोई ग़मख़ार दोस्त;
तो किसी तरह हमें फिर जाना होता,
कि मुसलमान होते'."
[कंज़ुल् ईमान]
#BabriMasjidAwaitsJustice
#बाबरी_मस्जिद
"وَ بُرِّزَتِ الْجَحِیْمُ لِلْغٰوِیْنَ وَ قِیْلَ لَهُمْ اَیْنَمَا كُنْتُمْ تَعْبُدُوْنَ مِنْ دُوْنِ اللّٰهِؕ هَلْ یَنْصُرُوْنَكُمْ اَوْ یَنْتَصِرُوْنَ فَكُبْكِبُوْا فِیْهَا هُمْ وَ الْغَاوٗنَ وَ جُنُوْدُ اِبْلِیْسَ اَجْمَعُوْنَ قَالُوْا وَ هُمْ فِیْهَا یَخْتَصِمُوْنَ تَاللّٰهِ اِنْ كُنَّا لَفِیْ ضَلٰلٍ مُّبِیْنٍ اِذْ نُسَوِّیْكُمْ بِرَبِّ الْعٰلَمِیْنَ وَ مَاۤ اَضَلَّنَاۤ اِلَّا الْمُجْرِمُوْنَ فَمَا لَنَا مِنْ شَافِعِیْنَ وَ لَا صَدِیْقٍ حَمِیْمٍ فَلَوْ اَنَّ لَنَا كَرَّةً فَنَكُوْنَ مِنَ الْمُؤْمِنِیْنَ"،
"और ज़ाहिर की जाएगी दोज़ख़, गुमराहों के लिए;
और उनसे कहा जाएगा:
'कहाँ हैं वो, जिन को तुम पूजते थे, अल्लाह के सिवा. क्या वो तुम्हारी मदद करेंगे, या बदला लेंगे?'
तो औंधा दिए गए जहन्नम में,
वो और सब गुमराह,
और इब्लीस के लश्कर सारे;
कहेंगे, और वो उसमें बाहम झगड़ते होंगे:
'ख़ुदा की क़सम! बेशक हम खुली गुमराही में थे,
जब, कि तुम्हें 'रब्बुल् आ़लमीन' के बराबर ठहराते थे;
और हमें न बहकाया, मगर मुजरिमों ने;
तो अब हमारा कोई सिफ़ारिशी नहीं;
और न कोई ग़मख़ार दोस्त;
तो किसी तरह हमें फिर जाना होता,
कि मुसलमान होते'."
[कंज़ुल् ईमान]
#BabriMasjidAwaitsJustice
#बाबरी_मस्जिद
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ स़िद्-दीक़ का पहला नंबर ⚠
कूफ़ा के मिम्बर पर खड़े होकर मौला ह़ैदरे कर्रार (कर्रमल्लाहु तआ़ला वज्हहुल् करीम) ने तफ़्ज़ीलिय्यत की जड़ों को ही काट डाला, और एलान कर दिया:
"ألا، إن خير هذه الأمة بعد نبيها، أبو بكر، ثم عمر"،
"ख़बरदार, नबी के बाद, इस उम्मत में सबसे अफ़्ज़ल, अबू बक्र हैं, फिर उ़मर हैं."
📙मुस्नदे अह़मद, ह़दीस न. 833 से 837 तक, जिल्द न. 2, पेज न. 201, पब्लिकेशन: मुअस्ससतुर् रिसालह (बेरूत), पहला एडीशन, 1421 हि./2001 ई.
📙तारीख़े दिमश्क़ (इब्ने अ़साकिर), ह़र्फ़ुल् ऐ़न, जिल्द न. 44, पेज न. 203, पब्लिकेशन: दारुल् फ़िक्र (बेरूत), 1415 हि./1995 ई.
'स़ह़ीह़ बुख़ारी' में है कि ह़ैदरे कर्रार मौला अ़ली (कर्रमल्लाहु तआ़ला वज्हहुल् करीम) के बेटे हज़रत मुह़म्मद इब्ने ह़नफ़िय्यह (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) रिवायत करते हैं:
"'قُلْتُ لِأَبِي أَيُّ النَّاسِ خَيْرٌ بَعْدَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ؟' قَالَ: 'أَبُو بَكْرٍ'، قُلْتُ: 'ثُمَّ مَنْ؟' قَالَ: 'ثُمَّ عُمَرُ'،
وَخَشِيتُ أَنْ يَقُولَ عُثْمَانُ، قُلْتُ: 'ثُمَّ أَنْتَ؟' قَالَ: 'مَا أَنَا إِلَّا رَجُلٌ مِنَ المُسْلِمِينَ'"،
"मैंने अपने वालिद (ह़ज़रत अ़ली) से पूछा कि: 'आक़ा (ﷺ 💚) के बाद लोगों में सबसे अफ़्ज़ल कौन है?'
तो ह़ज़रत अ़ली ने जवाब दिया: 'अबू बक्र',
मैंने पूछा: 'फिर कौन?'
तो ह़ज़रत अ़ली ने जवाब दिया: 'उ़मर',
फिर मुझे ख़ौफ़ हुआ कि (अगर मैं अब पूछूँगा कि: 'फिर कौन', तो आप कहीं) ह़ज़रत उ़स्मान का नाम न ले दें, (इसलिए) मैंने (डायरेक्ट) पूछा: 'फिर आप हैं न?'
तो ह़ज़रत अ़ली ने (तवाज़ुअ़न्) जवाब दिया: 'मैं तो सिर्फ़ मुसलमानों में से ही एक आदमी हूं'."
📙स़ह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस न. 3671, जिल्द न. 5, पेज न. 7, पब्लिकेशन: दारु त़ौक़िन् नजाह (बेरूत), फ़र्स्ट एडीशन, 1422 हि.
इमाम अबू बक्र बैहक़ी (d. 458 हि.), अपनी किताब: 'अल्-इअ़्तिक़ाद वल् हिदायह' में, और इमाम इब्ने अ़साकिर (d. 571 हि.) अपनी किताब: 'तारीख़े दिमश्क़' में रिवायत करते हैं कि मौला अ़ली (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने बस़रा में मिंबर पर ख़ुत़बा देते हुए इर्शाद फ़रमाया:
"أَلَا، لَا يُفَضِّلْنِي أَحَدٌ عَلَى أَبِي بَكْرٍ وَعُمَرَ. لَا أُوتِیَ بِأَحَدٍ فَضَّلَنِي عَلَيْهِمَا إِلَّا جَلَدْتُهُ حَدَّ الْمُفْتَرِي"،
"ख़बरदार, कोई भी, अबू बक्र और उ़मर पर, मुझे फ़ज़ीलत नहीं देगा. मेरे पास जो भी शख़्स ऐसा लाया गया, जो मुझे इन दोनों से अफ़्ज़ल मानता है, उसे मैं 80 कोड़ों की सज़ा दूँगा."
📙अल्-इअ़्तिक़ाद वल् हिदायह, पेज नं. 358, पब्लिकेशन: दारुल् आफ़ाक़ (बेरूत), पहला एडीशन, 1401 हि.
📙तारीख़े दिमश्क़ (इब्ने अ़साकिर), ह़र्फ़ुल् ऐ़न, ह़दीस नं. 3398, जिल्द न. 30, पेज न. 383, पब्लिकेशन: दारुल् फ़िक्र (बेरूत), 1415 हि./1995 ई.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
04/02/21 ई.
कूफ़ा के मिम्बर पर खड़े होकर मौला ह़ैदरे कर्रार (कर्रमल्लाहु तआ़ला वज्हहुल् करीम) ने तफ़्ज़ीलिय्यत की जड़ों को ही काट डाला, और एलान कर दिया:
"ألا، إن خير هذه الأمة بعد نبيها، أبو بكر، ثم عمر"،
"ख़बरदार, नबी के बाद, इस उम्मत में सबसे अफ़्ज़ल, अबू बक्र हैं, फिर उ़मर हैं."
📙मुस्नदे अह़मद, ह़दीस न. 833 से 837 तक, जिल्द न. 2, पेज न. 201, पब्लिकेशन: मुअस्ससतुर् रिसालह (बेरूत), पहला एडीशन, 1421 हि./2001 ई.
📙तारीख़े दिमश्क़ (इब्ने अ़साकिर), ह़र्फ़ुल् ऐ़न, जिल्द न. 44, पेज न. 203, पब्लिकेशन: दारुल् फ़िक्र (बेरूत), 1415 हि./1995 ई.
'स़ह़ीह़ बुख़ारी' में है कि ह़ैदरे कर्रार मौला अ़ली (कर्रमल्लाहु तआ़ला वज्हहुल् करीम) के बेटे हज़रत मुह़म्मद इब्ने ह़नफ़िय्यह (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) रिवायत करते हैं:
"'قُلْتُ لِأَبِي أَيُّ النَّاسِ خَيْرٌ بَعْدَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ؟' قَالَ: 'أَبُو بَكْرٍ'، قُلْتُ: 'ثُمَّ مَنْ؟' قَالَ: 'ثُمَّ عُمَرُ'،
وَخَشِيتُ أَنْ يَقُولَ عُثْمَانُ، قُلْتُ: 'ثُمَّ أَنْتَ؟' قَالَ: 'مَا أَنَا إِلَّا رَجُلٌ مِنَ المُسْلِمِينَ'"،
"मैंने अपने वालिद (ह़ज़रत अ़ली) से पूछा कि: 'आक़ा (ﷺ 💚) के बाद लोगों में सबसे अफ़्ज़ल कौन है?'
तो ह़ज़रत अ़ली ने जवाब दिया: 'अबू बक्र',
मैंने पूछा: 'फिर कौन?'
तो ह़ज़रत अ़ली ने जवाब दिया: 'उ़मर',
फिर मुझे ख़ौफ़ हुआ कि (अगर मैं अब पूछूँगा कि: 'फिर कौन', तो आप कहीं) ह़ज़रत उ़स्मान का नाम न ले दें, (इसलिए) मैंने (डायरेक्ट) पूछा: 'फिर आप हैं न?'
तो ह़ज़रत अ़ली ने (तवाज़ुअ़न्) जवाब दिया: 'मैं तो सिर्फ़ मुसलमानों में से ही एक आदमी हूं'."
📙स़ह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस न. 3671, जिल्द न. 5, पेज न. 7, पब्लिकेशन: दारु त़ौक़िन् नजाह (बेरूत), फ़र्स्ट एडीशन, 1422 हि.
इमाम अबू बक्र बैहक़ी (d. 458 हि.), अपनी किताब: 'अल्-इअ़्तिक़ाद वल् हिदायह' में, और इमाम इब्ने अ़साकिर (d. 571 हि.) अपनी किताब: 'तारीख़े दिमश्क़' में रिवायत करते हैं कि मौला अ़ली (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने बस़रा में मिंबर पर ख़ुत़बा देते हुए इर्शाद फ़रमाया:
"أَلَا، لَا يُفَضِّلْنِي أَحَدٌ عَلَى أَبِي بَكْرٍ وَعُمَرَ. لَا أُوتِیَ بِأَحَدٍ فَضَّلَنِي عَلَيْهِمَا إِلَّا جَلَدْتُهُ حَدَّ الْمُفْتَرِي"،
"ख़बरदार, कोई भी, अबू बक्र और उ़मर पर, मुझे फ़ज़ीलत नहीं देगा. मेरे पास जो भी शख़्स ऐसा लाया गया, जो मुझे इन दोनों से अफ़्ज़ल मानता है, उसे मैं 80 कोड़ों की सज़ा दूँगा."
📙अल्-इअ़्तिक़ाद वल् हिदायह, पेज नं. 358, पब्लिकेशन: दारुल् आफ़ाक़ (बेरूत), पहला एडीशन, 1401 हि.
📙तारीख़े दिमश्क़ (इब्ने अ़साकिर), ह़र्फ़ुल् ऐ़न, ह़दीस नं. 3398, जिल्द न. 30, पेज न. 383, पब्लिकेशन: दारुल् फ़िक्र (बेरूत), 1415 हि./1995 ई.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
04/02/21 ई.
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ हमेशा छोटे बनकर रहो ⚠
मख़्लूक़ में सबसे बड़े, मुख़्तारे कायनात, सुल्त़ानुल् अम्बिया, आक़ा (ﷺ 💚) ने इरशाद फ़रमाया:
"مَنْ تَوَاضَعَ لِلَّهِ رَفَعَهُ اللهُ، فَهُوَ فِي نَفْسِهِ صَغِيرٌ، وَفِي أَعْيُنِ النَّاسِ عَظِيمٌ؛ وَمَنْ تَكَبَّرَ وَضَعَهُ اللهُ، فَهُوَ فِي أَعْيُنِ النَّاسِ صَغِيرٌ، وَفِي نَفْسِهِ كَبِيرٌ، حَتَّى لَهُوَ أَهْوَنُ عَلَيْهِمْ مِنْ كَلْبٍ أَوْ خِنْزِيرٍ"،
"जिसने अल्लाह के लिए तवाज़ुअ़ (छोटा बनने की आदत) इख़्तियार की, अल्लाह ने उसे बुलंद कर दिया. तो वो ख़ुद में तो छोटा होता है, मगर लोगों की नज़र में अ़ज़्मत वाला होता है; और जिसने घमंड किया, तो अल्लाह ने उसे नीचा दिखा दिया. तो वो लोगों की नज़र में नीच होता है, और ख़ुद में अपने आप को बड़ा समझता है; यहां तक कि लोगों पर, वो कुत्ते और सूअर से भी ज़्यादा गया-गुज़रा हुआ होता है."
📙शुअ़बुल् ईमान (लिल् बैहक़िय्यि), ह़दीस न. 7790, जिल्द न. 10, पेज न. 455, पब्लिकेशन: मक्-तबतुर् रुश्द (रियाद़), फ़र्स्ट एडीशन, 1423 हि./2003 ई.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
27/01/21 ई.
मख़्लूक़ में सबसे बड़े, मुख़्तारे कायनात, सुल्त़ानुल् अम्बिया, आक़ा (ﷺ 💚) ने इरशाद फ़रमाया:
"مَنْ تَوَاضَعَ لِلَّهِ رَفَعَهُ اللهُ، فَهُوَ فِي نَفْسِهِ صَغِيرٌ، وَفِي أَعْيُنِ النَّاسِ عَظِيمٌ؛ وَمَنْ تَكَبَّرَ وَضَعَهُ اللهُ، فَهُوَ فِي أَعْيُنِ النَّاسِ صَغِيرٌ، وَفِي نَفْسِهِ كَبِيرٌ، حَتَّى لَهُوَ أَهْوَنُ عَلَيْهِمْ مِنْ كَلْبٍ أَوْ خِنْزِيرٍ"،
"जिसने अल्लाह के लिए तवाज़ुअ़ (छोटा बनने की आदत) इख़्तियार की, अल्लाह ने उसे बुलंद कर दिया. तो वो ख़ुद में तो छोटा होता है, मगर लोगों की नज़र में अ़ज़्मत वाला होता है; और जिसने घमंड किया, तो अल्लाह ने उसे नीचा दिखा दिया. तो वो लोगों की नज़र में नीच होता है, और ख़ुद में अपने आप को बड़ा समझता है; यहां तक कि लोगों पर, वो कुत्ते और सूअर से भी ज़्यादा गया-गुज़रा हुआ होता है."
📙शुअ़बुल् ईमान (लिल् बैहक़िय्यि), ह़दीस न. 7790, जिल्द न. 10, पेज न. 455, पब्लिकेशन: मक्-तबतुर् रुश्द (रियाद़), फ़र्स्ट एडीशन, 1423 हि./2003 ई.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
27/01/21 ई.
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
वक़्त पर शादी कर लेना बहुत ज़रूरी है, प्यारे आक़ा (ﷺ 💚) ने इरशाद फ़रमाया:
"مِسْكِينٌ مِسْكِينٌ رَجُلٌ لَيْسَتْ لَهُ امْرَأَةٌ، قِيلَ: 'يَا رَسُولَ اللهِ! وَإِنْ كَانَ غَنِيًّا ذَا مَالٍ؟' قَالَ: 'وَإِنْ كَانَ غَنِيًّا مِنَ الْمَالِ'، قَالَ: 'وَمِسْكِينَةٌ مِسْكِينَةٌ امْرَأَةٌ لَيْسَ لَهَا زَوْجٌ'، قِيلَ: 'يَا رَسُولَ اللهِ! وَإِنْ كَانَتْ غَنِيَّةً أَوْ مُكْثِرَةً مِنَ الْمَالِ؟' قَالَ: 'وَإِنْ كَانَتْ'."
"मिस्कीन है, मिस्कीन है वो मर्द, जिसकी बीवी न हो; अर्ज़ की गयी: 'ऐ अल्लाह के रसूल! अगरचे (वो मर्द) माल वाला अमीर (rich) हो?'
फ़रमाया: 'हाँ, अगरचे माल वाला अमीर (rich) हो.'
(फिर आक़ा ﷺ 💚 ने) फ़रमाया: 'मिस्कीना है, मिस्कीना है वो औरत, जिसका शौहर न हो.'
अर्ज़ की गयी: 'ऐ अल्लाह के रसूल! चाहें वो (औरत) अमीर (rich) हो, या ज़्यादा माल वाली हो?'
फ़रमाया: 'हाँ (चाहें माल वाली) हो'."
📙शुअ़बुल् ईमान (लिल् बैहक़िय्यि, d. 458 हि.), ह़दीस नं. 5097, जिल्द नं. 7, सफ़ा नं. 338, पब्लिकेशन: मक्-तबतुर् रुश्द (रियाद), फ़र्स्ट एडीशन, 1423 हि./2003 ई.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
07/10/20 ई.
"مِسْكِينٌ مِسْكِينٌ رَجُلٌ لَيْسَتْ لَهُ امْرَأَةٌ، قِيلَ: 'يَا رَسُولَ اللهِ! وَإِنْ كَانَ غَنِيًّا ذَا مَالٍ؟' قَالَ: 'وَإِنْ كَانَ غَنِيًّا مِنَ الْمَالِ'، قَالَ: 'وَمِسْكِينَةٌ مِسْكِينَةٌ امْرَأَةٌ لَيْسَ لَهَا زَوْجٌ'، قِيلَ: 'يَا رَسُولَ اللهِ! وَإِنْ كَانَتْ غَنِيَّةً أَوْ مُكْثِرَةً مِنَ الْمَالِ؟' قَالَ: 'وَإِنْ كَانَتْ'."
"मिस्कीन है, मिस्कीन है वो मर्द, जिसकी बीवी न हो; अर्ज़ की गयी: 'ऐ अल्लाह के रसूल! अगरचे (वो मर्द) माल वाला अमीर (rich) हो?'
फ़रमाया: 'हाँ, अगरचे माल वाला अमीर (rich) हो.'
(फिर आक़ा ﷺ 💚 ने) फ़रमाया: 'मिस्कीना है, मिस्कीना है वो औरत, जिसका शौहर न हो.'
अर्ज़ की गयी: 'ऐ अल्लाह के रसूल! चाहें वो (औरत) अमीर (rich) हो, या ज़्यादा माल वाली हो?'
फ़रमाया: 'हाँ (चाहें माल वाली) हो'."
📙शुअ़बुल् ईमान (लिल् बैहक़िय्यि, d. 458 हि.), ह़दीस नं. 5097, जिल्द नं. 7, सफ़ा नं. 338, पब्लिकेशन: मक्-तबतुर् रुश्द (रियाद), फ़र्स्ट एडीशन, 1423 हि./2003 ई.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
07/10/20 ई.
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ मिअ़्राजुन्-नबी ⚠
आज चांद की 26 तारीख़ है, और मग़रिब बाद 27 लग जाएगी. 27 रजब (ब-इख़्तिलाफ़े रिवायात) वो मुबारक रात है जिसमें अल्लाह (ﷻ) ने अपने प्यारे नबी (ﷺ 💚) को रात के एक बहुत ही छोटे हिस्से में, आसमानों, अ़र्श और फिर ला-मकां (no place) की सैर कराई. जिसका ज़िक्र क़ुरआन में कुछ इस तरह हुआ:
क़ुरआन 17:1 —
"سُبْحَانَ الَّذِي أَسْرٰى بِعَبْدِهِ لَيْلًا مِّنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِي بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِيَهُ مِنْ آيَاتِنَا ۚ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ"،
"पाकी है उसे, जो अपने बंदे को रातों रात ले गया, मस्जिदे ह़राम से मस्जिदे अक़्स़ा तक, जिसके गिर्दागिर्द हमनें बरकत रखी, कि हम उसे अपनी अ़ज़ीम निशानियाँ दिखाएं; बेशक, वो सुनता देखता है."
[कंज़ुल् ईमान]
क़ुरआन 53:1 —
"وَالنَّجْمِ إِذَا هَوٰى"،
"उस प्यारे, चमकते तारे, मुह़म्मद की क़सम!
जब ये मिअ़राज से उतरे."
[कंज़ुल् ईमान]
इस सफ़र के तीन दर्जे हैं, और तीनों का हुक्म अलग अलग है:
1. इस्-रा: मस्जिदे ह़राम से मस्जिदे अक़्स़ा तक, इसका इंकार करने वाला 'काफ़िर' है;
2. मिअ़राज: मस्जिदे अक़्स़ा से अ़र्श तक, इसका इंकार करने वाला 'गुमराह' है;
3. इअ़राज/उ़रूज: अ़र्श से ला-मकां तक, इसका इंकार करने वाला 'ख़ात़ी (ग़लत़ी पर)' है.
वक़्त की छोटी मिक़्दार जो अब तक साइंस ने दर्याफ़्त की है, उसकी कुछ झलक देखें:
(1) पिको सैकंड
= एक सैकंड का दस खरबवां हिस्सा
= 10¯¹²
= 1/1000 000 000 000
= 0.000 000 000 001 सैकंड
एक सैकंड के सामने पिको सैकंड की वही हैसियत है जो तक़रीबन 31,689 सालों के सामने एक सैकंड की होती है;
(2) नैनो सैकंड
= एक सैकंड का एक अरबवां हिस्सा
= 10⁻⁹
= 1⁄1 000 000 000
= 1000 पिको सैकंड
= 1⁄1000 माइक्रो सैकंड
जाहिल मुल्ह़िदीन (Atheists) और कुफ़्फ़ार को, वक़्त की ये छोटी छोटी इकाइयों पर तो अंधा यक़ीन है, कि इन छोटे-छोटे लम्हों में भी कायनात में बहुत सारी तब्दीलियां हो जाती हैं;
मगर अल्लाह (ﷻ) की क़ुदरत से कोई जिस्म पूरी कायनात में चंद लम्हों में सैर कर ले, तो ये इन्हें क़ुबूल नहीं.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
11/03/21 ई.
आज चांद की 26 तारीख़ है, और मग़रिब बाद 27 लग जाएगी. 27 रजब (ब-इख़्तिलाफ़े रिवायात) वो मुबारक रात है जिसमें अल्लाह (ﷻ) ने अपने प्यारे नबी (ﷺ 💚) को रात के एक बहुत ही छोटे हिस्से में, आसमानों, अ़र्श और फिर ला-मकां (no place) की सैर कराई. जिसका ज़िक्र क़ुरआन में कुछ इस तरह हुआ:
क़ुरआन 17:1 —
"سُبْحَانَ الَّذِي أَسْرٰى بِعَبْدِهِ لَيْلًا مِّنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِي بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِيَهُ مِنْ آيَاتِنَا ۚ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ"،
"पाकी है उसे, जो अपने बंदे को रातों रात ले गया, मस्जिदे ह़राम से मस्जिदे अक़्स़ा तक, जिसके गिर्दागिर्द हमनें बरकत रखी, कि हम उसे अपनी अ़ज़ीम निशानियाँ दिखाएं; बेशक, वो सुनता देखता है."
[कंज़ुल् ईमान]
क़ुरआन 53:1 —
"وَالنَّجْمِ إِذَا هَوٰى"،
"उस प्यारे, चमकते तारे, मुह़म्मद की क़सम!
जब ये मिअ़राज से उतरे."
[कंज़ुल् ईमान]
इस सफ़र के तीन दर्जे हैं, और तीनों का हुक्म अलग अलग है:
1. इस्-रा: मस्जिदे ह़राम से मस्जिदे अक़्स़ा तक, इसका इंकार करने वाला 'काफ़िर' है;
2. मिअ़राज: मस्जिदे अक़्स़ा से अ़र्श तक, इसका इंकार करने वाला 'गुमराह' है;
3. इअ़राज/उ़रूज: अ़र्श से ला-मकां तक, इसका इंकार करने वाला 'ख़ात़ी (ग़लत़ी पर)' है.
वक़्त की छोटी मिक़्दार जो अब तक साइंस ने दर्याफ़्त की है, उसकी कुछ झलक देखें:
(1) पिको सैकंड
= एक सैकंड का दस खरबवां हिस्सा
= 10¯¹²
= 1/1000 000 000 000
= 0.000 000 000 001 सैकंड
एक सैकंड के सामने पिको सैकंड की वही हैसियत है जो तक़रीबन 31,689 सालों के सामने एक सैकंड की होती है;
(2) नैनो सैकंड
= एक सैकंड का एक अरबवां हिस्सा
= 10⁻⁹
= 1⁄1 000 000 000
= 1000 पिको सैकंड
= 1⁄1000 माइक्रो सैकंड
जाहिल मुल्ह़िदीन (Atheists) और कुफ़्फ़ार को, वक़्त की ये छोटी छोटी इकाइयों पर तो अंधा यक़ीन है, कि इन छोटे-छोटे लम्हों में भी कायनात में बहुत सारी तब्दीलियां हो जाती हैं;
मगर अल्लाह (ﷻ) की क़ुदरत से कोई जिस्म पूरी कायनात में चंद लम्हों में सैर कर ले, तो ये इन्हें क़ुबूल नहीं.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
11/03/21 ई.
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ एक बीमारी जो आ़म हो चुकी है ⚠
आजकल एक ऐसा माहौल क्रिएट हो गया है कि मुसलमान अपने ऊपर आने वाली 'समावी परेशानियों (Natural Disasters)' को भी, ग़ैरों की साज़िश बताने में देर नहीं लगाता. इसे हर जगह फ़्रीमेसन, इल्यूमिनाती, हार्प वग़ैरह ही दिखाई देता है;
ये बात ठीक है कि दुश्मनों की साज़िशों का इंकार नहीं किया जा सकता, मगर अपनी बद-आ़मालियों के सबब आने वाले अ़ज़ाब का भी इंकार नहीं किया जा सकता;
अल्लाह (ﷻ) ने क़ुरआन 29:2-4 में इर्शाद फ़रमाया:
"اَحَسِبَ النَّاسُ اَنْ یُّتْرَكُوْۤا اَنْ یَّقُوْلُوْۤا اٰمَنَّا وَ هُمْ لَا یُفْتَنُوْنَ وَ لَقَدْ فَتَنَّا الَّذِیْنَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَلَیَعْلَمَنَّ اللّٰهُ الَّذِیْنَ صَدَقُوْا وَ لَیَعْلَمَنَّ الْكٰذِبِیْنَ اَمْ حَسِبَ الَّذِیْنَ یَعْمَلُوْنَ السَّیِّاٰتِ اَنْ یَّسْبِقُوْنَاؕ-سَآءَ مَا یَحْكُمُوْنَ"،
"क्या लोग इस घमंड में हैं कि इतनी बात पर छोड़ दिए जाएंगे, कि कहें: 'हम ईमान लाए', और उनकी आज़माइश न होगी!?
और बेशक हमने इनसे अगलों को जांचा, तो ज़रूर अल्लाह सच्चों को देखेगा, और ज़रूर झूठों को देखेगा;
या ये समझे हुए हैं वो, जो बुरे काम करते हैं कि हम से कहीं निकल जाएंगे!? क्या ही बुरा हुक्म लगाते हैं!"
[कंज़ुल् ईमान]
मुसीबत आए, तो दुश्मनों की चाल नज़र आती है, और अपनी बद-अ़मली का कोई हाथ उसमें दिखाई नहीं देता;
मगर निअ़्मतों के आने पर, हर दिमाग़ यही सोचता है कि मेरी फ़ुलां प्लानिंग से, मेरा फ़ुलां काम बन गया. तब, ऐसे लोगों के मुत़ाबिक़, न दुश्मनों का हाथ होता है, और न ही अल्लाह (ﷻ) का करमे ख़ास़;
अल्लाह (ﷻ) ने क़ुरआन 100:6 में इर्शाद फ़रमाया:
"إِنَّ الْإِنسَانَ لِرَبِّهِ لَكَنُودٌ"،
"बेशक!
आदमी अपने रब का बड़ा नाशुक्रा है."
[कंज़ुल् ईमान]
इमाम त़बरी व इब्ने कसीर ने इस आयत में मज़्कूर लफ़्ज़े 'कनूद' का मतलब ये बयान किया है कि:
"هو الكفور الذي يعد المصائب، وينسى نعم ربه"،
"('कनूद' उस) नाशुक्रे शख़्स को कहते हैं जो मुसीबतों को तो गिन-गिनकर रखता है, मगर अपने रब की निअ़्मतों को भुला देता है."
ह़क़ तो ये था कि मुसीबतों में अपने आ़माल का जायज़ा लिया जाता, और इ़बरत हासिल की जाती. इंसान जो मेहनत, एक समावी मुसीबत को, दुश्मनों की साज़िश साबित करने में कर रहा है; काश! इतनी तह़क़ीक़, अपने आ़माल का जायज़ा लेने में करता. 💔
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
08/02/21 ई.
आजकल एक ऐसा माहौल क्रिएट हो गया है कि मुसलमान अपने ऊपर आने वाली 'समावी परेशानियों (Natural Disasters)' को भी, ग़ैरों की साज़िश बताने में देर नहीं लगाता. इसे हर जगह फ़्रीमेसन, इल्यूमिनाती, हार्प वग़ैरह ही दिखाई देता है;
ये बात ठीक है कि दुश्मनों की साज़िशों का इंकार नहीं किया जा सकता, मगर अपनी बद-आ़मालियों के सबब आने वाले अ़ज़ाब का भी इंकार नहीं किया जा सकता;
अल्लाह (ﷻ) ने क़ुरआन 29:2-4 में इर्शाद फ़रमाया:
"اَحَسِبَ النَّاسُ اَنْ یُّتْرَكُوْۤا اَنْ یَّقُوْلُوْۤا اٰمَنَّا وَ هُمْ لَا یُفْتَنُوْنَ وَ لَقَدْ فَتَنَّا الَّذِیْنَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَلَیَعْلَمَنَّ اللّٰهُ الَّذِیْنَ صَدَقُوْا وَ لَیَعْلَمَنَّ الْكٰذِبِیْنَ اَمْ حَسِبَ الَّذِیْنَ یَعْمَلُوْنَ السَّیِّاٰتِ اَنْ یَّسْبِقُوْنَاؕ-سَآءَ مَا یَحْكُمُوْنَ"،
"क्या लोग इस घमंड में हैं कि इतनी बात पर छोड़ दिए जाएंगे, कि कहें: 'हम ईमान लाए', और उनकी आज़माइश न होगी!?
और बेशक हमने इनसे अगलों को जांचा, तो ज़रूर अल्लाह सच्चों को देखेगा, और ज़रूर झूठों को देखेगा;
या ये समझे हुए हैं वो, जो बुरे काम करते हैं कि हम से कहीं निकल जाएंगे!? क्या ही बुरा हुक्म लगाते हैं!"
[कंज़ुल् ईमान]
मुसीबत आए, तो दुश्मनों की चाल नज़र आती है, और अपनी बद-अ़मली का कोई हाथ उसमें दिखाई नहीं देता;
मगर निअ़्मतों के आने पर, हर दिमाग़ यही सोचता है कि मेरी फ़ुलां प्लानिंग से, मेरा फ़ुलां काम बन गया. तब, ऐसे लोगों के मुत़ाबिक़, न दुश्मनों का हाथ होता है, और न ही अल्लाह (ﷻ) का करमे ख़ास़;
अल्लाह (ﷻ) ने क़ुरआन 100:6 में इर्शाद फ़रमाया:
"إِنَّ الْإِنسَانَ لِرَبِّهِ لَكَنُودٌ"،
"बेशक!
आदमी अपने रब का बड़ा नाशुक्रा है."
[कंज़ुल् ईमान]
इमाम त़बरी व इब्ने कसीर ने इस आयत में मज़्कूर लफ़्ज़े 'कनूद' का मतलब ये बयान किया है कि:
"هو الكفور الذي يعد المصائب، وينسى نعم ربه"،
"('कनूद' उस) नाशुक्रे शख़्स को कहते हैं जो मुसीबतों को तो गिन-गिनकर रखता है, मगर अपने रब की निअ़्मतों को भुला देता है."
ह़क़ तो ये था कि मुसीबतों में अपने आ़माल का जायज़ा लिया जाता, और इ़बरत हासिल की जाती. इंसान जो मेहनत, एक समावी मुसीबत को, दुश्मनों की साज़िश साबित करने में कर रहा है; काश! इतनी तह़क़ीक़, अपने आ़माल का जायज़ा लेने में करता. 💔
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
08/02/21 ई.
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ ज़लज़ला: एक अ़ज़ाब ⚠
अल्लाह (ﷻ) ने क़ुरआन 6:65 में इर्शाद फ़रमाया:
"قُلْ هُوَ الْقَادِرُ عَلٰۤى اَنْ یَّبْعَثَ عَلَیْكُمْ عَذَابًا مِّنْ فَوْقِكُمْ اَوْ مِنْ تَحْتِ اَرْجُلِكُمْ اَوْ یَلْبِسَكُمْ شِیَعًا وَّ یُذِیْقَ بَعْضَكُمْ بَاْسَ بَعْضٍؕ اُنْظُرْ كَیْفَ نُصَرِّفُ الْاٰیٰتِ لَعَلَّهُمْ یَفْقَهُوْنَ"،
"तुम फ़रमाओ: 'वो क़ादिर है, कि तुम पर अ़ज़ाब भेजे, तुम्हारे ऊपर से, या तुम्हारे पांव के तले से;
या तुम्हें भिड़ा दे, मुख़्तलिफ़ गिरोह करके;
और एक को, दूसरे की सख़्ती चखाये',
देखो, हम क्यूंकर तरह-तरह से आयतें बयान करते हैं, कि कहीं इनको समझ सको."
[कंज़ुल् ईमान]
आक़ा (ﷺ ❤️) ने इर्शाद फ़रमाया:
"لَا تَقُومُ السَّاعَةُ حَتَّى يُقْبَضَ الْعِلْمُ، وَتَكْثُرَ الزَّلَازِلُ، وَيَتَقَارَبَ الزَّمَانُ، وَتَظْهَرَ الْفِتَنُ، وَيَكْثُرَ الْهَرْجُ، وَهُوَ الْقَتْلُ الْقَتْلُ، حَتَّى يَكْثُرَ فِيكُمُ الْمَالُ فَيَفِيضَ"،
"क़ियामत नहीं आएगी, यहां तक कि:
इ़ल्म उठा लिया जाएगा;
और बहुत ज़लज़ले आयेंगे;
और वक़्त सिमट जाएगा;
और फ़ितने ज़ाहिर होंगे;
और 'हर्ज' ज़्यादा होगा, और वो क़त्ल है क़त्ल;
यहां तक कि तुम्हारे दरमियान, दौलत बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगी."
📙स़ह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस नं. 1036, जिल्द नं. 2, पेज नं. 33, पब्लिकेशन: दारु त़ौक़िन् नजाह (बेरूत), पहला एडीशन, 1422 ई.
सय्यिदुना अनस (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) से रिवायत है कि सय्यिदा आ़इशा (रद़ियल्लाहु अ़न्हा) ने फ़रमाया:
"'إِنَّ الْمَرْأَةَ إِذَا خَلَعْتَ ثِيَابَهَا فِي غَيْرِ بَيْتِ زَوْجِهَا هَتَكَتْ مَا بَيْنَهَا وَبَيْنَ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ مِنْ حِجَابٍ، وَإِنْ تَطَيَّبَتْ لِغَيْرِ زَوْجِهَا كَانَ عَلَيْهَا نَارًا وَشَنَارًا، فَإِذَا اسْتَحَلُّوا الزِّنَا وَشَرِبُوا الْخُمُورَ بَعْدَ هَذَا وَضَرَبُوا الْمَعَازِفَ، غَارَ اللَّهُ فِي سَمَائِهِ، فَقَالَ لِلْأَرْضِ: 'تَزَلْزَلِي بِهِمْ'، فَإِنْ تَابُوا وَنَزَعُوا وَإِلَّا هَدَمَهَا عَلَيْهِمْ'"،
"'अगर एक (शादीशुदा) औरत, अपने शौहर के घर के अलावा किसी दूसरी जगह (बदकारी के लिए) अपने कपड़े उतारे, तो उसने अपने और अल्लाह के दरमियान रहने वाले पर्दे को चाक कर दिया;
और अगर कोई औरत, अपने शौहर के अलावा किसी दूसरे के लिए खुशबू लगाए, तो उसपर आग और शर्मिंदगी है;
और जब लोग ज़िना को ह़लाल कर लें, और इसके बाद शराबें पीने लगें, और ढोल-बाजे बजाने लगें, तो अल्लाह अपने आसमान में क़हर फ़रमाता है, और ज़मीन को हुक्म देता है: 'उनपर ज़लज़ला लेकर आ.'
अगर वो लोग तौबा कर लें, तो ठीक है. वर्ना अल्लाह, ज़मीन को उन पर ढहा देगा."
📙अल्-मुस्तदरक (लिल् ह़ाकिम), ह़दीस नं. 8575, जिल्द नं. 4, पेज नं. 561, पब्लिकेशन: दारुल् कुतुबिल् इ़ल्मिय्यह (बेरूत), पहला एडीशन, 1411 हि./1990 ई.
ज़लज़ला, क़ियामत की एक बड़ी निशानी है. हमारे बुज़ुर्गों ने इस टॉपिक पर भी कई किताबें लिखी हैं कि दुनिया में कब-कब, और कहाँ-कहाँ ज़लज़ले आए. इन किताबों में से कुछ अहम किताबें ये हैं:
1. इमाम अबुल् फ़रज इब्ने जौज़ी (d. 597 हि.) की किताब: 'अल्-मुद्हिश' के बाब नं. 4 की, फ़स़्ल नं. 9 में, सन् 20 हि. से लेकर 552 हि. तक के ज़लज़लों का बयान है. इस किताब का दूसरा एडीशन: 'दारुल् क़लम (दमिश्क)' से दो जिल्दों में, 1435 हि./2014 ई. में पब्लिश हुआ;
2. इमाम जलालुद्-दीन सुयूत़ी (d. 911 हि.) ने अपनी किताब: 'कश्फ़ुस़् स़ल्स़लह अ़न् वस़्फ़िज़् ज़लज़लह' भी, ज़लज़लों के बयान में लिखी. इस किताब में 20 हि. से लेकर 910 हि. तक के ज़लज़लों का ज़िक्र है. ये 'आ़लमुल् कुतुब (बेरूत)' से 1987 ई. में पब्लिश हुई. फिर इनके शागिर्द, शम्सुद्-दीन दाऊदी (d. 945 हि.) ने इसपर इज़ाफ़ा करके, 940 हि. तक के ज़लज़लों को शुमार कराया.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
07/02/23 ई.
अल्लाह (ﷻ) ने क़ुरआन 6:65 में इर्शाद फ़रमाया:
"قُلْ هُوَ الْقَادِرُ عَلٰۤى اَنْ یَّبْعَثَ عَلَیْكُمْ عَذَابًا مِّنْ فَوْقِكُمْ اَوْ مِنْ تَحْتِ اَرْجُلِكُمْ اَوْ یَلْبِسَكُمْ شِیَعًا وَّ یُذِیْقَ بَعْضَكُمْ بَاْسَ بَعْضٍؕ اُنْظُرْ كَیْفَ نُصَرِّفُ الْاٰیٰتِ لَعَلَّهُمْ یَفْقَهُوْنَ"،
"तुम फ़रमाओ: 'वो क़ादिर है, कि तुम पर अ़ज़ाब भेजे, तुम्हारे ऊपर से, या तुम्हारे पांव के तले से;
या तुम्हें भिड़ा दे, मुख़्तलिफ़ गिरोह करके;
और एक को, दूसरे की सख़्ती चखाये',
देखो, हम क्यूंकर तरह-तरह से आयतें बयान करते हैं, कि कहीं इनको समझ सको."
[कंज़ुल् ईमान]
आक़ा (ﷺ ❤️) ने इर्शाद फ़रमाया:
"لَا تَقُومُ السَّاعَةُ حَتَّى يُقْبَضَ الْعِلْمُ، وَتَكْثُرَ الزَّلَازِلُ، وَيَتَقَارَبَ الزَّمَانُ، وَتَظْهَرَ الْفِتَنُ، وَيَكْثُرَ الْهَرْجُ، وَهُوَ الْقَتْلُ الْقَتْلُ، حَتَّى يَكْثُرَ فِيكُمُ الْمَالُ فَيَفِيضَ"،
"क़ियामत नहीं आएगी, यहां तक कि:
इ़ल्म उठा लिया जाएगा;
और बहुत ज़लज़ले आयेंगे;
और वक़्त सिमट जाएगा;
और फ़ितने ज़ाहिर होंगे;
और 'हर्ज' ज़्यादा होगा, और वो क़त्ल है क़त्ल;
यहां तक कि तुम्हारे दरमियान, दौलत बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगी."
📙स़ह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस नं. 1036, जिल्द नं. 2, पेज नं. 33, पब्लिकेशन: दारु त़ौक़िन् नजाह (बेरूत), पहला एडीशन, 1422 ई.
सय्यिदुना अनस (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) से रिवायत है कि सय्यिदा आ़इशा (रद़ियल्लाहु अ़न्हा) ने फ़रमाया:
"'إِنَّ الْمَرْأَةَ إِذَا خَلَعْتَ ثِيَابَهَا فِي غَيْرِ بَيْتِ زَوْجِهَا هَتَكَتْ مَا بَيْنَهَا وَبَيْنَ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ مِنْ حِجَابٍ، وَإِنْ تَطَيَّبَتْ لِغَيْرِ زَوْجِهَا كَانَ عَلَيْهَا نَارًا وَشَنَارًا، فَإِذَا اسْتَحَلُّوا الزِّنَا وَشَرِبُوا الْخُمُورَ بَعْدَ هَذَا وَضَرَبُوا الْمَعَازِفَ، غَارَ اللَّهُ فِي سَمَائِهِ، فَقَالَ لِلْأَرْضِ: 'تَزَلْزَلِي بِهِمْ'، فَإِنْ تَابُوا وَنَزَعُوا وَإِلَّا هَدَمَهَا عَلَيْهِمْ'"،
"'अगर एक (शादीशुदा) औरत, अपने शौहर के घर के अलावा किसी दूसरी जगह (बदकारी के लिए) अपने कपड़े उतारे, तो उसने अपने और अल्लाह के दरमियान रहने वाले पर्दे को चाक कर दिया;
और अगर कोई औरत, अपने शौहर के अलावा किसी दूसरे के लिए खुशबू लगाए, तो उसपर आग और शर्मिंदगी है;
और जब लोग ज़िना को ह़लाल कर लें, और इसके बाद शराबें पीने लगें, और ढोल-बाजे बजाने लगें, तो अल्लाह अपने आसमान में क़हर फ़रमाता है, और ज़मीन को हुक्म देता है: 'उनपर ज़लज़ला लेकर आ.'
अगर वो लोग तौबा कर लें, तो ठीक है. वर्ना अल्लाह, ज़मीन को उन पर ढहा देगा."
📙अल्-मुस्तदरक (लिल् ह़ाकिम), ह़दीस नं. 8575, जिल्द नं. 4, पेज नं. 561, पब्लिकेशन: दारुल् कुतुबिल् इ़ल्मिय्यह (बेरूत), पहला एडीशन, 1411 हि./1990 ई.
ज़लज़ला, क़ियामत की एक बड़ी निशानी है. हमारे बुज़ुर्गों ने इस टॉपिक पर भी कई किताबें लिखी हैं कि दुनिया में कब-कब, और कहाँ-कहाँ ज़लज़ले आए. इन किताबों में से कुछ अहम किताबें ये हैं:
1. इमाम अबुल् फ़रज इब्ने जौज़ी (d. 597 हि.) की किताब: 'अल्-मुद्हिश' के बाब नं. 4 की, फ़स़्ल नं. 9 में, सन् 20 हि. से लेकर 552 हि. तक के ज़लज़लों का बयान है. इस किताब का दूसरा एडीशन: 'दारुल् क़लम (दमिश्क)' से दो जिल्दों में, 1435 हि./2014 ई. में पब्लिश हुआ;
2. इमाम जलालुद्-दीन सुयूत़ी (d. 911 हि.) ने अपनी किताब: 'कश्फ़ुस़् स़ल्स़लह अ़न् वस़्फ़िज़् ज़लज़लह' भी, ज़लज़लों के बयान में लिखी. इस किताब में 20 हि. से लेकर 910 हि. तक के ज़लज़लों का ज़िक्र है. ये 'आ़लमुल् कुतुब (बेरूत)' से 1987 ई. में पब्लिश हुई. फिर इनके शागिर्द, शम्सुद्-दीन दाऊदी (d. 945 हि.) ने इसपर इज़ाफ़ा करके, 940 हि. तक के ज़लज़लों को शुमार कराया.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
07/02/23 ई.
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