Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
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Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ एक आ़लिम का फ़र्ज़ ⚠
जब राफ़िज़िय्यत का फ़ितना मुँह उठाने लगे, ख़ास तौर पर तब, अफ़्ज़लुल् बशर बअ़दल् अम्बिया सय्यिदुना अबू बक्रे सिद्-दीक़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) की अफ़्ज़लिय्यत का ज़िक्र डंके की चोट पर किया जाएगा,
इन्-शा अल्लाह;
ख़ुस़ूस़न् शैख़ैन करीमैन व सय्यिदुना अमीरे मुआ़वियह (रद़ियल्लाहु अ़न्हुम्), और उ़मूमन् दूसरे स़ह़ाबा की शान में भौंकने वाले किलाबुर् रफ़द़ह (राफ़िज़ी कुत्ते), और इनकी इस ख़बासत पर ख़ामोश बैठने वाले अपने लोग, ज़रा देखें तो, कि आक़ा (ﷺ 💚) ने क्या इरशाद फ़रमाया:
"إِذَا ظَهَرَتِ الْفِتَنُ، أَوْ قَالَ: الْبِدَعُ، وَسُبَّ أَصْحَابِي، فَلْيُظْهِرِ الْعَالِمُ عِلْمَهُ، فَمَنْ لَمْ يَفْعَلْ ذَلِكَ فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ، لَا يَقْبَلُ اللَّهُ لَهُ صَرْفًا وَلَا عَدْلًا"،
"जब फ़ितने (या बिद्अ़तें) सर उठा लें, और मेरे स़ह़ाबा को बुरा कहा जाने लगे, तो आ़लिम को चाहिए कि अपना इ़ल्म ज़ाहिर करे; और जिस (आ़लिम) ने ऐसा नहीं किया, तो उसपर अल्लाह, फरिश्तों, और तमाम लोगों की लअ़नत है. अल्लाह उसकी न कोई नेकी क़ुबूल करेगा, न कोई स़दक़ा."
📙अल् जामिअ़ लि अख़्लाक़िर् रावी व आदाबिस् सामिअ़ (लिल्-इमाम ख़त़ीब अल्-बग़दादी), ह़दीस नं. 1354, जिल्द नं. 2, पेज नं. 118, पब्लिकेशन: मक्-तबतुल् मआ़रिफ़ (रियाद़)
______
मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
01/02/21 ई.
जब राफ़िज़िय्यत का फ़ितना मुँह उठाने लगे, ख़ास तौर पर तब, अफ़्ज़लुल् बशर बअ़दल् अम्बिया सय्यिदुना अबू बक्रे सिद्-दीक़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) की अफ़्ज़लिय्यत का ज़िक्र डंके की चोट पर किया जाएगा,
इन्-शा अल्लाह;
ख़ुस़ूस़न् शैख़ैन करीमैन व सय्यिदुना अमीरे मुआ़वियह (रद़ियल्लाहु अ़न्हुम्), और उ़मूमन् दूसरे स़ह़ाबा की शान में भौंकने वाले किलाबुर् रफ़द़ह (राफ़िज़ी कुत्ते), और इनकी इस ख़बासत पर ख़ामोश बैठने वाले अपने लोग, ज़रा देखें तो, कि आक़ा (ﷺ 💚) ने क्या इरशाद फ़रमाया:
"إِذَا ظَهَرَتِ الْفِتَنُ، أَوْ قَالَ: الْبِدَعُ، وَسُبَّ أَصْحَابِي، فَلْيُظْهِرِ الْعَالِمُ عِلْمَهُ، فَمَنْ لَمْ يَفْعَلْ ذَلِكَ فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ، لَا يَقْبَلُ اللَّهُ لَهُ صَرْفًا وَلَا عَدْلًا"،
"जब फ़ितने (या बिद्अ़तें) सर उठा लें, और मेरे स़ह़ाबा को बुरा कहा जाने लगे, तो आ़लिम को चाहिए कि अपना इ़ल्म ज़ाहिर करे; और जिस (आ़लिम) ने ऐसा नहीं किया, तो उसपर अल्लाह, फरिश्तों, और तमाम लोगों की लअ़नत है. अल्लाह उसकी न कोई नेकी क़ुबूल करेगा, न कोई स़दक़ा."
📙अल् जामिअ़ लि अख़्लाक़िर् रावी व आदाबिस् सामिअ़ (लिल्-इमाम ख़त़ीब अल्-बग़दादी), ह़दीस नं. 1354, जिल्द नं. 2, पेज नं. 118, पब्लिकेशन: मक्-तबतुल् मआ़रिफ़ (रियाद़)
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
01/02/21 ई.
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Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
⚠ हमारा सरमाया लुट गया ⚠
'बैतुल् ह़िक्मत (House of wisdom)', हमारी उस आ़लमी लाइब्रेरी का नाम है, जो ख़िलाफ़ते अ़ब्बासिय्यह के दौर में बग़दाद शरीफ़ में थी. जिसे 'Grand Library of Baghdad' के नाम से भी याद किया जाता है. जिसे मंगोल व तातार कुफ़्फ़ार ने अपने 1258 ई. के ह़मले में जला दिया था. जब भी इसके बारे में पढ़ता हूं, बहुत रोता हूं. 💔
8वीं सदी ईस्वी में 'हारुन रशीद' ने, इस बड़ी हैअत पर, इसकी बुनियाद रखी, और 'मामून' के दौर में ये पूरी दुनिया के हर मज़हब और फ़िक्र के मुफ़क्किरीन, वैज्ञानिकों, मनात़िक़ह और फ़लासिफ़ह के लिए मरकज़ी लायब्रेरी बन गयी थी. हर माहिर, इसकी तरफ रुजूअ़ करता था;
इसमें लाखों किताबें थीं. इमामी शीआ़ का बहुत बड़ा मौलवी, जिसे 'शैख़ुत़् त़ाइफ़ह' के लक़ब से शीओ़ं में याद किया जाता है: 'अबू जअ़्फ़र, ख़्वाजा नस़ीरुद्-दीन त़ूसी', जिसे, दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों में से एक माना जाता है, इसे हमले की भनक लगते ही, इसने लायब्रेरी पर हमले से पहले ही, चार लाख मख़्त़ूत़ों (manuscripts) को बचा लिया था, और मराग़ह की आॅब्ज़रबेटरी (Maragheh observatory) में मुन्तक़िल कर दिया था;
मुअर्रिख़ीन ने अपने लरज़ते व कांपते कलमों से लिखा है कि:
"जब इस लायब्रेरी की किताबों को जलाकर, दजला नदी (Tigris River) में फैंक दिया गया, तो नदी का पानी किताबों की सियाही से काला पड़ गया था."
__
मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
15/01/22 ई.
'बैतुल् ह़िक्मत (House of wisdom)', हमारी उस आ़लमी लाइब्रेरी का नाम है, जो ख़िलाफ़ते अ़ब्बासिय्यह के दौर में बग़दाद शरीफ़ में थी. जिसे 'Grand Library of Baghdad' के नाम से भी याद किया जाता है. जिसे मंगोल व तातार कुफ़्फ़ार ने अपने 1258 ई. के ह़मले में जला दिया था. जब भी इसके बारे में पढ़ता हूं, बहुत रोता हूं. 💔
8वीं सदी ईस्वी में 'हारुन रशीद' ने, इस बड़ी हैअत पर, इसकी बुनियाद रखी, और 'मामून' के दौर में ये पूरी दुनिया के हर मज़हब और फ़िक्र के मुफ़क्किरीन, वैज्ञानिकों, मनात़िक़ह और फ़लासिफ़ह के लिए मरकज़ी लायब्रेरी बन गयी थी. हर माहिर, इसकी तरफ रुजूअ़ करता था;
इसमें लाखों किताबें थीं. इमामी शीआ़ का बहुत बड़ा मौलवी, जिसे 'शैख़ुत़् त़ाइफ़ह' के लक़ब से शीओ़ं में याद किया जाता है: 'अबू जअ़्फ़र, ख़्वाजा नस़ीरुद्-दीन त़ूसी', जिसे, दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों में से एक माना जाता है, इसे हमले की भनक लगते ही, इसने लायब्रेरी पर हमले से पहले ही, चार लाख मख़्त़ूत़ों (manuscripts) को बचा लिया था, और मराग़ह की आॅब्ज़रबेटरी (Maragheh observatory) में मुन्तक़िल कर दिया था;
मुअर्रिख़ीन ने अपने लरज़ते व कांपते कलमों से लिखा है कि:
"जब इस लायब्रेरी की किताबों को जलाकर, दजला नदी (Tigris River) में फैंक दिया गया, तो नदी का पानी किताबों की सियाही से काला पड़ गया था."
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
15/01/22 ई.