🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹
2.86K subscribers
69.6K photos
227 videos
257 files
8.82K links
یہاں روزانہ اسلامی تاریخ اور بزرگانِ دین و علمائے ربانیین کی تاریخ ولادت و تاریخ وفات اور دینی باتیں (فوٹو،پوسٹ) تاریخ اور مہینے کی مناسبت سے مع کتابوں کی لِنکس بھیجی جاتی ہیں
طالب دعا 🤲
محمد جمال الدین خان قادری رضوی عفی عنہ
🆔 @Muhammad_Jamaluddin_Khan
Download Telegram
🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹
09-07-1445 ᴴ | 21-01-2024 ᴱ ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
09-07-1445 ᴴ | 21-01-2024 ᴱ
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
1
Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
1
🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹
09-07-1445 ᴴ | 21-01-2024 ᴱ ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
09-07-1445 ᴴ | 21-01-2024 ᴱ
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
1
Forwarded from 🌹 اسلامی معلومات عامہ 🌹 (محمد جمال الدين خان قادری)
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
1
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
ख़्वाजा का एक अनोखा आ़शिक़

राफ़िज़ी मुजाविरों, और नाम निहाद चिश्तियों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा:

मैं आपको एक ऐसे आ़शिक़े ग़रीब नवाज़ की बारगाह में ले चलता हूँ, जिसकी ज़िन्दगी का एक-एक लम्ह़ा ख़िदमते दीन, व इश्क़े रसूल (ﷺ ❤️) का आईना, आ़शिक़ाने रसूल (ﷺ ❤️) के लिए ख़ज़ीना, और दुश्मनों के लिए शम्शीरे बरहना है. जिसे दुनिया 'इमामे अहले सुन्नत', व 'मुजद्दिदे दीनो मिल्लत' के अल्क़ाब से याद करती है. यानी:

आ़ला ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा खा़न ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अलैहिर्रह़मह) की बारगाह में;

जिनके सामने एक इस्तिफ़्ता पेश किया गया कि:

"क्या अजमेर के साथ 'शरीफ़' न लिखना, और असली नाम 'ग़ुलामे मुई़नुद्दीन' पर 'ग़ुलाम' न लिखना, ख़िलाफ़े अ़क़ीद-ए-अहले सुन्नत है, या नहीं?"

आपने जवाब में इरशाद फ़रमाया:

"अजमेर शरीफ़ के नामे पाक के साथ लफ्ज़े 'शरीफ़' न लिखना, और इन तमाम मवाक़िअ़ में इसका इल्तिज़ाम करना, अगर इस बिना पर है कि हुज़ूर सय्यिदुना ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) की जलवा अफरोज़ी, ह़याते ज़ाहिरी, व मज़ारे पुर-अनवार को (जिस के सबब मुसलमान अजमेर शरीफ़ कहते हैं), वज्हे शराफ़त नहीं जानता, तो वो गुमराह, बल्कि अ़दुव्वुल्लाह (अल्लाह का दुश्मन) है. स़ह़ीह़ बुख़ारी शरीफ़ में है कि रसूलुल्लाह (ﷺ ❤️) इरशाद फरमाते हैं कि:

"अल्लाह (ﷻ) इरशाद फ़रमाता है:

"مَنْ عَادَى لِي وَلِيًّا فَقَدْ آذَنْتُهُ بِالحَرْبِ..."،

"जिसने मेरे वली से दुश्मनी मोल ली, मेरी जानिब से उसके लिए ऐलाने जंग है....",

और अगर ये नापाक इल्तिज़ाम, बर बिनाए कसल, व कोताहे क़लमी है, तो सख़्त बे-बरकता, और फ़ज़्ले अ़ज़ीम व ख़ैरे जसीम से मह़रूम है;
और अगर इसका मबना, वह्हाबिय्यत है, तो वह्हाबिय्यत कुफ़्र है, इसके बाद ऐसी बातों की क्या शिकायत?

अपने नाम से 'ग़ुलाम' का ह़ज़्फ़ अगर इस बिना पर है, कि ह़ुज़ूर ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगां (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) का ग़ुलाम बनने से इंकार व इस्तिक्बार रखता है, तो बदस्तूर गुमराह, और बह़ुक्मे ह़दीसे मज़्कूर, अ़दुव्वुल्लाह (अल्लाह का दुश्मन) है, और इसका ठिकाना जहन्नम है. अल्लाह (ﷻ) ने फ़रमाया:

"أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِلْمُتَكَبِّرِينَ"،

"क्या मग़रूर का ठिकाना जहन्नम नहीं ?"
[क़ुरआन, 39:60]

और अगर बर बिनाए वह्हाबियत है, कि ग़ुलामे औलिया-ए-किराम बनने वालों को मुशरिक, और 'ग़ुलामे मुह़िय्युद्दीन', व 'ग़ुलामे मुई़नुद्दीन' को शिर्क जानता है, तो वह्हाबिय्यह ख़ुद ज़िन्दीक़, बेदीन, कुफ़्फ़ार, व मुर्तद्दीन हैं;

"وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ"،

"और काफिरों के लिए ख़्वारी का अज़ाब है."
[क़ुरआन, 2:90]

📙फ़तावा रज़विय्यह, 6:187-188, रज़ा अकैडमी (मुम्‍बई)
_____
दूसरी जगह अपने ग़ौस व ख़्वाजा की ग़ुलामी का सुबूत देते हुए लिखते हैं:

"हुज़ूर सय्यिदुना ग़ौसे आ़ज़म (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ज़रूर दस्तगीर हैं, और ह़ज़रत सुल्त़ानुल् हिन्द मुई़नुल्-हक़्क़ि वद्-दीन, ज़रूर ग़रीब नवाज़."

📙फ़तावा रज़विय्यह, 11:43, रज़ा अकैडमी (मुंबई)
___
मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
14/03/19 ई.
1
Forwarded from Muḥammad Qāsim al-Qādirī al-Azʾharī (Qāsim Saifī)
मुल्ह़िदीन का वसवसा

आक़ा (ﷺ 💚) ने इरशाद फ़रमाया:

"يَأْتِي الشَّيْطَانُ أَحَدَكُمْ، فَيَقُولَ: 'مَنْ خَلَقَ كَذَا وَكَذَا؟' حَتَّى يَقُولَ لَهُ: 'مَنْ خَلَقَ رَبَّكَ؟' فَإِذَا بَلَغَ ذَلِكَ، فَلْيَسْتَعِذْ بِاللهِ وَلْيَنْتَهِ."

"तुम में से किसी के पास शैतान आएगा, तो पूछेगा: 'फ़ुलां-फ़ुलां चीज़ को किसने पैदा किया?'
यहां तक कि ये (सवाल) भी पूछेगा: 'तुम्हारे रब को किसने पैदा किया?'
तो जिसके साथ ऐसा हो, तो वो अऊ़ज़ु-बिल्लाह पढ़े, और (ऐसे वसवसों की तरफ़) तवज्जुह न दे."

📙स़ह़ीह़ मुस्लिम, किताबुल् ईमान, बाब: बयानुल् वस्वसह फ़िल् ईमान, ह़दीस न. 214, जिल्द न. 1, पेज न. 120, पब्लिकेशन: दारु इह़्याइत् तुरासिल् अ़रबिय्यि (बेरूत)
______
मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
20/12/20 ई.
1