مالیگاؤں سے پَـہـلی مَـرتَـبَـہ ‼
الفی قرآن مع ترجمہ کنز الایمان
و تفسیر خزائن الـعرفان شـریف
کے منفرد نسخے کی اشاعت ‼
فروغ تعلیمات قرآنی کیلئے معیاری
طباعت و کتابت سے مزین ایڈیشن
نوری مشن کا تاریخ ساز اقدام ‼
مالیگاؤں : اردو کتاب میلے میں نوری مشن اسٹال سے رعایتی شرح میں ہزار سے زیادہ نسخے قرآن پاک مع ترجمہ کنزالایمان و تفسیر خزائن العرفان ؛ عام کیے گئے۔ اللہ تعالیٰ نے اس کام کو ایسا مقبول فرمایا کہ چند ماہ قبل مالیگاؤں سے نوری مشن نے ترجمہ قرآن کنزالایمان کا خوب صورت ایڈیشن شائع کیا جسے سمتوں میں سراہا گیا۔ الحمدللہ ! ماہِ رمضان کی بہاروں میں قرآن پاک کا منفرد ایڈیشن الفی قرآن مع ترجمہ کنزالایمان کی اشاعت عمل میں لائی گئی۔ الفی قرآن کی اہم خصوصیت یہ ہے کہ ہر سطر الف سے شروع ہوتی ہے۔ جو فن کتابت کا منفرد انداز ہے۔ طباعت ملٹی کلر اور معیاری کاغذ پر کی گئی ہے ۔ ڈیزائننگ و کتابت و تزئین نشانِ اختر ممبئی نے ماہرین سے کروائی۔ صد سالہ عرس اعلیٰ حضرت کی مناسبت سے نوری مشن نے یہ ایڈیشن شائع کیا۔ اس ضمن میں الحاج محمد عمران دادانی نے کہا کہ الفی قرآن کی اشاعت کو کتابت و طباعت کے ماہرین نے سراہا ہے۔ مختلف شعبہ جات سے وابستہ شخصیات نے اشاعتِ الفی کنزالایمان پر نشانِ اختر و نوری مشن کو تہنیت پیش کی۔ ملک کے مختلف علاقوں سے قرآن مقدس کی اشاعت کا ذوق رکھنے والے الفی کنزالایمان کی ڈیمانڈ کر رہے ہیں۔ یہ ایڈیشن ملک بھر میں عام کیا جائے گا۔ ہمارا مقصد مسلمانوں میں قرآن پاک سمجھ کر پڑھنے کی فکر پروان چڑھانا ہے۔ تا کہ قرآنی تعلیمات سے قُرب حاصل ہو۔ یہی راہِ نجات و کامیابی ہے۔ اسی غرض سے ترجمہ و تفسیر کے ساتھ الفی قرآن کی اشاعت پہلی بار مالیگاؤں سے عمل میں آئی۔
مالیگاؤں میں حصول کے لیے
مدینہ کتاب گھر سے +919325028586
اور ممبئی و بیرون شہر میں
حصول کے لیے +917208198476
پر رابطہ قائم کریں ‼ June 2018
الفی قرآن مع ترجمہ کنز الایمان
و تفسیر خزائن الـعرفان شـریف
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نوری مشن کا تاریخ ساز اقدام ‼
مالیگاؤں : اردو کتاب میلے میں نوری مشن اسٹال سے رعایتی شرح میں ہزار سے زیادہ نسخے قرآن پاک مع ترجمہ کنزالایمان و تفسیر خزائن العرفان ؛ عام کیے گئے۔ اللہ تعالیٰ نے اس کام کو ایسا مقبول فرمایا کہ چند ماہ قبل مالیگاؤں سے نوری مشن نے ترجمہ قرآن کنزالایمان کا خوب صورت ایڈیشن شائع کیا جسے سمتوں میں سراہا گیا۔ الحمدللہ ! ماہِ رمضان کی بہاروں میں قرآن پاک کا منفرد ایڈیشن الفی قرآن مع ترجمہ کنزالایمان کی اشاعت عمل میں لائی گئی۔ الفی قرآن کی اہم خصوصیت یہ ہے کہ ہر سطر الف سے شروع ہوتی ہے۔ جو فن کتابت کا منفرد انداز ہے۔ طباعت ملٹی کلر اور معیاری کاغذ پر کی گئی ہے ۔ ڈیزائننگ و کتابت و تزئین نشانِ اختر ممبئی نے ماہرین سے کروائی۔ صد سالہ عرس اعلیٰ حضرت کی مناسبت سے نوری مشن نے یہ ایڈیشن شائع کیا۔ اس ضمن میں الحاج محمد عمران دادانی نے کہا کہ الفی قرآن کی اشاعت کو کتابت و طباعت کے ماہرین نے سراہا ہے۔ مختلف شعبہ جات سے وابستہ شخصیات نے اشاعتِ الفی کنزالایمان پر نشانِ اختر و نوری مشن کو تہنیت پیش کی۔ ملک کے مختلف علاقوں سے قرآن مقدس کی اشاعت کا ذوق رکھنے والے الفی کنزالایمان کی ڈیمانڈ کر رہے ہیں۔ یہ ایڈیشن ملک بھر میں عام کیا جائے گا۔ ہمارا مقصد مسلمانوں میں قرآن پاک سمجھ کر پڑھنے کی فکر پروان چڑھانا ہے۔ تا کہ قرآنی تعلیمات سے قُرب حاصل ہو۔ یہی راہِ نجات و کامیابی ہے۔ اسی غرض سے ترجمہ و تفسیر کے ساتھ الفی قرآن کی اشاعت پہلی بار مالیگاؤں سے عمل میں آئی۔
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ज़कात के आसान मसाइल :
मिनजानिब : जमाअ़त रज़़ा-ए-मुस़्त़फ़ा पुणे
जिसके पास 7.5 तोला सोना या 52.5 तोला चांदी या इसके बराबर की रक़म पर साल गुजर गया तो उस पर ज़कात फ़र्ज़ हो गई ‼
📕 फ़तावा आ़लमगीरी,जिल्द 1,सफ़ह 168
मसलन आज चांदी 39950 रू किलो है, यअ़्नी 52.5 तोला चांदी 25168 रू की हुई, तो अगर आज के दिन यअ़्नी 27 मई 2018 को कोई इतने रूपये का मालिक है और अगले साल 26 मई 2019 को फिर उसके पास स़ाह़िबे निस़ाब की जो मिल्क बनती है उतनी रक़म पायी जायेगी तो उस पर ज़कात फ़र्ज़ हो गयी अगर चे वो पूरे साल फ़क़ीर रहा हो ‼
औ़रतों के पास जो ज़ेवर होते हैं उनकी मालिक औ़रत ख़ुद है, तो अगर सोना चांदी मिलाकर 52.5 तोला चांदी की क़ीमत बनती है तो औ़रत पर ज़कात फ़र्ज़ है, शौहर पर उसकी ज़कात नहीं, शौहर चाहे तो दे और चाहे ना दे उस पर कुछ इलज़ाम नहीं, अगर शौहर अपनी बीवी के ज़ेवर की ज़कात नहीं देता तो औ़रत जितनी रक़म ज़कात की बनती है उतने का ज़ेवर बेचकर अदा करे ‼
📕 बहारे शरीअ़त,ह़िस्सा 5 - स़फ़ह 62
📕 क्या आप जानते हैं ? – स़फ़ह 391
ज़कात 2.5% यअ़्नी 100 रुपए में 2.5 रुपए है
बाप अपनी बालिग़ औलाद की त़रफ़ से या शौहर बीवी की त़रफ़ से ज़कात या स़दक़ये फ़ित्र देना चाहे तो बिग़ैर उनकी इजाज़त के नहीं दे सकता ‼
📕 फ़तावा अफ़ज़लुल मदारिस, स़फ़ह 88
ह़ाजते अस़लियह यानि रहने का घर, पहनने के कपड़े, किताबें, सफ़र के लिए सवारियां, और घरेलू सामान पर ज़कात फ़र्ज़ नहीं है ‼
📕 फ़तावा आ़लमगीरी,जिल्द 1, स़फ़ह 160
ए.सी. AC फ़िरिज बाइक फ़ोर व्हीलर ये सब ह़ाजते अस़लियह में दाख़िल हैं मगर टी.वी. ह़ाजते अस़लियह में दाख़िल नहीं है तो अगर किसी के पास 26000 रू की टीवी मौजूद है तो उस पर ज़कात फ़र्ज़ है, इसी त़रह़ किसी के पास कई मकान हैं और वो सब उसके ख़ुद के रहने के लिए हैं तो ज़कात नहीं लेकिन अगर किसी मकान में किरायेदार को बसा दिया और उसका किराया इतना है कि ये स़ाह़िबे निस़ाब को पहुंच जाए तो किराये पर ज़कात फ़र्ज़ होगी, उसी तरह दुकान पर तो ज़कात नहीं है मगर उस में भरे हुए माल की ज़कात है लिहाज़ा सब एह़तियात़ से जोड़कर ज़कात अदा की जाये ‼
सगे भाई-बहन, चाचा, मामू, ख़ाला, फूफी, सास-ससुर, बहु-दामाद या सौतेले माँ-बाप को ज़क़ात की रक़म दी जा सकती है ‼
📕 बहारे शरीअ़त ह़िस्सा 5, स़फ़ह 60-64
ज़कात, फित्रा या कफ़्फ़ारह का रुपया अपने अस़ली मां-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी, बेटा-बेटी, पोता-पोती, नवासा-नवासी को नहीं दे सकते ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 60
कफ़न दफ़न में तअ़्मीरे मस्जिद में मीलादे पाक की मह़फिल में ज़कात का रुपया ख़र्च नहीं कर सकते, किया तो ज़कात अदा नहीं होगी ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, सफ़ह़ 24
अफ़ज़़ल यह है कि ज़कात पहले अपने अ़ज़ीज़ ह़ाजतमंदों को दें, दिल में नियत ज़कात हो और उन्हें तोह़फ़ह या क़र्ज़़ कहकर भी देंगे तो ज़कात अदा हो जायेगी ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 24
अफ़ज़़ल यह है कि ज़कात व फ़ित़रे की रक़म जिसको भी दें तो कम से कम इतना दें कि उसे उस दिन किसी और से सवाल की ह़ाजत ना पड़े ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, सफह 66
ह़दीस शरीफ़ में है कि रब तआ़ला उसके स़दक़े को क़ुबूल नहीं करता जिसके रिश्तेदार मोह़ताज हों और वो दूसरों पर ख़र्च करे ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 65
तन्दरुस्त कमाने वाले शख़्स़ को अगर वो स़ाह़िबे निस़ाब ना हो तो उसे ज़कात दे सकते हैं, पर उसे ख़ुद मांगना जाइज़ नहीं ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 61
किसी पर 1 लाख रुपए क़र्ज़़ हैं उसको कहीं से 1 लाख रुपए मिल गए अगर वो अपना क़र्ज़़ नहीं चुकाता तो बुरा करता है मगर अब भी उसपर ज़कात फ़र्ज़़ नहीं है ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 15
जिसके पास ख़ुद का मकान, दुकान, खेत या खाने का ग़ल्ला साल भर के लिए मौजूद हो मगर वो स़ाह़िबे निस़ाब ना हो तो उसे ज़कात व फ़ित्रा दे सकते हैं ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 62
काफ़िर व बदमज़हब को ज़कात फित्रा हदिया तोह़फ़ा कुछ भी देना नाजायज़ है, अगर उनको ज़कात व फ़ित़रे की रक़म दी तो अदा ना होगी ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 63-65
पालिसी या F.D. अपने नाम है तो ज़कात फ़र्ज़़ है, लेकिन अपनी नाबालिग़ औलाद को देकर उनको मालिक बना दिया या उनके नाम से फ़िक्स कर दिया तो ज़कात फ़र्ज़़ नहीं ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 11
ज़कात व फ़ित्रा बनी हाशिम
यअ़्नी कि सय्यिदों को नहीं दे सकते !
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 63
अगर कोई सय्यिद स़ाह़ब परेशान ह़ाल हैं तो उनकी मदद करना मुसलमान पर ज़़रूरी है उनकी मदद अपने अस़ली माल से करें, ज़कात या फ़ित्रा से नहीं
✍ मिनजानिब : जमाअ़त रज़़ा-ए-मुस़्त़फ़ा पुणे
मिनजानिब : जमाअ़त रज़़ा-ए-मुस़्त़फ़ा पुणे
जिसके पास 7.5 तोला सोना या 52.5 तोला चांदी या इसके बराबर की रक़म पर साल गुजर गया तो उस पर ज़कात फ़र्ज़ हो गई ‼
📕 फ़तावा आ़लमगीरी,जिल्द 1,सफ़ह 168
मसलन आज चांदी 39950 रू किलो है, यअ़्नी 52.5 तोला चांदी 25168 रू की हुई, तो अगर आज के दिन यअ़्नी 27 मई 2018 को कोई इतने रूपये का मालिक है और अगले साल 26 मई 2019 को फिर उसके पास स़ाह़िबे निस़ाब की जो मिल्क बनती है उतनी रक़म पायी जायेगी तो उस पर ज़कात फ़र्ज़ हो गयी अगर चे वो पूरे साल फ़क़ीर रहा हो ‼
औ़रतों के पास जो ज़ेवर होते हैं उनकी मालिक औ़रत ख़ुद है, तो अगर सोना चांदी मिलाकर 52.5 तोला चांदी की क़ीमत बनती है तो औ़रत पर ज़कात फ़र्ज़ है, शौहर पर उसकी ज़कात नहीं, शौहर चाहे तो दे और चाहे ना दे उस पर कुछ इलज़ाम नहीं, अगर शौहर अपनी बीवी के ज़ेवर की ज़कात नहीं देता तो औ़रत जितनी रक़म ज़कात की बनती है उतने का ज़ेवर बेचकर अदा करे ‼
📕 बहारे शरीअ़त,ह़िस्सा 5 - स़फ़ह 62
📕 क्या आप जानते हैं ? – स़फ़ह 391
ज़कात 2.5% यअ़्नी 100 रुपए में 2.5 रुपए है
बाप अपनी बालिग़ औलाद की त़रफ़ से या शौहर बीवी की त़रफ़ से ज़कात या स़दक़ये फ़ित्र देना चाहे तो बिग़ैर उनकी इजाज़त के नहीं दे सकता ‼
📕 फ़तावा अफ़ज़लुल मदारिस, स़फ़ह 88
ह़ाजते अस़लियह यानि रहने का घर, पहनने के कपड़े, किताबें, सफ़र के लिए सवारियां, और घरेलू सामान पर ज़कात फ़र्ज़ नहीं है ‼
📕 फ़तावा आ़लमगीरी,जिल्द 1, स़फ़ह 160
ए.सी. AC फ़िरिज बाइक फ़ोर व्हीलर ये सब ह़ाजते अस़लियह में दाख़िल हैं मगर टी.वी. ह़ाजते अस़लियह में दाख़िल नहीं है तो अगर किसी के पास 26000 रू की टीवी मौजूद है तो उस पर ज़कात फ़र्ज़ है, इसी त़रह़ किसी के पास कई मकान हैं और वो सब उसके ख़ुद के रहने के लिए हैं तो ज़कात नहीं लेकिन अगर किसी मकान में किरायेदार को बसा दिया और उसका किराया इतना है कि ये स़ाह़िबे निस़ाब को पहुंच जाए तो किराये पर ज़कात फ़र्ज़ होगी, उसी तरह दुकान पर तो ज़कात नहीं है मगर उस में भरे हुए माल की ज़कात है लिहाज़ा सब एह़तियात़ से जोड़कर ज़कात अदा की जाये ‼
सगे भाई-बहन, चाचा, मामू, ख़ाला, फूफी, सास-ससुर, बहु-दामाद या सौतेले माँ-बाप को ज़क़ात की रक़म दी जा सकती है ‼
📕 बहारे शरीअ़त ह़िस्सा 5, स़फ़ह 60-64
ज़कात, फित्रा या कफ़्फ़ारह का रुपया अपने अस़ली मां-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी, बेटा-बेटी, पोता-पोती, नवासा-नवासी को नहीं दे सकते ‼
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 60
कफ़न दफ़न में तअ़्मीरे मस्जिद में मीलादे पाक की मह़फिल में ज़कात का रुपया ख़र्च नहीं कर सकते, किया तो ज़कात अदा नहीं होगी ‼
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अफ़ज़़ल यह है कि ज़कात पहले अपने अ़ज़ीज़ ह़ाजतमंदों को दें, दिल में नियत ज़कात हो और उन्हें तोह़फ़ह या क़र्ज़़ कहकर भी देंगे तो ज़कात अदा हो जायेगी ‼
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काफ़िर व बदमज़हब को ज़कात फित्रा हदिया तोह़फ़ा कुछ भी देना नाजायज़ है, अगर उनको ज़कात व फ़ित़रे की रक़म दी तो अदा ना होगी ‼
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पालिसी या F.D. अपने नाम है तो ज़कात फ़र्ज़़ है, लेकिन अपनी नाबालिग़ औलाद को देकर उनको मालिक बना दिया या उनके नाम से फ़िक्स कर दिया तो ज़कात फ़र्ज़़ नहीं ‼
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ज़कात व फ़ित्रा बनी हाशिम
यअ़्नी कि सय्यिदों को नहीं दे सकते !
📕 बहारे शरीअ़त, ह़िस्सा 5, स़फ़ह 63
अगर कोई सय्यिद स़ाह़ब परेशान ह़ाल हैं तो उनकी मदद करना मुसलमान पर ज़़रूरी है उनकी मदद अपने अस़ली माल से करें, ज़कात या फ़ित्रा से नहीं
✍ मिनजानिब : जमाअ़त रज़़ा-ए-मुस़्त़फ़ा पुणे
جمعة الوداع سے متعلق مَسَائل شرعـیہ
فتَاویٰ رضویہ جدید / جِلد⁸ صَـفحہ⁴⁵¹
—— —— —— —— —— —— —— ——
بہت سارے لوگوں کو یہ غلط فہمی ہے کہ رمضان المبارک کا آخری جمعہ / جمعۃ الوداع ایک الگ نوعیت کا جمعہ ہے جس کے خطبے میں "الوداعُ الوداعُ یاشهر رمضان" پڑھنا ضروری ہے اگر امام نے جمعۃ الوداع کے خطبہ میں "الوداعُ الوداعُ یاشهر رمضان" نہیں پڑھا تو فقط اس نے جمعہ پڑھا جمعۃ الوداع نہیں پڑھا,پیش ہیں اس سے متعلق سرکارِ اعلی حضرت رضی الله تبارك و تعالیٰ عنه سے کئے گئے کُچھ سوالات اور ان کے جوابات غور سے پڑھئے اگر آپ کو بھی غلط فہمی ہو تودور کیجئے -
—— —— —— —— —— —— —— ——
{1} جمعۃ الوداع کے خطبے میں نبئ کریم ﷺ نے "الوداعُ الوداعُ یاشهر رمضان" پڑھا ہے یانہیں ؟
{2} اگر حضور ﷺ نے نہیں پڑھا ہے تو سب سے پہلے خطبہ میں "الوداع الوداع یاشهر رمضان" کس نے پڑھا ہے ؟ اس کا موجد و مخترع کون ہے ؟ صحابۂ کرام رضوان ﷲ علیہم اجمعین یا ائمہ مجتہدین فقہاء و محدثین رحمہم ﷲ تعالیٰ ؟
{3} شریعت مقدسہ مطہرہ منورہ محمدیہ حنفیہ اہلسنت وجماعت میں "الوداعُ الوداعُ یاشهر رمضان" کا کیا درجہ ہے؟ فرض، واجب، سنت ، مستحب یا مباح ؟ صاف صاف مدلل تحریر فرمائیں
{4} جس جمعۃ الوداع کے خطبہ میں "الوداع الوداع یاشهر رمضان" نہ پڑھا جائے وہ جمعہ صحیح ہوگا یا نہیں ؟ اور جمعۃ الوداع کے خطبے میں "الوداع الوداع یاشهر رمضان" نہ پڑھنے والا امام کس درجہ کاخاطی وگنہگار ہے؟ وہ قابل ملامت و زجر ہے یا نہیں؟ اور جو لوگ اس کی ملامت و زجر کریں وہ گنہگار ہوں گے یانہیں ؟ اور ایسے امام کی امامت جائز ہے یا ناجائز ؟
{5} کتاب شبیہ الانسان میں لکھا ہے
"اما خواندن کلماتِ حسرت وافسوس درخطبۂ آخر رمضان مباح است فاما ازسلف منقول نیست وافضل ترک ست تا عوام راگمان وجوب وسنتش نگردد دریں شرط ست کہ روایت دروغ وبہتان برسول مقبول ﷺ دراں نباشد والاحرام ہم چنانکہ این ست "اکثر محمد مصطفی ﷺ محبوب ومطلوبِ خدا گفتے دریں حسرتا ای ماہ رمضان الوداع"
ترجمہ : رمضان کے آخری جمعہ میں حسرت وافسوس کے کلمات پڑھنا مباح ہے لیکن اسلاف سےمنقول نہیں ترک افضل ہے تاکہ عوام اسے واجب یاسنت نہ بنالیں، شرط یہ ہے کہ اس میں رسالت مآب ﷺ کی نسبت جھوٹ شامل نہ ہو ورنہ حرام ہے اور وہ یہ ہے کہ "اکثر خدا کے محبوب ومطلوب محمد عربی ﷺ حسرت کا اظہار کرتے ہوئے کہتے اے ماہِ رمضان ! الوداع
یہ فتوٰی مفتی سعد اﷲ نامی کسی بزرگ کا ہے جناب اس فتوٰی کے متعلق کیا فرماتے ہیں آیا صحیح قابلِ عمل ہے یا واجب الرد ؟ جو کچھ ہو صاف تحریر فرمائیں، بینوا توجروا ‼
—— —— —— —— —— —— —— ——
الــــجـَـــــــــــــــــوَاب : ﷽
{1} الوداع جس طرح رائج ہے حضور اقدس ﷺ سے ثابت نہیں۔
{2} نہ صحابۂ کرام ومجتہدین عظام رضی ﷲ تعالیٰ عنہم اجمعین سے نہ اس کا موجد معلوم،
{3} وہ اپنی حد ذات میں مباح ہے ہر مباح نیتِ حسن سے مستحب ہوجاتا ہے اور عروض وعوارض خلاف سے مکروہ سے حرام تک۔
{4} جمعہ کے لئے خطبہ شرط ہے خاص خطبہ الوداع کوئی چیز نہیں ان کے ترک سے نماز پر کُچھ اثر نہیں پڑ سکتا اس کے ترک میں کُچھ خلل نہیں، نہ تارک پر زجر وملامت روا جب کہ ترک بر بنائے وہابیت نہ ہو، ہاں اگر وہابیت ہے تو وہابی کے پیچھے نماز بے شک ناجائز محض باطل اور وہ زجر و ملامت سے بھی سخت تر کا مستحق ہے۔
{5} اس فتوے میں جو کُچھ لکھا حرف بحرف صحیح ہے سوائے اس لفظ کے کہ
'' افضل ترک است''
اس کی جگہ یوں ہونا چاہئے
"التزامش نہ شاید گا ہے ترک ہم کنند تا عوام گمان وجوب واستنان نہ دارند ؟
{ترجمہ - اس کا الترام نہیں کرنا چاہئے کبھی کبھار اسے ترک کردیں تاکہ عوام کو وجوب یا سنت ہونے کا وہم نہ ہو !}
فقد صرح العلماء الکرام ان الترک احیانا یزیل الایھام
{ترجمہ- علماء کرام نے تصریح کی ہے کہ بعض اوقات ترک کردینا عوام کے وہم کو زائل کردیتا ہے}
واللہ سبحٰنه وتعالیٰ ﷻ اعلم
—— —— —— —— —— —— —— ——
📖 فتاویٰ رضویہ شریف جدید
جِـــلــد ٨ / صَـفحہ ٤۵۱ تا ٤۵۲
مکتبہ : رضا فاؤنڈیشن لاہور پاکستان
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نوٹ :- عام قارئین کی سہولت کے لئے ناچیز نے سوال کے جملے کُچھ ترمیم کے ساتھ واضح کردئے ہیں ‼
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✍ محمد مجاہد حسین رضوی
دارالعلوم غریب نواز الٰہ آباد یُو پی
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فتَاویٰ رضویہ جدید / جِلد⁸ صَـفحہ⁴⁵¹
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بہت سارے لوگوں کو یہ غلط فہمی ہے کہ رمضان المبارک کا آخری جمعہ / جمعۃ الوداع ایک الگ نوعیت کا جمعہ ہے جس کے خطبے میں "الوداعُ الوداعُ یاشهر رمضان" پڑھنا ضروری ہے اگر امام نے جمعۃ الوداع کے خطبہ میں "الوداعُ الوداعُ یاشهر رمضان" نہیں پڑھا تو فقط اس نے جمعہ پڑھا جمعۃ الوداع نہیں پڑھا,پیش ہیں اس سے متعلق سرکارِ اعلی حضرت رضی الله تبارك و تعالیٰ عنه سے کئے گئے کُچھ سوالات اور ان کے جوابات غور سے پڑھئے اگر آپ کو بھی غلط فہمی ہو تودور کیجئے -
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{1} جمعۃ الوداع کے خطبے میں نبئ کریم ﷺ نے "الوداعُ الوداعُ یاشهر رمضان" پڑھا ہے یانہیں ؟
{2} اگر حضور ﷺ نے نہیں پڑھا ہے تو سب سے پہلے خطبہ میں "الوداع الوداع یاشهر رمضان" کس نے پڑھا ہے ؟ اس کا موجد و مخترع کون ہے ؟ صحابۂ کرام رضوان ﷲ علیہم اجمعین یا ائمہ مجتہدین فقہاء و محدثین رحمہم ﷲ تعالیٰ ؟
{3} شریعت مقدسہ مطہرہ منورہ محمدیہ حنفیہ اہلسنت وجماعت میں "الوداعُ الوداعُ یاشهر رمضان" کا کیا درجہ ہے؟ فرض، واجب، سنت ، مستحب یا مباح ؟ صاف صاف مدلل تحریر فرمائیں
{4} جس جمعۃ الوداع کے خطبہ میں "الوداع الوداع یاشهر رمضان" نہ پڑھا جائے وہ جمعہ صحیح ہوگا یا نہیں ؟ اور جمعۃ الوداع کے خطبے میں "الوداع الوداع یاشهر رمضان" نہ پڑھنے والا امام کس درجہ کاخاطی وگنہگار ہے؟ وہ قابل ملامت و زجر ہے یا نہیں؟ اور جو لوگ اس کی ملامت و زجر کریں وہ گنہگار ہوں گے یانہیں ؟ اور ایسے امام کی امامت جائز ہے یا ناجائز ؟
{5} کتاب شبیہ الانسان میں لکھا ہے
"اما خواندن کلماتِ حسرت وافسوس درخطبۂ آخر رمضان مباح است فاما ازسلف منقول نیست وافضل ترک ست تا عوام راگمان وجوب وسنتش نگردد دریں شرط ست کہ روایت دروغ وبہتان برسول مقبول ﷺ دراں نباشد والاحرام ہم چنانکہ این ست "اکثر محمد مصطفی ﷺ محبوب ومطلوبِ خدا گفتے دریں حسرتا ای ماہ رمضان الوداع"
ترجمہ : رمضان کے آخری جمعہ میں حسرت وافسوس کے کلمات پڑھنا مباح ہے لیکن اسلاف سےمنقول نہیں ترک افضل ہے تاکہ عوام اسے واجب یاسنت نہ بنالیں، شرط یہ ہے کہ اس میں رسالت مآب ﷺ کی نسبت جھوٹ شامل نہ ہو ورنہ حرام ہے اور وہ یہ ہے کہ "اکثر خدا کے محبوب ومطلوب محمد عربی ﷺ حسرت کا اظہار کرتے ہوئے کہتے اے ماہِ رمضان ! الوداع
یہ فتوٰی مفتی سعد اﷲ نامی کسی بزرگ کا ہے جناب اس فتوٰی کے متعلق کیا فرماتے ہیں آیا صحیح قابلِ عمل ہے یا واجب الرد ؟ جو کچھ ہو صاف تحریر فرمائیں، بینوا توجروا ‼
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الــــجـَـــــــــــــــــوَاب : ﷽
{1} الوداع جس طرح رائج ہے حضور اقدس ﷺ سے ثابت نہیں۔
{2} نہ صحابۂ کرام ومجتہدین عظام رضی ﷲ تعالیٰ عنہم اجمعین سے نہ اس کا موجد معلوم،
{3} وہ اپنی حد ذات میں مباح ہے ہر مباح نیتِ حسن سے مستحب ہوجاتا ہے اور عروض وعوارض خلاف سے مکروہ سے حرام تک۔
{4} جمعہ کے لئے خطبہ شرط ہے خاص خطبہ الوداع کوئی چیز نہیں ان کے ترک سے نماز پر کُچھ اثر نہیں پڑ سکتا اس کے ترک میں کُچھ خلل نہیں، نہ تارک پر زجر وملامت روا جب کہ ترک بر بنائے وہابیت نہ ہو، ہاں اگر وہابیت ہے تو وہابی کے پیچھے نماز بے شک ناجائز محض باطل اور وہ زجر و ملامت سے بھی سخت تر کا مستحق ہے۔
{5} اس فتوے میں جو کُچھ لکھا حرف بحرف صحیح ہے سوائے اس لفظ کے کہ
'' افضل ترک است''
اس کی جگہ یوں ہونا چاہئے
"التزامش نہ شاید گا ہے ترک ہم کنند تا عوام گمان وجوب واستنان نہ دارند ؟
{ترجمہ - اس کا الترام نہیں کرنا چاہئے کبھی کبھار اسے ترک کردیں تاکہ عوام کو وجوب یا سنت ہونے کا وہم نہ ہو !}
فقد صرح العلماء الکرام ان الترک احیانا یزیل الایھام
{ترجمہ- علماء کرام نے تصریح کی ہے کہ بعض اوقات ترک کردینا عوام کے وہم کو زائل کردیتا ہے}
واللہ سبحٰنه وتعالیٰ ﷻ اعلم
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📖 فتاویٰ رضویہ شریف جدید
جِـــلــد ٨ / صَـفحہ ٤۵۱ تا ٤۵۲
مکتبہ : رضا فاؤنڈیشن لاہور پاکستان
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نوٹ :- عام قارئین کی سہولت کے لئے ناچیز نے سوال کے جملے کُچھ ترمیم کے ساتھ واضح کردئے ہیں ‼
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✍ محمد مجاہد حسین رضوی
دارالعلوم غریب نواز الٰہ آباد یُو پی
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