Gems Of Hinduism pinned «सूरज इतना याद रहे संकट एक सूरज वंश पर हैं लंका के नीच राहु द्वारा अघात दिनेश अंश पर हैं मेरे आने से पेहले यदि किरडो का चमत्कार होगा तो सूर्यवंश में सूर्यदेव निश्चित ही अंधकार होगा इस लिए छिपे रहेना भगवन जब तक जड़ी पहुंचा दू मैं बस तभी प्रकट होना भगवन जब संकट…»
सनातन धर्म भारतीय सभ्यता का मूल धर्म है। यह धर्म दुनिया के अन्य धर्मों की तुलना में बहुत पुराना है। सनातन धर्म न केवल एक धर्म है, बल्कि एक विश्वव्यापी धार्मिक विचारधारा है जिसमें सभी जीवों के साथ न्याय और सम्मान की भावना होती है।
सनातन धर्म में अनेक देवताओं की पूजा की जाती है। यह धर्म उन सभी देवताओं को स्वीकार करता है जो भूत, वर्तमान और भविष्य के संसार में निवास करते हैं। सनातन धर्म में ज्ञान, धर्म, कर्म और मोक्ष की चार वेदिक उपदेशों को मान्यता दी जाती है।
सनातन धर्म की विशेषता यह है कि इसमें लोगों के धर्म और जीवन शैली के बारे में कोई अनुचित विचार नहीं होते हैं। इस धर्म में मौलिक उपदेशों जैसे सत्य, अहिंसा, दया और करुणा की बात की जाती है। सनातन धर्म धर्मग्रंथों, वेदों, पुराणों, उपनिषदों, महाभारत और रामायण जैसी महत्त्वपूर्ण ग्रंथों से संबंधित है।
सनातन धर्म के समर्थक इसे समस
सनातन धर्म में अनेक देवताओं की पूजा की जाती है। यह धर्म उन सभी देवताओं को स्वीकार करता है जो भूत, वर्तमान और भविष्य के संसार में निवास करते हैं। सनातन धर्म में ज्ञान, धर्म, कर्म और मोक्ष की चार वेदिक उपदेशों को मान्यता दी जाती है।
सनातन धर्म की विशेषता यह है कि इसमें लोगों के धर्म और जीवन शैली के बारे में कोई अनुचित विचार नहीं होते हैं। इस धर्म में मौलिक उपदेशों जैसे सत्य, अहिंसा, दया और करुणा की बात की जाती है। सनातन धर्म धर्मग्रंथों, वेदों, पुराणों, उपनिषदों, महाभारत और रामायण जैसी महत्त्वपूर्ण ग्रंथों से संबंधित है।
सनातन धर्म के समर्थक इसे समस
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धर्म शब्द का अर्थ होता है नैतिकता, सच्चाई और संगठन। यह धर्म एक आध्यात्मिक और नैतिक अनुभव होता है जो जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायता करता है। इसलिए, सनातन धर्म का मूल मकसद जीवन में न्याय, संतुलन, एकता, सदभाव, स्वास्थ्य और शांति का समृद्ध विकास होता है।
सनातन धर्म भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इस धर्म के अनुयायी संपूर्ण जगत में होते हैं। यह धर्म विश्वव्यापी होते हुए भारतीय संस्कृति को एक अलग आयाम देता है और इसे दुनिया में अलग-अलग भाषाओं में समझाने वाले कई विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जाता है।
सनातन धर्म के अनुयायी अधिकतर धर्मों से अलग होते हैं। इस धर्म के अनुयायी बाहर से आने वाली नई विचारधाराओं को स्वीकार करते हैं लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक विचारधारा से निर्धारित करते हैं
धर्म शब्द का अर्थ होता है नैतिकता, सच्चाई और संगठन। यह धर्म एक आध्यात्मिक और नैतिक अनुभव होता है जो जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायता करता है। इसलिए, सनातन धर्म का मूल मकसद जीवन में न्याय, संतुलन, एकता, सदभाव, स्वास्थ्य और शांति का समृद्ध विकास होता है।
सनातन धर्म भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इस धर्म के अनुयायी संपूर्ण जगत में होते हैं। यह धर्म विश्वव्यापी होते हुए भारतीय संस्कृति को एक अलग आयाम देता है और इसे दुनिया में अलग-अलग भाषाओं में समझाने वाले कई विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जाता है।
सनातन धर्म के अनुयायी अधिकतर धर्मों से अलग होते हैं। इस धर्म के अनुयायी बाहर से आने वाली नई विचारधाराओं को स्वीकार करते हैं लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक विचारधारा से निर्धारित करते हैं
सनातन धर्म भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इस धर्म के अनुयायी संपूर्ण जगत में होते हैं। यह धर्म विश्वव्यापी होते हुए भारतीय संस्कृति को एक अलग आयाम देता है और इसे दुनिया में अलग-अलग भाषाओं में समझाने वाले कई विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जाता है।
सनातन धर्म के अनुयायी अधिकतर धर्मों से अलग होते हैं। इस धर्म के अनुयायी बाहर से आने वाली नई विचारधाराओं को स्वीकार करते हैं लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक विचारधारा से निर्धारित करते हैं
धर्म शब्द का अर्थ होता है नैतिकता, सच्चाई और संगठन। यह धर्म एक आध्यात्मिक और नैतिक अनुभव होता है जो जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायता करता है। इसलिए, सनातन धर्म का मूल मकसद जीवन में न्याय, संतुलन, एकता, सदभाव, स्वास्थ्य और शांति का समृद्ध विकास होता है।
सनातन धर्म भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इस धर्म के अनुयायी संपूर्ण जगत में होते हैं। यह धर्म विश्वव्यापी होते हुए भारतीय संस्कृति को एक अलग आयाम देता है और इसे दुनिया में अलग-अलग भाषाओं में समझाने वाले कई विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जाता है।
सनातन धर्म के अनुयायी अधिकतर धर्मों से अलग होते हैं। इस धर्म के अनुयायी बाहर से आने वाली नई विचारधाराओं को स्वीकार करते हैं लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक विचारधारा से निर्धारित करते हैं
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हनुमान जी भगवान राम के श्रीरामचरितमानस में उनके भक्त और सेवक होते हैं। वे भक्ति, शक्ति, स्नेह और त्याग का प्रतीक होते हैं। हनुमान जी को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। वे मंगल के देवता होते हैं और भगवान राम की सेवा करते हुए उन्हें उनकी सभी संकटों से मुक्त करने की शक्ति होती है।
हनुमान जी के जन्म की कहानी में बताया जाता है कि माता अंजना देवी उनको शिव मंदिर में व्रत करते हुए प्रार्थना करती थी कि उन्हें सुन्दर बालक पुत्र प्राप्त हो। प्रभु शिव की कृपा से एक दिन माता अंजना देवी के पास वायुपुत्र हनुमान जी आ गए।
हनुमान जी ने बचपन में सूर्य को मजबूत और शक्तिशाली बनाने का उपदेश दिया था। उन्होंने अपनी बलशाली और स्वतंत्र शक्ति का उपयोग करके ब्रह्मास्त्र, पाश और अग्निवज्र जैसे दिव्य शस्त्रों का अभ्यास किया था। उनके पूर्वजों ने सूर्य की पूजा और आराधना की थी जो उन्होंने आगे भी अपनाई थी।
हनुमान जी को हिंदू धार्मिक आदर्श का पालन करते हुए देखा जाता है। उन्हें शक्तिशाली, समर्पित, उदार और त्यागी होने का प्रतीक माना जाता है।
भगवान हनुमान की पूजा विशेष रूप से हनुमान चालीसा, हनुमान अष्टक, हनुमान बाहुक, हनुमान जयंती, हनुमान जयंती, हनुमान व्रत और हनुमान जयंती के दिन ज्यादा की जाती है। हनुमान जी के भक्तों को उनकी शक्तिशाली उपस्थिति से राक्षसों, भूत-प्रेतों, तंत्र-मंत्र और नजर-उतारने जैसे संकटों से मुक्ति मिलती है।
भगवान हनुमान को दसवां अवतार माना जाता है जो भगवान विष्णु के दसवें अवतार मत्स्य अवतार से संबंधित होता है। हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा करते हुए उनकी सभी संकटों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान राम को मदद की थी।
आज भी हमारे देश में हनुमान जी की पूजा और उनके चमत्कारों का विश्वास बहुत है। हनुमान जी के भक्तों को उनके त्याग, समर्पण, उदारता और शक्ति का अनुभव मिलता है।
हनुमान जी के जन्म की कहानी में बताया जाता है कि माता अंजना देवी उनको शिव मंदिर में व्रत करते हुए प्रार्थना करती थी कि उन्हें सुन्दर बालक पुत्र प्राप्त हो। प्रभु शिव की कृपा से एक दिन माता अंजना देवी के पास वायुपुत्र हनुमान जी आ गए।
हनुमान जी ने बचपन में सूर्य को मजबूत और शक्तिशाली बनाने का उपदेश दिया था। उन्होंने अपनी बलशाली और स्वतंत्र शक्ति का उपयोग करके ब्रह्मास्त्र, पाश और अग्निवज्र जैसे दिव्य शस्त्रों का अभ्यास किया था। उनके पूर्वजों ने सूर्य की पूजा और आराधना की थी जो उन्होंने आगे भी अपनाई थी।
हनुमान जी को हिंदू धार्मिक आदर्श का पालन करते हुए देखा जाता है। उन्हें शक्तिशाली, समर्पित, उदार और त्यागी होने का प्रतीक माना जाता है।
भगवान हनुमान की पूजा विशेष रूप से हनुमान चालीसा, हनुमान अष्टक, हनुमान बाहुक, हनुमान जयंती, हनुमान जयंती, हनुमान व्रत और हनुमान जयंती के दिन ज्यादा की जाती है। हनुमान जी के भक्तों को उनकी शक्तिशाली उपस्थिति से राक्षसों, भूत-प्रेतों, तंत्र-मंत्र और नजर-उतारने जैसे संकटों से मुक्ति मिलती है।
भगवान हनुमान को दसवां अवतार माना जाता है जो भगवान विष्णु के दसवें अवतार मत्स्य अवतार से संबंधित होता है। हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा करते हुए उनकी सभी संकटों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान राम को मदद की थी।
आज भी हमारे देश में हनुमान जी की पूजा और उनके चमत्कारों का विश्वास बहुत है। हनुमान जी के भक्तों को उनके त्याग, समर्पण, उदारता और शक्ति का अनुभव मिलता है।
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Prabhu Ram Hindu dharm ke sabse prasiddh aur mahatvapurn devtaon mein se ek hai. Unki jeevan-katha, jo ki Ramayan ke roop mein prasiddh hai, ek atyant shikshit aur samarpit vyakti ke jeevan ka prateek hai.
Ram ji ka janm Ayodhya mein hua tha, jahaan unke pita Dasharatha rajya ke raja the. Unke bachpan ka ek mahatvapurn ghatna tha jab unke guru Vashishtha ne unhe aur unke bhaiyon ko shiksha di thi. Ram ji apne bhaiyon ke saath Vashishtha ke ashram mein rahate the, jahaan unhe shastraon, shastron aur adhyatmik shiksha di jaati thi.
Ram ji ne Sita se vivah kiya tha, jo ki ek bahut hi saubhagyashali aur gunvan mahila thi. Unki katha mein ek bahut hi mahatvapurn ghatna thi, jab unhone Lanka ke daitya-raaj Ravana ko parajit kiya tha aur apni patni ko uske khoone se bachaya tha.
Ram ji ek atyant samarpit aur dayalu devta the, jo ki unke bhakton ke hriday mein hamesha rahate hain. Unki katha, unke gun aur unki samarpit bhakti aaj bhi hamare jeevan mein ek atyant mahatvapurn aur prabhavshali jeevan-shaili ke prateek hain.
Ram ji ki katha, unke dharmik aur sanskritik mahatva aur unke vishisht charitra ko prasiddh hone se pehle bhi log unhe bahut prabhavshali samajhte the. Unki sabhyata mein bahut si janata ka vishwas tha aur logon ne unhe apne jeevan ke sabhi kshetron mein uddharak, adarsh aur margdarshak ke roop mein maana hai.
Ram ji ka vachan "Sabka Bhala Ho" hai, jo unke charitra ki pratishtha ko aur bhi badhata hai. Unki sharan mein aane se unke bhakton ki sabhi pareshaniyan door ho jaati hain aur unhe shanti prapt hoti hai.
Ram ji ke janamdin ko Ram Navami ke roop mein manaaya jaata hai aur yeh poore Bharat mein dhoom-dhaam se manaya jaata hai. Is din log Ram ji ke gun gaate hain aur unhe apne jeevan mein pravesh karne ki iccha rakhte hain.
Prabhu Ram ke charitra, unke vachan aur unki katha ka gyaan hamare jeevan mein hamein ek acchi aur nek jeevan-shaili ka margdarshan karta hai aur hamein sahi aur galat ke beech sahi nirnay lene mein sahayata pradaan karta hai.
Ram ji ke charitra mein unke dharma aur nyay ke prati vishesh sneh hai. Unhone hamesha apne dharma ko nibhaya aur apne vachano par chale. Unke charitra mein nyay, sachcha pyaar, vishvaas, sahas, vivek aur samarpan ki bhavnaen ubharati hain.
Ram ji ka vivah Sita ji se hua tha aur Sita ji unke jeevan ki sabse badi saathi thi. Unke prem, vishvaas aur samarpan ka udaharan Sita ji hamesha diya karti thi. Laxman ji bhi unke bade bhai the aur unhone hamesha unki seva mein tatpar rahkar unke dharma aur nyay ki raksha ki.
Ram ji ke charitra ke vishesh roop se unke vanvaas ki katha prasiddh hai. Unhone apne vanvaas mein bhi apne dharma aur nyay ko nibhaya aur unke bhai Bharat ji ne unke sthan ko swikaar kiya.
Ram ji ke charitra mein unki mahan shaktiyan bhi prasiddh hain. Unke dhanush todne, mare hue kaua ko zinda karne, aur Lanka mein Ravana ke sangharsh ke dauran unke samarthan aur sahayog ke prati prakat ki gayi shaktiyan hai.
Ram ji ka janm Ayodhya mein hua tha aur Ayodhya ki bhoomi unki pavitra charitra ke karan vishesh maana jaata hai. Ayodhya ke log unhe apna dharmik aur sanskritik adarsh maante hain.
Prabhu Ram ke charitra ko samajik, aarthik, naitik aur aadhunik roop se shreshttha ka prateek mana jaata hai aur log unhe apne jeevan ke prati sneh se yaad karte hain.
Ram ji ka janm Ayodhya mein hua tha, jahaan unke pita Dasharatha rajya ke raja the. Unke bachpan ka ek mahatvapurn ghatna tha jab unke guru Vashishtha ne unhe aur unke bhaiyon ko shiksha di thi. Ram ji apne bhaiyon ke saath Vashishtha ke ashram mein rahate the, jahaan unhe shastraon, shastron aur adhyatmik shiksha di jaati thi.
Ram ji ne Sita se vivah kiya tha, jo ki ek bahut hi saubhagyashali aur gunvan mahila thi. Unki katha mein ek bahut hi mahatvapurn ghatna thi, jab unhone Lanka ke daitya-raaj Ravana ko parajit kiya tha aur apni patni ko uske khoone se bachaya tha.
Ram ji ek atyant samarpit aur dayalu devta the, jo ki unke bhakton ke hriday mein hamesha rahate hain. Unki katha, unke gun aur unki samarpit bhakti aaj bhi hamare jeevan mein ek atyant mahatvapurn aur prabhavshali jeevan-shaili ke prateek hain.
Ram ji ki katha, unke dharmik aur sanskritik mahatva aur unke vishisht charitra ko prasiddh hone se pehle bhi log unhe bahut prabhavshali samajhte the. Unki sabhyata mein bahut si janata ka vishwas tha aur logon ne unhe apne jeevan ke sabhi kshetron mein uddharak, adarsh aur margdarshak ke roop mein maana hai.
Ram ji ka vachan "Sabka Bhala Ho" hai, jo unke charitra ki pratishtha ko aur bhi badhata hai. Unki sharan mein aane se unke bhakton ki sabhi pareshaniyan door ho jaati hain aur unhe shanti prapt hoti hai.
Ram ji ke janamdin ko Ram Navami ke roop mein manaaya jaata hai aur yeh poore Bharat mein dhoom-dhaam se manaya jaata hai. Is din log Ram ji ke gun gaate hain aur unhe apne jeevan mein pravesh karne ki iccha rakhte hain.
Prabhu Ram ke charitra, unke vachan aur unki katha ka gyaan hamare jeevan mein hamein ek acchi aur nek jeevan-shaili ka margdarshan karta hai aur hamein sahi aur galat ke beech sahi nirnay lene mein sahayata pradaan karta hai.
Ram ji ke charitra mein unke dharma aur nyay ke prati vishesh sneh hai. Unhone hamesha apne dharma ko nibhaya aur apne vachano par chale. Unke charitra mein nyay, sachcha pyaar, vishvaas, sahas, vivek aur samarpan ki bhavnaen ubharati hain.
Ram ji ka vivah Sita ji se hua tha aur Sita ji unke jeevan ki sabse badi saathi thi. Unke prem, vishvaas aur samarpan ka udaharan Sita ji hamesha diya karti thi. Laxman ji bhi unke bade bhai the aur unhone hamesha unki seva mein tatpar rahkar unke dharma aur nyay ki raksha ki.
Ram ji ke charitra ke vishesh roop se unke vanvaas ki katha prasiddh hai. Unhone apne vanvaas mein bhi apne dharma aur nyay ko nibhaya aur unke bhai Bharat ji ne unke sthan ko swikaar kiya.
Ram ji ke charitra mein unki mahan shaktiyan bhi prasiddh hain. Unke dhanush todne, mare hue kaua ko zinda karne, aur Lanka mein Ravana ke sangharsh ke dauran unke samarthan aur sahayog ke prati prakat ki gayi shaktiyan hai.
Ram ji ka janm Ayodhya mein hua tha aur Ayodhya ki bhoomi unki pavitra charitra ke karan vishesh maana jaata hai. Ayodhya ke log unhe apna dharmik aur sanskritik adarsh maante hain.
Prabhu Ram ke charitra ko samajik, aarthik, naitik aur aadhunik roop se shreshttha ka prateek mana jaata hai aur log unhe apne jeevan ke prati sneh se yaad karte hain.
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The Eklavya
महाभारत में, एकलव्य निषाद के प्रमुख हिरण्यधनुस का दत्तक पुत्र था, जिसने पूर्व को तब पाया जब उसे कृष्ण के चाचा और चाची द्वारा एक शिशु के रूप में छोड़ दिया गया था। एकलव्य के दत्तक पिता हिरण्यधनुस उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा जरासंध के सेनापति थे और एकलव्य ने स्वयं राजा जरासंध की सेना में जनरल के रूप में सेवा की थी। एक युवा के रूप में, एकलव्य ने द्रोण को कौरवों और पांडवों - शाही कुरु राजकुमारों - को धनुर्विद्या सिखाते हुए देखा और खुद सीखने की इच्छा से लिया। उन्होंने द्रोण से संपर्क किया और सम्मानपूर्वक तीरंदाजी के छात्र के रूप में लेने का अनुरोध किया। उच्च कुल के क्षत्रिय कुरु राजकुमारों ने, जिन्होंने एकलव्य को हिन्दू वर्ण से बाहर एक वन-निवासी के रूप में लिया था, एक आदिवासी, निम्न-जात व्यक्ति के रूप में अपने आप को जीवन में अपने पद से ऊपर समझने के लिए उसका उपहास उड़ाया। एकलव्य चला जाता है, और फिर जंगल से देखता है जब गुरु द्रोण राजकुमारों को पढ़ाते हैं। उनके आश्रम जाने के बाद, एकलव्य ने अपने गुरु के ज्ञान और पदचिन्हों के प्रति सम्मान के प्रतीक के रूप में उस मिट्टी को एकत्र किया जिस पर उनके गुरु चलते थे। वह जंगल में गया और एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे द्रोण की एक मूर्ति बनाई। उन्होंने कई वर्षों तक स्वाध्याय का एक अनुशासित कार्यक्रम शुरू किया। मूर्ति को अपना गुरु मानकर उन्होंने प्रतिदिन अपने गुरु के सामने अभ्यास किया। गुरु दक्षिणासंपादित करें एकलव्य द्वारा अपने गुरु को अपने दाहिने हाथ के अंगूठे की दक्षिणा एक दिन द्रोण और उनके शिष्य कौरवों के कुत्ते के साथ जंगल में जाते हैं, जो लगातार भौंकना शुरू कर देता है लेकिन फिर अचानक बंद हो जाता है। कौरव कुत्ते को अस्वस्थ पाते हैं लेकिन उसके मुंह में तीर भरने के कारण भौंकने में असमर्थ हैं। यह कुत्ते के लिए हानिरहित था लेकिन कुत्ते को भौंकने से रोकता था। द्रोण चकित थे, लेकिन व्यथित भी थे क्योंकि उन्होंने अर्जुन से वादा किया था कि वह उन्हें दुनिया का सबसे महान धनुर्धर बनाएंगे। द्रोण और उनके शिष्यों ने यह आश्चर्य करते हुए कि ऐसा उत्कृष्ट धनुर्धर कौन हो सकता है, एकलव्य को अपने धनुष के साथ देखा। द्रोण को देखते ही एकलव्य आया और उन्हें प्रणाम किया। द्रोण ने एकलव्य से पूछा कि उसने धनुर्विद्या कहाँ सीखी थी। एकलव्य ने उत्तर दिया "आपके अधीन, गुरुजी", और द्रोण को अपनी मूर्ति दिखाते हुए समझाया कि उसने क्या किया है। अर्जुन नाराज है और द्रोण को अर्जुन को "दुनिया का सबसे बड़ा तीरंदाज" बनाने के अपने वादे की याद दिलाता है। द्रोण ने फैसला किया कि एकलव्य को गुरु दक्षिणा देनी होगी। एकलव्य तत्परता से द्रोण के लिए कुछ भी करने की पेशकश करता है। द्रोण ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा के रूप में अपना दाहिना अंगूठा काटने को कहा। खुश और मुस्कुराते हुए, एकलव्य अंगूठा काट देता है और द्रोणाचार्य को गुरुदक्षिणा के रूप में प्रस्तुत करता है। बाद का जीवनसंपादित करें भागवत पुराण में उल्लेख है कि एकलव्य ने जरासंध की सहायता की, जब उसने कंस की मौत का बदला लेने के लिए मथुरा पर हमला किया। इस युद्ध में एकलव्य को भगवान कृष्ण ने मार डाला, क्योंकि कृष्ण महाभारत के भविष्य के युद्ध और उस एकलव्य के बारे में जानते थे। धर्म की स्थापना में बाधक बन सकता है।
महाभारत में, एकलव्य निषाद के प्रमुख हिरण्यधनुस का दत्तक पुत्र था, जिसने पूर्व को तब पाया जब उसे कृष्ण के चाचा और चाची द्वारा एक शिशु के रूप में छोड़ दिया गया था। एकलव्य के दत्तक पिता हिरण्यधनुस उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा जरासंध के सेनापति थे और एकलव्य ने स्वयं राजा जरासंध की सेना में जनरल के रूप में सेवा की थी। एक युवा के रूप में, एकलव्य ने द्रोण को कौरवों और पांडवों - शाही कुरु राजकुमारों - को धनुर्विद्या सिखाते हुए देखा और खुद सीखने की इच्छा से लिया। उन्होंने द्रोण से संपर्क किया और सम्मानपूर्वक तीरंदाजी के छात्र के रूप में लेने का अनुरोध किया। उच्च कुल के क्षत्रिय कुरु राजकुमारों ने, जिन्होंने एकलव्य को हिन्दू वर्ण से बाहर एक वन-निवासी के रूप में लिया था, एक आदिवासी, निम्न-जात व्यक्ति के रूप में अपने आप को जीवन में अपने पद से ऊपर समझने के लिए उसका उपहास उड़ाया। एकलव्य चला जाता है, और फिर जंगल से देखता है जब गुरु द्रोण राजकुमारों को पढ़ाते हैं। उनके आश्रम जाने के बाद, एकलव्य ने अपने गुरु के ज्ञान और पदचिन्हों के प्रति सम्मान के प्रतीक के रूप में उस मिट्टी को एकत्र किया जिस पर उनके गुरु चलते थे। वह जंगल में गया और एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे द्रोण की एक मूर्ति बनाई। उन्होंने कई वर्षों तक स्वाध्याय का एक अनुशासित कार्यक्रम शुरू किया। मूर्ति को अपना गुरु मानकर उन्होंने प्रतिदिन अपने गुरु के सामने अभ्यास किया। गुरु दक्षिणासंपादित करें एकलव्य द्वारा अपने गुरु को अपने दाहिने हाथ के अंगूठे की दक्षिणा एक दिन द्रोण और उनके शिष्य कौरवों के कुत्ते के साथ जंगल में जाते हैं, जो लगातार भौंकना शुरू कर देता है लेकिन फिर अचानक बंद हो जाता है। कौरव कुत्ते को अस्वस्थ पाते हैं लेकिन उसके मुंह में तीर भरने के कारण भौंकने में असमर्थ हैं। यह कुत्ते के लिए हानिरहित था लेकिन कुत्ते को भौंकने से रोकता था। द्रोण चकित थे, लेकिन व्यथित भी थे क्योंकि उन्होंने अर्जुन से वादा किया था कि वह उन्हें दुनिया का सबसे महान धनुर्धर बनाएंगे। द्रोण और उनके शिष्यों ने यह आश्चर्य करते हुए कि ऐसा उत्कृष्ट धनुर्धर कौन हो सकता है, एकलव्य को अपने धनुष के साथ देखा। द्रोण को देखते ही एकलव्य आया और उन्हें प्रणाम किया। द्रोण ने एकलव्य से पूछा कि उसने धनुर्विद्या कहाँ सीखी थी। एकलव्य ने उत्तर दिया "आपके अधीन, गुरुजी", और द्रोण को अपनी मूर्ति दिखाते हुए समझाया कि उसने क्या किया है। अर्जुन नाराज है और द्रोण को अर्जुन को "दुनिया का सबसे बड़ा तीरंदाज" बनाने के अपने वादे की याद दिलाता है। द्रोण ने फैसला किया कि एकलव्य को गुरु दक्षिणा देनी होगी। एकलव्य तत्परता से द्रोण के लिए कुछ भी करने की पेशकश करता है। द्रोण ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा के रूप में अपना दाहिना अंगूठा काटने को कहा। खुश और मुस्कुराते हुए, एकलव्य अंगूठा काट देता है और द्रोणाचार्य को गुरुदक्षिणा के रूप में प्रस्तुत करता है। बाद का जीवनसंपादित करें भागवत पुराण में उल्लेख है कि एकलव्य ने जरासंध की सहायता की, जब उसने कंस की मौत का बदला लेने के लिए मथुरा पर हमला किया। इस युद्ध में एकलव्य को भगवान कृष्ण ने मार डाला, क्योंकि कृष्ण महाभारत के भविष्य के युद्ध और उस एकलव्य के बारे में जानते थे। धर्म की स्थापना में बाधक बन सकता है।
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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||
Translation:
कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर कदापि नहीं कर्मों के फलों को अपना उद्देश्य मत बनने दो, और न ही तुम्हारी आसक्ति अकर्मण्यता में हो 🚩
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||
Translation:
कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर कदापि नहीं कर्मों के फलों को अपना उद्देश्य मत बनने दो, और न ही तुम्हारी आसक्ति अकर्मण्यता में हो 🚩
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1. सत्य लोक में नारद की ब्रह्मा से मुलाकात [Narada Meets Brahma In SatyaLoka]
ब्रह्मा सृष्टि के देवता हैं। वह सत्य लोक में रहता है। नारद उनके पुत्र हैं। वह नारायण के बहुत बड़े भक्त हैं। नारद हमेशा 'नारायण' नाम का जप करते हैं। सभी चौदह लोकों में उनकी मुक्त पहुँच है। वह हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता रहता है, कुछ सनसनीखेज समाचार लेकर। इस प्रकार वह देवताओं, देवों, असुरों और संतों के बीच परेशानी पैदा करता है। वह अपनी परेशानियों के लिए लोकप्रिय हैं। लेकिन इस तरह की परेशानियों का अंत अंतत: सार्वभौमिक भलाई में होगा। इस तरह वह अच्छे कर्मों के रखरखाव में मदद करता है। एक दिन ब्रह्मा अपने कमल के आसन पर विराजमान थे। उनके बगल में उनकी पत्नी सरस्वती वीणा बजा रही थीं, जो एक वाद्य यंत्र है। सभा में इंदिरा, सप्त ऋषियों, दिक्पालकों, सूर्य देवता और अन्य लोगों ने भाग लिया। वे वहां विधाता से मिलने और उनका निर्देश लेने के लिए उपस्थित थे। यह उस समय था जब नारद ने नारायण के भजनों का जप करते हुए ब्रह्मा के निवास सत्यलोक में प्रवेश किया। उन्होंने अपने माता-पिता सरस्वती और ब्रह्मा को प्रणाम किया। उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद उन्हें दिए गए आसन पर बैठ गए। वहां मौजूद सभी लोगों को यकीन था कि नारद जरूर कुछ सनसनीखेज लेकर आए हैं। सो वे उसकी बात सुनने को व्याकुल थे। नारद ने ब्रह्मा से कहा, “पिताजी, कृष्ण के अवतार के बाद, श्री हरि फिर से पृथ्वी पर नहीं गए। इसलिए पृथ्वी रहने के लिए नरक बन गई है। लोग निडर हो गए हैं। वहाँ अधर्म का बोलबाला है। 'माईट इज राइट' आज का आदर्श वाक्य है। बेगुनाहों को दुष्ट लोग छेड़ते हैं। यह परमेश्वर के पृथ्वी पर फिर से अवतार लेने और धार्मिकता को पुनर्स्थापित करने का समय है। ' ब्रह्मा ने उसे उत्तर दिया, 'प्रिय बालक, तुम हमेशा सभी संसारों में घूमते रहते हो। आपके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं है। आप समस्या पैदा कर सकते हैं और उसका समाधान कर सकते हैं। मेरे पास आपको सिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। फिर तुम मुझसे क्यों पूछते हो? .आप जो चाहते हैं उसे जारी रखें। मैं आप सभी की सफलता की कामना करता हूं।" अपने पिता की बात सुनकर नारद ने पिता से विदा ली और धरती पर जाने का फैसला किया
ब्रह्मा सृष्टि के देवता हैं। वह सत्य लोक में रहता है। नारद उनके पुत्र हैं। वह नारायण के बहुत बड़े भक्त हैं। नारद हमेशा 'नारायण' नाम का जप करते हैं। सभी चौदह लोकों में उनकी मुक्त पहुँच है। वह हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता रहता है, कुछ सनसनीखेज समाचार लेकर। इस प्रकार वह देवताओं, देवों, असुरों और संतों के बीच परेशानी पैदा करता है। वह अपनी परेशानियों के लिए लोकप्रिय हैं। लेकिन इस तरह की परेशानियों का अंत अंतत: सार्वभौमिक भलाई में होगा। इस तरह वह अच्छे कर्मों के रखरखाव में मदद करता है। एक दिन ब्रह्मा अपने कमल के आसन पर विराजमान थे। उनके बगल में उनकी पत्नी सरस्वती वीणा बजा रही थीं, जो एक वाद्य यंत्र है। सभा में इंदिरा, सप्त ऋषियों, दिक्पालकों, सूर्य देवता और अन्य लोगों ने भाग लिया। वे वहां विधाता से मिलने और उनका निर्देश लेने के लिए उपस्थित थे। यह उस समय था जब नारद ने नारायण के भजनों का जप करते हुए ब्रह्मा के निवास सत्यलोक में प्रवेश किया। उन्होंने अपने माता-पिता सरस्वती और ब्रह्मा को प्रणाम किया। उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद उन्हें दिए गए आसन पर बैठ गए। वहां मौजूद सभी लोगों को यकीन था कि नारद जरूर कुछ सनसनीखेज लेकर आए हैं। सो वे उसकी बात सुनने को व्याकुल थे। नारद ने ब्रह्मा से कहा, “पिताजी, कृष्ण के अवतार के बाद, श्री हरि फिर से पृथ्वी पर नहीं गए। इसलिए पृथ्वी रहने के लिए नरक बन गई है। लोग निडर हो गए हैं। वहाँ अधर्म का बोलबाला है। 'माईट इज राइट' आज का आदर्श वाक्य है। बेगुनाहों को दुष्ट लोग छेड़ते हैं। यह परमेश्वर के पृथ्वी पर फिर से अवतार लेने और धार्मिकता को पुनर्स्थापित करने का समय है। ' ब्रह्मा ने उसे उत्तर दिया, 'प्रिय बालक, तुम हमेशा सभी संसारों में घूमते रहते हो। आपके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं है। आप समस्या पैदा कर सकते हैं और उसका समाधान कर सकते हैं। मेरे पास आपको सिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। फिर तुम मुझसे क्यों पूछते हो? .आप जो चाहते हैं उसे जारी रखें। मैं आप सभी की सफलता की कामना करता हूं।" अपने पिता की बात सुनकर नारद ने पिता से विदा ली और धरती पर जाने का फैसला किया
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2. पृथ्वी पर ऋषियों से मिले नारद [ NARADA MEETS SAGES ON EARTH]
हरि के नामों का जप करते हुए, नारद गंगा नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ कश्यप और अन्य संत, सार्वभौमिक भलाई के लिए एक भव्य यज्ञ, एक अनुष्ठान यज्ञ कर रहे थे। मुनियों ने उनका आदर सत्कार किया। नारद उनके प्रयास की सराहना करते हैं। फिर भी उन्हें संदेह था। उन्होंने ऋषियों से पूछा, “यज्ञ का प्रभाव कौन भोगेगा? और आप तीनों देवताओं में से किसे उसके लिए उपयुक्त मानते हैं?” यह एक कठिन प्रश्न है। तो ऋषियों ने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने एक दूसरे को देखा। वे निर्णय पर नहीं आ सके। वे भ्रमित हो गए। संतों को तीन समूहों में बांटा गया और इस मुद्दे के बारे में तर्क दिया गया। शिव के भक्तों ने कहा, इसे महेश्वर जाना चाहिए। वैष्णवों ने कहा, नारायण सही व्यक्ति हैं। उनमें से कुछ ने सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को प्राथमिकता दी। प्रत्येक ने अपने भगवान के पक्ष में तर्क दिया। यह यज्ञ प्रांगण से युद्ध क्षेत्र बन गया। नारद ने उनसे समझौता करने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “आपको परीक्षण करके सही व्यक्ति का चयन करना होगा। तीन देवताओं का परीक्षण करना आसान नहीं है। यह आग से खेलने जैसा कुछ है। मैं मानता हूँ कि बृहु महर्षि, जिनके पास अपनी महान तपस्या से अलौकिक शक्तियाँ हैं, देवताओं की परीक्षा लेने के लिए पूर्ण व्यक्ति हैं। आप यह काम उसे सौंप सकते हैं। उनके सुझावों को सभी ने माना। इस गंभीर स्थिति में बृहु के पास इसे स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। बृहु को हमेशा अपनी अलौकिक मानवीय शक्तियों पर बहुत गर्व होता है। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए उसका चयन करके नारद उसे पढ़ाना चाहते हैं। अपनी योजना में सफल होने के बाद, खुशी-खुशी उस जगह से विदा ली।
हरि के नामों का जप करते हुए, नारद गंगा नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ कश्यप और अन्य संत, सार्वभौमिक भलाई के लिए एक भव्य यज्ञ, एक अनुष्ठान यज्ञ कर रहे थे। मुनियों ने उनका आदर सत्कार किया। नारद उनके प्रयास की सराहना करते हैं। फिर भी उन्हें संदेह था। उन्होंने ऋषियों से पूछा, “यज्ञ का प्रभाव कौन भोगेगा? और आप तीनों देवताओं में से किसे उसके लिए उपयुक्त मानते हैं?” यह एक कठिन प्रश्न है। तो ऋषियों ने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने एक दूसरे को देखा। वे निर्णय पर नहीं आ सके। वे भ्रमित हो गए। संतों को तीन समूहों में बांटा गया और इस मुद्दे के बारे में तर्क दिया गया। शिव के भक्तों ने कहा, इसे महेश्वर जाना चाहिए। वैष्णवों ने कहा, नारायण सही व्यक्ति हैं। उनमें से कुछ ने सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को प्राथमिकता दी। प्रत्येक ने अपने भगवान के पक्ष में तर्क दिया। यह यज्ञ प्रांगण से युद्ध क्षेत्र बन गया। नारद ने उनसे समझौता करने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “आपको परीक्षण करके सही व्यक्ति का चयन करना होगा। तीन देवताओं का परीक्षण करना आसान नहीं है। यह आग से खेलने जैसा कुछ है। मैं मानता हूँ कि बृहु महर्षि, जिनके पास अपनी महान तपस्या से अलौकिक शक्तियाँ हैं, देवताओं की परीक्षा लेने के लिए पूर्ण व्यक्ति हैं। आप यह काम उसे सौंप सकते हैं। उनके सुझावों को सभी ने माना। इस गंभीर स्थिति में बृहु के पास इसे स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। बृहु को हमेशा अपनी अलौकिक मानवीय शक्तियों पर बहुत गर्व होता है। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए उसका चयन करके नारद उसे पढ़ाना चाहते हैं। अपनी योजना में सफल होने के बाद, खुशी-खुशी उस जगह से विदा ली।
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3. ब्रहु ने भगवान ब्रह्मा का परीक्षण किया [ BRIHU TESTS LORD BRAHMA]
सत्यलोक में, ब्रह्मा और सरस्वती एक स्वर्ण सिंहासन पर बैठे थे। महर्षि के देवर्षि, राजऋषि और ब्रह्मऋषि सभी वहाँ इकट्ठे हैं। ब्रह्मा उन्हें वेदों के बारे में बताते हैं। उसी समय बृहु महर्षि वहां आ पहुंचे। वह दर्शकों को देखता है। उन्होंने बिना ब्रह्मा को संबोधित किए ही सिंहासन पर कब्जा कर लिया। उनके दौरे से सभी खुश नजर आए। लेकिन ब्रह्मा के प्रति उनकी लापरवाही की किसी ने सराहना नहीं की। ब्रह्मा को उसका व्यवहार बुरा लगा। वह बर्दाश्त नहीं कर सका। उसे गुस्सा आता है। उसकी आंखें लाल हो गईं। गुस्से भरे लहजे में वह फूट पड़ा, “बृहु, तुम भी उसी जाति के हो जैसे मैं हूं। लेकिन अपनी घोर तपस्या से आपने इतनी शक्तियाँ प्राप्त कर लीं। लेकिन आपका व्यवहार ठीक नहीं है। क्या आपको लगता है, आप इस दरबार में महर्षियों से श्रेष्ठ हैं? क्या आप अनुसूया से बढ़कर हैं, पवित्र महिला? तिरुमूर्ति को शिशुओं के रूप में किसने परिवर्तित किया? क्या आप गौतम से बड़े हैं, जिसने देवेंद्र को श्राप दिया था? क्या आप जमग्नि से अधिक शक्तिशाली हैं?” बृहु तुरंत सिंहासन से नीचे उतर गया। उसने सोचा कि "वह विनम्र नहीं है। रजोगुण वालों को ही ऐसा स्वभाव रखना चाहिए। . वह यज्ञ का उपहार स्वीकार करने के लिए सही व्यक्ति नहीं हैं।' तो उन्होंने ब्रह्मा को संबोधित किया, "हे भगवान, आप कभी नहीं समझते कि मैं यहां आपके दर्शन के लिए क्यों आया हूं। लेकिन तुमने व्यर्थ ही मुझे डाँटा। इसलिए आप मेरा श्राप धारण करें। पृथ्वी पर तुम्हारा कोई मंदिर नहीं होगा। और कोई भी आपकी पूजा नहीं करेगा 'फिर उन्होंने शिव के निवास स्थान कैलाश की ओर प्रस्थान किया।
सत्यलोक में, ब्रह्मा और सरस्वती एक स्वर्ण सिंहासन पर बैठे थे। महर्षि के देवर्षि, राजऋषि और ब्रह्मऋषि सभी वहाँ इकट्ठे हैं। ब्रह्मा उन्हें वेदों के बारे में बताते हैं। उसी समय बृहु महर्षि वहां आ पहुंचे। वह दर्शकों को देखता है। उन्होंने बिना ब्रह्मा को संबोधित किए ही सिंहासन पर कब्जा कर लिया। उनके दौरे से सभी खुश नजर आए। लेकिन ब्रह्मा के प्रति उनकी लापरवाही की किसी ने सराहना नहीं की। ब्रह्मा को उसका व्यवहार बुरा लगा। वह बर्दाश्त नहीं कर सका। उसे गुस्सा आता है। उसकी आंखें लाल हो गईं। गुस्से भरे लहजे में वह फूट पड़ा, “बृहु, तुम भी उसी जाति के हो जैसे मैं हूं। लेकिन अपनी घोर तपस्या से आपने इतनी शक्तियाँ प्राप्त कर लीं। लेकिन आपका व्यवहार ठीक नहीं है। क्या आपको लगता है, आप इस दरबार में महर्षियों से श्रेष्ठ हैं? क्या आप अनुसूया से बढ़कर हैं, पवित्र महिला? तिरुमूर्ति को शिशुओं के रूप में किसने परिवर्तित किया? क्या आप गौतम से बड़े हैं, जिसने देवेंद्र को श्राप दिया था? क्या आप जमग्नि से अधिक शक्तिशाली हैं?” बृहु तुरंत सिंहासन से नीचे उतर गया। उसने सोचा कि "वह विनम्र नहीं है। रजोगुण वालों को ही ऐसा स्वभाव रखना चाहिए। . वह यज्ञ का उपहार स्वीकार करने के लिए सही व्यक्ति नहीं हैं।' तो उन्होंने ब्रह्मा को संबोधित किया, "हे भगवान, आप कभी नहीं समझते कि मैं यहां आपके दर्शन के लिए क्यों आया हूं। लेकिन तुमने व्यर्थ ही मुझे डाँटा। इसलिए आप मेरा श्राप धारण करें। पृथ्वी पर तुम्हारा कोई मंदिर नहीं होगा। और कोई भी आपकी पूजा नहीं करेगा 'फिर उन्होंने शिव के निवास स्थान कैलाश की ओर प्रस्थान किया।
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4. बृहु ने भगवान शिव को श्राप दिया। [BRIHU CURSES LORD SHIVA]
कैलाश चांदी का पर्वत है। शिव को महेश्वर भी कहा जाता है। उस दिन, नंदी, ब्रीनी, और चंडी और अन्य सभी शिष्य भगवान शिव के नामों का जाप कर रहे थे। और पूरा पहाड़ उन प्रार्थनाओं से गूंज उठा। सभी ध्यान में लीन हैं। उसी समय बृहु वहां प्रवेश करते हैं। वह सीधे शिव के निजी कक्ष में गए हैं। उस समय शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ नृत्य करते हैं। शिव के कर्मियों ने बृहु को इस बारे में चेतावनी दी। लेकिन बृहु ने उनकी चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया। वह कमरे में प्रवेश करता है। बृहु पार्वती को देखकर शर्म आ गई। शिव जंगली हो गए। वह फूट पड़ा, 'तुम बृहु, तुम उसी जाति के हो जो विधाता है। आपने वेदों को सीखा है। आपने घोर तपस्या की है। फिर भी तुमने कोई शालीनता नहीं सीखी। तुम्हारे संस्कार ठीक नहीं हैं। . यह आपकी ओर से शर्म की बात है ”यह कहते हुए उन्होंने बृहु पर निशाना साधने के लिए अपना त्रिशूल उठाया। लेकिन पार्वती ने बीच में आकर उन्हें रोक लिया। शिव शांत हो गए। लेकिन बृहु शिव पर क्रोधित हो जाते हैं। उन्होंने कहा, "महेश्वर, मेरे आने का कारण जाने बिना ही आपने अपना त्रिशूल मुझ पर चढ़ा दिया। इसलिए आप मेरा श्राप धारण करें। "आप केवल अपने वास्तविक आकार के बजाय लिंगम के आकार में पूजे जाते हैं" यह कहते हुए बृहु ने स्थान छोड़ दिया और भगवान विष्णु के निवास स्थान वैकुंडम चले गए।
कैलाश चांदी का पर्वत है। शिव को महेश्वर भी कहा जाता है। उस दिन, नंदी, ब्रीनी, और चंडी और अन्य सभी शिष्य भगवान शिव के नामों का जाप कर रहे थे। और पूरा पहाड़ उन प्रार्थनाओं से गूंज उठा। सभी ध्यान में लीन हैं। उसी समय बृहु वहां प्रवेश करते हैं। वह सीधे शिव के निजी कक्ष में गए हैं। उस समय शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ नृत्य करते हैं। शिव के कर्मियों ने बृहु को इस बारे में चेतावनी दी। लेकिन बृहु ने उनकी चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया। वह कमरे में प्रवेश करता है। बृहु पार्वती को देखकर शर्म आ गई। शिव जंगली हो गए। वह फूट पड़ा, 'तुम बृहु, तुम उसी जाति के हो जो विधाता है। आपने वेदों को सीखा है। आपने घोर तपस्या की है। फिर भी तुमने कोई शालीनता नहीं सीखी। तुम्हारे संस्कार ठीक नहीं हैं। . यह आपकी ओर से शर्म की बात है ”यह कहते हुए उन्होंने बृहु पर निशाना साधने के लिए अपना त्रिशूल उठाया। लेकिन पार्वती ने बीच में आकर उन्हें रोक लिया। शिव शांत हो गए। लेकिन बृहु शिव पर क्रोधित हो जाते हैं। उन्होंने कहा, "महेश्वर, मेरे आने का कारण जाने बिना ही आपने अपना त्रिशूल मुझ पर चढ़ा दिया। इसलिए आप मेरा श्राप धारण करें। "आप केवल अपने वास्तविक आकार के बजाय लिंगम के आकार में पूजे जाते हैं" यह कहते हुए बृहु ने स्थान छोड़ दिया और भगवान विष्णु के निवास स्थान वैकुंडम चले गए।
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🔰गर्भ संस्कार [GARBHA SANSKAR]
गर्भ संस्कार का अर्थ गर्भ में पल रहे शिशु को शिक्षित करना है। गर्भ संस्कार गर्भधारण के समय से ही बच्चे में आध्यात्मिक विचार प्रदान करने की एक प्रक्रिया है। इस दृष्टि से, गर्भ संस्कार को सत्व गुण (या भौतिक अर्थों में महत्वपूर्ण विशेषताओं और सकारात्मक अटकलों) को बढ़ाने के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए। महाभारत, विष्णु पुराण में, कई कहानियों में गर्भ संस्कार की शक्ति का वर्णन है। हम में से बहुत से लोग महान धनुर्धर अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के बारे में जानते हैं। एक बार अर्जुन ने अपनी पत्नी सुभद्रा को अपने बेटे अभिमन्यु के साथ गर्भवती होने का वर्णन किया कि कैसे चक्रव्यूह (एक गठन एक दूसरे के अंदर गोलाकार रूप से आयोजित किया जाता है) में प्रवेश किया जाए। जब अभिमन्यु कुरुक्षेत्र युद्ध में एक युवा और एक योद्धा बन गया, तो उसे युद्ध की सारी बातें याद आ गईं और वह चक्रव्यूह में प्रवेश करने में सक्षम हो गया। प्रह्लाद की कहानी विष्णु पुराण से है। प्रह्लाद का जन्म एक राक्षस राजा हिरण्य कश्यप के यहाँ हुआ था जो स्वर्ग में देवताओं पर कहर बरपा रहा था। उनकी माँ ने भगवान विष्णु के बारे में भक्तिपूर्ण प्रार्थनाएँ और कहानियाँ सुनीं, जब वे उनके गर्भ में थे। इसके बाद, वह भगवान विष्णु के भक्त बन गए। वह महान बने रहे और सभी पुरुषवादी को निरस्त कर दिया। इसने उसके शैतान पिता, हिरण्य कश्यप के दुष्ट साम्राज्य की हार को प्रेरित किया। रिसर्च कहती है कि बच्चे के दिमाग का करीब 60 फीसदी विकास मां के गर्भ में होता है। सकारात्मक सोच और मानसिकता गर्भावस्था के दौरान और बाद में माँ और बच्चे की वास्तविक समृद्धि को आगे बढ़ाती है। गर्भ संस्कार का लाभ यह है कि आप अपने बच्चे को पढ़ाते हैं, और माँ और बच्चे के बीच एक संबंध विकसित होता है। एक बच्चे का चरित्र गर्भ में फलने-फूलने लगता है, जो गर्भावस्था के दौरान माँ के दृष्टिकोण से प्रभावित हो सकता है। वरमूर्थेश्वर मंदिर 6000 साल पुराना है- अविश्वसनीय कोणों पर निर्भर है (ऋषियों रोमर और मुकुन्थन के साथ महत्वपूर्ण जुड़ाव को देखते हुए)। लेकिन एक उचित अनुमान कहता है कि मंदिर लगभग 1000 साल पुराना है। राजा कुंजारा चोलन ने मंदिर में वेतन वृद्धि की है। मंदिर निश्चित रूप से चोल काल (लगभग 1000 वर्ष की आयु) में मौजूद था। उपरोक्त छवि में, तीन लंबवत रेखाओं के बीच में, दो आरेखण दिखाए गए हैं। बायां वाला, एक डिस्क को छूने वाला सांप, मानव अंडे के निषेचन के अलावा और कुछ नहीं है, और दाहिना उसका विवरण है। तमिल पाठ के अनुसार, मछली एक आकाशीय वस्तु है, एक तारा जो स्वर्ग के समुद्र में तैरता है। तो आकाश से आने वाली दिव्य मछली को मिट्टी के बर्तन में प्रवेश कराया जाता है। प्राचीन तमिलों ने अपने मृतकों को भ्रूण की स्थिति में मिट्टी के बर्तन में दफनाया। उलटा घड़ा माता के गर्भ का प्रतीक है। तो मछली, मुंह में एक कली वाली पवित्र वस्तु उलटे बर्तन में गिरा दी गई, मतलब आत्मा ने मां के गर्भ में प्रवेश किया। हजारों साल पहले, हमारे पूर्वज आधुनिक उपकरणों के बिना निषेचन के विज्ञान के बारे में जानते थे। उनके पास कुछ उपकरण या तकनीक होनी चाहिए जो इस युग में गायब है।
Image: https://telegra.ph/file/142c5dd31c0aa2e0435a3.jpg
गर्भ संस्कार का अर्थ गर्भ में पल रहे शिशु को शिक्षित करना है। गर्भ संस्कार गर्भधारण के समय से ही बच्चे में आध्यात्मिक विचार प्रदान करने की एक प्रक्रिया है। इस दृष्टि से, गर्भ संस्कार को सत्व गुण (या भौतिक अर्थों में महत्वपूर्ण विशेषताओं और सकारात्मक अटकलों) को बढ़ाने के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए। महाभारत, विष्णु पुराण में, कई कहानियों में गर्भ संस्कार की शक्ति का वर्णन है। हम में से बहुत से लोग महान धनुर्धर अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के बारे में जानते हैं। एक बार अर्जुन ने अपनी पत्नी सुभद्रा को अपने बेटे अभिमन्यु के साथ गर्भवती होने का वर्णन किया कि कैसे चक्रव्यूह (एक गठन एक दूसरे के अंदर गोलाकार रूप से आयोजित किया जाता है) में प्रवेश किया जाए। जब अभिमन्यु कुरुक्षेत्र युद्ध में एक युवा और एक योद्धा बन गया, तो उसे युद्ध की सारी बातें याद आ गईं और वह चक्रव्यूह में प्रवेश करने में सक्षम हो गया। प्रह्लाद की कहानी विष्णु पुराण से है। प्रह्लाद का जन्म एक राक्षस राजा हिरण्य कश्यप के यहाँ हुआ था जो स्वर्ग में देवताओं पर कहर बरपा रहा था। उनकी माँ ने भगवान विष्णु के बारे में भक्तिपूर्ण प्रार्थनाएँ और कहानियाँ सुनीं, जब वे उनके गर्भ में थे। इसके बाद, वह भगवान विष्णु के भक्त बन गए। वह महान बने रहे और सभी पुरुषवादी को निरस्त कर दिया। इसने उसके शैतान पिता, हिरण्य कश्यप के दुष्ट साम्राज्य की हार को प्रेरित किया। रिसर्च कहती है कि बच्चे के दिमाग का करीब 60 फीसदी विकास मां के गर्भ में होता है। सकारात्मक सोच और मानसिकता गर्भावस्था के दौरान और बाद में माँ और बच्चे की वास्तविक समृद्धि को आगे बढ़ाती है। गर्भ संस्कार का लाभ यह है कि आप अपने बच्चे को पढ़ाते हैं, और माँ और बच्चे के बीच एक संबंध विकसित होता है। एक बच्चे का चरित्र गर्भ में फलने-फूलने लगता है, जो गर्भावस्था के दौरान माँ के दृष्टिकोण से प्रभावित हो सकता है। वरमूर्थेश्वर मंदिर 6000 साल पुराना है- अविश्वसनीय कोणों पर निर्भर है (ऋषियों रोमर और मुकुन्थन के साथ महत्वपूर्ण जुड़ाव को देखते हुए)। लेकिन एक उचित अनुमान कहता है कि मंदिर लगभग 1000 साल पुराना है। राजा कुंजारा चोलन ने मंदिर में वेतन वृद्धि की है। मंदिर निश्चित रूप से चोल काल (लगभग 1000 वर्ष की आयु) में मौजूद था। उपरोक्त छवि में, तीन लंबवत रेखाओं के बीच में, दो आरेखण दिखाए गए हैं। बायां वाला, एक डिस्क को छूने वाला सांप, मानव अंडे के निषेचन के अलावा और कुछ नहीं है, और दाहिना उसका विवरण है। तमिल पाठ के अनुसार, मछली एक आकाशीय वस्तु है, एक तारा जो स्वर्ग के समुद्र में तैरता है। तो आकाश से आने वाली दिव्य मछली को मिट्टी के बर्तन में प्रवेश कराया जाता है। प्राचीन तमिलों ने अपने मृतकों को भ्रूण की स्थिति में मिट्टी के बर्तन में दफनाया। उलटा घड़ा माता के गर्भ का प्रतीक है। तो मछली, मुंह में एक कली वाली पवित्र वस्तु उलटे बर्तन में गिरा दी गई, मतलब आत्मा ने मां के गर्भ में प्रवेश किया। हजारों साल पहले, हमारे पूर्वज आधुनिक उपकरणों के बिना निषेचन के विज्ञान के बारे में जानते थे। उनके पास कुछ उपकरण या तकनीक होनी चाहिए जो इस युग में गायब है।
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🔰पुमसवाना [PUMSAVANA]
पुमासन हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से दूसरा संस्कार है। गर्भावस्था के तीसरे या चौथे महीने में इसकी सराहना की जाती है; आमतौर पर, गर्भावस्था में प्रवेश करने के बाद पहचानने योग्य होता है लेकिन इससे पहले कि बच्चा गर्भ में चलना शुरू करे। हमें अथर्ववेद के खंड 4.3.23 और 4.6.2 में पुंसवन का वर्णन मिला है, और यह पुंसवन में संदर्भित रणनीतियों द्वारा आमतौर पर ध्वनि वंशज बनाने की तकनीक देता है, जिसका उपयोग गर्भपात को रोकने और एक स्वस्थ, बुद्धिमान, बुद्धिमान देने के लिए बुद्धिमानी से किया जाना चाहिए। कल के लिए शक्ति, शक्ति और दीर्घायु के साथ सुंदर संतान। मानव भ्रूण की उन्नति अतिरिक्त रूप से काल भैरव नाथ मंदिर, तमिलनाडु में प्रदर्शित की गई है। इसके अतिरिक्त, इस चोल मंदिर को तंजावुर (तंजौर) - कुंभकोणम स्ट्रीट पर स्थित थिरुकारुगवुर, पापनासम तालुका में श्री गर्भरक्षम्बिका सहित श्री मुल्लिवन नाथर मंदिर कहा जाता है। अंदर की दीवारों पर भी पुरानी नक्काशी है। मंदिर के अंदर राजा राजा चोल के काल के उत्कीर्णन, जो 985 और 1014 के बीच प्रबंधित हुए, और परांतक चोल के काल (मध्य-दसवीं शताब्दी) के हैं। यहां पूजा पद्धति का एक हिस्सा गर्भावस्था से संबंधित है। तो "स्त्री रोग संबंधी मुद्दों" से निपटने के लिए एक समर्पित मंदिर। हो सकता है मंदिर में लोगों की मदद के लिए विशेषज्ञ उपलब्ध हों। यह समाज को दिया गया एक विशेषज्ञता प्रशासन था।
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पुमासन हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से दूसरा संस्कार है। गर्भावस्था के तीसरे या चौथे महीने में इसकी सराहना की जाती है; आमतौर पर, गर्भावस्था में प्रवेश करने के बाद पहचानने योग्य होता है लेकिन इससे पहले कि बच्चा गर्भ में चलना शुरू करे। हमें अथर्ववेद के खंड 4.3.23 और 4.6.2 में पुंसवन का वर्णन मिला है, और यह पुंसवन में संदर्भित रणनीतियों द्वारा आमतौर पर ध्वनि वंशज बनाने की तकनीक देता है, जिसका उपयोग गर्भपात को रोकने और एक स्वस्थ, बुद्धिमान, बुद्धिमान देने के लिए बुद्धिमानी से किया जाना चाहिए। कल के लिए शक्ति, शक्ति और दीर्घायु के साथ सुंदर संतान। मानव भ्रूण की उन्नति अतिरिक्त रूप से काल भैरव नाथ मंदिर, तमिलनाडु में प्रदर्शित की गई है। इसके अतिरिक्त, इस चोल मंदिर को तंजावुर (तंजौर) - कुंभकोणम स्ट्रीट पर स्थित थिरुकारुगवुर, पापनासम तालुका में श्री गर्भरक्षम्बिका सहित श्री मुल्लिवन नाथर मंदिर कहा जाता है। अंदर की दीवारों पर भी पुरानी नक्काशी है। मंदिर के अंदर राजा राजा चोल के काल के उत्कीर्णन, जो 985 और 1014 के बीच प्रबंधित हुए, और परांतक चोल के काल (मध्य-दसवीं शताब्दी) के हैं। यहां पूजा पद्धति का एक हिस्सा गर्भावस्था से संबंधित है। तो "स्त्री रोग संबंधी मुद्दों" से निपटने के लिए एक समर्पित मंदिर। हो सकता है मंदिर में लोगों की मदद के लिए विशेषज्ञ उपलब्ध हों। यह समाज को दिया गया एक विशेषज्ञता प्रशासन था।
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🔰WHY OFFERING WATER TO THE SUN?
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1. Beautiful Bodily Features (suramyāṅga)
The charming beauty of Krsn a ’s gorgeous form is incomparable. But to
provide a reference point for our limited minds, Sri Rupa Gosvami gives
some material comparisons. The full moon in the autumn season
somewhat resembles the soft radiance and pleasing aura of
Syamasundara’s beautiful lotus face. As cakora birds thrive by drinking
the moon rays with their eyes, pure devotees continually drink the nectar
flowing from the full moon of Syama’s face with the cups of their fully
blossomed eyes. This ever-sweet nectar bathes their hearts in streams of
delight that enlivens and energizes every atom of their beings. The minds
of the gopis spin in a thousand circles when they see Krsn a standing under
a kadamba tree beside the Yamuna in His attractive three-fold bending
form.
Krsn a ’s body displays the quintessence of design perfection; absolutely
stunning beauty in every limb. Krsn a ’s strong arms are two columns in the
palace of love that crush to dust the pride of Cupid. Krsn a ’s red palms,
which resemble blossoming red lotus flowers, refresh the tired faces of the
gopis with their sweet fragrance and cooling touch. Krsn a ’s handsome
broad chest is the door to the gopis’ treasury room of prema. The middle
of Krsn a ’s body is a terrace in the palace of Radharani wherein She sportsand sometimes rests. His hips are dens where a lion named Hari waits to
pounce on the curious eyes of the Vraja-gopis. Krsn a ’s shapely thighs,
which rival the powerful trunks of elephants, serve as pillars to tie up the
lusty minds of the Vraja-gopis.
“Sri Krsn a ’s complexion is the color of a blue lotus flower or a blue
sapphire, and it is as enchanting as a tamala tree or a group of black
clouds. Krsn a is an ocean of nectarean handsomeness. Sri Govinda wears
yellow garments and a garland of forest flowers. Gokulananda is decorated
with various jewels, and He is a great reservoir of the nectar of many
transcendental pastimes. Radhika-ramana has long, curling hair and He is
anointed with many fragrant scents.
“Syamasundara’s handsome crown is decorated with many different
flowers. Sri Gopinatha’s handsome forehead is decorated with tilaka
markings and curling locks of hair. The playful movements of Damodara’s
raised dark eyebrows enchant the hearts of the gopis. Muralimanohara’s
rolling eyes are as splendid as red and blue lotus flowers. Vrndavana-
candra’s ears and cheeks are decorated with earrings made of various
jewels.
“Madhava’s handsome face is as splendid as millions of moons. Sri Krsn a
speaks many charming jokes and His chin is exquisitely handsome.
Govardhana-dhari wears a locket on His chest containing a picture of Sri
Radha. Decorated with a necklace of pearls, the beauty of
Vrajendranandana’s neck enchants the residents of the three planetary
systems. Adorned with a necklace of pearls and the Kaustubha gem, which
shines like lightning, Mukunda’s handsome chest longs to enjoy the
company of the beautiful gopis. Krsn a received His Kaustubha jewel from
the Kaliya serpent’s wives, who gave this jewel to Krsn a candra with their
own hands.
“Ornamented with bracelets and armlets, Madhupati’s arms hang down to
His knees. Gokula-candra’s reddish lotus hands are decorated with various
auspicious signs. Radha-natha’s charming abdomen is the pleasure abode
of perfection. Radha-ramana’s nectarean back seems to beg for the playful
touch of the beautiful gopis. The nectarean lotus flower that is Rasa-
bihari’s hips bewilders Cupid. Rasaraja Sri Krsn a ’s knees are verysplendid, charming and handsome. Murari’s thighs are like two beautiful
plantain trees that charm the hearts of all women.
“Madana-mohana’s charming lotus feet are decorated with jeweled
The charming beauty of Krsn a ’s gorgeous form is incomparable. But to
provide a reference point for our limited minds, Sri Rupa Gosvami gives
some material comparisons. The full moon in the autumn season
somewhat resembles the soft radiance and pleasing aura of
Syamasundara’s beautiful lotus face. As cakora birds thrive by drinking
the moon rays with their eyes, pure devotees continually drink the nectar
flowing from the full moon of Syama’s face with the cups of their fully
blossomed eyes. This ever-sweet nectar bathes their hearts in streams of
delight that enlivens and energizes every atom of their beings. The minds
of the gopis spin in a thousand circles when they see Krsn a standing under
a kadamba tree beside the Yamuna in His attractive three-fold bending
form.
Krsn a ’s body displays the quintessence of design perfection; absolutely
stunning beauty in every limb. Krsn a ’s strong arms are two columns in the
palace of love that crush to dust the pride of Cupid. Krsn a ’s red palms,
which resemble blossoming red lotus flowers, refresh the tired faces of the
gopis with their sweet fragrance and cooling touch. Krsn a ’s handsome
broad chest is the door to the gopis’ treasury room of prema. The middle
of Krsn a ’s body is a terrace in the palace of Radharani wherein She sportsand sometimes rests. His hips are dens where a lion named Hari waits to
pounce on the curious eyes of the Vraja-gopis. Krsn a ’s shapely thighs,
which rival the powerful trunks of elephants, serve as pillars to tie up the
lusty minds of the Vraja-gopis.
“Sri Krsn a ’s complexion is the color of a blue lotus flower or a blue
sapphire, and it is as enchanting as a tamala tree or a group of black
clouds. Krsn a is an ocean of nectarean handsomeness. Sri Govinda wears
yellow garments and a garland of forest flowers. Gokulananda is decorated
with various jewels, and He is a great reservoir of the nectar of many
transcendental pastimes. Radhika-ramana has long, curling hair and He is
anointed with many fragrant scents.
“Syamasundara’s handsome crown is decorated with many different
flowers. Sri Gopinatha’s handsome forehead is decorated with tilaka
markings and curling locks of hair. The playful movements of Damodara’s
raised dark eyebrows enchant the hearts of the gopis. Muralimanohara’s
rolling eyes are as splendid as red and blue lotus flowers. Vrndavana-
candra’s ears and cheeks are decorated with earrings made of various
jewels.
“Madhava’s handsome face is as splendid as millions of moons. Sri Krsn a
speaks many charming jokes and His chin is exquisitely handsome.
Govardhana-dhari wears a locket on His chest containing a picture of Sri
Radha. Decorated with a necklace of pearls, the beauty of
Vrajendranandana’s neck enchants the residents of the three planetary
systems. Adorned with a necklace of pearls and the Kaustubha gem, which
shines like lightning, Mukunda’s handsome chest longs to enjoy the
company of the beautiful gopis. Krsn a received His Kaustubha jewel from
the Kaliya serpent’s wives, who gave this jewel to Krsn a candra with their
own hands.
“Ornamented with bracelets and armlets, Madhupati’s arms hang down to
His knees. Gokula-candra’s reddish lotus hands are decorated with various
auspicious signs. Radha-natha’s charming abdomen is the pleasure abode
of perfection. Radha-ramana’s nectarean back seems to beg for the playful
touch of the beautiful gopis. The nectarean lotus flower that is Rasa-
bihari’s hips bewilders Cupid. Rasaraja Sri Krsn a ’s knees are verysplendid, charming and handsome. Murari’s thighs are like two beautiful
plantain trees that charm the hearts of all women.
“Madana-mohana’s charming lotus feet are decorated with jeweled
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anklebells. Syama’s naturally reddish feet reflect the radiance of roses, and
they are decorated with various auspicious markings. Govardhana-natha’s
handsome lotus feet are like two oceans filled with the happiness of pure
love. Vraja Kishor’s reddish toes are decorated with a row of full moons
that are His toenails.” (Radha-Krsn a G anoddesa-dipika)
JAI SHREE RAM
anklebells. Syama’s naturally reddish feet reflect the radiance of roses, and
they are decorated with various auspicious markings. Govardhana-natha’s
handsome lotus feet are like two oceans filled with the happiness of pure
love. Vraja Kishor’s reddish toes are decorated with a row of full moons
that are His toenails.” (Radha-Krsn a G anoddesa-dipika)
JAI SHREE RAM
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Kedarnath 79.0669°
Kalahashti 79.7037°
Ekambaranatha- Kanchi 79.7036°
Thiruvanamalai 79.0747°
Thiruvanaikaval 78.7108
Chidambaram Nataraja 79.6954°
Rameshwaram 79.3129°
Kaleshwaram N-India 79.9067°
Kalahashti 79.7037°
Ekambaranatha- Kanchi 79.7036°
Thiruvanamalai 79.0747°
Thiruvanaikaval 78.7108
Chidambaram Nataraja 79.6954°
Rameshwaram 79.3129°
Kaleshwaram N-India 79.9067°
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