Bhajan Diary (भजन डायरी)
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मत ढूंढ खुशी तू पल पल में,
हो जाती छिन्न यह हर पल में।

आनंद समाया हर क्षण में, मत ढूंढ उसे तू कण-कण में।।

*शुभ एकादशी जय श्री हरि 🙏🏻🚩*
*🌴०७ दिसम्बर २०२२ बुधवार 🌴*
*मार्गशीर्षशुक्लपक्ष चतुर्दशी२०७९*
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*👉आज व्रत की पूर्णिमा भी है ।*
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*ऋषि चिंतन*
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*अवांछनीयताएँ दूर करने हेतु*
*💪 ताकत से खड़े होइए 💪*

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👉 *अवांछनीयताएँ" व्यक्ति के स्वभाव और समाज के व्यवहार में गहराई तक घुस कर बैठ गई हैं ।* अभ्यास में उतरते-उतरते आदत बन गई हैं और स्वाभाविक ही नहीं, प्रिय भी लगती हैं । अभ्यस्त होने के कारण एक प्रकार से अवांछनीयताओं के पक्ष में समर्थन तक का उत्साह रहता है । *जो प्रिय है, उसका पक्षपात करने के लिए असंख्य प्रकार के ऐसे तर्क और कारण गढ़ लिये जाते हैं, जिनमें न यथार्थता होती है और न औचित्य ।* भ्रांतियों की दृष्टि से अगणित मूढ़ मान्यताओं, अंधविश्वासों ने मस्तिष्क पर बेतरह कब्जा कर लिया है । अवांछनीयताओं में समाज विरोधी उच्छृंखलताओं की भरमार है । अपराधों की श्रेणी में गिने जाने योग्य कार्य आये दिन होते रहते हैं । *अनैतिकताओं में ही दुष्प्रवृत्तियाँ आती हैं, जो व्यक्ति के निजी स्तर को अपनी और दूसरों की आँखों से गिराती है तथा पिछड़ी परिस्थितियों में खड़े रहने के लिए विवश करती हैं ।* वैयक्तिक अनैतिकताएँ , सामाजिक अवांछनीयताएँ और इस अनगढ़पने की निशानी मूढ़-मान्यताएँ इन दिनों चरम सीमा तक पहुँची हैं । *इनको उखाड़ना भी एक बहुत बड़ा काम है ।*
👉 कई बार विषैले फोड़े इस बुरी तरह प्रकट होते हैं कि शल्य क्रिया कराने के अतिरिक्त और कोई उपाय ही नहीं रह जाता । कठिनाई हल्की होती है तो सौम्य उपायों से काम चल जाता है । रक्त की कमी उपयुक्त आहार-विहार से पूरी की जा सकती है । *सामान्य रक्त विकार दवा-दारू से ठीक हो जाते हैं, तो कैंसर जैसे भयंकर विष-व्रण ऑपरेशन के बिना और किसी उपाय से काबू में नहीं आते ।* खोखली दाढ़ जब बे-तरह दर्द करती है तो उसे उखाड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं । *कुछ ऐसी विवशताएँ होती हैं, जिनमें कटु उपायों के अतिरिक्त सुधार की कोई संभावना ही नहीं रह जाती ।* इस स्थिति में सुधारात्मक संघर्षों की अनिवार्यता को ही शिरोधार्य करना पड़ता है । *यों सामान्य स्थिति में हर कोई शांति चाहता है और वह स्थिरता एवं प्रगति की दृष्टि से आवश्यक भी है, पर जब आक्रमणकारी तत्त्व जीवित रहना ही असंभव कर दे तो फिर उन्हें पीछे धकेलने के लिए संघर्ष जैसे कटु प्रसंगों को भी मान्यता देनी पड़ती है ।*
👉भगवान के अवतार समय-समय पर सृष्टि का संतुलन बनाने आते रहै हैं । इनमें से प्रत्येक को धर्म की स्थापना का दूसरा पक्ष अधर्म का उन्मूलन भी अपने क्रियाकलाप में सम्मिलित रखना पड़ा है । *सच तो यह है कि उनकी गतिविधियों में "धर्म-स्थापना" से अधिक भाग "अधर्म-उन्मूलन" का रहा है ।* जिन दिनों दुष्टता और भ्रष्टता अपनी चरम सीमा स्पर्श कर रही हों, उन दिनों अनीति विरोधी तेजस्विता जगाने और अनीति से लड़ पड़ने के लिए उत्तेजना भी उत्पन्न करनी पड़ती है । *आपात धर्म के रूप में वह कड़वी औषधि भी गले उतारनी पड़ती है । उद्दंडता को धमकाए बिना वह काबू में नहीं आती ।*
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युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि और रुपरेखा पृष्ठ-११
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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हम सब हनुमान चालीसा पढते हैं, सब रटा रटाया।

क्या हमे चालीसा पढते समय पता भी होता है कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं या क्या मांग रहे हैं?

बस रटा रटाया बोलते जाते हैं। आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो।

तो लीजिए पेश है श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित!!

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श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★
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बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★
📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★
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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★
📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।★
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राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥★
📯《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।★
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महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥★
📯《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।★
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कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥★
📯《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।★
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हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥★
📯《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।★
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शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥★
📯《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।★
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विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥★
📯《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।★
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प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥★
📯《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।★
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सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥★
📯《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।★
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भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥★
📯《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।★
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लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥★
📯《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।★
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रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।★
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सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥★
📯《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।★
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सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥★
📯《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।★
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जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥★
📯《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।★
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तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥★
📯《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।★
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तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥★
📯《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।★
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जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥★
📯《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।★
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प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥★
📯《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।★
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दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥★
📯《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।★
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राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।★
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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥★
📯《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।★
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आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥★
📯《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।★
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भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥★
📯《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।★
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नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥★
📯《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।★
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सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥★
📯《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।★
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और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥★
📯《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।★
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥★
📯《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।★
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साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥★
📯《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।★
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥★
📯《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।★
1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।★
2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।★
3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।★
4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।★
5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।★
6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।★
7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।★
8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।★
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राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥★
📯《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।★
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तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥★
📯《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★
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अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥★
📯《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।★
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और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।★
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संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥★
📯《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥★
📯《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।★
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जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥★
📯《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।★
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जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥★
📯《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।★
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तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥★
📯《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।★
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥★
📯《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।★
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
🌹सीता राम दुत हनुमान जी को समर्पित🌹
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🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏
कृपया आगे भी औरौं को भेजें🙏।। जय श्री राम 🙏🚩🚩🚩🚩🚩
1️⃣2️⃣1️⃣2️⃣2️⃣0️⃣2️⃣2️⃣
🌹🌹 *"सुखी रहने का तरीका* 🌹🌹
🌹💦🌹💦🌹💦🌹💦🌹💦🌹💦🌹
*एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला-*

*गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए?*

*संत बोले- मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ !*

*“मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।*

*”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!” संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले।*

*कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?*

*शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।*

*उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।*

*शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला-*

*गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”*

*“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र। अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”*

*संत तुकाराम ने प्रश्न किया।*

*“नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?*
*मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी” शिष्य तत्परता से बोला।*

*"संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।"*
*"मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।*

*शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।*

*वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं :-*

*रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है ।*
*"आइये परिवर्तन आरम्भ करें।"*
*🙏🏽🙏🏼🙏🏻जय जय श्री राधे*🙏🏿🙏🙏🏾
*📚पढ़ाई का मंत्र*
बच्‍चे को स‍िखाएं क‍ि वह जब भी पढ़ने के ल‍िए बैठे तो पूर्व दिशा की ओर ही मुंह करके बैठे और पढ़ाई शुरू करने से पहले

*'ऊं नमो भगवती सरस्वती वाग्वादिनी ब्रह्मीणी ब्रह्मस्वरूपिणी बुद्धिवादिनी मम विद्या देहि-देहि स्वाहा।*

' मंत्र का 1, 3, 5,7 या फ‍िर 11 बार यथाशक्ति और भक्ति जप करे। इसके बाद पढ़ना शुरू कर दे।
: 🔆🏵🔆🏵🔆🏵🔆🏵🔆
*ओ साँवरिया रे, एक झलक तो दिखादे,*
*अरमां मेरे प्यासे, मस्ती के दरिया सें,*
*दो चार बूंद पिला दे ।।*
🏵
तेरे मेरे रिश्ते जूने,
मुझसे तेरी आँख मिचौनी,
दिल को भाई रे हरजाई,
सूरत तेरी श्याम सलौनी,
नैना नुकीले हैं, भाव लरजीले हैं,
मस्ती को कायम बनादे ।। एक झलक तो....
🔆
घायल करके मन पंछी को,
तेरा परदे में छिप जाना,
मेरी दिवाली ओ वनमाली,
करते हो क्यों व्यर्थ बहाना,
आशा लगाई है, नजरें बिछाई हैं,
दर्दी को कुछ तो दवा दे ।। एक झलक तो....
🏵
छेड़ के मेरे अरमानों को,
तड़फाना कोई खेल नहीं है,
मन मंदिर के ठाकुर से क्या,
मेरा अपना मेल नहीं है,
जीवड़ो दुखावै क्यूँ, नैणा नचावै क्यूँ,
किश्ती किनारे लगा दे ।। एक झलक तो....
🔆
नीलवरण धारी नटवर नागर,
सागर है तूं नाथ दया का,
श्यामबहादुर लूट लिया है,
मेरा सबकुछ डाल के डाका,
'शिव' दास तेरा है, तूं मीत मेरा है,
सोया नसीबा जगा दे ।। एक झलक तो....
🔆🏵🔆
*श्रद्धेय शिवचरणजी भीमराजका द्वारा 'ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना' गीत की तर्ज़ पर रचित अनुपम रचना*
🔆🏵🔆🏵🔆🏵🔆🏵🔆
🌹॥ सुभहकी कुछ सुभाषिते ॥🌹

🙏करदर्शनम् 🙏

कराग्रे वसते लक्ष्मी : 'करमुले सरस्वती |
करमध्ये तु गोविंदं ' प्रभाते करदर्शनम् ॥

🙏 धरती माता को वंदन 🙏

समुद्र वसने देवि! पर्वत स्तन मंडले |
विष्णुःपत्नी : नमसुंभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्वमे ॥

🌹गोविंद को नमस्कार 🌹

वसुदेव सुतं देवं ' कंसचानुर मर्दनं |
देवकी परमानंदम् 'कृष्णं वंदे जगद्गुरुम ॥

🔥 सुर्यदेवता को नमस्कार 🔥

आदिदेवनम :स्तुभ्यं प्रसिदमम भास्कर |
दिवाकर : नम :स्तुभं प्रभाकर नमः स्तुते ॥
🔥 फलश्रृती 🔥
आदीतस्यनमस्कारं ये कुरवंती दिनेदिने I
जन्मातर शहस्त्रेशु नोप जाय ते ॥

🕉सात चिरंजिव 🕉

अश्वस्थामाबलीरव्यसो हनुमांसोबिभीषनः I
कृप: परशुरामश्च, सप्तैते चिरजीवीन :

पाच सती

अहल्याद्रोपदीसीता , तारा मंदोदरी तथा :
पंचकन्या स्मरेनित्यं महापात कनाशनम् ॥

💐सातमोक्षपुरी 💐

अयोध्यामथुरामाया ' काशीकांची अवंतिका |
पुरीद्वारीकाचैव सप्ततैते मोक्षदायी का : ॥

🌲 अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधी विनाशणं |
सुर्यपादोदंकंतिर्थम् जठरेधार याम्यहम् ॥🌲

👏 पुन्यश्लोको नलोराजा पुन्यश्लोको युधिष्ठिर :
पुन्यश्लोकाश्चवैदेहि पुन्यश्लोको जनार्दन : ॥👏

🌹॥श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥🌹

🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰
हर हर महादेव 🙏🏻
*🥀२५ फरवरी २०२३ शनिवार🥀*
*//फाल्गुन शुक्लपक्ष षष्ठी २०७९//*

‼️
*ऋषि चिंतन*
‼️
〰️〰️〰️🌹〰️〰️〰️
*सुघड़ व्यक्तित्व गढ़ने की पाठशाला*
*--〰️परिवार〰️ --*
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👉 *"शालीनता" पुष्प वाटिका की तरह फैलती है ।* अपनी सुगंध और शोभा से दर्शकों का मन मोहती और वातावरण को सुगंध से भरती है, उसकी सर्वत्र सराहना होती है । इसके विपरीत हेय व्यक्ति के कण-कण में घुसी हुई निकृष्टता सर्वप्रथम अपने को अप्रमाणिक, अनगढ़ एवं घृणा-तिरस्कार का भाजन बनाती है । उसके उपरांत उसके साथी सहयोगी उस संस्कार छूत से प्रभावी होते हैं । कचरा जब सड़ता है तो विषाणु से सारे प्रभाव क्षेत्र में सड़न- असहनीय दुर्गंध भरती है । *"परिवार" कैसा बन पड़ा ? इसके संबंध में यही कहा जा सकता है कि जैसा कुछ उसे बनाया गया वैसा बन गया ।* कुंती और मदालसा ने अपने स्तर का प्रजनन और परिवार बना कर खड़ा कर दिया । परिवार बनाने में कोई बुद्धिमत्ता नहीं, यह कार्य तो क्षुद्र स्तर के प्राणी कीड़े-मकोड़े भी करते रहते हैं । *मनुष्य की गरिमा यह है कि वह परिवार के साथ रहने की प्रवृत्ति-प्रेरणा को सार्थक बनाने, सीखने सिखाने का, ढलने ढालने का क्रम जारी रखें ।*
👉 सेवा का दृष्टिकोण तो विश्व व्यापक स्तर का रखा जा सकता है, पर उसे व्यवहार में चरितार्थ कर पाना अपने निकटवर्ती क्षेत्र में ही बन पड़ता है । *"परिवार" एक ऐसी संस्था है, जो बालक के जन्मने से पूर्व ही उसे सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार रहती है ।* अपनी बहुमुखी उदारता से उसे बना-बढ़ाकर लाभान्वित करती है, स्नेह देने और सुधारने सिखाने में उसकी अपने ढंग की भूमिका रहती है । *बड़े होने पर उस बालक का कर्तव्य हो जाता है कि जो अनुदान दिया गया है उसका प्रति दान देने की तैयारी करें और जब तक वह श्रृंखला पूरी तरह न बन पड़े तब तक नए उत्तरदायित्व अपने अपने ऊपर ओढ़ने का दुस्साहस न करें ।* यह उऋणता मात्र भोजन वस्त्र जैसी सुविधाएंँ जुटा देने भर से पूरी नहीं हो जाती वरन्
यह अपेक्षा रखती है कि अधिक *"सुसंस्कृत'* बनकर अपने परिवार का सदस्य उस भावनात्मक विभूतियों से उन्हें लाभान्वित करें, जो सच्चे अर्थों में किसी को प्रामाणिक, प्रतिभावान और सुसंस्कृत बनाती है । *परिवार की खदान भले "कोयले" जैसी रही हो पर उसमें से प्राणवान प्रतिभाओं को तो "हीरा" बन कर ही निकलना चाहिए । कीचड़ में "कमल" खिल सकते हैं, सीपियों में "मोती" बन सकते हैं तो कोई कारण नहीं है कि सामान्यतया अनगढ़ परिस्थितियों वाले परिवार में भी उच्च स्तरीय प्रतिभाएँ न जग सकें --इस सुयोग का बन पड़ना ही "पारिवारिकता" की उपलब्धि है ।*
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*परिवार को सुव्यवस्थित कैसे बनाएँ ?पृष्ठ-१९*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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*🥀//२९ जून २०२३ गुरुवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्षएकादशी २०८०//*
*👉 आज .................*
*🧑‍🎤देवशयनी एकादशी है*
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*ऋषि चिंतन*
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*हम "सभ्य" व "शिष्ट बनें *
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👉 "शिष्टाचार" और "सभ्यता" का बड़ा निकट संबंध है। *हम यह भी कह सकते हैं कि बिना "शिष्टाचार" के मनुष्य "सभ्य" कहला ही नहीं सकता और जो व्यक्ति वास्तव में "सभ्य" होगा उसमें "शिष्टाचार" की प्रवृत्ति स्वभावतः पाई जाएगी।* सभ्य पुरुष ऐसी प्रत्येक बात से अपने आपको बचाने का प्रयत्न करता है, जो दूसरों के मन को क्लेश पहुँचाने या उनमें चिढ़ या खीझ उत्पन्न करे। मनुष्य को समाज में अनेक प्रकार की प्रकृति या स्वभाव वाले मनुष्यों से संसर्ग पड़ता है। कहीं उसका मतभेद होता है, कहीं भावों में संघर्ष होता है, कहीं उसे शंका होती है, कहीं उसे उदासी, आक्षेप, प्रतिरोध या ऐसे ही अन्यान्य भावों का सामना करना पड़ता है। *"सभ्य" पुरुष का कर्त्तव्य ऐसे सब अवसरों पर अपने आपको संयम में रख सब के साथ "शिष्ट" व्यवहार करना है।* उसकी आँखें उपस्थित समाज में चारों ओर होती हैं। *वह संकोचशील व्यक्तियों के साथ अधिक नम्र रहता है। और मूर्खों का भी समाज में उपहास नहीं करता।* वह किसी मनुष्य से बात करते समय उसके पूर्व संबंध की स्मृति रखता है ताकि दूसरा व्यक्ति यह नहीं समझे कि वह उसे भूला हुआ है। *वह ऐसे वाद-विवाद के प्रसंगों से बचता है जो दूसरों के चित्त में खीझ उत्पन्न करें।* जान-बूझकर संभाषण में अपने आपको प्रमुख आकृति नहीं बनाना चाहता और न वार्तालाप में अपनी थकावट व्यक्त करता है। *उसके भाषण और वाणी में मिठास होती है और अपनी प्रशंसा को वह अत्यंत संकोच के साथ ग्रहण करता है।* जब तक कोई बाध्य न करे वह अपने विषय में मुख नहीं खोलता और किसी आक्षेप का भी अनावश्यक उत्तर नहीं देता। *अपनी निंदा पर वह कान नहीं देता न किसी से व्यर्थ हमला मोल लेता है।* दूसरों की नीयत पर हमला करने का दुष्कृत्य वह कभी नहीं करता, बल्कि जहाँ तक बनता है, दूसरों के भावों का अच्छा अर्थ बैठाने का यत्न करता है। यदि झगड़े का कोई कारण उपस्थित हो भी जावे तो वह अपने मन की नीचता कभी नहीं दिखाता।
👉 *वह किसी बात का अनुचित लाभ नहीं उठाता और ऐसी कोई बात मुँह से नहीं निकालता जिसे प्रमाणित करने को वह तैयार न हो।* वह प्रत्येक बात में दूरदर्शी और अग्रसोची होता है। वह बात-बात में अपने अपमान की कल्पना नहीं करता, अपने प्रति की गई बुराइयों को स्मरण नहीं रखता और किसी के दुर्भाव का बदला चुकाने का भाव नहीं रखता। *दार्शनिक सिद्धांतों के विषय में वह गंभीर और त्याग मनोवृत्ति वाला होता है।* वह चर्चा या वादविवाद में दूसरे लोगों की लचर दलीलें, तीक्ष्ण व्यंग्य या अनुचित आक्षेपों से परेशान नहीं होता बल्कि मृदु हास्य के साथ उन्हें टाल देता है। *अपने विचार में सही हो या गलत, परंतु वह उन्हें सदा स्पष्ट रूप में रखता है और जानबूझकर उनका मिथ्या समर्थन या जिद नहीं करता।* वह अपने आपको लघु रूप में प्रकट करता है, पर अपनी क्षुद्रता नहीं दर्शाता । वह मानवी दुर्बलताओं को जानता है और इस कारण उसे क्षमा की दृष्टि से देखता है। अपने विचारों की भिन्नता या उग्रता के कारण वह सज्जन पुरुषों व दूसरों का मजाक नहीं उड़ाता। *दूसरों के विचारों, सिद्धांतों और मन्तव्यों का वह उचित आदर करता है।*
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*"शिष्टाचार" और "सहयोग" पृष्ठ-२०*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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