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चलिए जरा बताइए तो कि 19-20 नवंबर 2026 के लिए अभी आप कितना तैयार हैं?
Anonymous Poll
47%
कुछ समझ नहीं आ रहा है क्या करें?
26%
तैयारी बहुत जोर शोर से चल रही है
22%
योजना बना रहे हैं कैसे क्या करूँ
10%
तैयारी पूरी हो चुकी है
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एक लड़की थी जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश सचिवालय में समीक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत है। उसका पिछले 10 वर्ष में कोई प्रीलिम नहीं निकला था। जब वह हमारे संपर्क में आई तब उसे समीक्षा अधिकारी का एग्जाम देना था तो हमने उसको कुछ ट्रिक बताई थीं जिसके चलते उसकी समीक्षा अधिकारी पद के लिए चयन हो गया। रिजल्ट से पहले ही उससे संपर्क टूट गया था उसके बाद हमने देखा उसने अनेक बार पीसीएस का एग्जाम दिया लेकिन उसका फिर पीसीएस का प्रिलिम भी नहीं निकला। कहने का अर्थ यह है कि गुरु जिस परीक्षा के लिए ट्रिक बताते हैं वह उसी परीक्षा के लिए होती है। ऐसा नहीं होता है कि समीक्षा अधिकारी बन गए हो तो फिर पीसीएस भी हो जाओगे। असिस्टेंट प्रोफेसर के संबंध में भी अब पीसीएस जैसी ही रणनीति लागू होती है क्योंकि यहाँ पर भी नेगेटिव मार्किंग लग चुकी है। नेगेटिव मार्किंग बहुत अच्छी चीज है। मेधावी छात्रों के लिए नेगेटिव मार्किंग सकारात्मक परिणाम देती है बस थोड़ी सावधानी रखनी होती है।
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असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षार्थी ग्रुप
चलिए जरा बताइए तो कि 19-20 नवंबर 2026 के लिए अभी आप कितना तैयार हैं?
पोल में पहले और तीसरे ऑप्शन को चुनने वाले सही रास्ते पर हैं।
दूसरे ऑप्शन को चुनने वाले स्प्रिंट और मैराथन के अंतर को समझें।
चौथे ऑप्शन वालों को कॉलेज और कॉम्पीटिशन के अंतर जानने की जरूरत है।
डॉ. सुनील
पी-एच.डी., यूजीसी (नेट)
जय श्री कृष्ण!
दूसरे ऑप्शन को चुनने वाले स्प्रिंट और मैराथन के अंतर को समझें।
चौथे ऑप्शन वालों को कॉलेज और कॉम्पीटिशन के अंतर जानने की जरूरत है।
डॉ. सुनील
पी-एच.डी., यूजीसी (नेट)
जय श्री कृष्ण!
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असिस्टेंट प्रोफेसर विज्ञापन संख्या 51 की जो परीक्षा दोबारा हुई थी उसके विषय में हम अपना एक अनुभव पहले भी वीडियो में बता चुके हैं। यह घटना बड़ी रोचक थी इसलिए उसको दोबारा यहाँ पर लिख देते हैं। परीक्षा कक्ष में हमारे साथ सीट पर बैठे हुए एक छात्र ने हमारे विषय में जानने की इच्छा व्यक्ति की तो हमने कहा कि यह बात करने का समय नहीं है लेकिन जैसा आप पूछ रहे हैं तो हम अपने विषय में कुछ बता देते हैं। उसके बाद उन्होंने पूछा कि तैयारी कैसे करनी चाहिए तो हमने उन्हें कुछ तरीके बताए। उन्होंने पूछा क्या हम परीक्षा में उनकी कुछ सहायता कर सकते हैं तो हमने कहा ऐसा करना संभव नहीं है। हमने उन्हें समझाया कि अब आप हमसे कोई बात मत करिए। परीक्षा के बाद ही आपसे बात होगी। उसके बाद प्रश्न पत्र बँट गया और हमने उनसे जो चर्चा की थी उसमें से कुछ प्रश्न सीधे तौर पर पेपर में आए। परीक्षा के बाद वह हमसे बाहर मिले तो उन्होंने अपनी बेटी से कहा कि सर के पैर छुओ तो हमने कहा यह क्या कर रहे हो तो कहने लगे कि सर जैसा आपने पढ़ने का तरीका बताया है वह तो बहुत ही प्रभावी है और उसका प्रमाण मैंने स्वयं देख लिया है। आप मुझे अपना नंबर देने की कृपा करिए जिससे मैं आपसे आगे गाइडेंस ले सकूँ। एक छोटा सा किस्सा जो रोचक होने के साथ भावुक करने वाला भी है जिसमें कोई स्टूडेंट अपनी बेटी से कहता है कि सर के पैर छुओ। हमने उन्हें पैर छूने से रोक दिया था और अपना नंबर दे दिया था कि आप आगे कॉल कर सकते हैं। उन्होंने हमारा नंबर एक पर्ची पर लिखा था और हमें लगता है वह पर्ची खो गई होगी।
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व्यक्ति को प्रारब्ध के अनुसार चलना चाहिए और ऐसा करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिए। इसमें थोड़ा ट्विस्ट है कि व्यक्ति को ईमानदार रहना चाहिए और छल कपट से दूर रहना चाहिए और जब आप ऐसा करेंगे तो आज नहीं तो कल स्थिति आपके फेवर में अवश्य होगी। हमारी एक बात सदैव याद रखना कि मोड़ बदलने से रास्ते नहीं बदलते हैं। अधिक मोड़ आपको निखारते हैं, परिष्कृत करते हैं ताकि आप मुख्य रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ सकें और उस चीज को हिट कर सकें जो दूसरों के लिए एक स्वप्न है।
डॉ. सुनील
पी-एच.डी., यूजीसी (नेट)
जय श्री कृष्ण!
डॉ. सुनील
पी-एच.डी., यूजीसी (नेट)
जय श्री कृष्ण!
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#karwachauth2026 के संबंध में मेरे विचार नीचे दिए गए ट्विटर अकाउंट @DrSunilPhD पर जाकर पढ़ सकते हैं।
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असिस्टेंट प्रोफेसर विज्ञापन संख्या 4/2026 की परीक्षा के लिए समय बहुत सीमित रह गया है। आज 9 बोरे में रखी गई पुस्तकों में से काम की पुस्तकों को छाँटकर अलग किया गया। लेबर ने बताया कि प्रत्येक बोरे का वजन लगभग 50-60 kg के आसपास था तो लगभग 5 से 6 हजार पुस्तकों में से 200 पुस्तकों को निकाल लिया गया है। हम पुस्तकों को अलमारी में रखते हैं किंतु 3 महीना पहले घर के पुनर्निमाण हेतु पुस्तकों को अलमारी से बोरे में रख दिया गया था जिससे वह गंदी न हो जाएँ।
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ढंग से पढ़ने के लिए इतने दिन बहुत होते हैं। वैसे जिन्हें ढंग नहीं पता है उनके लिए तो साल भर भी कम है।
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भूलवश अगर कोई गलती हो जाए तो उसके सकारात्मक उपचार का प्रथम चरण है गलती को स्वीकार करना चाहिए न कि आनंद की अनुभूति मानकर उसका विस्तार किया जाए क्योंकि एक बार गर्त में पहुँचने पर वापस ऊपर आना संभव नहीं होता है।
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