काम–ज़िंदगी संतुलन with Sanjay ⚖️
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work, deadlines, family… और बीच में तू कहाँ है? ⚖️

रोज़ की भागदौड़ के बीच ये चैनल छोटी-छोटी सच वाली notes हैं काम–ज़िंदगी संतुलन पर: थकान को पहचानना, guilt थोड़ा कम करना और अपने लिए जगह बनाना. 🧘
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डेडलाइन strong, शरीर background ⏱️

आज सुबह lab से third बार reminder आया था — “test reports pending, please schedule your visit.” मैंने फोन देखा, calendar में client call और बच्चों का school event already भरा था, और सोचा, “अभी इसके लिए time कहाँ है, बाद में देख लेंगे।” शाम को हल्का सा chest tight लगा, पर मैंने खुद को समझा लिया, “शायद बस थकान है, थोड़ा rest के बाद ठीक हो जाएगा।” 🩹

धीरे-धीरे हम अपने health को silent mode पर डाल देते हैं। office के deadlines और घर की responsibilities को हम तुरंत respond करते हैं, पर same urgency कभी अपने body के signal के लिए नहीं रखते — महीनों से चल रहा दर्द, लगातार acidity, सिरदर्द जो हर week आता है, सबको हम “normal” नाम दे देते हैं। 🤒 अंदर कहीं guilt भी होता है कि “अगर अब doctor के चक्कर लगाऊँगा तो काम कौन करेगा, बच्चों का क्या होगा,” और ऐसे में जो सबसे ज़्यादा हमें need करता है, वही body सबसे पीछे की queue में चला जाता है।

⚖️ डेडलाइन miss होना कभी-कभी ठीक हो सकता है, पर अपने health के signal miss करना धीरे-धीरे बहुत महंगा पड़ जाता है।

आज बस इतना सा step try कर सकते हो: अपने week के calendar में किसी एक दिन के लिए health का छोटा सा slot block कर लो — test, check-up या कम से कम doctor से online consult — और उसके साथ वही respect रखो जो client meeting के साथ रखते हो: “reschedule last option।” ये छोटा सा appointment future वाले तुम्हारे लिए सबसे बड़ा support बन सकता है। 🩺

Sanjay · संतुलन 🧘
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कभी-कभी सबसे “spiritual” काम बस इतना होता है: फोन बंद करो और सो जाओ। नींद कोई आलस नहीं, healing है।
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नींद की जगह EMI का हिसाब 🌙

आज रात बिस्तर पर लेटा था, कमरे में light off थी, पर दिमाग पूरी तरह on था। तकिए पर सिर रखते ही mind ने अपना calculator खोल लिया — इतने EMI, इतनी school fees, अगले महीने की rent, फिर किसी शादी, किसी festival का extra खर्च… ऐसा लग रहा था जैसे रात की ख़ामोशी सिर्फ numbers से भर गई हो। 💵

समस्या ये है कि दिन भर की थकान के बाद दिमाग को rest चाहिए होता है, पर हम उसे रात में भी excel sheet बना देते हैं। हर “ये कहाँ से आएगा?” वाला सवाल body में छोटी-छोटी tension पैदा करता है, सांस हल्की हो जाती है, और हम सोचते रहते हैं कि “मैं अच्छा provider तभी हूँ जब हर चीज़ manage करूँ,” जबकि उसी time हमारा nervous system help के लिए चिल्ला रहा होता है।

⚖️ रात को सारे खर्च गिनना problem हल कम करता है, थकान और guilt ज़्यादा बढ़ा देता है।

आज बस इतना सा step try कर सकते हो: अपने लिए दिन में एक छोटा सा “money time” fix कर लो — 20–30 मिनट जब तुम budget, EMI और fees की planning करो — और जैसे ही वो slot खत्म हो, रात को बिस्तर पर जाते समय सिर्फ एक line बोलो, “आज के लिए हिसाब यहीं तक।” बाकी जो चिंता बचे, उसे कल के उस slot पर छोड़ दो, ताकि आज की रात कम से कम तुम्हारे सोने की रहे। 📒

Sanjay · संतुलन 🧘
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आराम, जो हमेशा justify करना पड़ता है 🧾

आज शाम office से लौटकर मैं बस थोड़ी देर bed पर लेटना चाहता था। उसी समय एक दोस्त ने call करके पूछा, “चल movie चलते हैं, तू भी थोड़ा switch off हो जा।” मेरे मुँह से खुद-ब-खुद निकल गया, “यार, आज तो कुछ ख़ास achieve ही नहीं किया, आराम किस बात का?”

धीरे धीरे हम rest को भी bonus की तरह treat करने लगते हैं, जैसे ये सिर्फ़ तब allowed हो जब सारे boxes tick हो जाएँ। अगर दिन perfect न हो, तो हम खुद को punishment देते हैं: “आज तो output कम था, अभी आराम का हक़ नहीं है।” अंदर से शरीर और दिमाग signal भेजते रहते हैं कि energy low हो रही है, पर हम तब तक उन्हें ignore करते हैं जब तक system सच में down न होने लगे। 🔋

⚖️ आराम कोई reward नहीं, तुम्हारे काम की तरह ही तुम्हारी basic ज़रूरत है।

आज एक छोटा सा step try कर सकते हो: हफ़्ते में किसी एक शाम के calendar में पहले से एक छोटा सा “rest slot” block कर लो, चाहे walk हो, music हो या बस चुपचाप बैठना, और उस पर caption लिखो “मुझे ज़रूरत है”, “मैंने deserve किया” नहीं। जब तुम इसे उतनी ही serious से रखोगे जितना कोई meeting, तुम्हारा शरीर भी धीरे धीरे यही message मानने लगेगा। 🛋️

Sanjay · संतुलन 🧘
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सीधी सी बात करें आज 🌙

रात को औसतन आप कितने घंटे सो पाते हैं? ईमानदारी से vote करें—यहाँ कोई judgement नहीं, बस समझना है हम सब कितने थके हुए चल रहे हैं।
Anonymous Poll
18%
5 घंटे से कम
33%
5 से 6 घंटे
33%
7 से 8 घंटे
15%
8 घंटे से ज़्यादा
124😭35👌17👍14🔥13🤪10😁5👏3🥰2
मीटिंगों के बीच छोटी खुशियाँ 😊

आज सुबह office पहुँचा तो calendar already back to back meetings से भरा था। बीच में पाँच मिनट का gap था, मैंने जल्दी से chai ली और खिड़की के पास खड़ा हो गया, हल्की धूप table पर गिर रही थी, नीचे garden में बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी। एक colleague ने पास से जाते हुए छोटी सी joke की, और एक पल के लिए लगा जैसे दिन थोड़ा हल्का हो गया।

अक्सर हम इन micro-joy वाले moments को notice ही नहीं करते, क्योंकि दिमाग पूरे दिन बस यही scan करता रहता है कि कहाँ risk है, किस task में problem है, अगला mail क्या trouble ला सकता है। mind threat पर zoom करता है, और छोटी सी मुस्कान, अच्छा सा song या गर्म chai की first sip background में चली जाती है, जैसे उनकी कोई value ही नहीं हो।

⚖️ छोटी खुशियाँ दिन को बड़ा नहीं दिखाती, लेकिन दिल को गिरने से जरूर बचाती हैं।

आज एक छोटा सा step try कर सकते हो: पूरे दिन में बस तीन ऐसे tiny moments को consciously पकड़ना, जैसे अच्छी chai, किसी का thank you, या मीटिंग के बीच पाँच शांत साँसें, और मन में quietly कहना "ये मेरे आज का छोटा सहारा है"। धीरे धीरे दिमाग सीख जाएगा कि tension के साथ साथ आराम की छोटी जेबें भी होती हैं, जो तुम्हारे ही लिए रखी गई हैं। 📒

Sanjay · संतुलन 🧘
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Work-life balance कोई super-skill नहीं है। यह रोज़ का छोटा सा “बस, आज के लिए काफी” है। खुद को समय देना भी काम है।
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खिलौने, बच्चा और busy phone 🧸

आज शाम घर आकर मैं floor पर बैठा था, बेटे ने blocks और छोटी car निकाल ली थी। हम दोनों मिलकर tower बना रहे थे कि तभी phone vibrate हुआ, office group में किसी ने tagging करके question भेज दिया। मैंने एक हाथ से car पकड़ी रखी, दूसरे हाथ से जल्दी से “just a sec” लिखकर reply करने लगा, और बच्चे ने पूछा, “पापा, आप game खेल रहे हो या phone देख रहे हो?” 🎈

धीरे धीरे ये habit बन जाती है कि हम बच्चों के साथ भी आधे time office में रहते हैं। शरीर तो उनके सामने होता है, पर mind अभी भी Jira, mails और “कल की meeting में क्या होगा” में अटका रहता है। अंदर से guilt भी आता है कि “मैं काम ignore नहीं कर सकता और बच्चे को भी ना नहीं बोल सकता”, और नतीजा यह होता है कि किसी एक के साथ भी पूरा नहीं होते, खुद के अंदर भी हमेशा थोड़ा सा खालीपन रह जाता है।

⚖️ बच्चे को पूरे time की ज़रूरत नहीं, उसे बस कुछ ऐसे moments चाहिए जहाँ आप सच में सिर्फ उसके साथ हों, किसी screen के नहीं।

आज एक छोटा सा step try कर सकते हो: बच्चे के साथ खेलने से पहले खुद के लिए सिर्फ पंद्रह मिनट की “phone-free play” decide कर लो, उस time के लिए mobile दूसरे कमरे में रख दो या silent पर रखकर उल्टा कर दो, और बस उसके toys, उसकी आवाज़ और अपनी हंसी पर ध्यान दो। बाकी chats थोड़ी देर रुक जाएँगी, पर ये पंद्रह मिनट उसके दिल में बहुत देर तक रहेंगे। 🧩

Sanjay · संतुलन 🧘
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आधा burnout तब शुरू होता है, जब दूसरों की उम्मीदें तुम्हारी क्षमता से आगे दौड़ती हैं। अपनी सीमा कहना कमजोरी नहीं, self-respect है। आज बस इतना ही, enough।
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भीड़ में बैठा दिल अकेला 🌊

आज office के open-space में चारों तरफ लोग थे, keyboard की आवाज़, laugh, calls, सब कुछ normal चल रहा था, पर मेरे headphone के पीछे अजीब सी खामोशी थी। शाम को घर आया तो टीवी चल रहा था, family पास बैठी थी, small talk हो रही थी, पर भीतर ऐसा लग रहा था जैसे किसी से सच में यह पूछने की जगह ही नहीं कि दिल कैसा है। 🏠

कभी कभी अकेलापन लोगों की कमी से नहीं, connection की कमी से होता है। हम दिन भर smile और हल्की मस्ती में बातें करते रहते हैं 🙂 लेकिन किसी के साथ बैठे बैठे भी ये महसूस होता है कि अगर मैं अपनी असली थकान या डर बोल दूँ तो माहौल भारी हो जाएगा, इसलिए बस same हल्का version दिखाते रहते हैं और अंदर की आवाज़ थोड़ी थोड़ी mute हो जाती है।

⚖️ अकेलापन तब सबसे ज़्यादा चुभता है जब हम हर जगह हैं लेकिन कहीं भी सच में दिख नहीं रहे होते।

आज एक छोटा सा step try कर सकते हो: किसी safe से लगने वाले इंसान को choose करके बस इतना कहना कि "यार, आज मैं थोड़ा honest रहना चाहता हूँ, सुनोगे", या फिर रात को खुद के लिए दो lines diary में लिख देना कि सच में कैसा महसूस हो रहा है। धीरे धीरे तुम्हारा दिल खुद को फिर से किसी के सामने लाने की हिम्मत महसूस करेगा। 📓

Sanjay · संतुलन 🧘
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पूरा दिन दुनिया को जवाब देते-देते, रात तक हम खुद से बात करना भूल जाते हैं। आज 2 मिनट रुककर पूछो: मैं ठीक हूँ? That’s enough.
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कमज़ोर नहीं, बस सीमा दिख रही है 😟

आज one-on-one से पहले मैं meeting room के बाहर बैठा था, सामने laptop पर sprint board खुला था। हर नई task के सामने मेरा ही नाम चमक रहा था, manager corridor से आते दिखे, और दिल की धड़कन थोड़ी तेज़ हो गई, जैसे अभी पूछने वाले हों "और ये भी ले लोगे ना?" पर मुँह से निकलने वाला जवाब पहले से ready था: "हाँ, कर लेंगे"। 💼

अंदर से सच ये है कि load पहले से ही ज़्यादा है, पर हम help माँगने को खुद ही failure का proof बना लेते हैं। बचपन से सुनते आए हैं "strong बनो", "किसी के भरोसे मत रहो", इसलिए जब भी मन में आता है कि "मैं नहीं संभाल पा रहा", साथ ही एक और आवाज़ उठती है कि "तुम्हीं कमजोर हो, बाकी तो manage कर लेते हैं"। इस डर में हम अपनी limit छुपाते रहते हैं और धीरे धीरे वही limit दीवार बनकर सामने खड़ी हो जाती है।

⚖️ मैनेजर से "मैं नहीं संभाल पा रहा" कहना हार नहीं, काम को लंबे समय तक चलने लायक बनाने का पहला कदम है।

आज एक छोटा सा step try कर सकते हो: अगले one-on-one में पहले ही line तैयार करके जाना, जैसे "मुझे अपने काम की quality और health दोनों बचानी है, अभी वाली workload मेरे लिए sustainable नहीं लग रही, क्या हम priorities और expectations को थोड़ा साफ़ कर सकते हैं?" फिर कुछ minutes बस चुप रहकर manager की बात सुनना और मिलकर दो तीन clear कट बदलाव लिख लेना। यह छोटी सी ईमानदारी कल के लिए तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। 📋

Sanjay · संतुलन 🧘
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अगर तुम्हें लगता है कि “सब कुछ” सिर्फ तुम ही संभाल रहे हो, तो शायद समस्या system नहीं है। शायद सीमा बोलने की आदत छूट गई है। Start small, one “no” at a time.
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पूरे दिन व्यस्त, अंदर से खाली 📋

आज सुबह से ही laptop के सामने बैठा था, back to back mails, calls और छोटे छोटे tasks की list थी। हर काम के बाद to-do के बगल में छोटा सा tick लगा रहा था, स्क्रीन पर दिन भर हरे निशान बढ़ते गए। शाम तक सब checkbox लगभग भर गए, पर भीतर से लगा जैसे आज भी अपने लिए कुछ नहीं किया, बस battery और थोड़ा drain हो गई। 🧾

धीरे धीरे हम busy रहने को ही productive मानने लगते हैं। mind को आदत पड़ जाती है कि जब तक कोई task चल रहा है, तभी मैं useful हूँ, और जैसे ही खाली दस मिनट मिलते हैं, तुरंत phone उठा कर scroll, अगली list, अगला काम ढूँढ लेते हैं। अंदर कहीं यह डर रहता है कि अगर आज अपने लिए time निकाला, तो शायद मैं कम मेहनती दिखूँगा, इसलिए दिन किसी और के लिए पूरा हो जाता है, और अपने लिए zero बचता है। 🧠

⚖️ भरा हुआ schedule और भरी हुई ज़िंदगी एक ही बात नहीं हैं।

आज एक छोटा सा step try कर सकते हो: अपनी to-do list के अंत में सिर्फ एक line अपने नाम की जोड़ दो, जैसे "20 मिनट सिर्फ मेरे लिए" और उसमें कुछ भी रखो जो काम से बाहर हो, walk, music, किताब या बस खिड़की के पास बैठना। दिन खत्म होने से पहले बाकी सब ticks से ज्यादा एक यही छोटा सा tick देख कर दिल को याद रहेगा कि आज तुमने अपने लिए भी थोड़ी जगह बनाई। 📖

Sanjay · संतुलन 🧘
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ऑफिस से घर वाला रूप बदलना 🚪

शाम को office से लौटते हुए local से उतरकर society के gate तक धीरे धीरे चल रहा था। बैग कंधे पर था, दिमाग में दिन की आख़िरी stand-up घूम रही थी, mobile में अभी भी work वाले notifications चमक रहे थे। दरवाज़ा खोलते ही बच्चे ने पकड़ लिया, family ने पूछा कि दिन कैसा था, पर अंदर से लगा कि मेरा mind अभी भी half office में ही खड़ा है। 🚶‍♂️

बहुत बार ऐसा होता है कि शरीर तो open-space से निकल कर drawing room तक पहुँच जाता है, लेकिन nervous system को कोई साफ़ signal नहीं मिलता कि अब role बदल गया है। पूरे दिन की urgency और target वाला tone शाम तक साथ चिपका रहता है, इस लिए हम घर पर भी जल्दी irritate हो जाते हैं या TV और phone पर खोए रहते हैं, जैसे काम अभी भी खत्म ही नहीं हुआ। 🧠

⚖️ छोटे छोटे transition rituals दिमाग को यह समझाने का तरीका हैं कि अब मुख्य किरदार "ऑफिस वाला मैं" नहीं, "घर वाला मैं" है।

आज से एक छोटा सा step try कर सकते हो: society के gate के बाद पाँच मिनट की slow walk लेना, या घर पहुँच कर सबसे पहले नहा कर कपड़े बदलना और फिर balcony में खड़े होकर तीन गहरी साँसें लेकर खुद से कहना कि अब मैं काम से नहीं, अपने लोगों से जुड़ रहा हूँ। यह छोटा सा pause दिन को बंद करने का switch बन सकता है। 🛁

Sanjay · संतुलन 🧘
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खुद को pause देना आलस नहीं है। यह maintenance है, जैसे मशीन को oil चाहिए होता है। आराम तुम्हारी productivity का दुश्मन नहीं।
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शाम का hobby, दिल का बोझ 🎵

ऑफिस से लौटकर घर आता हूँ तो calendar में पहले से लिखा होता है "gym 40 mins" या "guitar practice"। कपड़े बदलते ही hand अपने आप phone की तरफ़ जाता है, reminder पॉप अप होता है और mind बोलता है, "चलो, ये वाला task भी पूरा कर लेते हैं"। कुछ देर बाद महसूस होता है कि body workout कर रही है, पर दिल बस एक और checkbox पूरा करने में लगा है। 🧱

धीरे धीरे hobby भी daily performance का हिस्सा बन जाता है। music हो या gym, दिमाग हर चीज़ का हिसाब रखने लगता है - कितने reps हुए, कितने minutes हुए, कितना progress हुआ - और अगर एक दिन miss हो जाए तो अंदर guilt ऐसा आता है जैसे किसी client डिलीवरी में delay हो गया हो। 🎧 जिस चीज़ ने थकान हल्की करनी थी, वही चीज़ खुद pressure का नया source बन जाती है, और खेल की जगह competition जैसा feel होने लगता है।

⚖️ जिस hobby ने तुम्हें ज़िंदा महसूस करवाना था, अगर वही रोज़ test जैसा लगने लगे, तो formula बदलने का time आ गया है।

आज से एक छोटा सा step try कर सकते हो: हफ्ते में कम से कम एक दिन hobby को पूरी तरह "no target day" बना दो - ना reps गिनना, ना minutes, बस पाँच-दस मिनट के लिए ऐसे play या move करना जैसे बचपन में करते थे, सिर्फ मज़े के लिए। उस दिन का एक ही सवाल रखना, "क्या अच्छा लगा", "कितना achieve किया" नहीं 🎨

Sanjay · संतुलन 🧘
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सुबह की शुरुआत की बात करें आज 🌞

सुबह उठते ही सबसे पहले तुम्हारे हाथ किस तरफ़ जाते हैं? ईमानदारी से vote करो, बस इतना समझना है हमारा दिन ज़्यादा खुद से शुरू होता है या screens से। ⚖️
Anonymous Poll
55%
फोन / notifications
12%
चाय या coffee
19%
प्रार्थना / meditation / थोड़ा silence
5%
सीधा laptop / काम
4%
बच्चे / family time
6%
कुछ और (comment में लिखूँगा)
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सुपरहीरो मोड, दिल पर बोझ 🛡️

शाम को office से लौटकर घर पहुँचता हूँ तो दोनो तरफ़ से calls और आवाज़ें आती हैं। mobile पर team पूछ रही होती है "ये issue तुम देख लोगे न?", kitchen से आवाज़ आती है "gas की payment तुमने की थी क्या?", बच्चा homework लेकर बैठा होता है कि "ये वाला sum समझा दो"। हर तरफ़ नज़रें बस इसी expectation के साथ लगी होती हैं कि last में सब कुछ तुम ही संभाल लोगे।

अंदर एक पुरानी belief बैठी रहती है कि अगर मैंने नहीं उठाया तो सब बिखर जाएगा। "ना" बोलने की जगह हम खुद को और stretch करते जाते हैं, किसी से help माँगने की सोचते ही guilt आता है कि मैं ही कमजोर हूँ। धीरे धीरे mind हर जगह fire-fighter बन जाता है, और दिल के लिए कोई corner नहीं बचता जहाँ वह बस normal इंसान की तरह थक भी सके और रुक भी सके। 🧠

⚖️ घर और office दोनों को संभालना strength है, लेकिन सब कुछ अकेले उठाना धीरे धीरे उसी strength को अंदर से खा जाता है।

आज से एक छोटा सा step try कर सकते हो: office में एक task और घर में एक काम चुनकर consciously किसी और के साथ share करना, और साफ़ बोलना "मुझे इसमें मदद चाहिए"। शुरुआत में थोड़ा अजीब लगेगा, पर जैसे जैसे load बाँटना सीखोगे, वैसे वैसे तुम्हारी energy और रिश्ते दोनों थोड़ा हल्के महसूस होने लगेंगे। 🧺

Sanjay · संतुलन 🧘
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अगर एक ही काम के बाद तुम हर बार चुप होकर लौटते हो, तो वहाँ कुछ बदलना ज़रूरी है। थकान सिर्फ शरीर की नहीं होती, मन भी बोलता है। Listen to it.
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