प्रातः संध्या सत्संग | Morning Sandhya Satsang
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सत्संग की प्राप्ति होना महापुण्यों का फल है और सत्संग का त्याग महापापों का फल है।
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🥀💠❣️

📍*11.08.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
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*1.* ✨️ *समय का सदुपयोग*

मनुष्य जन्म बहुत कीमती है 🥀। हर क्षण का सदुपयोग करो। अच्छी जगह में बैठना, अच्छा सोचना, अच्छा करना ही असली सदुपयोग है 🌊

*2.* 🌊 *परमात्मा का घर हृदय है* 🌌

सबसे अच्छी जगह वो है जहाँ परमात्मा बसता है। वो विशेष रूप से हृदय में प्रकट होता है 💠
_ईश्वरो सर्वभूतानां हृदय से अर्जुन तिष्ठति_

*3.* 🍯 *जीभ जैसा अनुभव* 🔍

सुख-दुख बाहर होते हैं पर अनुभव हृदय में होता है। हृदय में टिक जाओ तो तुरंत पहचान जाओगे - ये विषय का सुख है या भगवान का सुख 🍯

*4.* 🥀 *लालिया और कालिया के स्वामी बनो* 🐾

सुख = लालिया और दुख = कालिया। ये हमारे पाले हुए हैं। इनसे डरकर मत भागो, इनके स्वामी बन जाओ 🪨

*5.* 🪨 *परम एकांत* 🕊️

असली एकांत है सब विचारों का "एक" में अंत हो जाना। आँखें अनेक देखती हैं पर देखने वाला "मैं" एक ही हूँ ✨️। उसी साक्षी में रहो।

*6.* 📍 *शरीर से पृथक रहो* 🌬️

_तन धरिया कोई ना सुखी देखा, जो देखा सो दुखिया रे_
शरीर, मन, सुख-दुख सब आने-जाने वाले हैं 📍। इनसे चिपकोगे तो दुख नहीं छूटेगा।

*7.* ✨️ *तुम पूर्ण हो* 🪔

सुखी होने के लिए न वस्तु, न समय, न जगह चाहिए। तुम आत्मदेव की जगह पहुँच जाओ, वहाँ सब सुलभ है 🌹

*सत्संग का सार*

🌊 बाहर की दुनिया में सुख-दुख आते-जाते रहेंगे।
💠 असली शांति हृदय में परमात्मा के साथ टिकने से मिलती है।
🪔 जब तुम साक्षी बनकर लालिया-कालिया के स्वामी बन जाओगे,
🌹 तब समझ जाओगे - तुम्हें पूर्ण होने के लिए कुछ चाहिए ही नहीं।

🙏🙏🕉️
Audio
सुबह संध्या सत्संग -12-08-2026.mp3
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🌹 *12.08.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन* 🏵️

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*उदर चिंता प्रिय चर्चा विरहीना संभारणा*
*स्व स्वरूपे स्थिर था ए बधा सहजै टळे।*

✨️उदर की चिंता प्रिय व्यक्ति की चर्चा जिसका वियोग हो गया उस स्त्री की यादें ये सब तुम्हारी वही समाप्त हो जाएगी अगर तुम अपनी सीट पर आ जाते हो। हमको परिस्थितियां उस लिए कुचलती है कि हम अपनी सीट पर नहीं तब आप आत्मा में डट जाओ। विपरीत से विपरीत परिस्थिति महान दुख की परिस्थिति आपको दुख नहीं दे सके। सुख में बदल जाए। आपका महान विरोधी महान शत्रु आप अगर आत्मा में डट जाते हैं तो शत्रु की बुद्धि बदल जाएगी और बुद्धि नहीं बदल दी तो प्रकृति उसको अपने ढंग से घुमा घुमा के दे घुमा घुमा के दे ऐसे हाल कर देगी कि उसका कुल में कोई रोने वाला नहीं बचेगा। ऐसा प्रकृति तुम्हारी सेवा में लगती है।

✨️मैं जरा इन शत्रुओं से निपट लूं फिर आराम से भजन करूंगा नहीं कभी नहीं होगा। शत्रुओं से निपट कर भजन नहीं होगा मित्रों से मिलने के बाद भजन नहीं होगा सेफ डिपॉजिट करके फिर आराम से भजन नहीं होगा भजन तो अभी चलते फिरते तुम पवित्र जगह पर बैठ जाओ बस और यह बैठने की कला जहां तुमको ठीक लगे जो जगह तुमको सपोर्ट देती हो मदद देती हो उसका थोड़ा उपयोग कर लो लेकिन बाद में बाद में तुम्हें पता चलेगा कि तो अरे राम..वो अनपढ़ लड़का भैंसे चराता था जब उसको थोड़ा सा उत्साह मिला और हिम्मत किया हो गया महाराज पढ़ते हुए एस एस सी..अब उसको पूछो कि तुम पहला पहले पहले तुम आए थे और 10 के आंकड़े लिखने में तुमने इंकार करा था बड़ा कठिन है तो अभी आपको तो कठिन लगता होगा 1000 लिखना है 1999 पैसा लिखना है अब तो आपके लिए बड़ा कठिन होगा बोले नहीं नहीं सरल है तो पहले कठिन मानते थे बोले मैं बेवकूफ था तब फिर अपनी बेवकूफी पे उसको हंसी आएगी

✨️ऐसे आप यह मेरी बात थोड़ी सी है प्रार्थना स्वीकार कर ले अपने में जम जाए तो बीता हुआ जीवन आपको बेवकूफी का लगेगा जो गुजर गई जिंदगी वो नितांत बेवकूफी की लगेगी कि अरे इतना महान खजाना मेरे पास था और मैं क्या कर रहा था इतना सरल उपाय था सुख दुख में सम रहो तो ज्ञान हो जाए ज्ञान हुआ तो अनंत ब्रह्मांड में तुम्हारी सत्ता फैल जाती इतने महान खजाना था मुझे मैं गिड़गिड़ा रहा था हे देवी तू दया करे फलानी तू दया करे हे दया करे संतोषी तू दया करे सब गिड़गिड़ाट बेवकूफी के थे

आपे लाडा आपे लाडी आपे मैया हो फकीरा
आपे अल्लाह हो
साथ में अरस तेरा नूर चमकता तू उससे भी ऊंचा हो फकीरा आपे अल्लाह हो
खुला तेनु भावन खांदे लिख लिख कैद ना हो

✨️तू खुला हो जा अपने स्वरूप में जग जा छुप छुप के कैद मत हो शरीर में मन में घुस के बैठ अरे तुम बाहर निकल आता है दुख तो बोले हां आओ क्या है कालिया क्या है भो भो करके और और दे और और लालिया कहता था कि और दे कब तक करोगे मैं देखने वाला हूं और तुम करने वाला हो देखने वाला थकता है कि करने वाला थकता है बोलो.. कोई आदमी दो कुश्ती कर रहे हैं आप कुश्ती में नहीं घुसते आप खाली देखते हैं तो कौन थकेगा आप थकेंगे कि वो बेटे थकेंगे सीधी बात है दो आदमी कुश्ती कर रहे हैं. लालिया कालिया कुश्ती कर रहा है दो पहलवान है समझो कुश्ती कर रहे हैं कभी तो एक पहलवान गिरता है कभी दूसरा गिरता है कालिया गिरता है तो लालिया की जीत होती है और लालिया गिरता गिरता है तो कालिया की जीत होती है आप उनमें शामिल नहीं होते आप खाली खड़े हैं तो थकेगा कौन ये बताओ खाली वो करने वाले थके गए कि देखने वाला थकेगा हैं सीधी बात है बस अपने को कर्ता नहीं मानो अपने को दृष्टा बना लो करने वाला तो ये मन है शरीर है ये जो नरकों का सामान बना रहे हैं या स्वर्ग का सामान बना रहे हैं ये तो तन और मन है इनके चेष्टा को आप देखोगे ये थक जाएंगे फिर तुम्हारे शरण हो जाएंगे

✨️*जिसने तन मन को वश कर लिया हो तो भगवान हो गया वो तो नारायण का अंग है कमजोर विचार को शत्रु समझ के काट डालो जो दुर्बल विचार आए उसको कुचल दो*

✨️*दुर्बलता के विचार कभी सत्य नहीं हो सकते घृणा के विचार है उसी समय उनको उखेड़ दो मैं नहीं कर सकता हूं ऐसा विचार आए तो उस वक्त पिस्तौल रखो अपने हृदय को दुर्बल विचार आए ज्ञान की पिस्तौल धर ओम ओम उसी बोली है 303 भी कुछ नहीं ये ऐसी 303 तो एक जन्म को एक शरीर को गिराएगी ये तो करोड़ों शरीर मिलने वाले उनको सबको गिराने का ओम के मंत्र में ताकत है*

✨️ओम का गुंजन करके फिर चुप हो जाओ फिर देखो मन क्या सोचता है या तो सुख सुख को पाने की इच्छा करेगा या तो दुख को धकेलने की इच्छा करेगा तो दोनों की इच्छाओं को देखो तुम इच्छाएं शांत हो गई सुख दुख दोनों भाग जाएगा आत्म प्रगट होता जाएगा
✨️अढ़ाई सेकंड के लिए भी निर्विचार दशा आ गई वही आत्मा है उन्होंने ढके हुए लील से ढके हुए पत्तों से ढके हुए सरोवर को को जरा पत्ते हटाकर कमल के पत्तों को हटाकर पानी का आचमन ले लिया पूरे सरोवर का ज्ञान हो गया चाहे फिर ढक भी जाए तो क्या तुम्हारा ज्ञान तो नहीं ढका मन के बुद्धि के निर्णयों को निकाल को देखने वाला मैं अलग हूं अलग होते साक्षी भाव में मन को खाली देखते रहोगे ना तभी भी शांत हो जाएगा अथवा तो मैं कौन हूं ऐसा सोचते सोचते मैं कौन हूं करते करते गहरे चले जाओगे तो जो मैं मैं मैं नादानी से मैं मैं चल रहा था देह में और मन में वो हट जाएगा असली स्वरूप में कौन हूं पूछोगे तो असली स्वरूप के तरफ मन को आना पड़ेगा वहां शांत हो जाएगा निर्विचार अवस्था आ जाएगी आप जो है वो फिर दिखेगा नहीं आप जो है वो हो जाएंगे दिखेगा तो तुम्हारे से अलग होगा वो दिखेगा तुम्हारे से जो पृथक होता वही दिखता है

✨️जिससे सब जाना जाता है उसको किससे जानोगे जिससे सबको जाना जाता है उसको किससे जानोगे और वो भी अगर जानकारी में आ गया तो उसको जानने वाला दूसरा होगा तो अपना आपा जानने में नहीं आता कई लोग बोलते अनुभव होवे मेरा आत्मा का दर्शन होवे मेरा आत्मा देखूं आत्मा कोई लड्डू पकोड़ा है कोई शिरा पूरी है कोई गुलाब जामुन है कि उसको देखेगा जो देखने में आ गया वो सब दृश्य हो गया जो देखने वाला है वही तुम है वही आत्मा है

✨️जिसने सुख को देखा उसने दुख को देखा जिसने रूप को देखा उसी ने रस को देखा जिसने रस को देखा उसने गंध को देखा जिसने जागृत को देखा उसने स्वप्न को देखा जिसने स्वप्न को देखा उसने सुसुप्त को देखा जिसने बचपन को देखा उसी ने जवानी को देखा बचपन गई जवानी गई सुसुप्त गई जागृत गई स्वप्न गया कई जन्मों में मृत्यु आई वो मृत्यु गई कई बार जन्म हुआ वे जन्म गए अभी की अवस्थाएं आई और गई देखने वाला गए नहीं उस देखने वाले में अगर डटने की कला आ गई..

✨️*ढूंढन हार नु ढूंढ मता होइ होइ यार तेरा सच्चा* खोजने वाले को खोज लो जो सुख को खोज रहा है उसको जरा ढूंढ नहीं तो महाराज एक तो दुकान क्या एक मकान क्या एक कार तो क्या डजन कार डजन बंगले डजन डजन महल मिल जाए फिर भी शांति नहीं सुख नहीं सार नहीं एक लालिया कालिया तो क्या हजार लालिया कालिया इकट्ठा कर दो उससे क्या जब तुम उनसे डरते फिरोगे तो परेशानी हो जाएगी लालिया काले का स्वामी हो जाओ वो तुम्हारे विनोद के लिए है ये सुख दुख के प्रसंग तुम्हारे विनोद के लिए है ये खेल मात्र है

*तमाम दुनिया है खेल मेरा मैं खेल सबको खिला रहा*

ऐसा अनुभव करो और जैसा एक शरीर में तुम बैठे हो ऐसे दूसरे शरीरों में भी जिस सत्ता से आंख देखती है तुम्हारी उसी सत्ता से सबके आंख देखती गाय की भैंस की मनुष्य के पशु पक्षी की जिस सत्ता से तुम्हारी आंख में चमक है उसी सत्ता से सूर्य में चमक है यहां जीरो का बल्ब है वहां अरबों का बल्ब है सत्ता वही की वही तो अनुभव करते ज्ञानवान..के सूर्य हो के मैं तप रहा हूं चंद्रमा होकर चांदनी दे रहा हूं मनुष्य होकर लीला कर रहा हूं कहीं योगी बना हूं कहीं त्यागी बना हूं कहीं भोगी बना हूं कहीं तपस्वी बना हूं

✨️जैसे हाथ पैर सिर नाक कान पेट छाती पीठ ऐसा तुमको लगा कि अरे ये सब क्या है अलग अलग है ये सब क्या है ऐसा तुमको लगा अपने शरीर का हाथ पैर अपने अलग अलग अंग को देखकर तुमको कभी भय हुआ ये सब क्या है अरे ये पेड़ पांच उंगली ये क्या है ऐसा कभी सोचा अरे सब हमारे है सब मैं ही हूं पांच उंगली पैरों के पांच हाथों की हाथों की सब मैं ही हूं पेट वेट देख के कभी डरे क्या ये क्या है नाक देख के कभी डरे बाल देख के कभी डरे ये सब क्या अब बाल सिर के बाल में और मूछों के बाल में फर्क मूछों के बाल में दाढ़ी के बालों में फर्क तुम्हारे नाक में और तुम्हारे पैर में एकतत्व नहीं है फर्क है ना नाक का शेप अलग है पैर का शेप अलग है हाथ अलग है तो पीठ का शेप अलग है पीठ पीठ और पेट दोनों का अलग-अलग क्षेत्र है...

✨️इस तमाम अलगाव में भी तुमको कभी होता है कि ये मैं अलग-अलग हूं सब मिला के मैं ठीक है ना ऐसे ज्ञानी को अनंत ब्रह्मांड मिलाकर मैं पने का अनुभव होता है जैसे तुम्हारे भिन्न भिन्न अंग भिन्न भिन्न चेष्टा करने वाले आंख जो आंख देखेगी कान नहीं देख सकते कान सुनते हैं तो नाक सुन नहीं सकता नाक सूंघता है तो जीभ सूंघ नहीं सकती तो ये अलग अलग काम करते हैं सब..सब तुम्हारे हैं सब तुम ही हो ऐसे अलग अलग लोक लोकांतर में सत्ताओं में व्यवहारिक जगत में अलग अलग विषयों के अलग अलग निपुण लोग हैं लेकिन वो सब मेरे ही अंग है ऐसा ज्ञानी को अनुभव जैसे तुम नदी को देखते हो निशंक होकर नदी को देखकर ऐसा थोड़े होता है कि अरे ये मेरे पीछे भागेगी पकड़ लेगी या मेरे को खा जाएगी ऐसा कभी डर लगा नदी को निशंक होकर देखते हो पेड़ पौधों को सूर्य को चांद को नक्षत्रों को निशंक हो के देखते हो ऐसे ही प्रत्येक व्यक्तियों को प्रत्येक दुनिया
को निशंक होकर देखे उसके लिए हानि करने वाला का विचार बदल जाएगा

✨️*कोई भी घटना घटे और दुख हो रहा है तो समझ लेना कि कचरा पेटी के नजदीक बैठे हैं कचरा पेटी में बैठे हैं नजदीक नहीं कचरा पेटी में बैठे हैं जब भी दुख हो जब भी भय हो जब भी चिंता हो तो ये बात तो पक्की है कि कचरा पेटी में बैठे अब कचरा पेटी में बैठे ऐसा याद आ गया ना निकल आओगे जय राम जी की*

✨️जब दुख आया चिंता आया भय आया ये सब कचरा पेटी में बैठने का फल है अच्छा तू बैठ मनीराम कचरा पेटी में बैठ तू...तुरंत अंदर से हंसी निकले...

✨️*दुनिया की कोई चीज बिगड़ जाए तो कोई हरकत नहीं अपना ज्ञान नहीं बिगड़ना चाहिए अपनी समझ नहीं बिगड़नी चाहिए सब देकर भी अपनी समझ बढ़ती है तो सौदा सस्ता है और सब लेकर भी अपनी समझ का दिवाला होता है आपका ज्ञान आपकी समझ आपका हृदय आपके साथ चलेगा रुपए पैसे पति पत्नी परिवार बच्चे साथ में नहीं चले आपका अंदर का हृदय आपका साथ चले कृपा करके अपने हृदय को दुर्बल नहीं होने दो अपने हृदय को मलीन नहीं होने दो जो साथ चलेगा वही बैठो फिर बाहर क्या बैठना*

✨️अपने हृदय में बैठो फिर तुम जहां बैठोगे वहां आश्रम बन जाएगा अपने हृदय में जो महापुरुष बैठे वो बयाबान में आके बैठे तो वहां भी आश्रम बन गया बनाया नहीं गया है बन गया है और जो बनाने पीछे लग गए उनका बनता भी नहीं और बनता है तो माथे पोटले होते टेंशन होता है नो बर्डन नो पोटला नो टेंशन

*मम दिल मस्त सदा तुम रहना आन पड़े सो सहना* *आतम नशे में देह भुलाकर साक्षी होकर रहना*
*मम दिल मस्त सदा तुम रहना आन पड़े सो सहना*

कोई दिन घी गुड़ मौज उड़ाना
तो कोई दिन भूखा रहना
कोई दिन गाड़ी कोई दिन वाड़ी
कब शमशान जगाना
रे मस्त सदा दिल रहना
आन पड़े

✨️मस्त सदा दिल रहना ऐसा नहीं मस्त सदा ढोसा रहना इडली में मस्त रहना इसमें मस्ती नहीं है मस्ती तुम्हारे दिल में है तुम्हारा दिल प्रसन्न है तो कंतान की चदरिया सुखी रोटी जरा सी सब्जी या चटनी खाओगे तभी भी आनंद रहेगा और तुम अगर दिल में नहीं रह रहे हो एयर कंडीशन कमरा है आइसक्रीम के कप पड़े हैं तैयार टीवी अपना रंग जमा रही है रेडियो अपनी पायल बजा रहा है *वात वात मा जा में रंग जो होए तो अपने संग अपने साथ हो जा अपने साथ आप समझे पोतानी साथे रयो अपने साथ रहो* दूसरों का महल दुखता ही दूसरों के साथ नहीं रहो अपने साथ रहो..स्वामी जी अपने साथ हम लोग कुछ लोग तो समझते हैं लेकिन जो नए नए है ना वो लोग नहीं समझते अपने साथ मतलब अपना जो आत्मा है जो मन के बुद्धि के शरीर के सब अवस्थाओं के सबके व्यवहार को जो जानता है मैं मैं मैं उस मैं में रहो अब उधर घुसे कैसे अरे घुसे हुए हो वही हो तुम दूसरे जगत को सच्चा नहीं मानो तो वही हो तुम कहीं कहीं जाना नहीं है कोई इन पैरों से अंदर हृदय में घुसना नहीं है..वही तो हो लेकिन विचारों से बाहर आ जाते बाहर की घटनाओं से उनको सच मान के बाहर के बहकाव में आ जाते

✨️हे राम जी जैसे गरुड़ को देखकर सर्प भागता है और फिर निकट नहीं आता वैसे ही ज्ञान रूपी गरुड़ को देखकर भोग रूपी सर्प भागते हैं .. अब वशिष्ठ जी को मैंने रिश्वत तो नहीं दिया था लिया था कि मैं सत्संग करूं आप भी ऐसे ही बोलना शास्त्र वशिष्ठ जी को रिश्वत तो नहीं दिया मैंने वशिष्ठ जी भी ज्ञान की महिमा करते आप राम जी को पूजते हैं तो राम जी ज्ञानी थे कि अज्ञानी थे..ज्ञानी थे.
कृष्ण को पूजते तो कृष्ण ज्ञानी थे कि अज्ञानी थे जब भागवत को नमस्कार करते तो भागवत बनाया वेदव्यास ने.. वेद व्यास थे कि अज्ञानी थे। तो ज्ञानियों के वचनों को आप पूजते हैं कि नहीं पूजते?
और ग्रंथ साहिब बना.. तो जिन्होंने बनाया वो ज्ञानी थे कि अज्ञानी थे? तो सिख कौम ग्रंथ साहिब को पूजती है। ज्ञानी ने बनाया। तो ज्ञानी के जो वचन है उनकी इतनी पूजा होती तो तुमको ज्ञानी बनने में तुम्हारा घाटा क्या है?

✨️कामी को राम के रस का पता नहीं चल सकता। लोभी को रुपयों से बढ़कर ईश्वर नहीं दिख सकता। और ईश्वर की पूजा करेगा वो भी तो रुपयों के लिए करो। हे भगवान, तू दया करो.. रुपए तेरा बाप ले गया, तेरा दादा ले गया, अब तू बाकी है ले जाने। बोले स्वामी जी, व्यवहार में तो धंधा रुपया होगा तभी तो जिएंगे, तभी तो करेंगे। ओहो, वो धंधा का रुपयों का मना नहीं लेकिन उन रुपयों में बैठो मत। ये रुपयों में बैठने की जगह नहीं, रुपयों में मोह होगा, मोह होना ही बैठना है, उनमें प्रीति हो जाना ही बैठना है। तो फिर तिजोरी में चिपकली बनके आना पड़ेगा। और बैंक में रखोगे तो बैंक में छछुंदर या चूहा अथवा कोई मच्छर होकर, कीड़ा होकर लटकना पड़ेगा। इसीलिए तुम बैठो तो ईश्वर में।
✨️*शरीर से यथा योग्य परोपकार का दूसरों की भलाई का काम करो। क्योंकि जला देना है शरीर को जिसको जला देना है वो किसी के काम आ जाए, अच्छी बात है।* वो भी बराबर शास्त्र मर्यादा के अनुकूल किसी के काम आ जाए तो बोले चलो हमारे साथ पिक्चर में आपके गुरुजी ने तो कहा है। चलो आप लोग हमारे साथ पिक्चर में। ये जरा मेरा इतना थैला उठा लो, दारू का बोतल उठा के चलो, शरीर तो आपका जल जाएगा मेरे काम में आ जाएगा, ऐसा नहीं। शास्त्र अनुकूल हो, मर्यादा अनुकूल हो, आपकी सामर्थ्य हो, आपकी योग्यता हो, आपकी सामर्थ्य हो, आप कर सकते हैं तो फिर इनकार नहीं करो। शास्त्र अनुकूल है, आप कर सकते हैं तो करो। करते हुए भी अपने को करता मत मानो, इन्होंने किया ,शरीर ने किया । प्रकृति में हुआ। सब भागा जा रहा है, सब अतीत में जा रहा है। देखते-देखते सब स्वप्न हो रहा है। अब ये देखते-देखते स्वप्न हो रहा है उसको स्वप्ने को स्वप्ना समझने में कठिन क्या है ये बताओ। देखते-देखते स्वप्ना हो रहा है, आप स्वप्ने में पिक्चर में आप बैठे हैं, एक आदमी आ रहा है, हाथ में लड्डू की थाली लेकर, दूसरे हाथ में रसगुल्ले और आपको इशारे देते थे कि आओ, आओ, आओ, आओ। आप सीट छोड़ के उसके पीछे लगेंगे कि खाली देखेंगे?बताओ। हां?देखेंगे ना?मजा लेंगे देखने का। और दूसरा आदमी आंखें दिखा रहा है और हाथ में तलवार ले आ रहा है, लगाने को भागा आ रहा है पर्दे पर से, तो आप सीट छोड़ के भागेंगे कि सीट पे बैठे-बैठे उसको भी देखेंगे?..देखेंगे। उसमें मजा है ना?

✨️तो मैं वही तो बोल रहा हूं। अब वो हमारा कोई नया ज्ञान नहीं है। कोई कठिन है क्या? हम वही तो बोलता हूं। तो अपने सीट पे आत्मभाव में तुम बैठे-बैठे आने वाले सुख को भी देखो, जाने वाले सुख-दुख को भी देखो, सुख को भी वो तो जा ही रहा है। जैसे पर्दे पर से चित्र जा रहे हैं ऐसे सब घटनाएं जा तो रही है। मारो जे कुंवारो छे, कुंवारो छे, क्यारे थई?

*मेरो चिंत्यो होत नाई, हरि को चिंत्यो होय*
*हरि चिंत्यो हरि करे, में रहुं निश्चिंत।*

✨️*तुम अपने स्वरूप में निश्चिंत रहो फिर देखो कैसे सब ठीक चलता है। मारुं जरा प्रमोशननुं पती जाय तो ए चिंता छे। ए सब झंझटबाजी में मत पड़..अच्छी जगह पे बैठो बस। आज का सत्संग क्या है अच्छी जगह पे बैठो। अच्छी जगह कोनसी? इंदौर है अच्छी जगह?भोपाल ?अहमदाबाद अच्छी जगह है? आश्रम अच्छी जगह है?है?नहीं? खराब जगह है? जहा अच्छी जगह की एड्रेस मिलती है वो भी थोड़ी देर के लिए तो अच्छी जगह माननी। अच्छी जगह का एड्रेस मिलता है आश्रम में।जय रामजी की। जय रामजी की।अच्छी जगह का एड्रेस मिलता है। इसलिए ये अच्छी जगह है।*

ओम ओम ओम

✨️*तो जैसे गरुड़ को देखकर सर्प भाग जाते हैं, ऐसे ज्ञान रूपी गारुड़ी मंत्र से दुःख भाग जाते हैं, पाप भाग जाते हैं।*

✨️अभी ज्ञान हो जाए, भगवान का दर्शन हो जाए ऐसा नहीं है लेकिन सुनते-सुनते पाप कटते जा रहे हैं।बेवकूफी दूर चली जा रही है। शांति आ रही है, आनंद आ रहा है। थोड़ा आ रहा है, आ रहा है ऐसे करके जत्था होगा ने घड़े में पानी पड़ता है थोड़ा-थोड़ा तो एक दिन भर जाता है। ऐसे ज्ञान पड़ते-पड़ते-पड़ते आनंद आते-आते भर जाएगा।
ये छलकेगा।

✨️ज्ञानी अपने आप में नहीं समाता जो छलकता है ने उसके छलकने का सारे संसार को आनंद आ जाता है।जिनके बीच वो बोलता है उनको तो आता है लेकिन चुप में बैठा-बैठा छलकता है तो हवाओं के द्वारा न जाने कितने आत्माओं को तृप्त कर देता है।
तो वो बड़ा परोपकार का नाम है। नहीं? ज्ञानी जैसा और कोई परोपकार कर भी नहीं सकता। जिन्हों ने अपना उपकार नहीं किया वो दूसरों का क्या करेंगे?

✨️*बड़े में बड़ा परोपकार है कि आप अपने पवित्र जगह में आ जाओ, ठीक जगह पे आ जाओ बस। फिर जो भी तुम्हारे द्वारा होगा वो ठीक हो जाएगा। तुम्हारे द्वारा जो भी काम होंगे ठीक होंगे, बिल्कुल आलीशान।परम सुखी हो जाओगे तो सुख के लिए तो कुछ तुमको धुप्पलबाजी तो करनी नहीं पड़ेगी।*

✨️*सुख छलकेगा तो क्या करोगे?सुख बांटोगे?और सुख बांटने से घटता कभी नहीं।*

*राम नाम के कारणे सब धन दीनो खोई*
*मूरख जानो घटि गयो दिन-दिन डूनो होय।*

🙏🙏🕉️
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📍*12.08.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
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🧘‍♀️ *अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ*💥

उदर की चिंता, प्रियजनों की याद, दुख-सुख – ये सब अपने आप समाप्त हो जाते हैं जब हम आत्मा में टिक जाते हैं।

🔥 *कर्ता नहीं, दृष्टा बनो*🤌

मन और शरीर ही सब करते हैं, तुम केवल देखने वाले हो। देखने वाला कभी थकता नहीं, करने वाला थक जाता है।

*भजन अभी करो, बाद में नहीं*✊️

परिस्थितियाँ ठीक हों तब भजन करेंगे – ऐसा कभी नहीं होगा। भजन तो अभी, इसी क्षण करना है।

💪 *दुर्बल विचारों को खत्म करो*⛔️

“मैं नहीं कर सकता” जैसे विचार शत्रु हैं। उन्हें ज्ञान और “ॐ” की शक्ति से समाप्त करो।

🕉️ *निर्विचार अवस्था ही आत्मा है*🛐

कुछ क्षण के लिए भी मन शांत हो जाए तो आत्मा का अनुभव होने लगता है।

👁️ *साक्षी भाव अपनाओ*🔥

सुख-दुख, जीत-हार – सबको एक खेल की तरह देखो। तुम उससे अलग हो।

🌍 *सारा जगत एक ही सत्ता है*🌠

जिस शक्ति से तुम देखते हो, वही शक्ति सबमें है – मनुष्य, पशु, सूर्य, चंद्रमा सबमें।

🗑️ *दुख का मतलब* – गलत जगह बैठे हो

जब भी चिंता, भय या दुख आए – समझो “कचरा पेटी” में बैठे हो। तुरंत अपने आत्मभाव में लौट आओगे ।

💖 *ज्ञान सबसे बड़ा धन है*💰

दुनिया की चीज़ें बिगड़ जाएँ तो कोई बात नहीं, लेकिन अपनी समझ और ज्ञान नहीं बिगड़ना चाहिए।

🏡 *अपने हृदय में बैठो*💖

जब तुम अपने अंदर टिक जाते हो, जहाँ भी बैठोगे वही आश्रम बन जाएगा।

🌈 *जीवन एक खेल है*📍

सुख-दुख, लाभ-हानि – सब एक खेल है। इसे हंसकर, साक्षी बनकर देखो।

*सबसे बड़ा परोपकार*
👉 अपने सही स्थान (आत्मा) में स्थित हो जाना ही सबसे बड़ा उपकार है।

💥*अंतिम संदेश*📍

🌹*सुख बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर है।*
🧘‍♀️*जब तुम अपने आप में टिक जाओगे* –
🪔*तो आनंद अपने आप छलकने लगेगा*… 💫

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🌹 *13.08.25* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन* 🏵️

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✨️दुखी हो जाना इससे आपकी आत्मिक उन्नति रुक जाती है। शरीर की सेवा कर रहे हो अपने आप की सेवा करो भाई साहब। अमनी भाव की साधना जो आज मैंने बताई आपको बहुत उत्तम साधना है, बहुत स्वाभाविक सरलता से आप कर सको ऐसा साधन। और हजारों हजारों तपस्या कर ले, हजारों साल शीर्षासन की तपस्या कर ले फिर भी इस साधन के आगे वो तपस्या छोटी हो जाएगी। ये वो साधन है।

✨️व्रत उपवास नियम मनुष्य के आनंद को, ज्ञान को, बुद्धि को शुद्ध करता है। व्रतेन दीक्षामापनोति। व्रत उपवास से जीवन में दृढ़ता आएगी, संकल्प में बल आएगा। श्रद्धा और श्रद्धा से सत्य स्वरूप अपने मैं को पहचान लेंगे। शरीर आपका सत्य नहीं है, शरीर छूट जाएगा। दुख सत्य नहीं है, सुख सत्य नहीं है। लेकिन दुख सुख जिससे आ आकर चले जाता है वो चैतन्य परमात्मा तुम्हारा आत्मा सत्य है। उस सत्य स्वरूप में विश्रांति पाने के लिए अमनी भाव की साधना बड़ी सरल है। अमनी भाव की साधना मन अपने मन की प्रसन्नता में अनुकूलता में जो प्रसन्नता आए, प्रतिकूलता में जो दुख आए वहां सम हो जाओ। सावधान। ये हो गया आखिर क्या?
ये मिल गया आखिर क्या? ये पा लिया आखिर क्या?

✨️तो संसार की जरा जरा सफलताओं में हर्षित हो जाना और विफलताओं में दुखी हो जाना इससे आपकी आत्मिक उन्नति रुक जाती है। श्री कृष्ण के उस पवित्र वचनों को आप समझ लो।

*मामनुस्मर युध्य च।*

✨️मुझ चैतन्य परमात्मा का स्मरण करो और युद्ध जैसे घोर कर्म करते हुए भी मुक्ति पा सकते हैं हरदम। स्मृति अपने भगवत सत्ता की रखो। रजोगुणी व्यवहार संसार में भटकाएगा। तमोगुणी व्यवहार और स्वभाव नीच योनियों में ले जाएगा। सत्वगुणी स्वभाव ऊंचे लोकों में जाएगा। और सत्वगुण से भी पार छलांग मारने का अगर ब्रह्मज्ञानी गुरु की कृपा और उपदेश मिल जाए तो वही अमनी भाव को प्राप्त हो गए। फिर रजोगुण, तमोगुण और सत्वगुण ये सब माया के हैं, शरीर भी माया है। इस माया में जिस परमेश्वर तत्व की सत्ता है वो मेरा सोहम स्वरूप। अविनाशी पद पाया। दुनिया का सारा वैभव एक आदमी को मिल जाए दुखों से अंत नहीं होगा। सारी कुर्सी पद एक आदमी के आधीन हो जाए दुखों से अंत नहीं होगा। दुखों से अंत होगा निर्दुख नारायण में अमनी भाव की प्राप्ति। कितनी डिग्रियां ले लो, कितने पैसे इकट्ठे कर लो। कितने मित्र और सहेलियां और सखे बना लो, आखिर क्या?

*कबीरा इस जग आइके, बहुत से कीने मीत।*
*जिन दिल बाँधा एक से, वे सोए निश्चिंत॥*

✨️उस एक आत्मदेव से जिसकी सत्ता से आंख देख रही है। जिसकी सत्ता से कान सुनते हैं, मन सोचता है, बुद्धि निर्णय करती है। निर्णय बदल जाते हैं, मन के संकल्प विकल्प बदल जाते हैं फिर भी जो नहीं बदलता उस अपने आप को थोड़ा पहचानने का संकल्प ही करो। युधिष्ठिर कहते हैं भीष्म पितामह को दादा जी मनुष्य को कौन से दोष त्याग करने चाहिए?किन दोषों को बुद्धि से शिथिल करना चाहिए?

✨️कौन दोष बार बार आ जाते हैं और कौन मोह वश फलहीन हो जाना पड़ता है? बुद्धिमान पुरुष किन दोषों के बला बल का विचार करें। भीष्म जी कहते हैं मनुष्य सत्वगुण का संपादन करें। अगर सत्वगुण नहीं आएगा तो रजोगुण में लोभ, लालच, मोह, चिंता आदि बढ़ जाती है। तमोगुण में भी लोभ की अति और दीनता की अति हो जाती है, मूढ़ता। तमोगुण लोभ और दीनता और मूढ़ता दे देता है। रजोगुण भी विषय विकार की तृप्ति के लिए दीनता में ही गिरा देता है। सत्वगुण दैन्यों से पार करता है।

*प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।*

✨️प्राणायाम से, ध्यान से, सात्विक आहार से, सात्विक ग्रंथों से सत्वगुण की वृद्धि का उपाय जानकर मनुष्य को शीघ्र सत्वगुण बढ़ा लेना चाहिए। हमको सत्वगुण बढ़ाने के समय जो भला हुआ और जो खजाना मिला वो बांटते बांटते इतनी उम्र हो गई अभी खुटा नहीं। 40 दिन में एकांत में रहे। सात्विक दुग्ध आहार, जप और ध्यान दूसरा किसी से बात वार्तालाप नहीं। ऐसे सत्वगुण में प्रभाव और ऐसे खजानों के कुंजियां आवे हाथ में कि वो खजाने खोलते जाओ, बांटते जाओ खुटता नहीं। मैं चाहता हूं कि कुछ सच्चे साधक उत्तम अगर पांच, 25 अथवा 100, 200, 500 साधक ज्यादा नहीं। ऐसी जगह पर उनके रखें और हम भी ऐसे ही मस्ती में रहे। अरे दाएं हाथ का खेल हो जाए। रोगों की निवृत्ति और दिव्यता की प्राप्ति दाएं हाथ का खेल। जैसे भोजन में सातत्य होने से भोजन बन जाता है ऐसे ही साधना में सत्व में सातत्य होने से काम बन जाता है। इतनी मजदूरी कर करके जो जो मिला है वो तो संभाल संभाल के मर जाओ। लेकिन वहां कोई मजदूरियां नहीं और जो मिलता है बिना संभाले संभला रहता है। इसलिए मैं आम सत्संग में भी कहता हूं कि दो चार बच्चों को जन्म दिया, दो चार मकान, दुकान, फैक्ट्रियां कर ली ये मनुष्य जीवन का फल नहीं है मैया। संसार के बोझ और तनाव में तनते तनते, सुकड़ते
सुकड़ते, खिलते सुकड़ते खप जाने के लिए तो मानव जन्म नहीं हुआ है।

*घट में है, सूझे नहीं, नालथ ऐसे जीव।*
*तुलसी ऐसे जीव को, भयो मोतियाबिंद॥*

✨️घट में है सारे दुखों का अंत करने वाला और परम पद उस परमात्मदेव को नहीं जानता है और जो नहीं रहेगा छूट जाएगा उसी को पकड़ पकड़ के सुखी होने की बेवकूफी में खपा जा रहा है सारा संसार। जो पहले नहीं था और बाद में नहीं हो जाएगा उस शरीर और संबंधों के पीछे खपे जा रहा है। जो पहले था, शरीर के पहले था, अभी है, बाद में रहेगा। जिसकी सत्ता से ही शरीर का अस्तित्व दिखता है उसके लिए अगर कमर नहीं कसता है तो समझो उसके आंतरिक नेत्रों को मोतियाबिंद हो गया है। घट में है तुलसीदास जी के वचन है। घट में है सूझे नहीं नालत ऐसे जिंद। ये भी करुणा करके जैसे बच्चे को बुरी आदत से बचाना है तो बच्चे के व्यर्थ जीवन से उसको मोड़ना है तो मां बाप कठोर शब्द बोलते हैं ऐसे ही संत तुलसीदास ने कठोर शब्द का उपयोग किया है। ये भी कृपा है उनकी। नालत दी है। जो संसार में सुख ढूंढते ढूंढते मर जाते हैं उनको नालत दी है तुलसीदास ने। सच्चा सुख अपने घट में है उसको छोड़कर बाहर जो सुखी होकर डॉलर कमाकर सुखी होंगे, मकान बनाकर सुखी होंगे, ऐसा बनाकर ऐसी परिस्थिति रचकर फिर सुखी बनेंगे ऐसे सभी लोगों को संत प्रवर महान महात्मा तुलसीदास जी ने लाल बत्ती दिखाई। लाल आंख दिखाई कह दो। घट में है सूझे नहीं नालत ऐसे जिंद तुलसी ऐसे जीव को भयो मोतियाबिंद।

✨️व्रत उपवास में अगर संतों का संग मिल जाए तो कहना ही क्या वो व्रत उपवास स्नान करोड़ों गुना करोड़ों गुना हो जाता है समर्थ रामदास ने कहा। व्रत उपवास अगर ब्रह्मज्ञान का सत्संग में मिलता है तो कोटि गुना हो जाता है ऐसा समर्थ रामदास का वचन सार्थक है। व्रत उपवास से पुण्य होता है थोड़ा सात्विक अंश बढ़ता है। सात्विक अंश बढ़ता है तो बोलते पुण्य हुआ। रजस तमस क्षमता है तो बोले पाप नाश होता है। स्नान करने से पाप नाश होते हैं ये करने से पाप नाश मतलब रजस तमस गुण क्षमा। फिर हम खाते पीते ऐसा व्यवहार करके रजस तमस गुण ले आते हैं फिर बोले पाप नाश। अगर सतत सात्विक वातावरण में और सात्विक खानपान में रहे तो पाप करो और नाश करो, करो और नाश करो, करो नाश करो, जीवन खप जाता है। पाप होवे नहीं और पुण्य करते करते छलांग मार के ईश्वर के अनुभव में चले जाओ। वो कठिन नहीं है। जब तक मेरे को नहीं मिला था तो कठिन लग रहा था। मैंने प्रयोग नहीं किए थे तो कठिन लग रहा था। अब तो मुझे लगता है कि ईश्वर प्राप्ति जैसा सरल कोई साधना नहीं है। हाथ नहीं जमता है तो क ख ग लिखना कठिन है और हाथ जम गया तो वो बड़ी उम्र का चरवाहा जो स्कूल में पकड़ के ले गए वो भाग गया बोले मास्टर साहब मुझे छुट्टी कर दो। मास्टर ने कहा तू 10 आंकड़े लिख दे। तो छुट्टी बोले मास्टर साहब मैं तुम्हारे 10 भैंसे चरा दूं। 10 किलो अनाज पीसकर ले आऊं। लेकिन 10 आंकड़े लिखने मेरे लिए कठिन है वहां भी छोड़ दो मेरे को। तुम्हारे लिए 10 लिखना कठिन नहीं क्योंकि हाथ जम गया। उसके लिए कठिन है।

✨️जैसे वो चरवाहा था ढोर चराने वाला उसको भैंस चराना आसान है, दिन भर धूप में भटकना आसान है 10 आंकड़े क ख ग अथवा एक दो चार लिखना कठिन है। ऐसे ही नश्वर इंद्रियों में, नश्वर मन में, नश्वर बदलने वाले संसार में जीने की आदत पड़ गई, भैंस चराने की आदत पड़ गई ये सरल लग रहा है। और शाश्वत रंग में आना कठिन लग रहा है। जैसे चरवाहा को आंकड़े लिखना कठिन लग रहा था और भैंस चराना आसान है। तुम्हारे को भैंस चराना कठिन है। आंकड़े लिखना तुम्हारे लिए आसान है। क्या मैं कहता हूं 10 के आंकड़े लिखने में अथवा क ख ग 10 लिखने में क्या है? ऐसा सरल है।

*वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था*
*आता न था नजर तो नजर का कसूर था।*

ओम नजरिया मिल जाती है। अपने अनुभव की आंख खुल जाती है।

*पित्वा मोह-मयीं मदिरां संसारभूतोऽन्मत्ताः।*

✨️मोह मयी मदिरा पीकर एक दो नहीं सब उन्मत की नाई दौड़े जा रहे हैं। ये सर्टिफिकेट ले लूं, ये मकान कर लूं, ये गाड़ी ले लूं ऐसा अपडेट हो जाऊंगा, ऐसा बैंक बैलेंस कर दूंगा, ऐसा वो कर दूं कर करके सब मरे जा रहे हैं। बूढ़े हो जा रहे हैं, रिटायर हो रहे हैं, निराश हो रहे हैं, लाचार हो रहे हैं। उनको देखते हुए दूसरे जवान भी वही करे करे करे खपे जा रहे हैं। और किसी को विवेक जगता है थोड़ा सत्संग मिलता है तो लगता है कि बात तो सच्ची है फिर वो उसी माहौल में चले जाते हैं। जो आत्म सुख पाने को महत्व देना चाहिए आत्मिक अनुभव का महत्व जो होना चाहिए जीवन में वो नहीं है। जैसे कुएं में भांग पड़ी तो जो पानी पिए सब होत वाले ऐसे ही कुएं में भांग पड़ी कलयुग में। सब प्रश्न कर रहे हैं बापू जी आशीर्वाद करो मैं तुम्हारी सेवा करूं, तुम्हारा प्रचार करूं। अरे मार गोली सेवा को प्रचार को। मैं कहता हूं कि पहले तुलसीदास ये तुकाराम महाराज ने कहा कि विट्ठल पहले तुम्हारा रस दे दो,
तुम्हारी अनुभूति करा दो फिर ही मैं सच्ची सेवा कर सकूंगा। नहीं तो सेवा के नाम से ना जाने क्या क्या अहम पोसा जाता है। राग द्वेष पोसा जाता है। तुम्हारी प्रीति दे दो पहले फिर जो होगा वो सेवा होगी। तुम्हारी भक्ति दे दो महाराज पहले तुम्हारी प्रीति भक्ति दे दो फिर ही सेवा कर पाऊंगा। नहीं तो सेवा के नाम से आयुष्य पूरा हो जाएगा।

✨️हमारी ट्रांसपोर्ट कंपनी बस सर्विस इतने वर्षों से सेवा कर रही है। हमारी रेलवे इतने वर्षों से सेवा कर रही है, करते जाओ सेवा। हमारे कुल खानदान में हम इतने वर्षों से सेवा कर रहे हैं। करते जाओ। शरीर की सेवा कर रहे हो अपने आप की सेवा करो भाई साहब। मरने वाले शरीरों की सेवा तो बहुत हो गई अब अमर आत्मा की तरफ आने के लिए अमनी भाव की यात्रा के लिए कुछ करो। सुख आ जाए तो उसमें हर्षित मत हो मन को कह रहे तो आखिर कब तक टिकेगा रे क्या बालक जैसा मूर्ख बन रहा है। ततः किम?

✨️दुख आ जाए तो बोले ततः किम आखिर कब तक? बड़े से बड़ी ऊंची पदवी मिली और जो ऊंची पदवी पे है वे भी बेचारे मरकर चले गए हैं उनकी राख भी नहीं मिलती थी।

*कह रहा है आसमां ये समा भी कुछ नहीं*
*रो रही है शबनम ये नजारे कुछ नहीं।*
*जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानुस*
*झाड़ उनकी कब्र पे है और निशान कुछ भी नहीं।* *कह रहा है आसमां ये समा भी कुछ नहीं।*

✨️बड़े बड़े तीस मार खां आए। सोने की लंका वाले आए और सुवर्ण हिरणा हिरणपुर सोने की हिरणपुर वाले हिरणाक्षपुर वाले आए। ना जाने कैसे कैसे आ आकर बेचारे खप गए। तुम कब तक अपने शरीर को बचाए रखोगे, टिकाए रखोगे, बुढ़ापे से कब तक बचेंगे? शरीर को सदा बनाए रखने की ममता भी बड़ी दुखदायी है। ममता तो अपने आत्मदेव से करो। इसका उपयोग करने के लिए स्वस्थ रखो बाकी मैं सदा बना रहूंगा ये भी बेवकूफी है। शरीर सदा किसी का नहीं हो सकता है। अनित्यानि शरीराणि। शरीर सभी अनित्य है। शरीर अनित्य है फिर आप नित्य हो। आप अपने आप की जरा सा यात्रा कर लो। अपने विचारों को उर्ध्वगामी करो। लक्ष्य को उर्ध्वगामी करो। अच्युत पद पाने का संकल्प करो। धन मिल गए लेकिन धन धनी धन छोड़ देगा नहीं तो धन धनवान को छोड़कर चला जाएगा। कुर्सी मिल गई है तो कुर्सी तुमको छोड़ेगी या तो तुम कुर्सी को छोड़कर लाचार हो जाओगे। ऐसे ही मित्र मिले कोई भी मिले आखिर क्या? ततः किम ततः किम। शरीरम सुरूपम शरीर सुंदर हो। सुमेरु पर्वत जितने धन और हीरे जवाहरातों के ढेर हो। पत्नी आज्ञाकारी हो, सुंदर हो। मधुर भाषिणी हो, बेटा आज्ञाकारी हो। चारों ओर जय जयकार हो। देश विदेश में तुम्हारे बोले हुए बोल वचन पुस्तकें बन जाती हो और लोग तुम्हारे नाम पर नतमस्तक हो जाते हो। लेकिन उस आत्मदेव को उस गुरु पद को नहीं जाना तो आखिर कब तक मैया? गुरु अष्टक का पाठ समझने जैसा है।

*शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं*
*यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम्।*
*मनस्यं न लग्नं गुरुर्ङ्घ्रिपद्मे*
*ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥*

✨️यदि शरीर रूपवान हो पत्नी भी रूपसी हो और सब कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तृत हो। मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो किंतु गुरु के श्री चरणों में अर्थात गुरु का जहां आत्मिक अनुभव है वहां आप यदि मन अपना आसक्त नहीं होता तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ होगा?

*कलत्रं धनं पुत्र-पौत्रादि सर्वं*,
*गृहं बान्धवाः सर्वमेतज्जातं।*
*मनस्यं न लब्धं गुरु-रङ्घ्रिपद्मे,*
*ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥*

✨️घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो गए हो। किंतु गुरु तत्व में गुरु चरणों में मन नहीं लगा तो आखिर क्या?

*श्रुतिः शास्त्रादि वेदो मुखे शास्त्रविद्या,*
*कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति।*
*मनस्यं न लग्नं गुरु-रङ्घ्रिपद्मे,*
*ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥*

✨️वेद एवं षडंग वेदांग आदि वेद और षड शास्त्र आदि कंठस्थ हो गए जिनमें सुंदर काव्य निर्माण की आपके अंदर प्रतिभा भी आ गई। आप घटी शतक हो गए। एक घड़ी में सौ श्लोक बनाने वाले भी हो गए। कविताओं के रचयिता भी हो गए। षड शास्त्रों का ज्ञान और वेदों का ज्ञान भी कंठस्थ हो गया। लेकिन उस गुरु तत्व में आपकी प्रीति नहीं हुई तो आखिर मृत्यु का झटका यह सब भुलावे में तो डाल देगा ना भैया।

*विदेशेषु मान्या स्वदेशेषु धन्या सदाचारवृत्तेषु मतो न चान्यः।*
*मनस्य न लग्नं गुरुरङ्घ्रिपद्मे तथा किं तथा किं तथा किं तथा किम्॥*

✨️जिन्हें विदेशों में समा आदर मिलता है। विदेशों में तुम्हारा खूब यश और आदर है। अपने देश में भी जिनका नित्य जय जयकार हो रहा है। स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार पालन में भी अनन्य आस्था रखता हो। यदि उस प्रकार सदाचारी भी हो। देश विदेश में सम्मानित भी हो रहे हो। लेकिन उस गुरु तत्व में यदि उसका मन नहीं लगा तो आखिर क्या?

*क्षमामण्डले भूप-भूपालवृन्दे*
*सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्।*
*मनस्यं न लग्नं गुरुरङ्घ्रिपद्मे*
*ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥*
✨️जिन महानुभावों के चरण कमल पृथ्वी के पृथ्वी मंडल के बड़े-बड़े राजा और जैसे रामचंद्र जी वशिष्ठ के चरण धोते हैं ऐसे ही बड़े-बड़े राजा आपके चरण धोते हो। नित्य पूजन कर रहे हैं किंतु ऐसे आपका मन ऐसे जो नित्य पूजित होने वाले लोगों का भी मन उस गुरु तत्व में परमात्मा स्वरूप में नहीं टिका तो आखिर चरण पुजवाने से भी क्या हो गया?

*यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्*
*जगद्वस्तु सर्वं करे यत् सदैव*
*मनस्यं न लग्नं गुरुरङ्घ्रिपद्मे*
*ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥*

✨️आप इतने दानवीर दाता है के दान वृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिग दिगंतरों में व्याप्त हो जाती है। अति उदार गुरु की सहज कृपा दृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख ऐश्वर्य हस्तगत हो गए। किंतु उनका मन भी यदि गुरु चरणों में आसक्त भाव नहीं रखता तो आखिर इन भोगों से और जय जयकारों से मरने वाले शरीर से आपको क्या मिलेगा?

*ना भोगे न योगे न वा वाजिराजे ।*
*न कान्तासुखे नैव वित्तेषु चित्तम् ।*
*मनस्य न लग्नं गुरोर्ङ्घ्रिपद्मे ।*
*ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥*

✨️जिनका मन भोग में योग में अथवा राज्य धन वैभव में और स्त्री सुख से कभी विचलित नहीं हुआ हो। ऐसे संयमी भी हो। फिर भी अगर ब्रह्म तत्व में गुरु तत्व में आपका मन नहीं टिका तो आखिर क्या?
जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में अपने कार्य या शरीर में तथा मूल्य भंडार में आसक्त भी नहीं होता समझो ऐसा मन भी हो गया। पर गुरु के श्री चरणों में यदि आपका वह मन ब्रह्म तत्व में गुरु चरणों में आसक्त नहीं हुआ तो आपकी अनासक्ति से भी क्या लाभ हो गया?

*अङ्गारिणी रत्नादि मुक्तानि सम्यक् समालिङ्गिता कामिनी यामिनीषु ।*
*मनस्य न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ।*
*ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥*

✨️अमूल्य मणि मुक्ता आदि रत्न उपलब्ध हो। रात्रि में है महा सुंदरी समालिंगनी पत्नी विलासनी पत्नी भी प्राप्त हो। सोने की खाट हो रेशम की नवार हो पूनम की रात हो इत्र का छिड़काव हो और अप्सरा आकर गले लग जाए फिर भी आत्म सुख के आगे वह सुख दो कौड़ी का भी नहीं है

तो आदि शंकराचार्य जी कहते हैं कि समालिंगनी प्राप्त हो जाए यह सब हो जाए लेकिन गुरु तत्व में मन नहीं लगा तो आखिर क्या?

*यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी व गिरी*
*लभेद्वाञ्छितार्थं पदं ब्रह्मसंज्ञम्।*
*गुरोरक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नं*
*तथा किं तथा किं तथा किं तथा किम्॥*

✨️जो यति हो अर्थात साधु फक्कड़ हो या राजा हो ब्रह्मचारी हो एवं ग्रस्त हो इन इस गुरु अष्टक का पठन पाठन करता है और जिसका मन गुरु के चरणों में आसक्त है वह पुण्यशाली शरीर धारी अपने वांछित वांछितार्थ को एवं ब्रह्म पद को इन दोनों को सं प्राप्त कर लेता है यह निश्चित है। यह गुरु अष्टक का पाठ जो भी करे ब्रह्मचारी ग्रस्त साधु सन्यासी जो भी करे वह अपने वांछित को पालेगा।

✨️मेरी बुद्धि आप में विलय हो। इंद्रियां संसार के तरफ मन को खींचती है और मन बुद्धि को पटाकर भटका देता है। बुद्धि में अगर भगवत जप भगवत ध्यान भगवत पुकार नहीं है तो बुद्धि बिचारी मन के पीछे-पीछे चलकर भटकाने वाली बन जाएगी। बुद्धि में अगर बुद्धि दाता की प्रार्थना उपासना का बल है तो बुद्धि ठीक परिणाम का विचार करेगी कि यह कर लिया तो क्या हो जाएगा? यह इच्छा करूं वह इच्छा करूं वह इच्छा करूं ऐसे करते-करते बुद्धि मन की दास नहीं बनेगी तथा किम तथा किम शिवतेषु आखिर क्या? ऐसा प्रश्न करके बुद्धि को बलवान बनाओ तो मन के संकल्प विकल्प कम हो जाएंगे। मन को आराम मिलेगा बुद्धि को आराम मिलेगा उस परमात्मा में अमनी भाव की साधना जो आज मैंने बताई आपको बहुत उत्तम साधन है। बहुत स्वाभाविक सरलता से आप कर सको ऐसा साधन है।

✨️*और हजारों हजारों तपस्या कर ले हजारों साल शीर्षासन की तपस्या कर ले। फिर भी इस साधन के आगे वह तपस्या छोटी हो जाएगी। यह वह साधन है। मन को अमनी भाव में ले आना सीधा भगवान में डुबो देना। बहुत उत्तम साधन है।* अपने मन की हो तो आप हर्षित मत हो। और अपने मन की ना हो तो आप दुखी मत हो। इसको गीता में कहा समत्वं योगं उच्यते। जरा-जरा बात में हर्षित हो जाते जरा-जरा बात में दुखी हो जाते। और जब भी हर्ष और दुख आए तो सावधान हो जाओ कि हर्ष मन में आया दुख मन में आया उसको देखने वाला राग द्वेष बुद्धि में रहे हर्ष दुख मन में रहे इसको देखने वाला मेरा प्रभु मेरा मैं प्रभु का हूं। अमनी भाव को प्राप्त करने की कुंजियां दे रहा हूं। ताला तुम्हारे पास कुंजियां बता रहा हूं फिर खोलने में क्यों क्या मेहनत है?काहे को ढीला पड़ते हो?क्यों देर करते हो?क्यों संसार में पच मरते हो?क्यों खामखा की ख्वाहिशें करते-करते खलास हो जाना?
✨️*कोई भी ख्वाहिश उठे बुद्धि को प्रबल रखो। सौ की कर दे साठ। सौ-सौ ख्वाहिशें उठे धीरज रखो। समय की धारा में वह ख्वाहिशें शांत हो जाएगी। सौ की कर दे साठ। आधा कर दे काट* मन को बोले सौ की साठ कर आधा काट कर तो तीस रहे। दस देंगे दस छुड़ाएंगे दस के जोड़ेंगे हाथ। अभी तो शांत भगवान में बैठ भैया। मैं सुनाया करता हूं यह घटना पाकिस्तान में किसी नामीच आदमी ने थोड़ा गुंडा टाइप था। ₹100 लिए उस जमाने में ₹100 मतलब दो तोला सोना आज के 12000। तो दुकान वाले ने कहा भाई यह तो नामीच है पैसा देगा नहीं। ब्याज तो नहीं लेकिन पैसा बोले तू पैसा दे दे ब्याज हम नहीं मांगते। बोले पैसा देना है तो एक शर्त मानो। दुकान वाले ने कहा भाई मान ली। बोले सौ की साठ कर दो। बोले अच्छा बात है साठ ही दे दो। बोले आधा काट कर दो। दुकान वाले ने कहा अच्छा भैया। भर तू घर कृष्ण अर्पण। भागते चोर की लंगोटी भली कुछ भी नहीं देगा तो तीस ही दे दे भाई। उसने बोला दस देंगे दस छुड़ाएंगे दस के हाथ जोड़ेंगे बाय-बाय करता। अभी तो कुछ नहीं दिया। ऐसे ही मनवा को पटाओ। सौ-सौ ख्वाहिशें संसार में सुखी होने की है वह आधा काट कर दे।

✨️*सौ की साठ कर दे आधा काट कर दे। दस पूरी करेंगे दस छुड़ाएंगे दस के हाथ जोड़ेंगे भैया। और जो वह वेरी नेसेसरी है ना जो जरूरत है आवश्यकता आराम से पूरी होती है। भोजन की आवश्यकता वस्त्र की आवश्यकता जो बहुत आवश्यक है वह सहज में ही पूरी होती है। नखरों में ही जिंदगी भर जाती।*

🙏🙏🕉️
🥀💠❣️

📍*13.08.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
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*1. 😊 दुख-सुख में सम रहो* ❤️

छोटी सफलता पर खुश 😃 और छोटी हार पर दुखी 😔 होने से आपकी आत्मिक उन्नति रुक जाती है। मन की अनुकूलता-प्रतिकूलता में _अमनी भाव_ की साधना करो ⚖️ यही सबसे ऊँची तपस्या है।

*2. 🙏 व्रत-उपवास + सत्संग = शक्ति* 🔥

व्रत उपवास से बुद्धि शुद्ध होती है और संकल्प में बल आता है 💪 अगर साथ में संतों का संग और ब्रह्मज्ञान मिल जाए तो उसका फल करोड़ गुना बढ़ जाता है 📿

*3. 👁️ शरीर नहीं, आत्मा सत्य है* 💫

शरीर 💀, सुख-दुख 🎭 सब आकर चले जाएंगे। जो पहले था, अभी है, बाद में रहेगा वो _चैतन्य परमात्मा_ 🕉️ वही आपका असली स्वरूप है। उसी में विश्रांति पाओ 🕊️

*4. ⚖️ सत्वगुण बढ़ाओ* 🔥

रजोगुण से लोभ-चिंता 😰 और तमोगुण से आलस-मूढ़ता 😵‍💫 आती है। प्राणायाम, ध्यान, सात्विक भोजन 🥛 और सत्संग 📖 से सत्व बढ़ाओ। सत्व से पार जाकर ही ब्रह्म अनुभव होगा 🌅

*5. ततः किम् - आखिर क्या?* ⛔️

रूपवान शरीर, मेरु जैसा धन 💰, यश, पद 👑, आज्ञाकारी परिवार 👨‍👩‍👧‍👦 सब मिल जाए... पर अगर गुरु तत्व/आत्मदेव में मन न लगा तो _आखिर क्या_? सब यहीं छूट जाएगा।

*6. 💎 घट में ही खजाना है* 💚

हम बाहर डॉलर, मकान, नाम में सुख ढूंढ रहे हैं 🏠💵 पर सच्चा सुख तो _घट के अंदर_ है। उसे न जानना ही _मोतियाबिंद_ है 👁️‍🗨️ तुलसीदास जी कहते हैं - अपने भीतर के आत्मदेव को पहचानो।

*7. 🧘‍♀️ सबसे सरल साधन: अमनी भाव*

हजारों साल की तपस्या से भी बड़ी ये साधना है 🙌 मन की 100 ख्वाहिशों को _सौ की साठ, आधा काट_ कर दो ✂️ जो जरूरी है वो सहज मिल जाएगा। बाकी नखरों में आयुष्य मत खपाओ।

🌸 *सत्संग सार* 💖

_बाहरी दौड़ छोड़ो, भीतर उतरो_ 🧘‍♀️
सुख-दुख में सम रहो, सत्वगुण बढ़ाओ और हर काम करते हुए भी भगवान की स्मृति रखो _मामनुस्मर युध्य च_ 🙏
यही _अमनी भाव_ है - यही मुक्ति और सच्चे आनंद की कुंजी है 🔑

_शरीर की सेवा बहुत हो गई, अब अपने आप की सेवा करो भाई साहब_

🙏🙏🕉️
Audio
सुबह संध्या सत्संग 13.08.2026
Audio
सुबह संध्या सत्संग 14.08.2026
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🌹 *14.08.25* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन* 🏵️

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✨️अर्थ रूपा कौन है बोलो... राम आगे चलते हैं ,मोक्ष आगे चलता है। कामना उनके पीछे ,भरत आगे चलते हैं शत्रुघ्न उनके पीछे। धर्म के पीछे ,अर्थ चले और मोक्ष के अनुरूप कामना चले ,राम जी के पीछे लक्ष्मण चलते हैं और भरत के पीछे शत्रुघ्न चलते हैं । लक्ष्मण कामना पूर्ति के, शूर्पणखा आई है वह भी काम है ।मोक्ष के सामने काम आता है ,मोक्ष बोलता है इधर तेरी जगह नहीं ,जा कामना पाले के पास लक्ष्मण के पास लेकिन कामना अनुचित है तो लक्ष्मण स्वीकार नहीं करते। लक्ष्मण कहते हैं सुंदरी देखते हैं राम की तरफ और बोलते हैं सुंदरी शूर्पणखा को अच्छा तो लगा सुंदरी तो कहा लेकिन बुरा भी लगा मेरे तरफ तो देखते नहीं। लक्ष्मण ने संकेत दिया कि जब तक तेरी तरफ नहीं देखता हूं तब तक तू सुंदरी है ।अगर तेरी तरफ देखूं तो नककटी है और जब लक्ष्मण ने देखा तो लक्ष्मण को नाक और कान काट देने पड़े।

✨️कामना पूर्ति तो हो लेकिन नककटी होकर नहीं, शास्त्र मर्यादा में ।औचित्य अनौचित्य की मर्यादा में ,जो आए सो खा लिया नहीं जो आए सो कर लिया नहीं ।औचित्य अनौचित्य की मोक्ष का उद्देश्य वाले लक्ष्मण को जिसकी निगाह राम पर है, तो उचित अनुचित जानते हैं ।कामना पूर्ति तो होनी चाहिए। लेकिन मोक्ष से परे ले जाने वाली, कामना को पूर्ति का जामा न पहनाए ,उसको निवृत्ति के तीक्ष्ण शलाका से काट दे। लक्ष्मण जी ने काट दिया कामना के नाक और कान को ,कामना नककटी अपने कुल खानदान का नाश करा देती है । और कामना मर्यादित अपने को अपने कुल खानदान को उन्नत कर देती है।

✨️आज कामना नककटी चल रही है ।एमबीए करूं ,एमबीबीएस करूं, एमडी करूं ,पैसा कमाऊं अच्छा बनके दिखाऊं। *अहम को सजाने वाली कामना दुखी और निराश कर देती है। सुविधाओं में घर का होने वाली कामना असंतुष्ट बना देती है। दूसरे को नीचा दिखा के बड़ा दिखाने की अहंकार की कामना। शरीर तो मर जाएगा लेकिन कामना वाला जन्मता मरता रहेगा ।* 10-10 सिर है रावण को, 20-20 भुजाएं भुजा कटती तो बन जाती है ।सिर कटता तो फिर आ जाता है ।क्रोध ,लोभ ,मोह, अहंकार कटते कटते फिर उजागर हो जाता है। क्योंकि चित्त चालू है।

✨️योग कहता है, योग चित्त वृत्ति निरोधा योग हमारे चित्त की वृत्तियों को शांत करके ब्रह्म साक्षात्कार कराता है । चाहे ज्ञान योग हो, चाहे भक्ति योग हो, चाहे ध्यान योग हो। योग गीता में 64 बार शब्द आया है।तस्मात योगी भव अर्जुना।इसलिए अर्जुन तू योगी हो।योगी नाम अपि सर्वेषाम...योगियों में भी सब योगियों में।

*योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।*

मदगत हो जा अपने अंतरात्मा की महिमा जान।

सबसे श्रेष्ठतर कौन है? भीष्म जी से पूछा गया ।सबसे श्रेष्ठ कौन है? बोले मनुष्य

*यत् करोति मनुष्यस्तु तत् सुरा नासुरास्तथा।*

✨️सुर और असुर उस ऊंचाई को नहीं छू सकता जो मनुष्य छू सकता है। मनुष्य पीपल के पेड़ में, आंवले के पेड़ में, तुलसी के पौधे में अपना अहोभाव डाल के वहां से ऊर्जा पर पा लेता है। मूर्तियों में ,मठों में ,मंदिरों में अहो भाव डाल कर आह्लादित, आनंदित और प्रेरणा का स्रोत पा लेता है। भगवान में रसीलापन मनुष्य डालता है।
मेरे भगवान सुख रूप है।
मेरे भगवान चैतन्य रूप है।
मेरे भगवान आनंद रूप है।
मेरे भगवान सर्वव्यापक है।
मेरे भगवान प्राणी मात्र के सुहृद है।ऐसे करते -करते मनुष्य भगवान को जीव को ,जगत को रसमय बनाने की ताकत रखता है।
वही मनुष्य अगर शूर्पणखा की कामना का अनुसरण करता है, तो नककटा हो जाता है। और लक्ष्मण की निगाह मोक्ष स्वरूप राम जी पर है कामना तो पूर्ति चाहते हैं करते हैं लेकिन मोक्ष के रास्ते जाने में अड़चन ना हो मोक्ष प्राप्ति में सहायक हो वह कामना पूरी कर हिंदू धर्म ने बताया ए वो दी देखाड़ वाला ए वो दी उगाड़ भूल आवी हूं मारो ने तारा में उगाड़ ये शरीर में हूं और इतनी चीजें या वस्तुएं दृष्टांत मेरे हैं नहीं नहीं तुझ में डूबा जब तक ज्ञान दृष्टि नहीं आती इश्क इलाही नजरिया नहीं आती तब तक यह नाक तू परफ्यूम के द्वारा सुख दे हे मूत्र इंद्रिय पति पत्नी के शरीर की सत्यानाश करने के द्वारा सुख दे यह शूर्पणखा का काम है लक्ष्मण का काम राम पर नजर है राम जी को देखते देखते आह्लादित होते हैं आनंदित होते हैं हनुमान जी की नम्रता और कार्य तत्परता देखकर लक्ष्मण गदगद होते हैं

✨️रावण सीता का हरण करके गया रास्ते में गहने मिले तो राम जी उठा उठा कर पूछते हैं कि यह नूपुर है सीता के हैं कुंडल किसके हैं यह बाजूबंद यह चूड़ियां बोले प्रभु मैं तो मां को प्रणाम करता था उनके चरणों के नूपुर के सिवाय और गहनों को मैं नहीं पहचानता लक्ष्मण भी सीता जी को देखते हैं और राम जी रावण भी सीता जी को देखते हैं शूर्पणखा भी सीता को देखती है शूर्पणखा ने जाकर रावण को भड़काया कि अगर लंका में विश्व की परम
सुंदरी सीता नहीं तो तेरा लंका अधूरा है कामना को भड़काया कामना पूर्ति में विघ्न आया तो क्रोध हुआ क्रोध से सम्मोह हुआ सम्मोह से बुद्धि विभ्रम हुई बुद्धि विभ्रम हुई तो अपना नाश आप ही किया जगत की कामनाएं क्रोध को लोभ को मोह को बुद्धि विभ्रम को और नाश को ले आती है

✨️पतंगे दिए के तरफ जाकर क्या करते हैं नाश ही तो करते हैं राम जी ने एक बार हनुमान को कहा कि हनुमान लंका जलाने के पहले तुमने कुछ विचार तो किया होगा तुमने कोई विचार नहीं किया लंका जलाने के पहले हनुमान जी बड़े बुद्धिमान थे वे नम्र भाव से कहते हैं प्रभु मुझे विचार करने की आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि लंका मैंने जलाई ही नहीं मुझसे लंका जलवाई गई मैं ना कपड़ा ले गया था ना घी ले गया था ना तेल ले गया था ना बत्ती ले गया था ना दिया ले गया था उसके कामना से क्रोध आया क्रोध से लोभ मोह और बुद्धि विभ्रम से और बुद्धि भ्रमित हुई तो अपना ही कपड़ा मेरे पूंछ पर लपेटवाया इतना इतना लपेटवाया कि पूंछ को तो कोई असर ही ना हो उसी का कपड़ा उसी को लंका जलाता है उसी का तेल घी और और नहीं बचा तो एरंडिया भी जलवाया उसी ने दिया लगवाया आग भी उसी ने लगवाई मैंने लंका नहीं जलाई

✨️ज्ञानी से लोग अपनी ही इच्छा पूर्ति करवाते हैं लोगों की इच्छा से ज्ञानी महापुरुष विचरण करते हैं साधारण लोग अपनी इच्छा सुख की इच्छा से भटकते हैं ज्ञानी सुख बांटने की सहज प्रेरणा से लोगों की इच्छा से पर इच्छा प्रारब्ध है हनुमान जी की पर इच्छा प्रारब्ध है राम जी की पर इच्छा प्रारब्ध है श्री कृष्ण और कबीर नानक और बुद्ध पुरुष सुख की इच्छा से नहीं विचरण करते दूसरों की इच्छा पूर्ति के लिए वैसे जिधर की हवा आई और पीपल का पत्ता उधर पूर कर रहा है तो जिसको मोक्ष उपलब्ध हो गया है उसकी कामना दिखेगी लेकिन बाधित रस्सी में सांप दिख रहा था बैटरी मार के उठाकर देख लिया यह सांप नहीं रस्सी है अब फिर से सांप जैसा लगेगा लेकिन वह सांप बाधित हो गया मरुभूमि में पानी दिखेगा जाकर देखा कि बालू है फिर अपनी जगह गए तो वही पानी दिखेगा लेकिन वह पानी बाधित हो गया

✨️ऐसे ज्ञानी महापुरुष के लिए जगत बाधित हो गया देखने भर को देखते देखते बदल रहा है मिट रहा है देखत नैन चलो जग जाई का मांगू कछु फिर ना रहा है क्या मांगे भगवान के मंदिर में अथवा मस्जिद में चर्चों में या और कोई उपासना स्थलों में लोग जाते हैं अंधी कामनाओं के पीछे अंधी सवारी पर बैठ जाते हैं कितनी भी कामना पूर्ति कर लो अग्नि में कितना भी घी डाल दो और भड़के इच्छा पूर्ति आवश्यकता पूर्ति और इच्छा निवृत्ति यह तीन बातें समझो इच्छा तो अंत शंट होती रहती है इसके पीछे जो लगते हैं वह बिल्कुल खपते जाते हैं इच्छा पूर्ति अपने हाथ की बात नहीं सब इच्छा पूरी कर दे उचित इच्छा है तो उचित इच्छा को इच्छा ना कहो आवश्यकता जैसे भूख है भोजन की आवश्यकता है स्वस्थ का ख्याल करके भोजन खा लिया वह आवश्यकता है लेकिन यह स्वाद होना चाहिए ऐसा होना चाहिए ऐसा मजा आना चाहिए यह इच्छा हो गई नींद आई परोड़े लेकिन ऐसा गलीचा ऐसा बिस्तर ऐसा होना चाहिए रंगीन चाहिए समाचार सुनना है तो रंगीन टीवी चाहिए अब ब्लैक एंड व्हाइट क्या पत्नी सुंदर चाहिए पति ऐसा चाहिए मेरे को ऐसा चाहिए ऐसा चाहिए ऐसा चाहिए सारी दुनिया की चीजें एक व्यक्ति की सेवा में लगा दो फिर भी उनकी इच्छाएं पूरी नहीं होगी और भड़केगी...

✨️लेकिन राम जी पर नजर है लक्ष्मण की तो उनकी इच्छाएं नियंत्रित है इच्छाएं आवश्यकता में आ गई भूख क्या मान ली कंद मूल खा लिए पड़ गए आवश्यकता पूर्ति हो गई आवश्यकता सहज में पूर्ति होती है गरीब से गरीब आदमी को भरपेट अन्न मिल सकता है पानी और रहने का छत पर हो जाता है लेकिन और और और खपते खपते खपते

*चाह चमारी चुहरी अति नीचन की नीच*
*तू तो पूर्ण ब्रह्म था जो चाह मुट्ठी बीच है*

✨️पूर्ण सबसे श्रेष्ठ है ईश्वर को रसमय बनाने वाला मनुष्य है ईश्वर को मनुष्य को पेड़ पौधों को जूते को रसमय बनाने वाला मनुष्य है जूता मेरा है अपना मानने से जूता प्यारा हो जाता है यह कितना प्यार का सिंधु है मनुष्य जिसको अपना मानता है वह प्यारा हो जाता है जिससे अपना माना जाता है उसको अपना जाने तो सभी का प्यारा सदा के लिए हो जाए श्री रामचंद्र जी संकेत करते हैं लक्ष्मण को कि कामना आई अनियंत्रित कामना है लक्ष्मण समझ गए और नाक और कान काट दिए काम से ही काम मरता है कामना से ही कामना काटो और भरत को संकेत हुआ मंथरा लोभ का रूप है राम जी ने तो जाकर मंथरा को पुचकारा लेकिन भरत ने मंथरा को भरत धर्म का रूप है मंथरा लोभ का रूप है धर्म के द्वारा लोभ को नियंत्रित दंडित किया जम पाए यह है लेकिन आखिर क्या हल्का चिंतन हुआ तुम जैसा चिंतन करते हो वही तुम्हारी गति होती है शरीर का चिंतन करते हो जाति का चिंतन करते हो केवल अपने 5.5 फुट शरीर का चिंतन करते हो तो बहुत छोटे हो जाते हो परिवार का चिंतन करते हो तो बड़े राज्य के भले का राष्ट्र
के भले का चिंतन और बड़े विश्व की भलाई का चिंतन और बड़े लेकिन विश्व जिससे विश्व दिखाई दे रहा है उस विश्वेश्वर का चिंतन करके अपने को ब्रह्म रूपमय बना दो आपकी बुद्धि बहुत बड़ी हो जाएगी विशाल हो जाएगी

✨️*बड़ा व्यक्ति वह नहीं जिसके पास बहुत संपदा है बहुत सर्टिफिकेट है बड़े में बड़ा है जो सबसे विभु व्याप्त है उसमें जिसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हुई* जनक बड़े नहीं है अष्टावक्र बड़े हैं राजा रघुगण बड़े नहीं है जड़ भरत जी बड़े हैं क्योंकि उनकी बुद्धि बड़े में बड़े अपने ब्रह्म स्वभाव में विश्रांति पाई सब छीन खसोट करके कितना भी बड़ा राज्य पाओगे फिर भी बड़ापन नहीं दिखेगा रावण का नहीं टिका शूर्पणखा का नहीं टिका लेकिन शबरी ने सतगुरु के वचन सुनकर अपने बड़े स्वभाव में विश्रांति पाई..राम शब्द का रकार और आखिरी में मकार उसके बीच तू तेरा मैं मेरा कुछ संकल्प नहीं उठता है वह बड़े में बड़ा परमेश्वर है दूर नहीं है दुर्लभ नहीं परे नहीं पराय है ऐसे ही ओम में अकार और अंत में मकार ओम ओम ओम ओम ओम ओम

✨️शबरी का विश्रांति योग राम तीर्थ का विश्रांति जनक अष्टावक्र का विश्रांति योग अपने बड़कप्पन में प्रतिष्ठित कर देता हूं आप भी वो करो मन में सो-सो कामनाएं आए सुर्पन्खा की आदत वाली पुराने कई जन्मों का संस्कार मैंने कई बार ये दृष्टांत सुनाया है कि एक गुजरात में तो ये माथा भारी मानस.
हिंदी में कहे एक डॉन बदमाश बदमाशों का गिरोह किसी बनिया से ₹100 उधार लिया एक ₹100 दे दो तुमको मिल जाएंगे ब्याज सहित 10 दिन पांच दिन हुए 25 दिन हुए महीना दो महीना देवे नहीं देवे नहीं बनिया ने कहा देखो ब्याज मत दे तू 100 दे दे उस लुच्चे ने कहा देखो मेरे से पैसा लेना हो तो मेरी बात मान बोले एक नहीं तेरी चार बात मान तू पैसा देने की हां बोल बस बोले ठीक है बनिया 100 की कर दो 60 बनिया ने देखा 100 जा रहे हैं 40 गए बोले ठीक है मान ली उसने बोला रुको आधा कर दो काट बनिया ने सोचा चलो कुछ भी नहीं आएगा 30 ही सही 30 दे दे बोले अभी सुनो ना 100 की कर दो 60 आधा कर दो काट 10 देंगे 10 छुड़ाएंगे 10 के जोड़ेंगे हाथ तभी क्या मिला घुमा दिया

✨️ऐसे ध्यान भजन करते हो ये करना है वो करना है बोले ठीक है 100-100 करना है 100 की कर दो 60 आधा कर दो काट 10 काम करेंगे 10 छुड़ाएंगे 10 के हाथ जोड़ेंगे... ॐ ॐ...

✨️काम से काम मरता है और धर्म से लोभ मरता है अगर धर्म आगे नहीं है भरत आगे नहीं है शत्रुघ्न आगे है और भरत पीछे है तो गड़बड़ हो जाएगी राम जी आगे नहीं है और लखन आगे है और राम जी उनके पीछे चलते हैं तो कामना के पीछे मुक्ति नहीं चल सकती कामना के पीछे तो बंधन चलता है मोक्ष के पीछे कामना चले तो मुक्त हो जाएगा आप अपने जीवन में ईश्वर प्राप्ति का उद्देश्य बना दे बस मुझे मुक्त होना है दुख से सुख से राग से द्वेष से भय से... कौन चाहता है मैं दुखी रहूं कौन चाहता है मैं सुख का लंपट हूं पतंगे सुख के लंपट हुए जल मरते हैं मछली सुख की लंपट हुई तो खूंटे में फंस मरती है हाथी सुख का लंपट हुए घास फूस के हाथीन के स्पर्श से गड्ढे में जा गिरता है विक कहां तो हाथी और कहां महावत उसको रगड़ता रहता है कामना ही तो है

✨️*चाह चमारी चूहरी अति नीचन की नीच* ऐसा हो जाए ऐसा हो जाए ये सारी कामनाएं तुम्हें सताएगी कई जन्मों से अपने आप को सताते आए हो इस जन्म मे जरा रुको..इन सारी सताने वाली कामनाओं को निकालने के लिए भगवान को पाने की कामना डाल दो मेरे गुरुदेव कहा करते थे कुएं में लील हो गई है काई आ गई है महाराज क्या करें महाराज बोले मछियां डाल दो छोटी-छोटी मछियां डाल दी महाराज अब मछियां भी बोले कछुआ डाल दो कछुआ डाल दिया तो कछुए ने मछु को सभा मछुओं ने काई को सभा अब बोले कछुए निकालो ऐसे ही छोटी-मोटी तामसी राजसी कामनाओं की बजाय इतनी माला करूंगा इतना जप करूंगा इतनी सेवा करूंगा हे नाथ फिर..

✨️*आरु रुक्ष मुनेर योगम* श्री कृष्ण कहते हैं गीता के छठे अध्याय में जो परमात्मा से योग करना चाहते हैं जो ईश्वर से मिलना चाहते हैं योग में आरुढ़ होना चाहते हैं उनको क्या करना चाहिए

*आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।*

✨️आलसि होके बैठा रहेगा तो तमस आ जाएगा कामना पूर्ति में लगेगा तो तबाह कर देगी तो सत्कर्म करें परदुःख कातरता.. धर्म के प्रचारक.. स्वार्थ का धंधा छोड़कर परमार्थ के धंधे में लगे

*आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।*

✨️जो योग में आरुढ़ होना चाहता है उसके लिए कर्म ही कारण है लेकिन योग में आरुढ़ हो रहा है तो फिर कर्मों से भी अपना समय बचाकर सम करें विश्रांति ले भगवान जैसे घोड़े के रकाब में अथवा साइकिल के पैडल पर पहले एक पैर रखें दूसरे पैर से साइकिल को धक्का मारे फिर जंप मार के दूसरा पैर भी उठा ले और फिर पैडल मारे और पैडल मारते-मारते एक ऐसी जगह आती है कि पैडल मारना भी बंद कर दे साइकिल पकड़ना भी बंद कर दे अपने घर पहुंच जाए एक पैर रखना भी यात्रा का श्री गणेश
है जंप मारना भी यात्रा के लिए उचित है दोनों पैरों से साइकिल चलाना भी उचित है कि अंत में साइकिल को ब्रेक मार के किनारे रख दिया और अपने घर में जाना उचित है ऐसे ही दुष्कर्म से बचने के लिए सत्कर्म के पैडल पर पैर रखें फिर सत्कर्म से यात्रा करते-करते सत् स्वभाव में विश्रांति ले कामना पूर्ति से वो सुख नहीं मिलता जो कामना निवृत्ति से मिलता है कामना पूर्ति अपने बस की बात नहीं है उसमें प्रारब्ध चाहिए पुरुषार्थ चाहिए वातावरण चाहिए तब वो कामना पूर्ति हुई कामना पूर्ति तो दूसरी कामना आ गई लेकिन बुद्धिमानी से कामना निवृत्त कर दी 100 की 60 आधा काट 10 करेंगे 10 छुड़ाएंगे तो भगवत सुख मिलेगा तो कामना की कोई जरूरत नहीं।

✨️हरिद्वार गंगा किनारे से सटा हुआ एक जंगल है, चीला इलाका। जहां थर्मल पावर है उस जंगल में मैं घूमने जाता कभी-कभार भीड़भाड़ से बचने। एक साधु मिला उसने मेरे को प्रणाम किया। प्रभावशाली साधु था ।उसको मैंने पूछा क्या हाल है? कैसे? वो हिंदी में बात करा तो उसने कहा बापू आपने वो कुछ वो गुजरात में था राजकोट में था। नानो तो अपने यहां होता तो फिर डोंगरे महाराज ने मंत्र दिया। डोंगरे महाराज ने मेरे को बोला कि तुम जप करो, मंत्र का अनुष्ठान करो। जितना अक्षर उतना लाख उतना करोड़ । 12 करोड़ जप। तभी तो प्रभावशाली था मैंने कहा अब तुम्हारी क्या इच्छा है क्या चाहते हो बोलो ? बोले अब कोई इच्छा ही नहीं है, इच्छा नहीं इसलिए प्रसन्नता और प्रभाव।

✨️कई वकील, कई जज, कोई चीफ जस्टिस ,आदि भी उनको मानते हैं कई सेठ लोग भी उनको मानते हैं । फिर अपने आश्रम में भी आ गया था वो दर्शन करने को। मैंने कहा बोलो क्या इच्छा है? बोले अब बस आप ही आप हैं। अब ईश्वर से कुछ इच्छा नहीं मैंने कहा ईश्वर सामने खड़ा है और बोले क्या चाहिए? तो बोले बापू आप ही तो हैं। सब आप ही आप हैं। मतलब सब ईश्वर ही ईश्वर है। किससे कौन मांगे?

✨️*कामनाओं ने ही हमको ईश्वर से दूर किया है। बाकी तो*➖️

ईश्वरो सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति

*सभी भूतों का जिगरी जान तो परमात्मा ही है। वो परमात्मा सत् स्वरूप है। चेतन स्वरूप है। ज्ञान स्वरूप है। आनंद स्वरूप है।*

🙏🙏🕉️
🥀💠❣️

📍*14.08.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
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*1. 🎯 क्रम सही रखो: मोक्ष → कामना* ⚜️

राम आगे चलते हैं, लक्ष्मण पीछे। यानी _मोक्ष_ आगे, _कामना_ पीछे। धर्म के पीछे अर्थ चले और मोक्ष के अनुरूप कामना चले तो जीवन सुधरता है। अगर कामना आगे हो गई तो बंधन पक्का है ⛓️

*2. ✂️ नककटी कामना vs मर्यादित कामना* 💚

शूर्पणखा = नककटी कामना। लक्ष्मण ने नाक-कान काट दिए। मतलब शास्त्र मर्यादा में न आने वाली कामना को _निवृत्ति की तीक्ष्ण शलाका_ से काट दो। मर्यादित कामना कुल को उन्नत करती है, नककटी कामना कुल का नाश करा देती है 🔥

*3. 🧠 कामना का स्वभाव: कटे फिर उगे* ⛔️

क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार = रावण के 10 सिर। काटो तो फिर आ जाते हैं क्योंकि _चित्त चालू है_। इसलिए सिर्फ काटने से नहीं, _योग - चित्त वृत्ति निरोध_ से शांति आएगी 🧘

*4. 👑 मनुष्य सबसे श्रेष्ठ* 💫

_यत् करोति मनुष्यस्तु तत् सुरा नासुरास्तथा_ - देव और दानव भी वो ऊंचाई नहीं छू सकते जो मनुष्य छू सकता है। मनुष्य पेड़, मूर्ति, मंदिर में _अहोभाव_ डालकर भगवान को रसमय बना देता है। भगवान को सुख-आनंद-चैतन्य रूप मानने की ताकत सिर्फ मनुष्य में है 🌳🙏

*5. 🔥 कामना = आग में घी* 😌

कितनी भी कामना पूरी करो, अग्नि और भड़कती है। पतंगा दीये में जलता है, मछली कांटे में फंसती है, हाथी गड्ढे में गिरता है - सब _सुख के लंपट_ होने से।
_चाह चमारी चुहरी अति नीचन की नीच_ 🥾

*6. 🪜 3 सीढ़ी: इच्छा पूर्ति → आवश्यकता पूर्ति → इच्छा निवृत्ति* 📍

जरूरत: भूख लगी तो भोजन खा लिया = आवश्यकता।
नखरा: ऐसा रंग, ऐसा बिस्तर, ऐसा स्वाद = इच्छा।
ज्ञान: _सौ की साठ, आधा काट, 10 करेंगे 10 छुड़ाएंगे_ = इच्छा निवृत्ति। यहीं असली सुख है 🕊️

*7. 🕉️ अंत में विश्रांति योग* 💖

रावण का राज्य नहीं टिका, शबरी की भक्ति टिक गई। बड़ा वो नहीं जिसके पास संपदा है, बड़ा वो है जिसकी बुद्धि _सबसे विभु_ में प्रतिष्ठित है। _आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते_ - योग में चढ़ने के लिए पहले सत्कर्म करो, फिर कर्म से भी ऊपर उठकर विश्रांति लो 🚲➡️🏡

🌸 *सत्संग सार* 🌸

_कामना को मालिक मत बनाओ, सेवक बनाओ_
लक्ष्मण की तरह नजर _राम = मोक्ष_ पर रखो। कामना आए तो पूछो - "क्या ये मुझे मोक्ष के करीब ले जाएगी?"
नहीं तो _नककटी_ करके छोड़ दो ✂️
जरूरत पूरी करो, इच्छा कम करो, और अंत में _इच्छा निवृत्ति_ में ब्रह्मानंद पाओ।

_कामनाओं ने ही हमको ईश्वर से दूर किया है। बाकी तो ईश्वर तो हृदय में ही बैठा है_ ❤️

_ईश्वरो सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति_ 🕉️

🙏🙏🕉️
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🌹 *15.08.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️*पूज्यश्री के अनमोल वचन*🏵️

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✨️ऐसे लोग होते है जिनको थोड़ा सा संकेत मात्र कर दो वो बात को पकड़ लेते हैं। और ऐसा अमृत पा लेते हैं। सबकी ऐसी पहुंच नहीं होती इसलिए संकेत की भाषा नहीं समझते थोड़े से शब्दों में नहीं समझने वाले व्यक्तियों के प्रति विस्तार करके वर्णन करना पड़ता है। *सांकेतिक भाषा समझे या विस्तार से समझे लेकिन बात यह समझनी है कि मनुष्य जन्म कीमती है, उसका एक-एक क्षण का सदुपयोग करो।*

✨️सदुपयोग का मतलब है कि आप कोई अच्छी जगह में बैठेंगे, तो सदुपयोग है ,हां अच्छी जगह में बैठेंगे अच्छी जगह में सोचेंगे, तो अच्छा करेंगे तो सदुपयोग है। तो अच्छी जगह कौन सी है? बताओ कौन सी अच्छी जगह है? स्वर्ग अच्छी जगह है कि नर्क अच्छी जगह है, हिमालय अच्छी जगह है, कि दक्षिण भारत अच्छी जगह है ,कि अमेरिका अच्छी जगह है, लंदन अच्छी जगह है बताओ कौन सी अच्छी जगह है? *अच्छी में अच्छी जगह है जहां परमात्मा बसता है ।श्री राम!*

✨️बताओ परमात्मा कहां बसता है ?जहां परमात्मा बसे वहां चलो रहने को अपने चले जाएं जहां परमात्मा हो उससे बढ़कर कोई अच्छी जगह तो नहीं परमात्मा कहां रहता है? परमात्मा सामान्य रूप से तो सब जगह रहता है, लेकिन विशेष रूप में प्रकट होता है हृदय में, इसलिए कहते हैं ➖️

*ईश्वरो सर्वभूतानां हृदय से अर्जुन तिष्ठति*

✨️भगवान हृदय में रहता है ,तो आप भी हृदय में रहो ।हृदय में कैसे रहें ?सुख दुख लाभ हानि के जो भी प्रसंग होते हैं ,घटनाएं तो बाहर घटती हैं लेकिन अनुभव हृदय में होता है। तो विशेष अनुभव की जगह है ।

✨️जैसे हमारा त्वचा तो सारे शरीर में है चमड़ा, वहां मिठाई रखो तो मीठी नहीं लगेगी ।नमकीन रखो तो वह नमकीनपन का स्वाद नहीं आएगा और जीभ भी चमड़ा है, लेकिन जिह्वा पर रखो तो तुरंत पता चलेगा कि खारा है ,कड़वा है ,मीठा है ,तुरिया है क्या है ?है तो सारे शरीर में ही हम ही हम हमारे शरीर में है सारे शरीर में तो हमारा ही चमड़ा है हमारी चेतना है हम ही हम हैं शरीर के किसी भी अंगों पर आप मिठाई रखो, हलवा रखो ,जलेबी रखो ,शक्कर ही रख दो ,चाशनी लगा दो चलो तो पता नहीं चलेगा और जो होठों के करीब आई जिह्वा ने जरा सा टच कर दिया हां कि गुड़ की चाशनी है ,कि खांड की है, अथवा शहद है या दूसरे कोई शरबत की चाशनी है ।पता चल जाएगा ।

✨️ऐसे ही आप अगर हृदय में रहते हैं ,तो आपको पता चल जाएगा कि विषयों का सुख है ?कल्पनाओं का सुख है? कामनाओं का सुख है? भावनाओं का सुख है?कि भगवान का सुख है ।
जल्दी पता चलेगा ।
श्री राम !

✨️आदमी कल्पनाओं के सुख में अभी जो है उसकी कोई फिक्र नहीं करता यह होगा वह होगा फिर मैं सुखी होऊंगा । ऐसे कल्पनाओं की जाल में फंस जाते हैं ।कई विषयों के जाल में फंसे रहते हैं ।पशु जैसा जीवन। अगर आप हृदय में रहना सीखेंगे तो तुरंत पता चलेगा कि क्या हुआ ।
यह घटना घटी हृदय में क्या हुआ फलाने ने दुखद समाचार सुनाए लेकिन अब क्या हुआ, दुख आ गया कोई हरकत नहीं लेकिन दुख को देखने की अटकल आ गई ,दुख से अलग हो गए।

🥀*विषय का सुख आ गया कोई हरकत नहीं ,लेकिन विषय के सुख को देखने की अटकल आ गई ,विषय के सुख से पृथक। जो आदमी पृथक होकर उस देखता है ,उसका उपयोग करता है ,वह ठीक से कर सकता है।*

✨️संसार से भी पृथक होकर संसार से पृथक होकर कहां रहेंगे? कहां जाएंगे ?जहां जाओ शरीर है, वहां तो संसार होगा ही। पृथ्वी होगी ,सूर्य के किरण होंगे, पानी लेना पड़ेगा, घर छोड़ के झोपड़ा घर छोड़ के और कोई गुफा, गुफा पवित्र देश में मंदिर पवित्र होता है यह बात सही है।

✨️एकांत देश में भगवत प्राप्ति में सुविधा होती है यह बात सही है। लेकिन एकांत देश एक तो बाह्य एकांत होता है ,दूसरा सब विचारों का एक में ही अंत कर दे। वह हृदय में साक्षी स्वरूप में, वह बढ़िया एकांत है। वह परम एकांत है ।एक में ही सब विचारों का अंत ।आंख रूप अनेक देखती है, लेकिन देखने वाला मैं एक।कान शब्द अनेक सुनते हैं ,
मैं देखने वाला एक ।जीभ स्वाद अनेक लेती है,
लेकिन उस स्वाद को देखने वाला मैं एक ।
धारणा गंध अनेक प्रकार की लेती है ,लेकिन गंध का दृष्टा मैं एक ।अच्छी गंध आई उसको भी मैं देखता हूं ,मध्यम आई उसको भी देखता हूं ,और एकदम दूषित आई जो चित्त खिन्न हो गया मन को अच्छी नहीं लगी। तो मन को अच्छी नहीं लगी उसको भी मैं देखने वाला एक ।

✨️बिल्कुल सही सीधी साफ बात है। शास्त्रों की वेदांत की बात है। महापुरुषों का अनुभव है श्रुति और युक्ति से भी सिद्ध हो रहा है। तुम भी युक्ति से देखो तो सिद्ध है। अच्छी गंध आई ,मध्यम आई कि एकदम दुर्गंध आई तो अच्छी गंध में, मन को बहलावा मिला, मध्यम को मन को विशेष कोई आकर्षण नहीं हुआ और एकदम मलिन आई । तो मन को खिन्नता हुई तो खिन्नता मन को नहीं हुई थी, तभी भी तुम थे मन को खिन्नता आई, तभी भी तुम थे मन को