जाते हैं। सुख आया तो सुख के आकर्षण से हम छोटे हो जाते हैं, बढ़ जाते हैं। तो हालांकि सुख-दुख नश्वर है, पानी के तरंगों जैसा है।
*आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥*
✨️ये आगम और अपायी है। इसलिए इनको सह लो, इनको पचा लो। लेकिन हम अगर मनमुख हैं तो इनको सह ना पाएंगे, पचा ना पाएंगे। तो जरा सा सुख भी हमारे चित्त में रेखा डाल देगा, जरा सा दुख भी हमारे चित्त में रेखा डाल देगा। चित्त की अशुद्धि क्या है कि चित्त में संस्कार जगत के सत्यता के संस्कार पड़ना ही चित्त की अशुद्धि है। सुख आकर आकर्षण की रेखा डाल देगा। जैसे आईने में आपने सीधी रेखा डाली, तोड़ा, एक सीधा टुकड़ा लिया। फिर आपने टेढ़ा टुकड़ा करा तो आईना खंड-खंड हो गया। खंड-खंड आईना होने पर आप एक होने पर भी अनेक दिखेंगे। ऐसे ही चित्त में अनेक वृत्तियां होने के कारण आप एक सच्चिदानंद आनंद स्वरूप होते हुए भी अनेक रूपों में विभाजित, खंडित-खंडित दिखेंगे। और खंड में सुख नहीं है। इसीलिए नारद जी ने प्रार्थना की सनकादि ऋषियों को कि भगवान, मैं अतल, वितल, तलातल, रसातल, महातल, पाताल, भूलोक, भुवर्लोक, जनलोक, तपलोक, महलोक, ये सब जानता हूं। चार वेदों को जानता हूं। छह दर्शन जानता हूं। मंत्र विद्या, तंत्र विद्या, भूत विद्या, प्रेत विद्या ये सब जानता हूं। ऐसा नहीं कि बांदरी पाना घुमा के पाइपलाइन फिट करना ही जानता हूं तो होशियार हो गया। ये सब मैं जानता हूं। फिर भी जिससे जाना जाता है उस स्वरूप को नहीं जानता। उसमें विश्रांति नहीं।
✨️तो संयोग जन्य सुख है पति-पत्नी का सुख क्षण भर, दो क्षण, पांच क्षण। ऐसे ही कोई दुख है क्षण भर दुख। वो शाश्वत सुख मुझे नहीं। नारद जी बोलते हैं कि मैं और सब जानता हूं, घर में आग लगवाना कैसे वो जानता हूं और बुझाना कैसे वो भी जानता हूं। ये सब जानता हूं लेकिन जिससे जाना जाता है उस आत्मदेव में विश्रांति नहीं मिली। इसीलिए मैं आपके शरण हूं। अब उन बड़ी उम्र के और बड़ी विद्या और बड़ी प्रसिद्धि रखने वाले नारद जी नन्हे-मुन्ने बाल गोपाल के भाव में रहने वाले सनकादि ऋषियों के शरण गए। तब सनकादि ऋषियों ने कृपा करके उनको उपदेश दिया कि नारद,
"यो वै भूमा तत्सुखम्।" जब तू उस भूमा व्यापक ब्रह्म को जानेगा तब सुखी होगा। परिच्छिन्न मन के साथ जुड़कर कितना भी तुम सीख लो, कितना भी तुम पा लो, कितना भी तुम कर लो। अभी तुमको अच्छा लगेगा। लेकिन कालांतर में यही मन तुमको चार पैर वालों के घर में लाकर रख देगा। दो पैर वालों के घर में, उधर मीलाकर रख देगा। तो मन के अनुसार अगर हम करते आए तो मन पुष्ट हो जाएगा। कृपानाथ, कृपा कीजिए। जय जय।
✨️तो इसीलिए हमारे इस भूमंडल पे कोई न कोई ऐसा हमारा हितेषी हो जो हमारे मन पर लगाम करे। और जिसका कोई गुरु नहीं है, वो सचमुच में महा दरिद्र और महा अभागा है। और जिसके पास ब्रह्मवेत्ता रूपी गुरु का धन है, वो बाहर से कंगला दिखता हो, तीन टूक कोपीन न की, भाजी बिना लूण। कोपीन पर्ची तीन चिथड़े हो, अथवा तीन इंच की, तीन टुकड़े की कोपीन हो। भाजी तांदुलीया की ही और बिना लूण की हो। लेकिन हृदय में अगर आत्मरामी होने की तत्परता है, मनमुखता से पार होने की योग्यता है, तो इंद्र से भी ऊंचे आसन पर है।
✨️तो जो अभी सुख मिला या दुख मिला, घंटे भर के बाद उसका उतना प्रभाव नहीं रहेगा। ठीक है ना? अनुभव का, आपके अनुभव की बात है। अभी जो दुख दिखता है, घंटे भर बाद उतना उसका प्रभाव नहीं रहेगा। और दिन भर बाद उतना प्रभाव नहीं रहेगा। साल के बाद तो याद भी नहीं रहेगा, हजूर। रहेगा? बड़ी मुश्किल है याद रखने के लिए भी मेहनत करनी पड़ेगी। और 10-20 साल बीत गए तो याद कराने वाले भी नहीं रहेंगे सामने। अब तो जिसका कोई अस्तित्व नहीं, वही दुख और सुख हमें कितना खरीद लेता है, कितना नचा देता है। क्योंकि हम मन के साथ जुड़ गए, निगुरे हैं। निगुरे हैं। गुरु क्या कि जो गुरु हो वो महान। जैसे गुरु शिखर, बड़ा पहाड़, बड़ा शिखर। तो तिनखा छोटी हवा और झोंका आएगा तो हिलता रहेगा। लेकिन बड़े-बड़े तूफान चलेंगे तो भी पर्वत नहीं हिलता। ऐसे ही बड़े-बड़े सुख और दुख के अनुकूलता और प्रतिकूलता के जीवन में तूफान भी चालू उठें। फिर भी जिसकी समता, शांति, निष्ठा नहीं हिलती है, वो वास्तविक में गुरु है। और ऐसी जगह पर जो पहुंचाने की कोशिश में है या पहुंचने की कोशिश में है, वो शिष्य है। गुरु माना जो महान हो अथवा तो जो महान प्रतिष्ठा में, महान जगह में प्रतिष्ठित करने की क्षमता रखते हों, उन्हें हम गुरु कहते हैं। तो
कबीर जी ने कहा➖️
*गुरु धोबी, शिष्य कपड़ा। साबुन सर्जनहार।*
*सूरत शिला पर बैठ के निकले मैल अपार।*
*आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥*
✨️ये आगम और अपायी है। इसलिए इनको सह लो, इनको पचा लो। लेकिन हम अगर मनमुख हैं तो इनको सह ना पाएंगे, पचा ना पाएंगे। तो जरा सा सुख भी हमारे चित्त में रेखा डाल देगा, जरा सा दुख भी हमारे चित्त में रेखा डाल देगा। चित्त की अशुद्धि क्या है कि चित्त में संस्कार जगत के सत्यता के संस्कार पड़ना ही चित्त की अशुद्धि है। सुख आकर आकर्षण की रेखा डाल देगा। जैसे आईने में आपने सीधी रेखा डाली, तोड़ा, एक सीधा टुकड़ा लिया। फिर आपने टेढ़ा टुकड़ा करा तो आईना खंड-खंड हो गया। खंड-खंड आईना होने पर आप एक होने पर भी अनेक दिखेंगे। ऐसे ही चित्त में अनेक वृत्तियां होने के कारण आप एक सच्चिदानंद आनंद स्वरूप होते हुए भी अनेक रूपों में विभाजित, खंडित-खंडित दिखेंगे। और खंड में सुख नहीं है। इसीलिए नारद जी ने प्रार्थना की सनकादि ऋषियों को कि भगवान, मैं अतल, वितल, तलातल, रसातल, महातल, पाताल, भूलोक, भुवर्लोक, जनलोक, तपलोक, महलोक, ये सब जानता हूं। चार वेदों को जानता हूं। छह दर्शन जानता हूं। मंत्र विद्या, तंत्र विद्या, भूत विद्या, प्रेत विद्या ये सब जानता हूं। ऐसा नहीं कि बांदरी पाना घुमा के पाइपलाइन फिट करना ही जानता हूं तो होशियार हो गया। ये सब मैं जानता हूं। फिर भी जिससे जाना जाता है उस स्वरूप को नहीं जानता। उसमें विश्रांति नहीं।
✨️तो संयोग जन्य सुख है पति-पत्नी का सुख क्षण भर, दो क्षण, पांच क्षण। ऐसे ही कोई दुख है क्षण भर दुख। वो शाश्वत सुख मुझे नहीं। नारद जी बोलते हैं कि मैं और सब जानता हूं, घर में आग लगवाना कैसे वो जानता हूं और बुझाना कैसे वो भी जानता हूं। ये सब जानता हूं लेकिन जिससे जाना जाता है उस आत्मदेव में विश्रांति नहीं मिली। इसीलिए मैं आपके शरण हूं। अब उन बड़ी उम्र के और बड़ी विद्या और बड़ी प्रसिद्धि रखने वाले नारद जी नन्हे-मुन्ने बाल गोपाल के भाव में रहने वाले सनकादि ऋषियों के शरण गए। तब सनकादि ऋषियों ने कृपा करके उनको उपदेश दिया कि नारद,
"यो वै भूमा तत्सुखम्।" जब तू उस भूमा व्यापक ब्रह्म को जानेगा तब सुखी होगा। परिच्छिन्न मन के साथ जुड़कर कितना भी तुम सीख लो, कितना भी तुम पा लो, कितना भी तुम कर लो। अभी तुमको अच्छा लगेगा। लेकिन कालांतर में यही मन तुमको चार पैर वालों के घर में लाकर रख देगा। दो पैर वालों के घर में, उधर मीलाकर रख देगा। तो मन के अनुसार अगर हम करते आए तो मन पुष्ट हो जाएगा। कृपानाथ, कृपा कीजिए। जय जय।
✨️तो इसीलिए हमारे इस भूमंडल पे कोई न कोई ऐसा हमारा हितेषी हो जो हमारे मन पर लगाम करे। और जिसका कोई गुरु नहीं है, वो सचमुच में महा दरिद्र और महा अभागा है। और जिसके पास ब्रह्मवेत्ता रूपी गुरु का धन है, वो बाहर से कंगला दिखता हो, तीन टूक कोपीन न की, भाजी बिना लूण। कोपीन पर्ची तीन चिथड़े हो, अथवा तीन इंच की, तीन टुकड़े की कोपीन हो। भाजी तांदुलीया की ही और बिना लूण की हो। लेकिन हृदय में अगर आत्मरामी होने की तत्परता है, मनमुखता से पार होने की योग्यता है, तो इंद्र से भी ऊंचे आसन पर है।
✨️तो जो अभी सुख मिला या दुख मिला, घंटे भर के बाद उसका उतना प्रभाव नहीं रहेगा। ठीक है ना? अनुभव का, आपके अनुभव की बात है। अभी जो दुख दिखता है, घंटे भर बाद उतना उसका प्रभाव नहीं रहेगा। और दिन भर बाद उतना प्रभाव नहीं रहेगा। साल के बाद तो याद भी नहीं रहेगा, हजूर। रहेगा? बड़ी मुश्किल है याद रखने के लिए भी मेहनत करनी पड़ेगी। और 10-20 साल बीत गए तो याद कराने वाले भी नहीं रहेंगे सामने। अब तो जिसका कोई अस्तित्व नहीं, वही दुख और सुख हमें कितना खरीद लेता है, कितना नचा देता है। क्योंकि हम मन के साथ जुड़ गए, निगुरे हैं। निगुरे हैं। गुरु क्या कि जो गुरु हो वो महान। जैसे गुरु शिखर, बड़ा पहाड़, बड़ा शिखर। तो तिनखा छोटी हवा और झोंका आएगा तो हिलता रहेगा। लेकिन बड़े-बड़े तूफान चलेंगे तो भी पर्वत नहीं हिलता। ऐसे ही बड़े-बड़े सुख और दुख के अनुकूलता और प्रतिकूलता के जीवन में तूफान भी चालू उठें। फिर भी जिसकी समता, शांति, निष्ठा नहीं हिलती है, वो वास्तविक में गुरु है। और ऐसी जगह पर जो पहुंचाने की कोशिश में है या पहुंचने की कोशिश में है, वो शिष्य है। गुरु माना जो महान हो अथवा तो जो महान प्रतिष्ठा में, महान जगह में प्रतिष्ठित करने की क्षमता रखते हों, उन्हें हम गुरु कहते हैं। तो
कबीर जी ने कहा➖️
*गुरु धोबी, शिष्य कपड़ा। साबुन सर्जनहार।*
*सूरत शिला पर बैठ के निकले मैल अपार।*
गुरु है धोबी, शिष्य है कपड़ा। जब कपड़ा को धोबी धोता है तो लगता है कपड़ा को तो ये कि मेरे पीछे पड़ा है। हाथ धो के पीछे पड़ा है। तो उसको उसमें डब्बे में डालकर सोडा खाद डालते हैं, फिर अग्नि लगाया, तपाया उकड़ते पानी में। फिर बड़ी मुश्किल से बाहर निकला, थोड़ी ठंडी हवा खाई, हवा खाई तो भी धोबी छोड़ता नहीं। फिर धोबी ने हाथ में लिया, घुमा-घुमा के दे। फिर जहां-जहां देखता है कि दाग है, वहां-वहां दे साबुन, दे टीनोपोल, दे कुछ। और जहां दाग होगा वहां और मसालेदार वस्तु लगाएगा। तो कपड़ा को अगर प्राण होता तो उसी समय धोबी के साथ एटीकेटी कर लेता। लागी छूटे ना। जय जय। ऐसा लगता है। कुम्हार घड़े को दुश्मन लगता है। कपड़े को धोबी दुश्मन लगता है। पत्थर को शिल्पी दुश्मन लगता है। लेकिन शिल्पी पत्थर को भगवान की जगह पर प्रतिष्ठित कर देता है। और धोबी ही कपड़े को स्वच्छ, सुथरा करके देव मंदिर तक पहुंचाने की क्षमता रख देता है। और कुम्हार ही मिट्टी को रौंद-रौंद कर घरों में आदर की जगह पर, दूसरों को शीतलता पहुंचाने की जगह पर ही तो योग्यता दे देता है, वहीं रख देता है कुम्हार। ऐसे ही सद्गुरु इस साधक को, इस शिष्य को टींच-टांच के, घढ घढाके। धोबी को तो एक ही काम है कपड़े को धोना। कुम्हार का तो एक ही काम है कि घड़े को गढ़ना। और शिल्पी का एक ही काम है कि पत्थर में से मूर्ति प्रकट करना। लेकिन गुरु का तो महाराज एक ही गुरु के बहुत सारे काम हो जाते हैं। गुरु धोबी की नाई हमारे चित्त को धोते हैं। कुम्हार की नाई हमारे चित्त में संस्कार भरते हैं। और महाराज शिल्पी की नाई हमारे जीवत्व को ब्रह्मत्व में प्रकट करते हैं। और फिर जीवत्व और ब्रह्मत्व की भावनाओं से भी पार जहां वाणी नहीं जा सकती, उस पद पर प्रतिष्ठित कर देते हैं।
✨️तो शिष्य कुछ ना कुछ आध्यात्मिक रास्ते चला है तो कुदरती है कि जितना आप ईश्वर के रास्ते चलते हैं उतने पुण्य बढ़ते हैं। गुरु की सेवा या ईश्वर की सेवा। ईश्वर और गुरु कहने भर को दो हैं। हकीकत में ईश्वर साकार, ईश्वर तो हमने देखा नहीं। और निराकार वो निष्क्रिय है, निर्गुण है, अव्यक्त है। तो अपरोक्ष अपरोक्ष ईश्वर तो अव्यक्त है। और परोक्ष ईश्वर जो है वो तो निर्गुण है, निराकार है। परोक्ष ईश्वर तो हमने देखा नहीं, परोक्ष है। और अपरोक्ष तो है वो तो निर्गुण है, निराकार है। तो गुरु को देखते हैं जिन्होंने परोक्ष या अपरोक्ष तत्व को समझा है। तो गुरु के प्रति अगर श्रद्धा नहीं होगी तो फल क्या होगा कि आप गुरु के सेवा में रहे या गुरु के चरणों में पहुंचे तो जाने का, आने का, सत्संग सुनने का पुण्य हुआ। अब पुण्य होगा तो आपको सुख सुविधा मिलेगा, यश मिलेगा। तो या तो जीव का स्वभाव है, यश में फंस जाएगा, सुविधा में फंस जाएगा, मान में फंस जाएगा, पद में फंस जाएगा, प्रतिष्ठा में फंस जाएगा। तो फिर गुरु वहां कहेंगे कि ये तू गलती कर रहा है। अगर श्रद्धा नहीं है तो लगेगा कि गुरु हमारा यश नहीं सह सकते हैं। हमने शादी-वादी की और हवाई जहाज ही लाए तो गुरु टोकते हैं। हमको देख के गुरु राजी नहीं होते हैं। अगर श्रद्धा नहीं है तो गुरु के हितकारी वचन भी अहित हो के लगेंगे। जय जय। और फिर आंखें बंद हो जाएगी। ध्यान करने लग जाएंगे। अगर श्रद्धा पूर्ण है तो एक-एक वचन सुनते हुए हृदय धन्यता से अनुभव करने लगेगा धन्यता का। कि हमें भवसागर से निकालने के लिए कितनी-कितनी निगरानी रखते हैं, धन्य है। तो अगर श्रद्धा है तो उनका एक-एक वचन हम सही ढंग से लेंगे। और श्रद्धा हिली हुई है तो उनका एक-एक वचन हमारे चित्त में कुछ नई खलबलाहट पैदा कर देगा।
✨️तो ये जरूरी नहीं कि मां चॉकलेट ही खिलाती रहे। जो मां सदा मीठा खिलाती और मीठा बोलती और चॉकलेट खिलाती है, वो बच्चे का सत्यानाश करती है। और जो गुरु शिष्य को सदा मीठा ही बोलते रहते हैं और उसके ऊपर लगाम नहीं करते, वो गुरु भी शिष्य का ठीक से गढ़तर नहीं कर पाएंगे। तो प्रेम में अनुशासन की आवश्यकता है और अनुशासन में प्रेम की आवश्यकता है। अपने कल्याण की बात को भी गणकारता नहीं मन। और फिर गिरते-गिरते एक सीढ़ी गिरता है ना तो पता नहीं चलता। गिरते-गिरते जब एकदम अधो पे जाता है तब आदमी पश्चाताप करता है। तो लपसने से लपसने का जो सुख मिल रहा है वो लपसने का सुख नहीं है लेकिन सीढ़ियों से हम चढ़े हैं उस परिश्रम का फल है। तो मनमुख होने से जो मजा आता है वो मनमुख होने का मजा नहीं है। मनमुख होने का मजा होता तो सब निगुरे लोग सुखी होते। हैं? मनमुख होने का अगर मजा होता, मनमुख जीवन में अगर रस होता तो जो लोग निगुरे हैं, निपट निराले हैं, जैसा भी आया वो एकादशी भी नहीं मानते, माता-पिता को भी नहीं मानते और पुण्य-पाप को भी नहीं मानते, जैसा आया वैसा खाते हैं, जैसा आया वैसा करते हैं। तो वो लोग सुखी होना चाहिए क्योंकि उनको कोई बंधन नहीं।
✨️तो शिष्य कुछ ना कुछ आध्यात्मिक रास्ते चला है तो कुदरती है कि जितना आप ईश्वर के रास्ते चलते हैं उतने पुण्य बढ़ते हैं। गुरु की सेवा या ईश्वर की सेवा। ईश्वर और गुरु कहने भर को दो हैं। हकीकत में ईश्वर साकार, ईश्वर तो हमने देखा नहीं। और निराकार वो निष्क्रिय है, निर्गुण है, अव्यक्त है। तो अपरोक्ष अपरोक्ष ईश्वर तो अव्यक्त है। और परोक्ष ईश्वर जो है वो तो निर्गुण है, निराकार है। परोक्ष ईश्वर तो हमने देखा नहीं, परोक्ष है। और अपरोक्ष तो है वो तो निर्गुण है, निराकार है। तो गुरु को देखते हैं जिन्होंने परोक्ष या अपरोक्ष तत्व को समझा है। तो गुरु के प्रति अगर श्रद्धा नहीं होगी तो फल क्या होगा कि आप गुरु के सेवा में रहे या गुरु के चरणों में पहुंचे तो जाने का, आने का, सत्संग सुनने का पुण्य हुआ। अब पुण्य होगा तो आपको सुख सुविधा मिलेगा, यश मिलेगा। तो या तो जीव का स्वभाव है, यश में फंस जाएगा, सुविधा में फंस जाएगा, मान में फंस जाएगा, पद में फंस जाएगा, प्रतिष्ठा में फंस जाएगा। तो फिर गुरु वहां कहेंगे कि ये तू गलती कर रहा है। अगर श्रद्धा नहीं है तो लगेगा कि गुरु हमारा यश नहीं सह सकते हैं। हमने शादी-वादी की और हवाई जहाज ही लाए तो गुरु टोकते हैं। हमको देख के गुरु राजी नहीं होते हैं। अगर श्रद्धा नहीं है तो गुरु के हितकारी वचन भी अहित हो के लगेंगे। जय जय। और फिर आंखें बंद हो जाएगी। ध्यान करने लग जाएंगे। अगर श्रद्धा पूर्ण है तो एक-एक वचन सुनते हुए हृदय धन्यता से अनुभव करने लगेगा धन्यता का। कि हमें भवसागर से निकालने के लिए कितनी-कितनी निगरानी रखते हैं, धन्य है। तो अगर श्रद्धा है तो उनका एक-एक वचन हम सही ढंग से लेंगे। और श्रद्धा हिली हुई है तो उनका एक-एक वचन हमारे चित्त में कुछ नई खलबलाहट पैदा कर देगा।
✨️तो ये जरूरी नहीं कि मां चॉकलेट ही खिलाती रहे। जो मां सदा मीठा खिलाती और मीठा बोलती और चॉकलेट खिलाती है, वो बच्चे का सत्यानाश करती है। और जो गुरु शिष्य को सदा मीठा ही बोलते रहते हैं और उसके ऊपर लगाम नहीं करते, वो गुरु भी शिष्य का ठीक से गढ़तर नहीं कर पाएंगे। तो प्रेम में अनुशासन की आवश्यकता है और अनुशासन में प्रेम की आवश्यकता है। अपने कल्याण की बात को भी गणकारता नहीं मन। और फिर गिरते-गिरते एक सीढ़ी गिरता है ना तो पता नहीं चलता। गिरते-गिरते जब एकदम अधो पे जाता है तब आदमी पश्चाताप करता है। तो लपसने से लपसने का जो सुख मिल रहा है वो लपसने का सुख नहीं है लेकिन सीढ़ियों से हम चढ़े हैं उस परिश्रम का फल है। तो मनमुख होने से जो मजा आता है वो मनमुख होने का मजा नहीं है। मनमुख होने का मजा होता तो सब निगुरे लोग सुखी होते। हैं? मनमुख होने का अगर मजा होता, मनमुख जीवन में अगर रस होता तो जो लोग निगुरे हैं, निपट निराले हैं, जैसा भी आया वो एकादशी भी नहीं मानते, माता-पिता को भी नहीं मानते और पुण्य-पाप को भी नहीं मानते, जैसा आया वैसा खाते हैं, जैसा आया वैसा करते हैं। तो वो लोग सुखी होना चाहिए क्योंकि उनको कोई बंधन नहीं।
✨️मनमुखता अगर स्वतंत्रता है तो जो मनमुखी निगुरे हैं वे सुखी होने चाहिए और बुद्धिमान होने चाहिए। सीधी बात है एकदम लॉजिकल सिद्धांत है ये। मनमुखता से अगर सुख मिलता और महानता मिलती तो जो लोग मनमुख हैं वे सुखी होते। संतुष्ट होते, आनंदित होते, मुक्त होते, आत्मरामी होते। मनमुख होने से अगर आदमी सुखी हो सकता है तो सब मनमुखी लोग सुखी होते। अभी जो सुख है या थोड़ी हंसी है या थोड़ी मस्ती है या थोड़ी श्रद्धा है, ये भी कभी न कभी माता-पिता के और गुरुओं के गुरुमुखता के संस्कार ही तो अभी थोड़ी ऊंचाई पर ले आए हैं। अभी जो थोड़ी बहुत कोने-खांचे में श्रद्धा है, ये भी मां की कृपा है। बेचारे नट बोल्ट वाले पापा की कृपा है। तो हमारे जीवन में कई दुख आएंगे, कई सुख आएंगे, कई मान आएंगे, कई अपमान आएंगे। लेकिन हम अगर गुरुमुख हैं तो आसानी से उनको साधन बनाकर अपने साध्य तक पहुंच जाएंगे। और हम अगर मनमुख हैं तो एक-एक में गुलाटें खाते जाएंगे।
✨️जैसे कोई किसान 10 फीट कहीं खोदे फिर बोले यहां पानी की संभावना कम है। यह भूमि अच्छी है। यह अच्छा है। यहां खोदो। फिर दूसरा कोई आए, भूमि का ज्ञाता होकर और बोले, "अटनी पानी निकलेगा। अटैज निकलेगा।" आप जाओ रतलाम डिस्ट्रिक्ट में तो कई कुएं किए हुए हैं। और पूरे खानदान के पैसे लगा दिए और कर्जे पर दबे हुए किसान। पानी नहीं। लेकिन जहां एक डट के किया उचित जगह पर, उनका खेत खराब। ऐसे ही जीवन का रस पाने के लिए मनमुख होंगे तो कभी किसी चीज की प्रशंसा सुनेंगे, कभी किसी वस्तु की प्रशंसा सुनेंगे, कभी किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व देखकर प्रभावित होंगे, कभी वस्तु का प्रभाव से प्रभावित होंगे, कभी मंत्र के प्रभाव से, कभी साधना के प्रभाव से। तो हम अलग-अलग साधन करते जाएंगे। तो अलग-अलग रेखाएं पड़ती जाएगी। गहरी यात्रा होगी नहीं। खेत भी कुओं के रूप में बदल जाएगा। ना खेत रहा, ना पानी रहा और वह किसान दरिद्र हो जाता है। ऐसे ही ना मनुष्यता रही, ना ईश्वर साक्षात्कार रहा, आदमी दरिद्र हो जाता है। फिर वह खड़िया पलटन में चले जाते हैं।
✨️जो लोग साधु बन जाते हैं मौज में आकर और जहां-कहां दीक्षा ले लेते हैं। एक आदमी मुझे मिला। उसने बोला, "मैंने 48 गुरु किए।" और वह फक्र कर रहा था कि दत्तात्रेय ने 24 किए, मैंने 48 किए। लेकिन दुख की बात यह है कि मैं इतना सेक्सी हूं कि दो दिन भी नहीं बीतते और मेरे को 48 गुरुओं के पास भी कुछ नहीं मिला। और सब पंथ वालों का, सब संप्रदाय वालों का, महाराज, प्रसिद्ध से प्रसिद्ध क्या-क्या उसने वर्णन करा। कि उनके पास रहा 15 दिन। ऐसा किया, ऐसा सिखाया, कुछ नहीं मिला। उसके पास रहा, कुछ नहीं। और बड़ा थोड़ा बोलने में कुशल भी था। पढ़ाई-लिखाई के उसके पास पुछड़े भी बहुत सारे थे। प्रमाणपत्र। लेकिन उसने कहा कि, "बड़ा बेचैन हूं, बड़ी अशांति है। आपसे मंत्र दीक्षा लेने आया हूं।" मैं कहा, "माफ करो। हम तुमको शिष्य बनाने के योग्य नहीं है।" क्यों? कि वह पूरा मनमुख था। अब पूरा मनमुख था। मैं कहा, "शिविर भरो फिर देखा जाएगा। मैं दीक्षा नहीं दूंगा।" भोपाल में तो दीक्षा दे रहे थे हम। उसको नहीं दिया, उसको निकाल दिया बाहर।
*चिंता ऐसी डाकिनी काटी कलेजो खाए।*
*वैद्य बेचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए।*
जैसे चिंतित व्यक्ति को दवा असर नहीं करती। मन से हारे हुए व्यक्ति को दवा असर नहीं करती। ऐसे ही मन के चुंगल में फंसे हुए मनमुख व्यक्ति को गुरु उपदेश भी असर नहीं करता।
वासना ऐसी डाकिनी काटी कलेजो खाए।
साईं बेचारा क्या करे, कहां तक कथा सुनाए।
✨️तो व्यक्तित्व को पोसने की वासना, सुख-दुख में सत्य बुद्धि की जो वासना है, यह हमारे जीवन को कोर के खा लेती है। प्रिंटिंग होता है जो कपड़े में जान होती है। जो कपड़ा सड़ा-गला हुआ है, उस पर प्रिंटिंग करने वाला बेवकूफ है। ऐसे ही जिसका जीवन अंदर से अश्रद्धा से और गुरुओं की परीक्षा के भाव से, गुरु बदलने के शौक से, जिनका जीवन खोखला हो गया, उन पर फिर दीक्षा का मोहर मारने की जरूरत क्या है?
✨️एक आदमी ने खूब शराब पी थी और वह चिल्ला रहा था, "मेरी पत्नी दिखाओ, मेरे बच्चे दिखाओ। मेरे बेटों को मिलना है मुझे।" अब शराब पिया, धुलेंडी के दिन घर में बैठकर और शराब के नशे में कह रहा है कि मुझे घर ले चलो। अब क्या उसको आप घर ले जाएंगे या बच्चे और पत्नी लाकर सामने रखेंगे? आप जो आदमी शराब के नशे में घर में बैठे हुए बोलता है, "मुझे अपने घर ले चलो, मुझे बीवी-बच्चे दिखाओ।" और जो आदमी उसको समझाने लगाए, वह शराबी से भी ज्यादा शराबी है। अब शराबी को समझाना यह कम शराबियों का काम नहीं है। जो शराब के नशे में और उनको जो समझा रहे हैं, समझ लो उसने ज्यादा शराब पी है। जो दारू के नशे में है और उसको जो सीखामन दे रहा है, सीख दे रहा है, तो वह कम नशे में नहीं है सीख देने वाला। जो नशे में पुर है, उसको तुम सीख दे रहे हो तो तुम सवाय नशे में हो। उसको सीख देने की जरूरत नहीं। उसके
✨️जैसे कोई किसान 10 फीट कहीं खोदे फिर बोले यहां पानी की संभावना कम है। यह भूमि अच्छी है। यह अच्छा है। यहां खोदो। फिर दूसरा कोई आए, भूमि का ज्ञाता होकर और बोले, "अटनी पानी निकलेगा। अटैज निकलेगा।" आप जाओ रतलाम डिस्ट्रिक्ट में तो कई कुएं किए हुए हैं। और पूरे खानदान के पैसे लगा दिए और कर्जे पर दबे हुए किसान। पानी नहीं। लेकिन जहां एक डट के किया उचित जगह पर, उनका खेत खराब। ऐसे ही जीवन का रस पाने के लिए मनमुख होंगे तो कभी किसी चीज की प्रशंसा सुनेंगे, कभी किसी वस्तु की प्रशंसा सुनेंगे, कभी किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व देखकर प्रभावित होंगे, कभी वस्तु का प्रभाव से प्रभावित होंगे, कभी मंत्र के प्रभाव से, कभी साधना के प्रभाव से। तो हम अलग-अलग साधन करते जाएंगे। तो अलग-अलग रेखाएं पड़ती जाएगी। गहरी यात्रा होगी नहीं। खेत भी कुओं के रूप में बदल जाएगा। ना खेत रहा, ना पानी रहा और वह किसान दरिद्र हो जाता है। ऐसे ही ना मनुष्यता रही, ना ईश्वर साक्षात्कार रहा, आदमी दरिद्र हो जाता है। फिर वह खड़िया पलटन में चले जाते हैं।
✨️जो लोग साधु बन जाते हैं मौज में आकर और जहां-कहां दीक्षा ले लेते हैं। एक आदमी मुझे मिला। उसने बोला, "मैंने 48 गुरु किए।" और वह फक्र कर रहा था कि दत्तात्रेय ने 24 किए, मैंने 48 किए। लेकिन दुख की बात यह है कि मैं इतना सेक्सी हूं कि दो दिन भी नहीं बीतते और मेरे को 48 गुरुओं के पास भी कुछ नहीं मिला। और सब पंथ वालों का, सब संप्रदाय वालों का, महाराज, प्रसिद्ध से प्रसिद्ध क्या-क्या उसने वर्णन करा। कि उनके पास रहा 15 दिन। ऐसा किया, ऐसा सिखाया, कुछ नहीं मिला। उसके पास रहा, कुछ नहीं। और बड़ा थोड़ा बोलने में कुशल भी था। पढ़ाई-लिखाई के उसके पास पुछड़े भी बहुत सारे थे। प्रमाणपत्र। लेकिन उसने कहा कि, "बड़ा बेचैन हूं, बड़ी अशांति है। आपसे मंत्र दीक्षा लेने आया हूं।" मैं कहा, "माफ करो। हम तुमको शिष्य बनाने के योग्य नहीं है।" क्यों? कि वह पूरा मनमुख था। अब पूरा मनमुख था। मैं कहा, "शिविर भरो फिर देखा जाएगा। मैं दीक्षा नहीं दूंगा।" भोपाल में तो दीक्षा दे रहे थे हम। उसको नहीं दिया, उसको निकाल दिया बाहर।
*चिंता ऐसी डाकिनी काटी कलेजो खाए।*
*वैद्य बेचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए।*
जैसे चिंतित व्यक्ति को दवा असर नहीं करती। मन से हारे हुए व्यक्ति को दवा असर नहीं करती। ऐसे ही मन के चुंगल में फंसे हुए मनमुख व्यक्ति को गुरु उपदेश भी असर नहीं करता।
वासना ऐसी डाकिनी काटी कलेजो खाए।
साईं बेचारा क्या करे, कहां तक कथा सुनाए।
✨️तो व्यक्तित्व को पोसने की वासना, सुख-दुख में सत्य बुद्धि की जो वासना है, यह हमारे जीवन को कोर के खा लेती है। प्रिंटिंग होता है जो कपड़े में जान होती है। जो कपड़ा सड़ा-गला हुआ है, उस पर प्रिंटिंग करने वाला बेवकूफ है। ऐसे ही जिसका जीवन अंदर से अश्रद्धा से और गुरुओं की परीक्षा के भाव से, गुरु बदलने के शौक से, जिनका जीवन खोखला हो गया, उन पर फिर दीक्षा का मोहर मारने की जरूरत क्या है?
✨️एक आदमी ने खूब शराब पी थी और वह चिल्ला रहा था, "मेरी पत्नी दिखाओ, मेरे बच्चे दिखाओ। मेरे बेटों को मिलना है मुझे।" अब शराब पिया, धुलेंडी के दिन घर में बैठकर और शराब के नशे में कह रहा है कि मुझे घर ले चलो। अब क्या उसको आप घर ले जाएंगे या बच्चे और पत्नी लाकर सामने रखेंगे? आप जो आदमी शराब के नशे में घर में बैठे हुए बोलता है, "मुझे अपने घर ले चलो, मुझे बीवी-बच्चे दिखाओ।" और जो आदमी उसको समझाने लगाए, वह शराबी से भी ज्यादा शराबी है। अब शराबी को समझाना यह कम शराबियों का काम नहीं है। जो शराब के नशे में और उनको जो समझा रहे हैं, समझ लो उसने ज्यादा शराब पी है। जो दारू के नशे में है और उसको जो सीखामन दे रहा है, सीख दे रहा है, तो वह कम नशे में नहीं है सीख देने वाला। जो नशे में पुर है, उसको तुम सीख दे रहे हो तो तुम सवाय नशे में हो। उसको सीख देने की जरूरत नहीं। उसके
आगे बीवी-बच्चे या घर लाने की जरूरत नहीं। उसका नशा उतार दो तो बीवी-बच्चे और घर में तो वह है ही।
✨️*ऐसे ही साधक को मनमुखता का नशा चढ़ गया। उसी लिए चाहता है, "सुख चाहिए, भगवान चाहिए, मुक्ति चाहिए।" अब मुक्ति, भगवान पकड़ के लाया नहीं जाता। केवल उसके अविद्या का, मनमुखता का नशा उतार दो तो भगवान, मुक्ति तो उसके पास ही है। वही तो बैठा है।* भगवान में ही बैठा है, मुक्ति में ही तो बैठा है, आनंद में ही तो बैठा है, सत्य में ही तो बैठा है। सत्य लाना नहीं, भगवान लाना नहीं, मोक्ष लाना नहीं। केवल नशा उतारना है।
*"पीत्वा मोहमयीं मदिरां संसारे भूत्वोन्मत्तः।"*
✨️मोहमई मदिरा पीकर, हमारी मनमुखता का हम नशा पीकर उन्मत हो रहे हैं। खाने को नहीं है, उस लिए दुखी इतने लोग नहीं मिलेंगे। वस्तुओं के अभाव के कारण दुख नहीं है। लेकिन सद्गुरुओं की कृपा पचाने की पात्रता नहीं है, उस लिए हम दुखी हैं। नहीं तो वे लोग भी हैं जिनको दिन को खाने को नहीं, रात को सोने को नहीं और वस्त्र पहनने को नहीं। फिर भी शुकदेव जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हैं और लाखों लोगों के तारणहार हो गए। शुकदेव जी के पास क्या था रहने को, खाने को और सुविधाएं? लेकिन गुरु तत्व की बात मानी। लाखों लोगों के तारणहार बन गए। और रावण के पास क्या नहीं था? सुख, सुविधा आदि-आदि। और फिर भी देखो। तो ठीक समझ ना होने के कारण, मनमुख होने के कारण ही हम दुखी हैं। जो भी दुख है मनमुखता के सिवाय टिक नहीं सकता। बिना मनमुख हुए कोई दुख टिक नहीं सकता। पहले मनमुख होंगे, बाद में दुख टिकेगा, दुख आएगा। नहीं तो दुख नहीं आएगा। आप ठीक से गुरुमुख हैं तो आपके सामने दुख आ नहीं सकता। दुख टिक नहीं सकता। आएगा दुख लेकिन वह दुख आपकी निगाह पड़ते ही सुख में बदल जाएगा, साधन में बदल जाएगा अगर आप गुरुमुख हैं तो। क्या बात करते हो?
✨️ महावीर के जीवन की कथा आती है कि महावीर जब चलते थे तो कंकर उनके लिए बकमल बन जाता था और कांटा उनके लिए फूल का काम करता था। सांप ने काटा तो सांप को पीने के लिए महावीर के शरीर से दूध की धारा बह चली। अब हकीकत में जो महापुरुष होते हैं, उनके जीवन को समझाने के लिए इर्द-गिर्द की कल्पना करके कथाएं रची जाती थी। कांटा फूल बन जाता है और कंकर बकमल बन जाता है तो उसका मतलब यह नहीं कि महावीर चलते हैं और कंकर सब बकमल हो गए, कांटे फूल होकर खिले, सांप ने काटा तो रक्त की जगह पर दूध बहा। अगर रक्त की जगह पर दूध बहता तो महावीर जी का शरीर दूध से संचित था। तो फिर उनको पेचिस की बीमारी नहीं होनी चाहिए। अंत समय उनको पेचिस की बीमारी हुई जो साधारण व्यक्तियों को होती है। जो रक्त है शरीर में कभी आप खाओ, कभी ना खाओ। तो जठरा कमजोर हो जाएगी। और पेचिस की बीमारी की संभावना है। तो महावीर ने 12 साल में एक साल भोजन किया था। कभी 6 दिन में तो कभी 16 दिन में तो कभी 6 घंटे में। जब-जब समाधि से उतरे खा लिया। नहीं तो उपवास थे। उप माना समीप। आत्मा के समीप वास था, उस लिए भूख-प्यास नहीं लगती थी। महावीर जी इतने स्वरूप में मस्त रहे कि महाराज मन और प्राण शांत हो गए, भूख नहीं लगी। तो कभी 15 दिन में, कभी 25 दिन में तो 12 साल में 365 बार भोजन किए, एक साल भोजन किए। तो उसका असर पड़ा जठरा पर। और ढलते हुए जीवन वक्त, जवानी की की हुई शारीरिक बेपरवाही ढलते हुए जीवन पर असर डालती है। तो महावीर जी को पेचिस की बीमारी हुई। और 6 महीने तक इस पीड़ा में उनका शरीर पीड़ित रहा और अंत में देव।
✨️तो मानना पड़ेगा कि महावीर जी के शरीर से जब सांप ने काटा तो दूध बहा नहीं होगा, रक्त ही होगा। लेकिन महावीर के चित्त में मेरा रक्त बह रहा है, हाय-हाय का भाव नहीं हो रहा होगा। क्योंकि वह तो उपवास में थे। ईश्वर के समीप थे, शांति में थे। इसलिए कथा घढने वाले ने ठीक लिखा है कि महावीर को सांप ने काटा तो उसके लिए उनके शरीर से रक्त के बजाय मानो दूध बह रहा है। सर्प के प्रति हिंसा वृत्ति नहीं हुई। और मैं मर गया हूं या मुझे काट रहा है, हाय मैं मरा, ऐसा भाव नहीं है। तो मानो सांप के लिए दूध बहा। महावीर जब चलते हैं तो कांटे फूल बन जाते हैं। उसका मतलब कांटा, कांटा जब चुभा तब भी उस परमात्मा की सुवास आई और कंकर भी जब लगा तो उसी यार की शांति आई। यही उस कथा का अर्थ होता है।
✨️तो जो गुरुमुख है या आत्मा के समीप है, उन लोगों के आगे दुख, विघ्न, बाधा आ नहीं सकते और आए तो वह रूप बदल जाते हैं। क्योंकि कंकर भी फूल बन जाते हैं और कांटे फूल बन जाते हैं और कंकर बकमल हो जाते हैं और सर्प दंश भी उनके लिए यार की याद बन जाता है। तो मनमुखता के बिना दुख टिक नहीं सकता। मनमुखता के बिना जन्म-मरण की शूली रह नहीं सकती। पहले मनमुखता चाहिए, बाद में जन्म-मरण। अगर मनमुखता नहीं है, हम ठीक ब्रह्मवेत्ता के गुरुओं के आदेश के अनुसार जीते हैं ना तो महाराज बहुत थोड़े समय में यात्रा हो जाती है। और मन के अनुसार करते रहते हैं तो ना जाने कितने
✨️*ऐसे ही साधक को मनमुखता का नशा चढ़ गया। उसी लिए चाहता है, "सुख चाहिए, भगवान चाहिए, मुक्ति चाहिए।" अब मुक्ति, भगवान पकड़ के लाया नहीं जाता। केवल उसके अविद्या का, मनमुखता का नशा उतार दो तो भगवान, मुक्ति तो उसके पास ही है। वही तो बैठा है।* भगवान में ही बैठा है, मुक्ति में ही तो बैठा है, आनंद में ही तो बैठा है, सत्य में ही तो बैठा है। सत्य लाना नहीं, भगवान लाना नहीं, मोक्ष लाना नहीं। केवल नशा उतारना है।
*"पीत्वा मोहमयीं मदिरां संसारे भूत्वोन्मत्तः।"*
✨️मोहमई मदिरा पीकर, हमारी मनमुखता का हम नशा पीकर उन्मत हो रहे हैं। खाने को नहीं है, उस लिए दुखी इतने लोग नहीं मिलेंगे। वस्तुओं के अभाव के कारण दुख नहीं है। लेकिन सद्गुरुओं की कृपा पचाने की पात्रता नहीं है, उस लिए हम दुखी हैं। नहीं तो वे लोग भी हैं जिनको दिन को खाने को नहीं, रात को सोने को नहीं और वस्त्र पहनने को नहीं। फिर भी शुकदेव जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हैं और लाखों लोगों के तारणहार हो गए। शुकदेव जी के पास क्या था रहने को, खाने को और सुविधाएं? लेकिन गुरु तत्व की बात मानी। लाखों लोगों के तारणहार बन गए। और रावण के पास क्या नहीं था? सुख, सुविधा आदि-आदि। और फिर भी देखो। तो ठीक समझ ना होने के कारण, मनमुख होने के कारण ही हम दुखी हैं। जो भी दुख है मनमुखता के सिवाय टिक नहीं सकता। बिना मनमुख हुए कोई दुख टिक नहीं सकता। पहले मनमुख होंगे, बाद में दुख टिकेगा, दुख आएगा। नहीं तो दुख नहीं आएगा। आप ठीक से गुरुमुख हैं तो आपके सामने दुख आ नहीं सकता। दुख टिक नहीं सकता। आएगा दुख लेकिन वह दुख आपकी निगाह पड़ते ही सुख में बदल जाएगा, साधन में बदल जाएगा अगर आप गुरुमुख हैं तो। क्या बात करते हो?
✨️ महावीर के जीवन की कथा आती है कि महावीर जब चलते थे तो कंकर उनके लिए बकमल बन जाता था और कांटा उनके लिए फूल का काम करता था। सांप ने काटा तो सांप को पीने के लिए महावीर के शरीर से दूध की धारा बह चली। अब हकीकत में जो महापुरुष होते हैं, उनके जीवन को समझाने के लिए इर्द-गिर्द की कल्पना करके कथाएं रची जाती थी। कांटा फूल बन जाता है और कंकर बकमल बन जाता है तो उसका मतलब यह नहीं कि महावीर चलते हैं और कंकर सब बकमल हो गए, कांटे फूल होकर खिले, सांप ने काटा तो रक्त की जगह पर दूध बहा। अगर रक्त की जगह पर दूध बहता तो महावीर जी का शरीर दूध से संचित था। तो फिर उनको पेचिस की बीमारी नहीं होनी चाहिए। अंत समय उनको पेचिस की बीमारी हुई जो साधारण व्यक्तियों को होती है। जो रक्त है शरीर में कभी आप खाओ, कभी ना खाओ। तो जठरा कमजोर हो जाएगी। और पेचिस की बीमारी की संभावना है। तो महावीर ने 12 साल में एक साल भोजन किया था। कभी 6 दिन में तो कभी 16 दिन में तो कभी 6 घंटे में। जब-जब समाधि से उतरे खा लिया। नहीं तो उपवास थे। उप माना समीप। आत्मा के समीप वास था, उस लिए भूख-प्यास नहीं लगती थी। महावीर जी इतने स्वरूप में मस्त रहे कि महाराज मन और प्राण शांत हो गए, भूख नहीं लगी। तो कभी 15 दिन में, कभी 25 दिन में तो 12 साल में 365 बार भोजन किए, एक साल भोजन किए। तो उसका असर पड़ा जठरा पर। और ढलते हुए जीवन वक्त, जवानी की की हुई शारीरिक बेपरवाही ढलते हुए जीवन पर असर डालती है। तो महावीर जी को पेचिस की बीमारी हुई। और 6 महीने तक इस पीड़ा में उनका शरीर पीड़ित रहा और अंत में देव।
✨️तो मानना पड़ेगा कि महावीर जी के शरीर से जब सांप ने काटा तो दूध बहा नहीं होगा, रक्त ही होगा। लेकिन महावीर के चित्त में मेरा रक्त बह रहा है, हाय-हाय का भाव नहीं हो रहा होगा। क्योंकि वह तो उपवास में थे। ईश्वर के समीप थे, शांति में थे। इसलिए कथा घढने वाले ने ठीक लिखा है कि महावीर को सांप ने काटा तो उसके लिए उनके शरीर से रक्त के बजाय मानो दूध बह रहा है। सर्प के प्रति हिंसा वृत्ति नहीं हुई। और मैं मर गया हूं या मुझे काट रहा है, हाय मैं मरा, ऐसा भाव नहीं है। तो मानो सांप के लिए दूध बहा। महावीर जब चलते हैं तो कांटे फूल बन जाते हैं। उसका मतलब कांटा, कांटा जब चुभा तब भी उस परमात्मा की सुवास आई और कंकर भी जब लगा तो उसी यार की शांति आई। यही उस कथा का अर्थ होता है।
✨️तो जो गुरुमुख है या आत्मा के समीप है, उन लोगों के आगे दुख, विघ्न, बाधा आ नहीं सकते और आए तो वह रूप बदल जाते हैं। क्योंकि कंकर भी फूल बन जाते हैं और कांटे फूल बन जाते हैं और कंकर बकमल हो जाते हैं और सर्प दंश भी उनके लिए यार की याद बन जाता है। तो मनमुखता के बिना दुख टिक नहीं सकता। मनमुखता के बिना जन्म-मरण की शूली रह नहीं सकती। पहले मनमुखता चाहिए, बाद में जन्म-मरण। अगर मनमुखता नहीं है, हम ठीक ब्रह्मवेत्ता के गुरुओं के आदेश के अनुसार जीते हैं ना तो महाराज बहुत थोड़े समय में यात्रा हो जाती है। और मन के अनुसार करते रहते हैं तो ना जाने कितने
तीर्थों में जाना पड़ता है, कितने व्रत करने पड़ते हैं, कितने रंग बदलने पड़ते हैं, कितने रूप बदलने पड़ते हैं, कितना क्या-क्या करना पड़ता है। पहले यह टीला करते थे हम 10 साल, वह दीक्षा मेरे अब फिर यूं टीला करते हो 5 साल उसको हो गए। अब फिर सब छोड़-छाड़ के धुणा दुखाते हैं, उसमें 11 साल हो गए। भाई कुछ करने की जरूरत अगर उचित ब्रह्मवेत्ता गुरु मिल जाए तो।
✨️इसी लिए तो कहा है हिंदी मे➖️
*ईश कृपा बिन गुरु नहीं। गुरु बिना नहीं ज्ञान।*
*ज्ञान बिना आत्मा नहीं। सब ही वेद पुराण।*
*उस आत्मज्ञान के बिना, ज्ञान के बिना, स्वरूप के ज्ञान बिना अंतर्यामी आत्मा होते हुए भी हमारे लिए नहीं है। हमारा परमात्मा विश्व नेता हमारे साथ होते हुए भी हमारे लिए नहीं है। क्योंकि हम मनमुख हैं।*
🙏🙏🕉️
✨️इसी लिए तो कहा है हिंदी मे➖️
*ईश कृपा बिन गुरु नहीं। गुरु बिना नहीं ज्ञान।*
*ज्ञान बिना आत्मा नहीं। सब ही वेद पुराण।*
*उस आत्मज्ञान के बिना, ज्ञान के बिना, स्वरूप के ज्ञान बिना अंतर्यामी आत्मा होते हुए भी हमारे लिए नहीं है। हमारा परमात्मा विश्व नेता हमारे साथ होते हुए भी हमारे लिए नहीं है। क्योंकि हम मनमुख हैं।*
🙏🙏🕉️
🥀💠❣️
📍*02.06.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
=====================
*🌊 मूल बात* 🔱
जब हम ज्ञान और गुरु की नज़र से देखते हैं तो हम अपने आप को जानने की तरफ झुकते हैं। तब भोग और आसक्ति की अपेक्षा खुद ही कम हो जाती है। अपेक्षा ही बंधन बनती है।
*🪔 समझाने वाला उदाहरण*🥀
गंगा किनारे दिया, दूना, फुग्गी बहती रहती है। उनकी न गिनती रहती है न आकृति। लेकिन अगर “ये मेरा दिया है” की पकड़ हो गई तो दुःख होता है। धुआँ इधर जाए या उधर, पकड़ ही परेशान करती है।
*🔓 रास्ता* 💥
_अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः_ – जो बाहर की अपेक्षा छोड़ दे और अपने स्वरूप के सुख में स्थित हो जाए, उसकी व्यथा मिट जाती है। आसक्ति ही अशुद्धि है।
*🛶 जीने का तरीका*🛐
संसार में सुख-दुःख, मान-अपमान सब बहती नाव की तरह है। अगर ज्ञान की किश्ती में बैठे रहो तो शांति रहती है। सुख-दुःख तो पानी की लहरें हैं, आते-जाते रहते हैं।
*🧼 गुरु का काम* 💖
गुरु धोबी है, हम कपड़ा। दाग छुड़ाने के लिए रगड़ते हैं, तपाते हैं। वही हमारे संस्कार मिटाकर जीव को ब्रह्म में स्थित करते हैं। गुरु कुम्हार और शिल्पी भी हैं – मिट्टी को बर्तन और पत्थर को मूर्ति बना देते हैं।
*💎 सच्चा धन* 🥀
आत्म-सुख ही असली धन है। देह और संबंधों का सुख बंधन है। गुरु बिना इंसान अंदर से खाली है, चाहे बाहर से कितना भी बड़ा दिखे।
*🔥 चेतावनी* 💥
बस मनमुख होकर इधर-उधर भटकने से कुछ नहीं होता। जैसे शराबी को घर नहीं, नशा उतारना ज़रूरी है। वैसे ही हमें मोक्ष नहीं, मनमुखता का नशा उतारना ज़रूरी है। भगवान तो पहले से ही अंदर बैठे हैं।
*🕉️ सार*
_ईश कृपा बिन गुरु नहीं। गुरु बिना नहीं ज्ञान।_
_ज्ञान बिना आत्मा नहीं। सब ही वेद पुराण।_
*गुरुमुख बनो, मनमुखता छोड़ो 🙏 बस इतना समझ लो तो जीवन का रास्ता साफ हो जाएगा।*
🙏🙏🕉️
📍*02.06.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
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*🌊 मूल बात* 🔱
जब हम ज्ञान और गुरु की नज़र से देखते हैं तो हम अपने आप को जानने की तरफ झुकते हैं। तब भोग और आसक्ति की अपेक्षा खुद ही कम हो जाती है। अपेक्षा ही बंधन बनती है।
*🪔 समझाने वाला उदाहरण*🥀
गंगा किनारे दिया, दूना, फुग्गी बहती रहती है। उनकी न गिनती रहती है न आकृति। लेकिन अगर “ये मेरा दिया है” की पकड़ हो गई तो दुःख होता है। धुआँ इधर जाए या उधर, पकड़ ही परेशान करती है।
*🔓 रास्ता* 💥
_अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः_ – जो बाहर की अपेक्षा छोड़ दे और अपने स्वरूप के सुख में स्थित हो जाए, उसकी व्यथा मिट जाती है। आसक्ति ही अशुद्धि है।
*🛶 जीने का तरीका*🛐
संसार में सुख-दुःख, मान-अपमान सब बहती नाव की तरह है। अगर ज्ञान की किश्ती में बैठे रहो तो शांति रहती है। सुख-दुःख तो पानी की लहरें हैं, आते-जाते रहते हैं।
*🧼 गुरु का काम* 💖
गुरु धोबी है, हम कपड़ा। दाग छुड़ाने के लिए रगड़ते हैं, तपाते हैं। वही हमारे संस्कार मिटाकर जीव को ब्रह्म में स्थित करते हैं। गुरु कुम्हार और शिल्पी भी हैं – मिट्टी को बर्तन और पत्थर को मूर्ति बना देते हैं।
*💎 सच्चा धन* 🥀
आत्म-सुख ही असली धन है। देह और संबंधों का सुख बंधन है। गुरु बिना इंसान अंदर से खाली है, चाहे बाहर से कितना भी बड़ा दिखे।
*🔥 चेतावनी* 💥
बस मनमुख होकर इधर-उधर भटकने से कुछ नहीं होता। जैसे शराबी को घर नहीं, नशा उतारना ज़रूरी है। वैसे ही हमें मोक्ष नहीं, मनमुखता का नशा उतारना ज़रूरी है। भगवान तो पहले से ही अंदर बैठे हैं।
*🕉️ सार*
_ईश कृपा बिन गुरु नहीं। गुरु बिना नहीं ज्ञान।_
_ज्ञान बिना आत्मा नहीं। सब ही वेद पुराण।_
*गुरुमुख बनो, मनमुखता छोड़ो 🙏 बस इतना समझ लो तो जीवन का रास्ता साफ हो जाएगा।*
🙏🙏🕉️
🙏2
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🌹 *04.06.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन*🏵️
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💥*जीवन मुक्त ज्ञानी पुरुष का स्वरूप और उसकी महिमा।*
✨️जीवन मुक्त आत्म पद उसमें जो टिक गया उसका जीवन होता है कुम्हार के चाक की नाई जैसे चाक घूमता है ऐसे उसके प्रारब्ध के अनुसार उसका कर्म हो जाता है अपने अंदर कर्ता भोक्तापना का बोझा नहीं उठाता वो हां वह पुरुष शरीर रूपी नगर में राज्य करता है और लेपायमान नहीं है हां नागरिक होकर नहीं जीता राजा होकर जीता है शरीर में शरीर का राजा है और लेपायमान नहीं होता वह ज्ञानी जीवन मुक्त पुरुष उसको भोग और मोक्ष दोनों सिद्ध होते हैं
✨️ज्ञानी का प्रारब्ध ऐसा होता है कि संसार के भोग भी उसके आगे हाजिर और मोक्ष भी उसकी मुट्ठी में है भोग मोक्ष दोनों पदार्थ सिद्ध हो जाते हैं उसको संसारी का तो बेचारे को भोग भी नहीं मिलता भोग भोगते भोगते अपना भोग दे देता है भोग को इकट्ठा करते करते अपनी जिंदगी सुखा देता है ज्ञानी गुरु के चरणों में अपना आत्मज्ञान पा लेता है फिर भोग और मोक्ष दोनों उसके दास बन जाते हैं शरीर रूपी नगर में सुख से जीता है शरीर की पीड़ा होते हुए भी वो सुखी रहता है दो मिनट जाओ तो सब दुःख दूर चिंता दूर सारे प्रॉब्लम सॉल्व खाली दो मिनट ज्ञानी के गांव में ज्ञानी का गांव कौन सा है देख लो सुना दो फिर से
✨️उनके देश उदारता धीरज संतोष वैराग्य समता मित्रता मुदिता और उपेक्षा है उनमें अज्ञान नहीं प्रवेश करने पाता है और आप ध्यान रूपी नगर में रहता है सत्यता और एकता दोनों स्त्रियों को साथ रखता है और उनसे सदा शोभायमान रहता है जैसे चंद्रमा चित्रा और विशाखा दोनों स्त्रियों से शोभता है
*पूज्य बापूजी*- चंद्रमा की दो पत्नियां है ना चित्रा विशाखा दोनों से शोभता है ऐसे ज्ञानवान..ज्ञानवान का देश क्या है➖️
🔥मैत्री 🔥करुणा
🔥मुदिता 🔥उपेक्षा
🔥शांति 🔥वैराग्य
🔥समता 🔥एकरस्ता
🔥और आत्मा में प्रीति
✨️ये ज्ञानी का स्वभाव है ज्ञानी का देश होता है ज्ञान आत्मा का है अपने दुनिया भर का तो ज्ञान हो जाए लेकिन वो सब मन तक होता है बायोलॉजी साइकोलॉजी टेलीपैथी टेक्नोलॉजी ये सारे जो हैं ये सारी की गति मन तक होती है बुद्धि वृत्ति तक होती है लेकिन आत्म साक्षात्कार मन और बुद्धि से परे की चीज होता है इसलिए दुनिया की सारी चीजों का ख्याल कोई पता लगा ले फिर भी उसको पूर्ण तृप्ति नहीं मिलेगी शांति नहीं मिलेगी और आत्मा का कोई पता लगा ले उसको फिर अशांति नहीं मिलेगी दुनिया के सब लोग विरुद्ध हो जाएं सारी चीजें उससे छीन ली जाए फिर भी आत्मा को कोई घाटा नहीं दुनिया के सब लोग उसकी फेवर करें एक आदमी की सारी चीजें एक आदमी को दे दे फिर भी पूर्ण निर्भीक नहीं रहेगा क्योंकि मौत का भय तो लगा रहेगा चीजें चली ना जाए वो भी भय बना रहेगा *पूरा निर्भय तो आत्मज्ञानी होता है निश्चिंतता निर्भयता सुहृदता समता ये ज्ञानी का देश है ईर्ष्या भोग वासना लोलुपता मरने का भय जीने की लालच ये अज्ञानी का गांव है*
✨️जीने की लालच से कोई लंबा जिया हो ये तो दिखता नहीं सब मर रहे हैं मरने के भय से कोई मरने से बच रहा है वो भी नहीं दिखता है जहां मौत नहीं होती वहां आत्मा में चले आओ आत्मा की कभी मौत नहीं होती शरीर सदा रहता नहीं दूसरा ज्ञानी में ये होता है मैत्री जो अच्छे आदमी हैं उनसे हैं ज्ञानवान के रास्ते जाते हैं आत्मवेत्ता हैं उनसे उनकी मैत्री होती है ब्रह्मा विष्णु और महेश से ज्ञानी की मैत्री होती है दोस्ती ज्ञानी कगरता नहीं ब्रह्मा विष्णु महेश को हे भगवान नहीं फ्रेंडशिप होती है ज्ञानी की मैत्री ब्रह्मा विष्णु महेश से मैत्री होती है ज्ञानी की समाज के लोगों पर उनकी करुणा होती है छोटे बेचारे नहीं जानते परमात्मा को करुणा करके ज्ञानी उनके बीच रहता है और जो ऊपर चलते हैं दिव्य जीवन बिताने की तरफ उनको देखकर ज्ञानी प्रसन्न होता है और जो निगुरे लोग हैं अत्यंत घमंडी उनके उनको देखकर ज्ञानी दुखी नहीं होता है उपेक्षा कर देता है कि देर सवेर टक्कर खा खा के चौरासी के चक्कर में घिस घिस के फिर आएंगे किसी ना किसी ज्ञानी के पास जाएंगे हमारा क्यों क्यों नहीं करता ऐसा करके ज्ञानी का चित्त पछता नहीं है दुखी नहीं होता उपेक्षा कर लेता है ज्ञानी चलो इनको श्रद्धा नहीं तो इनका प्रारब्ध ही ऐसा होगा चलो दारुड़िया है तो इनका प्रारब्ध ही ऐसा होगा ठोकर खाते अभी नहीं आएगा तो दूसरे जन्म में कहीं ना कहीं ठोकर खाते सुधरेगा दूसरे आदमी को तो दुःख होता है कि ये इतना ये ऐसा क्यों नहीं करता ये ऐसा क्यों नहीं करता ऐसा करके आदमी पछता रहता है ज्ञानी पछता नहीं है अंदर हां थोड़े निकट के उनको देखकर थोड़ा सा क्षोभ दिखा देता है...ज्ञानी अंदर से अज्ञानी की नहीं पछता नहीं है
💥*मैत्री ब्रह्मा विष्णु महेश से उसकी मैत्री होती है*
💥*संसारियों के ऊपर उसकी करुणा होती है*
🌹 *04.06.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन*🏵️
====================
💥*जीवन मुक्त ज्ञानी पुरुष का स्वरूप और उसकी महिमा।*
✨️जीवन मुक्त आत्म पद उसमें जो टिक गया उसका जीवन होता है कुम्हार के चाक की नाई जैसे चाक घूमता है ऐसे उसके प्रारब्ध के अनुसार उसका कर्म हो जाता है अपने अंदर कर्ता भोक्तापना का बोझा नहीं उठाता वो हां वह पुरुष शरीर रूपी नगर में राज्य करता है और लेपायमान नहीं है हां नागरिक होकर नहीं जीता राजा होकर जीता है शरीर में शरीर का राजा है और लेपायमान नहीं होता वह ज्ञानी जीवन मुक्त पुरुष उसको भोग और मोक्ष दोनों सिद्ध होते हैं
✨️ज्ञानी का प्रारब्ध ऐसा होता है कि संसार के भोग भी उसके आगे हाजिर और मोक्ष भी उसकी मुट्ठी में है भोग मोक्ष दोनों पदार्थ सिद्ध हो जाते हैं उसको संसारी का तो बेचारे को भोग भी नहीं मिलता भोग भोगते भोगते अपना भोग दे देता है भोग को इकट्ठा करते करते अपनी जिंदगी सुखा देता है ज्ञानी गुरु के चरणों में अपना आत्मज्ञान पा लेता है फिर भोग और मोक्ष दोनों उसके दास बन जाते हैं शरीर रूपी नगर में सुख से जीता है शरीर की पीड़ा होते हुए भी वो सुखी रहता है दो मिनट जाओ तो सब दुःख दूर चिंता दूर सारे प्रॉब्लम सॉल्व खाली दो मिनट ज्ञानी के गांव में ज्ञानी का गांव कौन सा है देख लो सुना दो फिर से
✨️उनके देश उदारता धीरज संतोष वैराग्य समता मित्रता मुदिता और उपेक्षा है उनमें अज्ञान नहीं प्रवेश करने पाता है और आप ध्यान रूपी नगर में रहता है सत्यता और एकता दोनों स्त्रियों को साथ रखता है और उनसे सदा शोभायमान रहता है जैसे चंद्रमा चित्रा और विशाखा दोनों स्त्रियों से शोभता है
*पूज्य बापूजी*- चंद्रमा की दो पत्नियां है ना चित्रा विशाखा दोनों से शोभता है ऐसे ज्ञानवान..ज्ञानवान का देश क्या है➖️
🔥मैत्री 🔥करुणा
🔥मुदिता 🔥उपेक्षा
🔥शांति 🔥वैराग्य
🔥समता 🔥एकरस्ता
🔥और आत्मा में प्रीति
✨️ये ज्ञानी का स्वभाव है ज्ञानी का देश होता है ज्ञान आत्मा का है अपने दुनिया भर का तो ज्ञान हो जाए लेकिन वो सब मन तक होता है बायोलॉजी साइकोलॉजी टेलीपैथी टेक्नोलॉजी ये सारे जो हैं ये सारी की गति मन तक होती है बुद्धि वृत्ति तक होती है लेकिन आत्म साक्षात्कार मन और बुद्धि से परे की चीज होता है इसलिए दुनिया की सारी चीजों का ख्याल कोई पता लगा ले फिर भी उसको पूर्ण तृप्ति नहीं मिलेगी शांति नहीं मिलेगी और आत्मा का कोई पता लगा ले उसको फिर अशांति नहीं मिलेगी दुनिया के सब लोग विरुद्ध हो जाएं सारी चीजें उससे छीन ली जाए फिर भी आत्मा को कोई घाटा नहीं दुनिया के सब लोग उसकी फेवर करें एक आदमी की सारी चीजें एक आदमी को दे दे फिर भी पूर्ण निर्भीक नहीं रहेगा क्योंकि मौत का भय तो लगा रहेगा चीजें चली ना जाए वो भी भय बना रहेगा *पूरा निर्भय तो आत्मज्ञानी होता है निश्चिंतता निर्भयता सुहृदता समता ये ज्ञानी का देश है ईर्ष्या भोग वासना लोलुपता मरने का भय जीने की लालच ये अज्ञानी का गांव है*
✨️जीने की लालच से कोई लंबा जिया हो ये तो दिखता नहीं सब मर रहे हैं मरने के भय से कोई मरने से बच रहा है वो भी नहीं दिखता है जहां मौत नहीं होती वहां आत्मा में चले आओ आत्मा की कभी मौत नहीं होती शरीर सदा रहता नहीं दूसरा ज्ञानी में ये होता है मैत्री जो अच्छे आदमी हैं उनसे हैं ज्ञानवान के रास्ते जाते हैं आत्मवेत्ता हैं उनसे उनकी मैत्री होती है ब्रह्मा विष्णु और महेश से ज्ञानी की मैत्री होती है दोस्ती ज्ञानी कगरता नहीं ब्रह्मा विष्णु महेश को हे भगवान नहीं फ्रेंडशिप होती है ज्ञानी की मैत्री ब्रह्मा विष्णु महेश से मैत्री होती है ज्ञानी की समाज के लोगों पर उनकी करुणा होती है छोटे बेचारे नहीं जानते परमात्मा को करुणा करके ज्ञानी उनके बीच रहता है और जो ऊपर चलते हैं दिव्य जीवन बिताने की तरफ उनको देखकर ज्ञानी प्रसन्न होता है और जो निगुरे लोग हैं अत्यंत घमंडी उनके उनको देखकर ज्ञानी दुखी नहीं होता है उपेक्षा कर देता है कि देर सवेर टक्कर खा खा के चौरासी के चक्कर में घिस घिस के फिर आएंगे किसी ना किसी ज्ञानी के पास जाएंगे हमारा क्यों क्यों नहीं करता ऐसा करके ज्ञानी का चित्त पछता नहीं है दुखी नहीं होता उपेक्षा कर लेता है ज्ञानी चलो इनको श्रद्धा नहीं तो इनका प्रारब्ध ही ऐसा होगा चलो दारुड़िया है तो इनका प्रारब्ध ही ऐसा होगा ठोकर खाते अभी नहीं आएगा तो दूसरे जन्म में कहीं ना कहीं ठोकर खाते सुधरेगा दूसरे आदमी को तो दुःख होता है कि ये इतना ये ऐसा क्यों नहीं करता ये ऐसा क्यों नहीं करता ऐसा करके आदमी पछता रहता है ज्ञानी पछता नहीं है अंदर हां थोड़े निकट के उनको देखकर थोड़ा सा क्षोभ दिखा देता है...ज्ञानी अंदर से अज्ञानी की नहीं पछता नहीं है
💥*मैत्री ब्रह्मा विष्णु महेश से उसकी मैत्री होती है*
💥*संसारियों के ऊपर उसकी करुणा होती है*
💥*साधकों की उन्नति देखकर उनमें मुदिता होती है और*
💥*मूढ़ों को निगूरों को निंदकों को देखकर उनको उपेक्षा होती है*
💥*इसीलिए वो अपने सदा अपने चित्त में तृप्त रहते हैं आत्मरस में*
✨️अपनी कोई निंदा करे तो अपने को तो पीड़ा होती है और कोई प्रशंसा करे तो अपन लोलुप हो जाते हैं उसके हैं ज्ञानी लोलुप नहीं होता प्रशंसा का दुनिया में हर ऊंची इज्जत वाले से भी ऊंची इज्जत ज्ञानी की होती है देवता लोग दीदार करके ज्ञानी का दर्शन करके अपना भाग्य बना लेते हैं देवी संपदा के मनुष्य लोग भी ज्ञानी का दीदार पूजन करके अपना भाग्य बना लेते हैं फिर भी ज्ञानी को अभिमान नहीं होता ऐसा वो ज्ञानी होता है और कभी हरदूत भी होती है मूर्खों के द्वारा ज्ञानी अंदर शोभायमान नहीं होता बोले उसकी नजर ऐसा है तो चलो...सुखदेव महाराज की हरदूत हो रही थी हुरियो हुरियो ले बाबा बीको दिखाते थे कंकर मारते थे जड़ भरत को पालकी उठवा देते थे रैको मुनि बैलगाड़ी चलाते थे फिर भी अंदर में क्षोभ नहीं होता ज्ञानी को चलो शरीर का प्रारब्ध है उसकी उसका ऐसा प्रारब्ध है लेने देने का बुद्ध के ऊपर लोग थूक जाते थे गालियां देते थे बुद्ध का कुप्रचार इतना हुआ कि बुद्ध भिक्षा मांगने जाते थे लोग थूकते थे उनके ऊपर दरवाजा बंद कर देते थे फिर भी बुद्ध को क्षोभ नहीं होता था चलो उनका प्रारब्ध ऐसा है मेरा ज्ञान लेने की इनकी क्षमता नहीं है दूसरे द्वार पर वहां भी दरवाजा बंद कर दिया चलो कोई बात नहीं अब तुम किसी के वहां जाओ दरवाजा बंद कर दे तो ओ हो हो जब याद आए तब रोना आ जाए हृदय में आग उठे अरे हम जा रहे थे तब तक तो दरवाजा खुला मेरे को देखकर साले ने दरवाजा बंद किया मैंने उसको चार चार बार मैंने बहुत दुःख होता है 12 वर्ष पुरानी बात याद आती है और लोही उकड़ती है ऐसा होता है
✨️सुखदेव जी महाराज का इतना अपमान करते थे जिसका कोई हिसाब नहीं अंदर में शांति और फिर सोने के सिंहासन पर बिठाया परीक्षित राजा चरणों में पड़ा दूसरे साधु संत महात्मा साधु साधु करके अभिवादन देते हैं वाह सुखदेव जी महाराज की निष्ठा अंदर में क्षोभ नहीं हुआ देवता स्वर्ग से अमृत ले आए परीक्षित को हम अमृत पिला देते हैं आप हमको कथा का अमृत पिलाओ सुखदेव बोला स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य नाश होता है अपसरा मिलती है और ब्रह्मज्ञान का अमृत पीने से पाप नाश होता है शांति मिलती है आनंद मिलता है और परमात्मा मिलता है आखिर में तो तुम कांच का टुकड़ा देकर कोहिनूर लेना चाहते हो अदला बदली ऐसे ही बैठ जाते कथा का अमृत हम दे देते लेकिन ये बदला साटा माटा सत्संग को बिक्री कराने आए हो जाओ अब तुम्हारा कोई लाभ नहीं होगा जाओ ऐसे निष्प्रह फिर भी मैं निष्प्रह हूं ऐसा अभिमान नहीं आया उनको नेता लोगों को तारने की शक्ति सुखदेव जी में फिर भी मैं शक्तिशाली हूं ऐसा अभिमान नहीं और लोग कंकर मार रहे हैं एक तरफ देवता गिड़गिड़ा रहे हैं उनको सत्संग नहीं सुनाया लोग पत्थर मार रहे हैं तो उन पर नाराजगी नहीं हुई कैसी समता है
✨️ज्ञानी का देश में दो मिनट जाओ तो निहाल हो जाओ मैत्री करुणा ब्रह्मा विष्णु महेश से मैत्री अंबा जी ब्रह्मा विष्णु जो ज्ञान तत्व में खड़े हैं उनके साथ ये मैत्री हो जाती है ज्ञानी की ज्ञानी ज्ञानी का कभी विरोध नहीं होगा दत्तात्रेय ज्ञानेश्वर एकनाथ वशिष्ठ राम कृष्ण अंबा ब्रह्मा विष्णु महेश ऐसा वैकई है एक बार देवताओं ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना किया कि हम सदा दैत्यों से भिड़ते हैं और दैत्य आजकल जोर में आ गए हैं क्योंकि बलि राजा बड़ा दानी है दान करने से उसका तेज बढ़ गया है तो राजा के तेज से प्रजा में भी तेज आ गया है तो हम लोग मारे जाते हैं तो बलि से बलि तो चला गया पृथ्वी का दान लेकिन दैत्यों में बल आ गया है हम बार बार हार जाते हैं तो ब्रह्मा जी ने कहा कि जाओ पृथ्वी लोक पर अभी दत्तात्रेय हैं ज्ञानी हैं जीवन मुक्त हैं उनसे सलाह पूछ लेना तो भगवान दत्तात्रेय के पास आए देवता लोग दत्तात्रेय ने कहा कि तुम हिम्मत साहस करो और अपने चित्त में वैर वृत्ति मत रखो थोड़ी समता बढ़ाओ तुम्हारी विजय हो जाएगी अथवा तो वो विषय लंपट हो जाएं वो अंदर से दुर्बल हो जाएं तो भी तुम्हारी विजय हो जाएगी अथवा तो तुम समता में आ जाओ तभी भी तुम्हारी विजय हो जाएगी या तो शत्रु दुराचारी हो तभी गिरेगा या तो तुम सदाचार के ऊंचे आसन पर बैठो तभी विजय होगा दत्तात्रेय की बात सुनकर क्या आशीर्वाद दो क्या मेरा आशीर्वाद है मेरे वचन मानो तो आशीर्वाद है ही है देवताओं ने युद्ध चालू कर दिया युद्ध चालू कर दिया तो बुरी तरह मार खाया ऐसा दैत्यों ने ऐसा धाड़ा बुला दिया कि देवता भागते भागते भागते दत्तात्रेय के आश्रम में पहुंच गए कि महाराज भला आपका आशीर्वाद है हम तो मर गए वो महाराज को धक्का देने जा रहे थे आश्रम में पहुंच गए तो वहां लक्ष्मी जी किसी कारणवश पृथ्वी लोक का आटा मारने को आए दत्तात्रेय से बातचीत कर रही थी तो दैत्य पीछे पीछे आए
💥*मूढ़ों को निगूरों को निंदकों को देखकर उनको उपेक्षा होती है*
💥*इसीलिए वो अपने सदा अपने चित्त में तृप्त रहते हैं आत्मरस में*
✨️अपनी कोई निंदा करे तो अपने को तो पीड़ा होती है और कोई प्रशंसा करे तो अपन लोलुप हो जाते हैं उसके हैं ज्ञानी लोलुप नहीं होता प्रशंसा का दुनिया में हर ऊंची इज्जत वाले से भी ऊंची इज्जत ज्ञानी की होती है देवता लोग दीदार करके ज्ञानी का दर्शन करके अपना भाग्य बना लेते हैं देवी संपदा के मनुष्य लोग भी ज्ञानी का दीदार पूजन करके अपना भाग्य बना लेते हैं फिर भी ज्ञानी को अभिमान नहीं होता ऐसा वो ज्ञानी होता है और कभी हरदूत भी होती है मूर्खों के द्वारा ज्ञानी अंदर शोभायमान नहीं होता बोले उसकी नजर ऐसा है तो चलो...सुखदेव महाराज की हरदूत हो रही थी हुरियो हुरियो ले बाबा बीको दिखाते थे कंकर मारते थे जड़ भरत को पालकी उठवा देते थे रैको मुनि बैलगाड़ी चलाते थे फिर भी अंदर में क्षोभ नहीं होता ज्ञानी को चलो शरीर का प्रारब्ध है उसकी उसका ऐसा प्रारब्ध है लेने देने का बुद्ध के ऊपर लोग थूक जाते थे गालियां देते थे बुद्ध का कुप्रचार इतना हुआ कि बुद्ध भिक्षा मांगने जाते थे लोग थूकते थे उनके ऊपर दरवाजा बंद कर देते थे फिर भी बुद्ध को क्षोभ नहीं होता था चलो उनका प्रारब्ध ऐसा है मेरा ज्ञान लेने की इनकी क्षमता नहीं है दूसरे द्वार पर वहां भी दरवाजा बंद कर दिया चलो कोई बात नहीं अब तुम किसी के वहां जाओ दरवाजा बंद कर दे तो ओ हो हो जब याद आए तब रोना आ जाए हृदय में आग उठे अरे हम जा रहे थे तब तक तो दरवाजा खुला मेरे को देखकर साले ने दरवाजा बंद किया मैंने उसको चार चार बार मैंने बहुत दुःख होता है 12 वर्ष पुरानी बात याद आती है और लोही उकड़ती है ऐसा होता है
✨️सुखदेव जी महाराज का इतना अपमान करते थे जिसका कोई हिसाब नहीं अंदर में शांति और फिर सोने के सिंहासन पर बिठाया परीक्षित राजा चरणों में पड़ा दूसरे साधु संत महात्मा साधु साधु करके अभिवादन देते हैं वाह सुखदेव जी महाराज की निष्ठा अंदर में क्षोभ नहीं हुआ देवता स्वर्ग से अमृत ले आए परीक्षित को हम अमृत पिला देते हैं आप हमको कथा का अमृत पिलाओ सुखदेव बोला स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य नाश होता है अपसरा मिलती है और ब्रह्मज्ञान का अमृत पीने से पाप नाश होता है शांति मिलती है आनंद मिलता है और परमात्मा मिलता है आखिर में तो तुम कांच का टुकड़ा देकर कोहिनूर लेना चाहते हो अदला बदली ऐसे ही बैठ जाते कथा का अमृत हम दे देते लेकिन ये बदला साटा माटा सत्संग को बिक्री कराने आए हो जाओ अब तुम्हारा कोई लाभ नहीं होगा जाओ ऐसे निष्प्रह फिर भी मैं निष्प्रह हूं ऐसा अभिमान नहीं आया उनको नेता लोगों को तारने की शक्ति सुखदेव जी में फिर भी मैं शक्तिशाली हूं ऐसा अभिमान नहीं और लोग कंकर मार रहे हैं एक तरफ देवता गिड़गिड़ा रहे हैं उनको सत्संग नहीं सुनाया लोग पत्थर मार रहे हैं तो उन पर नाराजगी नहीं हुई कैसी समता है
✨️ज्ञानी का देश में दो मिनट जाओ तो निहाल हो जाओ मैत्री करुणा ब्रह्मा विष्णु महेश से मैत्री अंबा जी ब्रह्मा विष्णु जो ज्ञान तत्व में खड़े हैं उनके साथ ये मैत्री हो जाती है ज्ञानी की ज्ञानी ज्ञानी का कभी विरोध नहीं होगा दत्तात्रेय ज्ञानेश्वर एकनाथ वशिष्ठ राम कृष्ण अंबा ब्रह्मा विष्णु महेश ऐसा वैकई है एक बार देवताओं ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना किया कि हम सदा दैत्यों से भिड़ते हैं और दैत्य आजकल जोर में आ गए हैं क्योंकि बलि राजा बड़ा दानी है दान करने से उसका तेज बढ़ गया है तो राजा के तेज से प्रजा में भी तेज आ गया है तो हम लोग मारे जाते हैं तो बलि से बलि तो चला गया पृथ्वी का दान लेकिन दैत्यों में बल आ गया है हम बार बार हार जाते हैं तो ब्रह्मा जी ने कहा कि जाओ पृथ्वी लोक पर अभी दत्तात्रेय हैं ज्ञानी हैं जीवन मुक्त हैं उनसे सलाह पूछ लेना तो भगवान दत्तात्रेय के पास आए देवता लोग दत्तात्रेय ने कहा कि तुम हिम्मत साहस करो और अपने चित्त में वैर वृत्ति मत रखो थोड़ी समता बढ़ाओ तुम्हारी विजय हो जाएगी अथवा तो वो विषय लंपट हो जाएं वो अंदर से दुर्बल हो जाएं तो भी तुम्हारी विजय हो जाएगी अथवा तो तुम समता में आ जाओ तभी भी तुम्हारी विजय हो जाएगी या तो शत्रु दुराचारी हो तभी गिरेगा या तो तुम सदाचार के ऊंचे आसन पर बैठो तभी विजय होगा दत्तात्रेय की बात सुनकर क्या आशीर्वाद दो क्या मेरा आशीर्वाद है मेरे वचन मानो तो आशीर्वाद है ही है देवताओं ने युद्ध चालू कर दिया युद्ध चालू कर दिया तो बुरी तरह मार खाया ऐसा दैत्यों ने ऐसा धाड़ा बुला दिया कि देवता भागते भागते भागते दत्तात्रेय के आश्रम में पहुंच गए कि महाराज भला आपका आशीर्वाद है हम तो मर गए वो महाराज को धक्का देने जा रहे थे आश्रम में पहुंच गए तो वहां लक्ष्मी जी किसी कारणवश पृथ्वी लोक का आटा मारने को आए दत्तात्रेय से बातचीत कर रही थी तो दैत्य पीछे पीछे आए
देवताओं के उधर वहां दुर्जन आदमी तो नहीं देखता कि आश्रम है दुर्जन तो अपनी दुर्जनता ही करेगा दैत्य तो तो आ गए आ गए तो देखा कि दत्तात्रेय महाराज के आगे लक्ष्मी जी बात कर रही है तो दैत्यों से वैर लेना भूल गए लक्ष्मी जी को देखकर उनको लोभ हो गया लक्ष्मी जी को पकड़ के ले जाएं हमारे पास धन संपत्ति रहेगी लक्ष्मी जी को पकड़ने का जब हुआ तो लक्ष्मी जी का मायावी रूप धारण कर लिया एक जैसे सीता जी असली सीता जी रह गई और तो एक लक्ष्मी की परछाई लक्ष्मी दिखने लगी असली लक्ष्मी अंतर्ध्यान हो गई तो डुप्लीकेट लक्ष्मी बन गई उसको लेकर दैत्य के नहीं छोड़ेंगे अब लक्ष्मी जी को नहीं छोड़ेंगे
✨️विष्णु हमारा वैरी है लक्ष्मी जी को नहीं छोड़ेंगे हमारे पास रखेंगे ऐसा करके लक्ष्मी को घसीट के ले गए ओरिजिनल लक्ष्मी तो अपने योग बल से अंतर्ध्यान हो गई माया की लक्ष्मी एक सेम रूप ले गए तो आए थे तो दैत्यों को कुचलने को देवताओं को लक्ष्मी जैसी तो उसी में उलझ गए दैत्य ले गए तो देवताओं ने बोला कि महाराज हम तो बुरी तरह पीटे गए मारे गए बोले कोई बात नहीं तुम में समता नहीं रही इसीलिए तुम हार गए डर गए अभी इनका अपने आप विनाश होगा बोले क्यों बोले ये लक्ष्मी को ले गए हैं इसी से आपस में लड़ मरेंगे लोभ बढ़ जाएगा समता तो है ही नहीं उनमें अपने आप वो विनाश को प्राप्त हो जाएंगे तो जो आदमी संसार के भोगों में पड़ता है उसको दूसरा कोई नहीं भी मारे बहु कन्या दो स्त्री उनको क्यों मारिए मार दियो करतार ...बहु कन्या और दो नार उनको क्यों मारिए मार दियो करतार..एक नारी तो उनके घर की दूसरी ले गए जो उनका बॉस है तो बहु कन्या दो नार उनको क्यों मारिए मार दियो करतार..अथवा भी ऐसा कि थोड़े ही दिनों में दैत्य आपस में चिन हो गए...कहने का तात्पर्य है कि दत्तात्रेय तो साक्षात लक्ष्मी से बात कर रहे हैं उनका चित्त शोभायमान नहीं हुआ और वो असुर गैंग का आगेवान बड़ा राजा लक्ष्मी की परछाई में ही उलझ गया ज्ञानी का गांव देखा कैसा है
✨️वह मन रूपी घोड़े पर आरूढ़ होकर और विचार रूपी लगाम उसको लगाकर जीव ब्रह्म की एकतारूपी संगम तीर्थ में स्नान करने जाता है
*पूज्य बापूजी* ज्ञानी का स्नान कैसा है कि मन रूपी घोड़े पर मन जहां भी जाता है विचार की लगाम रखकर समता के संगम में स्नान करता है कोई भी उसके आगे दिखेगा तो कोई व्यक्ति कोई माई कोई भाई लेकिन उसकी गहराई में वो अपने आप को देखता है सम रहता है उसका चित्त इसीलिए उसकी निगाहों से अमृत बरसता है ज्ञानी की निगाह ज्ञानी का दर्शन करने का लाभ यही है कि ज्ञानी में समता होती है तो उसके वेव्स मिलते हैं उसके वचन अपने चित्त में भी थोड़ा बहुत शांति आनंद आता है दुनिया की सुविधाओं में उतना आनंद नहीं आता है जितना ज्ञानी के चरणों में आता है तीर्थ स्नान से भी इतना आनंद नहीं आता जितना ज्ञानी के चरणों में बैठने से आता है व्रत और उपवास से भी उतना आनंद नहीं आता जितना ज्ञानी के चरणों में बैठने से आता है क्योंकि समता के वेव्स मिलते रहते हैं मन रूपी घोड़े पर ज्ञानी सैर करता है विचार रूपी चाबुक लेकर समता रूपी संगम में स्नान करता रहता है
✨️एक बात हम पूछते हैं तुम जवाब दो किसी को अपना प्यारा मिले तो क्या दुःख होता है कि सुख होता है किसी को कभी अपना प्यारा मिल जाए अपना इष्ट मित्र वस्तु कुछ भी अपनी प्यारी वस्तु प्यारा मित्र प्यारा व्यक्ति तो उसको क्या होता है सुख होता है जरा बोलो तो सही आनंद होता है आनंद होता है सुख होता है ना कभी अपना प्यारा मिल जाए प्यारी वस्तु व्यक्ति तो उसको सुख आनंद होता है ठीक है ज्ञान हो गया कि सब जगह उसको अपना प्यारा मिलता रहता है ज्ञानी को उसका सुख कितना है ज्ञानी को सब जगह सर्वत्र सब में अपना प्यारा मिलता रहता है उसको सुख कितना होगा डॉक्टर साहब पूछते हैं देखो है कभी कभी प्यारा मिलता है तो इतना सुख होता है जिसको सब सर्वत्र सब में अपना प्यारा मिलता रहता हो ज्ञानी तो पक्षियों की किलर में चिड़िया में भी देखता है कि हां चे चे कर रहा है यार मैं तुझे जानता हूं फूलों की महक में भी उसको अपना प्यारा दिखता है चंद्रमा की चांदनी में भी अपना प्यारा दिखता है चेलों में अपना प्यारा दिखता है गुरु में अपना प्यारा दिखता है दुःख दर्द आफत में भी अपना प्यारा दिखता है इसीलिए आज शरीर की पीड़ा है लेकिन कोई ऐसा महसूस नहीं कर सकता कि पीड़ा है दो दिन से तबीयत एकदम ऐसा हो गया इसीलिए तो लेट लेट के विनोद में सत्संग बताए वो महात्मा का रेस्ट भी हो गया शरीर को दुःख दर्द आफत पीड़ा शरीर को होती है अपने को थोड़ी होती है..मन चंगा तो कठौती में गंगा मन प्रसन्न है तो शरीर में क्या है चलो चलो और जैसे देह में शोभता है शरीर में होते हुए भी शोभा पाता है है तो हाड़ मांस का पुतला उसमें भी वो शोभा पाता है ज्ञान की ऐसा वो ज्ञानी होता है ऐसा कोई ज्ञानी मिले तो मेरे को बताना 12 कोस पैदल जाना पड़े तो हम जाएंगे विवेकानंद
✨️विष्णु हमारा वैरी है लक्ष्मी जी को नहीं छोड़ेंगे हमारे पास रखेंगे ऐसा करके लक्ष्मी को घसीट के ले गए ओरिजिनल लक्ष्मी तो अपने योग बल से अंतर्ध्यान हो गई माया की लक्ष्मी एक सेम रूप ले गए तो आए थे तो दैत्यों को कुचलने को देवताओं को लक्ष्मी जैसी तो उसी में उलझ गए दैत्य ले गए तो देवताओं ने बोला कि महाराज हम तो बुरी तरह पीटे गए मारे गए बोले कोई बात नहीं तुम में समता नहीं रही इसीलिए तुम हार गए डर गए अभी इनका अपने आप विनाश होगा बोले क्यों बोले ये लक्ष्मी को ले गए हैं इसी से आपस में लड़ मरेंगे लोभ बढ़ जाएगा समता तो है ही नहीं उनमें अपने आप वो विनाश को प्राप्त हो जाएंगे तो जो आदमी संसार के भोगों में पड़ता है उसको दूसरा कोई नहीं भी मारे बहु कन्या दो स्त्री उनको क्यों मारिए मार दियो करतार ...बहु कन्या और दो नार उनको क्यों मारिए मार दियो करतार..एक नारी तो उनके घर की दूसरी ले गए जो उनका बॉस है तो बहु कन्या दो नार उनको क्यों मारिए मार दियो करतार..अथवा भी ऐसा कि थोड़े ही दिनों में दैत्य आपस में चिन हो गए...कहने का तात्पर्य है कि दत्तात्रेय तो साक्षात लक्ष्मी से बात कर रहे हैं उनका चित्त शोभायमान नहीं हुआ और वो असुर गैंग का आगेवान बड़ा राजा लक्ष्मी की परछाई में ही उलझ गया ज्ञानी का गांव देखा कैसा है
✨️वह मन रूपी घोड़े पर आरूढ़ होकर और विचार रूपी लगाम उसको लगाकर जीव ब्रह्म की एकतारूपी संगम तीर्थ में स्नान करने जाता है
*पूज्य बापूजी* ज्ञानी का स्नान कैसा है कि मन रूपी घोड़े पर मन जहां भी जाता है विचार की लगाम रखकर समता के संगम में स्नान करता है कोई भी उसके आगे दिखेगा तो कोई व्यक्ति कोई माई कोई भाई लेकिन उसकी गहराई में वो अपने आप को देखता है सम रहता है उसका चित्त इसीलिए उसकी निगाहों से अमृत बरसता है ज्ञानी की निगाह ज्ञानी का दर्शन करने का लाभ यही है कि ज्ञानी में समता होती है तो उसके वेव्स मिलते हैं उसके वचन अपने चित्त में भी थोड़ा बहुत शांति आनंद आता है दुनिया की सुविधाओं में उतना आनंद नहीं आता है जितना ज्ञानी के चरणों में आता है तीर्थ स्नान से भी इतना आनंद नहीं आता जितना ज्ञानी के चरणों में बैठने से आता है व्रत और उपवास से भी उतना आनंद नहीं आता जितना ज्ञानी के चरणों में बैठने से आता है क्योंकि समता के वेव्स मिलते रहते हैं मन रूपी घोड़े पर ज्ञानी सैर करता है विचार रूपी चाबुक लेकर समता रूपी संगम में स्नान करता रहता है
✨️एक बात हम पूछते हैं तुम जवाब दो किसी को अपना प्यारा मिले तो क्या दुःख होता है कि सुख होता है किसी को कभी अपना प्यारा मिल जाए अपना इष्ट मित्र वस्तु कुछ भी अपनी प्यारी वस्तु प्यारा मित्र प्यारा व्यक्ति तो उसको क्या होता है सुख होता है जरा बोलो तो सही आनंद होता है आनंद होता है सुख होता है ना कभी अपना प्यारा मिल जाए प्यारी वस्तु व्यक्ति तो उसको सुख आनंद होता है ठीक है ज्ञान हो गया कि सब जगह उसको अपना प्यारा मिलता रहता है ज्ञानी को उसका सुख कितना है ज्ञानी को सब जगह सर्वत्र सब में अपना प्यारा मिलता रहता है उसको सुख कितना होगा डॉक्टर साहब पूछते हैं देखो है कभी कभी प्यारा मिलता है तो इतना सुख होता है जिसको सब सर्वत्र सब में अपना प्यारा मिलता रहता हो ज्ञानी तो पक्षियों की किलर में चिड़िया में भी देखता है कि हां चे चे कर रहा है यार मैं तुझे जानता हूं फूलों की महक में भी उसको अपना प्यारा दिखता है चंद्रमा की चांदनी में भी अपना प्यारा दिखता है चेलों में अपना प्यारा दिखता है गुरु में अपना प्यारा दिखता है दुःख दर्द आफत में भी अपना प्यारा दिखता है इसीलिए आज शरीर की पीड़ा है लेकिन कोई ऐसा महसूस नहीं कर सकता कि पीड़ा है दो दिन से तबीयत एकदम ऐसा हो गया इसीलिए तो लेट लेट के विनोद में सत्संग बताए वो महात्मा का रेस्ट भी हो गया शरीर को दुःख दर्द आफत पीड़ा शरीर को होती है अपने को थोड़ी होती है..मन चंगा तो कठौती में गंगा मन प्रसन्न है तो शरीर में क्या है चलो चलो और जैसे देह में शोभता है शरीर में होते हुए भी शोभा पाता है है तो हाड़ मांस का पुतला उसमें भी वो शोभा पाता है ज्ञान की ऐसा वो ज्ञानी होता है ऐसा कोई ज्ञानी मिले तो मेरे को बताना 12 कोस पैदल जाना पड़े तो हम जाएंगे विवेकानंद
बोलते थे 12 कोस नंगे पैर भूखे पेट भूखे पेट नंगे सिर नंगे पैर चलकर जाना पड़े 12 कोस तभी भी मैं चलूंगा मित्रों क्योंकि मुझे पता है कि ज्ञानवान के चरणों में जो पुण्य और आनंद होता है वो मेरे काली की पूजा से भी वो नहीं हुआ विवेकानंद बोलते थे 12 कोस पैदल जाना पड़े नंगे पैर नंगे सिर भूखे पेट कितना कठिन है भूखे पेट नंगे सिर नंगे पैर सिर नंगा है तो ताल तटेगी पैर नंगे है तो ठेस लगेगी पेट भूखा है तो चलने में मजा नहीं आएगा फिर भी ज्ञानी के पास जाऊंगा मुझे उस दर्शन से जो मजा आएगा वो सारी थकान मिटा देगा दर्शन से जो आनंद मिलेगा वचनों से जो ज्ञान मिलेगा सौदा सस्ता है 12 कोस तो क्या बड़ी बात होता है
✨️शंकराचार्य के गुरु का नाम था गोविंदाचार्य गोविंदाचार्य के गुरु का नाम था गौड़पादाचार्य भगवान गौड़पादाचार्य गौड़पादाचार्य गौड़ देश से पैदल चलकर गए थे सुखदेव जी महाराज के पास दक्षिण भारत से गौड़ देश उत्तर भारत में हिमालय पैदल चलकर गए थे और फिर सुखदेव जी की कृपा से आत्मज्ञान हुआ उनको सब उनका नाम पड़ा भगवान गौड़पादाचार्य बराबर है 1800 मील चलकर एक गए संत और ज्ञानी महापुरुष की गुफा का दरवाजा बंद था खटखटा के चुप हो गए
अंदर से आवाज आई कौन? बोले प्रभु 1800 माइल चलकर ये दास आपके चरण रज में यही बात जानने को आया है मैं कौन हूं? चटाक से दरवाजा खोल दिया। समझदार जिज्ञासु है। ऐसे एक महात्मा थे हिमालय में। गंगोत्री से भी ऊपर रहते थे। बड़े फक्कड़ थे उनसे हमारा थोड़ा परिचय हो गया। हम जा तो रहे थे जहां से गंगा निकलती है वहां। तो उनका सत्संग मिल गया बातचीत किया था। वहीं बैठ गए। बड़े मस्त संत थे। अभी तो शरीर नहीं है उनका। दूसरे कभी-कभी अदृश्य योगी भी मिल जाते थे। हां प्रकट हुए बातचीत किया पर चले गए। ऐसे भी मिले हिमालय में। उनके अब तो ये भी नहीं रहा मिलने की भी इच्छा नहीं कोई मिलो ना मिलो। हम मिल गया उस योगी ने जो है वही हमारा आराम है आत्मा है। अब तो सब अदृश्य सदृश्य सब एक साथ है। पहले बहुत इच्छा थी कि ऐसे मिल जाए योगी ऐसा मिल जाए। ये सब किए पापड़ बेले खूब टक्करें खाई। ए दम गंगा जहां से निकलती है गंगोत्री से ऊपर ऊपर गोमुख। और रात-वसा कहीं करना पड़ा कहीं कुछ किया। आज से 20 साल पहले शरीर भी जरा का था 25 साल पहले। नहीं तो हम क्या-क्या पापड़ बेलते थे। घर से चलते थे कूद-कूद करके पहुंचना है। फिर देखते कि यहां से गंगा निकली अब। एकदम ओरिजिनल गंगा है इतनी छोटी सी है। आदमी कूद के पार हो सकता है ओरिजिनल गंगा इतनी है। बाकी के सब उसमें झरने या ज्यादा पानी उसको नाले बोलते हैं पहाड़ी लोग। नाले पड़ते हैं गंगा बढ़ती जाती है। तो उधर ओरिजिनल गंगा में नहाने को गोता मारा। आजू-बाजू बर्फ ही बर्फ बर्फ। खाना है तो बर्फ और पीना है तो बर्फ। तो ये सब मामला था। गोता मारा। चलो फिर सोचा कि फलाना आदमी अपनी सेवा करता है बेचारा उसका वो थोड़ी देर आएगा। चलो उसके नाम का गोता मार। फिर सोचा कि मां ने जन्म दिया है। वो तो कभी नहीं आ सकती बेचारे चलो उसके नाम का गोता मार। फिर याद आते गए इसकी रोटी खाई इसने प्रणाम किया तो कितनों के। तब इतनी प्रसिद्धि तो थी नहीं। फिर भी काफी लोग तो थे ही। तो एक-एक गोता मारता गया इतने का मारा तो फलाना बेचारे का अन्याय हो जाएगा। मारो। ऐसे जल्दी-जल्दी में ऐसे ही भागेडू डुबकी। वो भागेडू डुबकी मारते-मारते हमारा शरीर में पकड़ा गया सब। कुल्फी हो गया। वहां तो चिड़िया भी नहीं दिखती कौवा भी नहीं मनुष्य तो कहां आवे। एकदम अंदर उसमें मैं कुल्फी हो गया जैसे बर्फ जम कुल्फी नहीं होता है। ऐसे में कैसे कुल्फी हो जाता है डिजाइन में। गोता मारते जो एक्शन था वो वही का वही हो गया। एक चाह हो गया। सब जम गया टर गया अंदर। फिर योग युक्ति जानता था। धीरे-धीरे हाथ को नाक की तरफ ले आकर बहुत ठंड लगे तो चंद्रनाड़ी बंद करके सूर्यनाड़ी से श्वास लेना चाहिए ये हमने सुन रखा था। वहां ज्ञान काम आया। तभी तुम्हारे आगे हूं नहीं तो वहां कुल्फी में मैं कुल्फी हो जाते। देखो ज्ञान हंसते-हंसते मिलता है लेकिन काम आता है जीवन और मृत्यु के बीच। ऐसे आत्मज्ञान भी ऐसे ही है। यदि आपको हंसते-हंसते मिल रहा है लेकिन मृत्यु के समय भी याद आ जाए। अरे मरने के बाद इसमें भी याद आए तो मुक्ति हो जाएगा ऐसा ज्ञान है। परमात्मा तत्व का। लिंगो भक्तो ही मुक्तो हो। लिंग शरीर भंग हो जाए ज्ञान के बल से। मुक्त हो जाए। यहां साक्षात्कार हो जाए तो अच्छा है नहीं तो मरते समय। और मरने के बाद भी दूसरा देह धारण अरे नहीं धारण है। तो फिर मैं कौन हूं? जो हूं प्रकट हो जाए। गया सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म भूतों में। आत्मा परमात्मा घटाकाश महाकाश में मिल जाए। सब मिल जाएगा।
✨️शंकराचार्य के गुरु का नाम था गोविंदाचार्य गोविंदाचार्य के गुरु का नाम था गौड़पादाचार्य भगवान गौड़पादाचार्य गौड़पादाचार्य गौड़ देश से पैदल चलकर गए थे सुखदेव जी महाराज के पास दक्षिण भारत से गौड़ देश उत्तर भारत में हिमालय पैदल चलकर गए थे और फिर सुखदेव जी की कृपा से आत्मज्ञान हुआ उनको सब उनका नाम पड़ा भगवान गौड़पादाचार्य बराबर है 1800 मील चलकर एक गए संत और ज्ञानी महापुरुष की गुफा का दरवाजा बंद था खटखटा के चुप हो गए
अंदर से आवाज आई कौन? बोले प्रभु 1800 माइल चलकर ये दास आपके चरण रज में यही बात जानने को आया है मैं कौन हूं? चटाक से दरवाजा खोल दिया। समझदार जिज्ञासु है। ऐसे एक महात्मा थे हिमालय में। गंगोत्री से भी ऊपर रहते थे। बड़े फक्कड़ थे उनसे हमारा थोड़ा परिचय हो गया। हम जा तो रहे थे जहां से गंगा निकलती है वहां। तो उनका सत्संग मिल गया बातचीत किया था। वहीं बैठ गए। बड़े मस्त संत थे। अभी तो शरीर नहीं है उनका। दूसरे कभी-कभी अदृश्य योगी भी मिल जाते थे। हां प्रकट हुए बातचीत किया पर चले गए। ऐसे भी मिले हिमालय में। उनके अब तो ये भी नहीं रहा मिलने की भी इच्छा नहीं कोई मिलो ना मिलो। हम मिल गया उस योगी ने जो है वही हमारा आराम है आत्मा है। अब तो सब अदृश्य सदृश्य सब एक साथ है। पहले बहुत इच्छा थी कि ऐसे मिल जाए योगी ऐसा मिल जाए। ये सब किए पापड़ बेले खूब टक्करें खाई। ए दम गंगा जहां से निकलती है गंगोत्री से ऊपर ऊपर गोमुख। और रात-वसा कहीं करना पड़ा कहीं कुछ किया। आज से 20 साल पहले शरीर भी जरा का था 25 साल पहले। नहीं तो हम क्या-क्या पापड़ बेलते थे। घर से चलते थे कूद-कूद करके पहुंचना है। फिर देखते कि यहां से गंगा निकली अब। एकदम ओरिजिनल गंगा है इतनी छोटी सी है। आदमी कूद के पार हो सकता है ओरिजिनल गंगा इतनी है। बाकी के सब उसमें झरने या ज्यादा पानी उसको नाले बोलते हैं पहाड़ी लोग। नाले पड़ते हैं गंगा बढ़ती जाती है। तो उधर ओरिजिनल गंगा में नहाने को गोता मारा। आजू-बाजू बर्फ ही बर्फ बर्फ। खाना है तो बर्फ और पीना है तो बर्फ। तो ये सब मामला था। गोता मारा। चलो फिर सोचा कि फलाना आदमी अपनी सेवा करता है बेचारा उसका वो थोड़ी देर आएगा। चलो उसके नाम का गोता मार। फिर सोचा कि मां ने जन्म दिया है। वो तो कभी नहीं आ सकती बेचारे चलो उसके नाम का गोता मार। फिर याद आते गए इसकी रोटी खाई इसने प्रणाम किया तो कितनों के। तब इतनी प्रसिद्धि तो थी नहीं। फिर भी काफी लोग तो थे ही। तो एक-एक गोता मारता गया इतने का मारा तो फलाना बेचारे का अन्याय हो जाएगा। मारो। ऐसे जल्दी-जल्दी में ऐसे ही भागेडू डुबकी। वो भागेडू डुबकी मारते-मारते हमारा शरीर में पकड़ा गया सब। कुल्फी हो गया। वहां तो चिड़िया भी नहीं दिखती कौवा भी नहीं मनुष्य तो कहां आवे। एकदम अंदर उसमें मैं कुल्फी हो गया जैसे बर्फ जम कुल्फी नहीं होता है। ऐसे में कैसे कुल्फी हो जाता है डिजाइन में। गोता मारते जो एक्शन था वो वही का वही हो गया। एक चाह हो गया। सब जम गया टर गया अंदर। फिर योग युक्ति जानता था। धीरे-धीरे हाथ को नाक की तरफ ले आकर बहुत ठंड लगे तो चंद्रनाड़ी बंद करके सूर्यनाड़ी से श्वास लेना चाहिए ये हमने सुन रखा था। वहां ज्ञान काम आया। तभी तुम्हारे आगे हूं नहीं तो वहां कुल्फी में मैं कुल्फी हो जाते। देखो ज्ञान हंसते-हंसते मिलता है लेकिन काम आता है जीवन और मृत्यु के बीच। ऐसे आत्मज्ञान भी ऐसे ही है। यदि आपको हंसते-हंसते मिल रहा है लेकिन मृत्यु के समय भी याद आ जाए। अरे मरने के बाद इसमें भी याद आए तो मुक्ति हो जाएगा ऐसा ज्ञान है। परमात्मा तत्व का। लिंगो भक्तो ही मुक्तो हो। लिंग शरीर भंग हो जाए ज्ञान के बल से। मुक्त हो जाए। यहां साक्षात्कार हो जाए तो अच्छा है नहीं तो मरते समय। और मरने के बाद भी दूसरा देह धारण अरे नहीं धारण है। तो फिर मैं कौन हूं? जो हूं प्रकट हो जाए। गया सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म भूतों में। आत्मा परमात्मा घटाकाश महाकाश में मिल जाए। सब मिल जाएगा।
✨️इसीलिए वशिष्ठ कहते हैं हे राम जी ज्ञानवानों की भली प्रकार से सेवा करो। उनका बड़ा उपकार है। *नौकरी कर-कर के झख मार-मार के जो कमाया उससे क्या मिला तुम देख लो। पेंशन से क्या मिला है वो देख लो। और उधर थोड़ी सी सेवा करते तो कितना मिलता है। पेंशन होगी तो वो बेटे बोलेंगे तुम हमारा बाप। मृत्यु आएगी तब नहीं बोलेंगे तुम हमारे बाप हो हम साथ में चलते हैं। वहां तो गुरु ही चलेगा साथ में गुरु तत्व का ज्ञान। जैसे अगले जन्म का बाप साथ में नहीं आया बेटा साथ में नहीं आया।
📍*हजारों जन्म के बाप मिलकर जो चीज नहीं दिया।*
📍*हजारों जन्म के पति मिलकर जो चीज नहीं दिया।*
📍*हजारों जन्म की पत्नियों ने कुछ नहीं दिया।*
📍*हजारों जन्मों के लाखों मित्रों ने नहीं दिया।*
*वो सतगुरु रूपी मित्र हंसते-हंसते दे देता है ऐसा ज्ञान है। इसीलिए उनका बड़ा उपकार है। भली प्रकार ज्ञानवान की सेवा करना चाहिए।* और ज्ञानी की सेवा यही है कि ज्ञानी के दैवी कार्य में सेवा का मतलब ये नहीं कि पग दबाओ। हे बापू जी मिठाई खाओ। लो ये हार पहनो। ये तो ठीक है बहिरंग सेवा है। अंतरंग सेवा ये है कि वो कैसे संतुष्ट हो कैसे खुश हो। ज्ञानी खुश कैसे होता है पता है? ज्ञानी को अपना शरीर इतना प्यारा नहीं होता। जितना अपना अनुभव प्यारा होता है। जितना अपना सिद्धांत अनुभव प्यारा होता है। *तो ज्ञानी के अनुभव को दूसरों तक पहुंचाना ज्ञानवान के दैवी कार्य में अपने को झंपला देना ये ज्ञानी के बड़े में बड़ी सेवा है।* मिठाई भी खाए तो ठीक। फूल हार ये सब ठीक छोटी सेवा है। बहुत छोटी तुच्छ। कोई बड़ी सेवा है। बस। उनको देख के आहो भाव से हृदय भर जाए। ज्ञानी में और ब्रह्म में भेद ना देखे। लटका करता ब्रह्म है।
*अगुन ही सगुन ही नहीं कछु भेदा*
*बारि बीच इम गावहि वेदा।*
तुलसीदास जी बोले➖️
निर्गुण में सगुण में कोई भेद नहीं है। जैसे जल में और तरंग में कोई भेद नहीं है। उसमें प्रश्न किया रामायण में। अगुन ही सगुन ही नहीं कछु भेदा बारि बीच इम गावहि वेदा। फिर प्रश्न किया है। अगुन अरूप सगुन सो कैसे? जो अगुण है निर्गुण है वो सगुण कैसे है? जल से बिलग तरंग नहीं जैसे। अगुन अरूप सगुन सो कैसे? जल से बिलग तरंग नहीं जैसे।
*अगुन ही सगुन ही नहीं कछु भेदा*
*बारि बीच इम गावहि वेदा।*
तो जैसे हम बैठे हैं तो भी हम हैं खड़े हैं तो भी हम हैं। हवा चलती है तभी भी हवा है और शांत है तभी भी हवा है। ऐसे अव्यक्त है तभी भी ब्रह्म है। अव्यक्त है तभी भी ब्रह्म है। जिसमें प्रकट हुआ है उसमें तो साक्षात है ही है। एक आदमी ने उड़िया बाबा से पूछा कि ज्ञानी का आत्मा ब्रह्म है ज्ञानी ज्ञानी का आत्मा ब्रह्म है कि शरीर ब्रह्म है? ज्ञानी शरीर रहित ब्रह्म है कि शरीर सहित ब्रह्म है? उड़िया बाबा ने कहा कि अरे महामूर्ख ज्ञानी शरीर शरीर से अलग हो ब्रह्म होगा। मरने के बाद ब्रह्म होता है क्या ज्ञानी? शरीर से अलग है ये तो जिज्ञासु को विवेक करके सूक्ष्म वृत्ति बनाने के लिए उपदेश दिया जाता है बाकी तो सब जर्रे-जर्रे में कण-कण में ईश्वर है। तो जिसके हृदय में ईश्वर प्रकट हो गया तो उसका शरीर भी ईश्वर के आंदोलन से ईश्वरमय हो गया कि नहीं?.स शरीर ब्रह्म है। शरीर रहित ब्रह्म है नहीं स शरीर ब्रह्म है। वो लटका करता हुआ ब्रह्म है।
💥*ज्ञानी चलता खेलता फिरता बोलता सुनता ब्रह्म है। बोलता सुनता सुनाता ब्रह्म है... लटका करता ब्रह्म है।*
🙏🙏🕉️
📍*हजारों जन्म के बाप मिलकर जो चीज नहीं दिया।*
📍*हजारों जन्म के पति मिलकर जो चीज नहीं दिया।*
📍*हजारों जन्म की पत्नियों ने कुछ नहीं दिया।*
📍*हजारों जन्मों के लाखों मित्रों ने नहीं दिया।*
*वो सतगुरु रूपी मित्र हंसते-हंसते दे देता है ऐसा ज्ञान है। इसीलिए उनका बड़ा उपकार है। भली प्रकार ज्ञानवान की सेवा करना चाहिए।* और ज्ञानी की सेवा यही है कि ज्ञानी के दैवी कार्य में सेवा का मतलब ये नहीं कि पग दबाओ। हे बापू जी मिठाई खाओ। लो ये हार पहनो। ये तो ठीक है बहिरंग सेवा है। अंतरंग सेवा ये है कि वो कैसे संतुष्ट हो कैसे खुश हो। ज्ञानी खुश कैसे होता है पता है? ज्ञानी को अपना शरीर इतना प्यारा नहीं होता। जितना अपना अनुभव प्यारा होता है। जितना अपना सिद्धांत अनुभव प्यारा होता है। *तो ज्ञानी के अनुभव को दूसरों तक पहुंचाना ज्ञानवान के दैवी कार्य में अपने को झंपला देना ये ज्ञानी के बड़े में बड़ी सेवा है।* मिठाई भी खाए तो ठीक। फूल हार ये सब ठीक छोटी सेवा है। बहुत छोटी तुच्छ। कोई बड़ी सेवा है। बस। उनको देख के आहो भाव से हृदय भर जाए। ज्ञानी में और ब्रह्म में भेद ना देखे। लटका करता ब्रह्म है।
*अगुन ही सगुन ही नहीं कछु भेदा*
*बारि बीच इम गावहि वेदा।*
तुलसीदास जी बोले➖️
निर्गुण में सगुण में कोई भेद नहीं है। जैसे जल में और तरंग में कोई भेद नहीं है। उसमें प्रश्न किया रामायण में। अगुन ही सगुन ही नहीं कछु भेदा बारि बीच इम गावहि वेदा। फिर प्रश्न किया है। अगुन अरूप सगुन सो कैसे? जो अगुण है निर्गुण है वो सगुण कैसे है? जल से बिलग तरंग नहीं जैसे। अगुन अरूप सगुन सो कैसे? जल से बिलग तरंग नहीं जैसे।
*अगुन ही सगुन ही नहीं कछु भेदा*
*बारि बीच इम गावहि वेदा।*
तो जैसे हम बैठे हैं तो भी हम हैं खड़े हैं तो भी हम हैं। हवा चलती है तभी भी हवा है और शांत है तभी भी हवा है। ऐसे अव्यक्त है तभी भी ब्रह्म है। अव्यक्त है तभी भी ब्रह्म है। जिसमें प्रकट हुआ है उसमें तो साक्षात है ही है। एक आदमी ने उड़िया बाबा से पूछा कि ज्ञानी का आत्मा ब्रह्म है ज्ञानी ज्ञानी का आत्मा ब्रह्म है कि शरीर ब्रह्म है? ज्ञानी शरीर रहित ब्रह्म है कि शरीर सहित ब्रह्म है? उड़िया बाबा ने कहा कि अरे महामूर्ख ज्ञानी शरीर शरीर से अलग हो ब्रह्म होगा। मरने के बाद ब्रह्म होता है क्या ज्ञानी? शरीर से अलग है ये तो जिज्ञासु को विवेक करके सूक्ष्म वृत्ति बनाने के लिए उपदेश दिया जाता है बाकी तो सब जर्रे-जर्रे में कण-कण में ईश्वर है। तो जिसके हृदय में ईश्वर प्रकट हो गया तो उसका शरीर भी ईश्वर के आंदोलन से ईश्वरमय हो गया कि नहीं?.स शरीर ब्रह्म है। शरीर रहित ब्रह्म है नहीं स शरीर ब्रह्म है। वो लटका करता हुआ ब्रह्म है।
💥*ज्ञानी चलता खेलता फिरता बोलता सुनता ब्रह्म है। बोलता सुनता सुनाता ब्रह्म है... लटका करता ब्रह्म है।*
🙏🙏🕉️
🥀💠❣️
📍*04.06.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
=====================
1. *जीवन मुक्त ज्ञानी का स्वरूप*💥
*कर्म होता है, कर्तापन नहीं* ⚙️
जैसे कुम्हार का चाक पहले घुमाया जाता है फिर अपने वेग से चलता रहता है 🔄, वैसे ही ज्ञानी का शरीर प्रारब्ध से कर्म करता है। लेकिन अंदर "मैं कर रहा हूँ" का बोझ नहीं होता 🪶
*शरीर का राजा, गुलाम नहीं* 👑
वो शरीर रूपी नगर में नागरिक बनकर नहीं रहता। राजा की तरह रहता है। शरीर में रहकर भी लेपायमान नहीं होता, पानी पर कमल की तरह 🌸
*अंदर शांत, बाहर सामान्य* ☮️
शरीर को पीड़ा हो, नुकसान हो, सब दिखता है। लेकिन अंदर का सुख अटल रहता है 🧘♂️
2. *ज्ञानी का देश - उसका स्वभाव* 🌿
ये कोई जगह नहीं, गुणों का देश है:
- *मैत्री* 🤝: ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे ज्ञानवानों से दोस्ती
- *करुणा* 💛: जो आत्मा को नहीं जानते उन पर दया
- *मुदिता* 😊: साधकों की उन्नति देखकर प्रसन्नता
- *उपेक्षा* 🙏: निंदक, घमंडी पर द्वेष नहीं
- *शांति, वैराग्य, समता, निर्भयता* 🕊️: ये सब उसका स्वभाव है
ईर्ष्या, भोग वासना, मरने का भय 😨 - ये अज्ञानी का गांव है।
3. *महिमा* ✨
*भोग और मोक्ष दोनों दास* 🙌
साधारण आदमी भोग इकट्ठा करते-करते जिंदगी सुखा देता है 😵। ज्ञानी का प्रारब्ध ऐसा होता है कि भोग भी हाजिर रहते हैं और मोक्ष भी मुट्ठी में रहता है ✊
*सर्वत्र अपना प्यारा दिखता है* 👀
ज्ञानी को चिड़िया की चहचहाट 🐦, फूल की महक 🌺, सबमें अपना ही आत्मा दिखता है। इसलिए आनंद कभी कम नहीं होता
*दो मिनट में निहाल* ⏳
ज्ञानी की संगत, मौन, दृष्टि - दो मिनट भी उसके भाव में बैठ जाओ तो चिंता-समस्या का बोझ उतर जाता है 🍃
*निंदा-स्तुति से अविचल* 🗿
लोग गाली दें, थूकें, कंकर मारें तो भी क्षोभ नहीं। सम्मान मिले तो भी अभिमान नहीं 🙏
4. *सेवा का असली मतलब* 🌸
सेवा का मतलब पाँव दबाना नहीं। ज्ञानी को शरीर से ज्यादा अपना अनुभव प्यारा होता है। इसलिए उसकी सबसे बड़ी सेवा है - उसके अनुभव, उसके सिद्धांत को दूसरों तक पहुँचाना 📢
🕉️*वो चलता-फिरता, बोलता-सुनता ब्रह्म है* 🌌
---
💥*सार बात* 💡:
अज्ञानी को कभी-कभी प्यारा मिलता है तो सुख होता है। ज्ञानी को सर्वत्र अपना प्यारा मिलता रहता है, इसलिए सुख अटल रहता है 🔥
तुम्हें ऐसा लगता है कि आज के समय में भी कोई बिना नाम-पद के सिर्फ समता से पहचाना जाने वाला ज्ञानी मिल सकता है? 🤔
🙏🙏🕉️
📍*04.06.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
=====================
1. *जीवन मुक्त ज्ञानी का स्वरूप*💥
*कर्म होता है, कर्तापन नहीं* ⚙️
जैसे कुम्हार का चाक पहले घुमाया जाता है फिर अपने वेग से चलता रहता है 🔄, वैसे ही ज्ञानी का शरीर प्रारब्ध से कर्म करता है। लेकिन अंदर "मैं कर रहा हूँ" का बोझ नहीं होता 🪶
*शरीर का राजा, गुलाम नहीं* 👑
वो शरीर रूपी नगर में नागरिक बनकर नहीं रहता। राजा की तरह रहता है। शरीर में रहकर भी लेपायमान नहीं होता, पानी पर कमल की तरह 🌸
*अंदर शांत, बाहर सामान्य* ☮️
शरीर को पीड़ा हो, नुकसान हो, सब दिखता है। लेकिन अंदर का सुख अटल रहता है 🧘♂️
2. *ज्ञानी का देश - उसका स्वभाव* 🌿
ये कोई जगह नहीं, गुणों का देश है:
- *मैत्री* 🤝: ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे ज्ञानवानों से दोस्ती
- *करुणा* 💛: जो आत्मा को नहीं जानते उन पर दया
- *मुदिता* 😊: साधकों की उन्नति देखकर प्रसन्नता
- *उपेक्षा* 🙏: निंदक, घमंडी पर द्वेष नहीं
- *शांति, वैराग्य, समता, निर्भयता* 🕊️: ये सब उसका स्वभाव है
ईर्ष्या, भोग वासना, मरने का भय 😨 - ये अज्ञानी का गांव है।
3. *महिमा* ✨
*भोग और मोक्ष दोनों दास* 🙌
साधारण आदमी भोग इकट्ठा करते-करते जिंदगी सुखा देता है 😵। ज्ञानी का प्रारब्ध ऐसा होता है कि भोग भी हाजिर रहते हैं और मोक्ष भी मुट्ठी में रहता है ✊
*सर्वत्र अपना प्यारा दिखता है* 👀
ज्ञानी को चिड़िया की चहचहाट 🐦, फूल की महक 🌺, सबमें अपना ही आत्मा दिखता है। इसलिए आनंद कभी कम नहीं होता
*दो मिनट में निहाल* ⏳
ज्ञानी की संगत, मौन, दृष्टि - दो मिनट भी उसके भाव में बैठ जाओ तो चिंता-समस्या का बोझ उतर जाता है 🍃
*निंदा-स्तुति से अविचल* 🗿
लोग गाली दें, थूकें, कंकर मारें तो भी क्षोभ नहीं। सम्मान मिले तो भी अभिमान नहीं 🙏
4. *सेवा का असली मतलब* 🌸
सेवा का मतलब पाँव दबाना नहीं। ज्ञानी को शरीर से ज्यादा अपना अनुभव प्यारा होता है। इसलिए उसकी सबसे बड़ी सेवा है - उसके अनुभव, उसके सिद्धांत को दूसरों तक पहुँचाना 📢
🕉️*वो चलता-फिरता, बोलता-सुनता ब्रह्म है* 🌌
---
💥*सार बात* 💡:
अज्ञानी को कभी-कभी प्यारा मिलता है तो सुख होता है। ज्ञानी को सर्वत्र अपना प्यारा मिलता रहता है, इसलिए सुख अटल रहता है 🔥
तुम्हें ऐसा लगता है कि आज के समय में भी कोई बिना नाम-पद के सिर्फ समता से पहचाना जाने वाला ज्ञानी मिल सकता है? 🤔
🙏🙏🕉️
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🌹 *05.06.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन*🏵️
====================
💥*दुख के संयोग का वियोग ही योग है और शाश्वत सुख का मार्ग।*
*तं विद्यात् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।*
*स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥*
✨️जिसमें दुख दुखों के संयोग का वियोग है अर्थात जिसमें दुख का संयोग नहीं है उसी को योग नाम से जानना चाहिए उस ध्यान योग का अभ्यास बिना उकताए हुए चित्त से निश्चय पूर्वक करना चाहिए भगवान कहते हैं कि जहां दुख का मिश्रण नहीं है संसार के सुखों में दुखों का मिश्रण है और संसार के सुखों में अज्ञान का और लाचारी का मिश्रण है और भगवान का सुख जो है उसमें दुख का मिश्रण नहीं है
*तं विद्यात् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।*
*स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥*
✨️जिसमें दुखों के संयोग का ही वियोग है अर्थात जिसमें दुख का मिश्रण संयोग नहीं है उसी को योग नाम से जानना चाहिए उस ध्यान योग का अभ्यास बिना उकताए ना उकताए हुए चित्त से निश्चय पूर्वक करना चाहिए भगवत गीता के छठे अध्याय का 23वां श्लोक तुम बोल गए भगवान ने भगवत गीता के दूसरे अध्याय के 48वें श्लोक में कहा समत्वं योगं उच्यते सुख आता है और चला जाता है दुख आता है चला जाता है इन दोनों में जो ज्ञान स्वरूप सम चैतन्य रहता है उसमें जो टिक रहा है वह योग है
✨️एक होती है कामना दूसरी होती है आवश्यकता कामना संसार के लोग करते हैं लेकिन आवश्यकता अपने को सच्चे सुख की है कामना पूरी नहीं होती है कामनाएं बदलती रहती है कामना एक व्यसन करने जाता है उसमें भी सुख नहीं मिला तो दूसरी जगह जाता है तीसरी जगह जाता है तो इच्छाएं बदलता रहता है लेकिन सच्चे सुख की आवश्यकता जब तक पूरी नहीं हुई तब तक इस जीव को जन्म मरण मरण जन्म चिंता और मुसीबतों से थपेड़े खाने पड़ते हैं तो आवश्यकता है परमात्म सुख की प्राप्ति की और इच्छा हो रही है नश्वर संसार की अगर नश्वर संसार की इच्छा छूट जाए तो आवश्यकता अपने आप पूरी हो जाती है कामना पूर्ति में भविष्य की बाट देखनी पड़ती है अभी नहीं है बेटा शादी करेंगे फिर बेटा होगा अभी नौकरी नहीं है पास होंगे फिर नौकरी होगी फिर पैसे मिलेंगे फिर वस्तु लाएंगे फिर सुखी होंगे नौकरी के लिए इंतजार है पैसे के लिए इंतजार है कामना पूर्ति करके सुख के लिए भविष्य का इंतजार है लेकिन आवश्यकता पूरी करनी हो तो कोई इंतजार नहीं अभी था अभी है पहले था और बाद में रहेगा उस परमात्मा में शांत हुआ तो अभी वह सुख मिलने लग जाएगा तो संसार के सुख में इच्छा की नौबत है और इच्छाएं करते-करते संसार का सुख जरा सा दिखता है फिर ओझल हो जाता है क्यों कि संसार सरकने वाला है
✨️*ना धन का सुख सदा रहता है ना शरीरों का सुख सदा रहता है ना संग्रह का सुख सदा रहता है ना भोग का सुख सदा रहता है ना नाक की सुगंधि का सुख सदा रहता है ना जीभ के चटोरेपन का सुख रहता है ना आंख के विलन देखने का सुख सदा रहता है ना कान की धाकड़ धिन धिन का सुख सदा रहता है लेकिन उन सभी बदलने वाले को देखने वाला सदा रहता है वह मेरा आत्मा है परमात्मा है उससे योग करोगे तो दुख का कभी संयोग नहीं होगा और शाश्वत सुख आपके घर में झुरमुट झुरमुट झुरमुट दिल के झरोखे से छलकाता रहेगा*
✨️ ऐसे उस शाश्वत सुख को पाने का योग करो उकताओ नहीं उसको छोड़ो नहीं अभी मैं महीने में एक सप्ताह आऊंगा दो सप्ताह आऊंगा तीन सप्ताह आऊंगा बोलकर भी मुंडो मार-मार करके अपने पैर पर कुल्हाड़े मत मारो समय किसी की बात नहीं देखता मौत कब आ जाए बीमारी कब झटका मारे 15 अगस्त के आसपास भूतपूर्व मुख्यमंत्री का मृत्यु हो गई लेकिन 15 दिन पहले मतलब 1-2 अगस्त को जो लोग मिलने गए उनके आगे उन्होंने कहा कि मैं फिर से मुख्यमंत्री बनूं तो मेरे दिमाग में ब्लूप्रिंट है ऐसा करूंगा ऐसा करूंगा ऐसा करूंगा लेकिन *मानसिक इच्छाएं कितनी धीरे आप बटोरों सब पूरी नहीं होती और सब अधूरी नहीं रहती और जो पूरी होती है फिर भी ऐसे कैसे और अधूरी रहती है तो पीड़ा देती है लेकिन परमात्मा इच्छा एक बार पूरी हो गई तो फिर परमात्मा शाश्वत रहते हैं परमात्मा का सुख शाश्वत है परमात्मा का ज्ञान शाश्वत है परमात्मा का अस्तित्व शाश्वत है शरीर शाश्वत नहीं है शरीर से मिलने वाला सुख यह वस्तु शाश्वत नहीं है लेकिन मेरा परमात्मा और मेरा आत्मा शाश्वत है मैं उसका योग करने के लिए ही मनुष्य जीवन में आया हूं ऐसी एक बार पक्की धारणा कर लो*
✨️ रुपए का योग करते-करते मर गए कई लोग परेशान हो गए प्रेत होकर मुसलम जैसे भटकते हैं रुपए का योग सेठ के साथ कभी नहीं हो सकता प्रतीति होगी कि रुपए मेरे हैं मैंने इतने लाख कमा लिए इतने करोड़ कमा लिए कटेगा पिया बड़ा पिया कटे हैं पिया तो तिजोरी में कि दो नंबर एक नंबर में थे तो भटके भूत हो के यह नश्वर चीजों का मोह छोड़ दो
🌹 *05.06.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन*🏵️
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💥*दुख के संयोग का वियोग ही योग है और शाश्वत सुख का मार्ग।*
*तं विद्यात् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।*
*स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥*
✨️जिसमें दुख दुखों के संयोग का वियोग है अर्थात जिसमें दुख का संयोग नहीं है उसी को योग नाम से जानना चाहिए उस ध्यान योग का अभ्यास बिना उकताए हुए चित्त से निश्चय पूर्वक करना चाहिए भगवान कहते हैं कि जहां दुख का मिश्रण नहीं है संसार के सुखों में दुखों का मिश्रण है और संसार के सुखों में अज्ञान का और लाचारी का मिश्रण है और भगवान का सुख जो है उसमें दुख का मिश्रण नहीं है
*तं विद्यात् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।*
*स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥*
✨️जिसमें दुखों के संयोग का ही वियोग है अर्थात जिसमें दुख का मिश्रण संयोग नहीं है उसी को योग नाम से जानना चाहिए उस ध्यान योग का अभ्यास बिना उकताए ना उकताए हुए चित्त से निश्चय पूर्वक करना चाहिए भगवत गीता के छठे अध्याय का 23वां श्लोक तुम बोल गए भगवान ने भगवत गीता के दूसरे अध्याय के 48वें श्लोक में कहा समत्वं योगं उच्यते सुख आता है और चला जाता है दुख आता है चला जाता है इन दोनों में जो ज्ञान स्वरूप सम चैतन्य रहता है उसमें जो टिक रहा है वह योग है
✨️एक होती है कामना दूसरी होती है आवश्यकता कामना संसार के लोग करते हैं लेकिन आवश्यकता अपने को सच्चे सुख की है कामना पूरी नहीं होती है कामनाएं बदलती रहती है कामना एक व्यसन करने जाता है उसमें भी सुख नहीं मिला तो दूसरी जगह जाता है तीसरी जगह जाता है तो इच्छाएं बदलता रहता है लेकिन सच्चे सुख की आवश्यकता जब तक पूरी नहीं हुई तब तक इस जीव को जन्म मरण मरण जन्म चिंता और मुसीबतों से थपेड़े खाने पड़ते हैं तो आवश्यकता है परमात्म सुख की प्राप्ति की और इच्छा हो रही है नश्वर संसार की अगर नश्वर संसार की इच्छा छूट जाए तो आवश्यकता अपने आप पूरी हो जाती है कामना पूर्ति में भविष्य की बाट देखनी पड़ती है अभी नहीं है बेटा शादी करेंगे फिर बेटा होगा अभी नौकरी नहीं है पास होंगे फिर नौकरी होगी फिर पैसे मिलेंगे फिर वस्तु लाएंगे फिर सुखी होंगे नौकरी के लिए इंतजार है पैसे के लिए इंतजार है कामना पूर्ति करके सुख के लिए भविष्य का इंतजार है लेकिन आवश्यकता पूरी करनी हो तो कोई इंतजार नहीं अभी था अभी है पहले था और बाद में रहेगा उस परमात्मा में शांत हुआ तो अभी वह सुख मिलने लग जाएगा तो संसार के सुख में इच्छा की नौबत है और इच्छाएं करते-करते संसार का सुख जरा सा दिखता है फिर ओझल हो जाता है क्यों कि संसार सरकने वाला है
✨️*ना धन का सुख सदा रहता है ना शरीरों का सुख सदा रहता है ना संग्रह का सुख सदा रहता है ना भोग का सुख सदा रहता है ना नाक की सुगंधि का सुख सदा रहता है ना जीभ के चटोरेपन का सुख रहता है ना आंख के विलन देखने का सुख सदा रहता है ना कान की धाकड़ धिन धिन का सुख सदा रहता है लेकिन उन सभी बदलने वाले को देखने वाला सदा रहता है वह मेरा आत्मा है परमात्मा है उससे योग करोगे तो दुख का कभी संयोग नहीं होगा और शाश्वत सुख आपके घर में झुरमुट झुरमुट झुरमुट दिल के झरोखे से छलकाता रहेगा*
✨️ ऐसे उस शाश्वत सुख को पाने का योग करो उकताओ नहीं उसको छोड़ो नहीं अभी मैं महीने में एक सप्ताह आऊंगा दो सप्ताह आऊंगा तीन सप्ताह आऊंगा बोलकर भी मुंडो मार-मार करके अपने पैर पर कुल्हाड़े मत मारो समय किसी की बात नहीं देखता मौत कब आ जाए बीमारी कब झटका मारे 15 अगस्त के आसपास भूतपूर्व मुख्यमंत्री का मृत्यु हो गई लेकिन 15 दिन पहले मतलब 1-2 अगस्त को जो लोग मिलने गए उनके आगे उन्होंने कहा कि मैं फिर से मुख्यमंत्री बनूं तो मेरे दिमाग में ब्लूप्रिंट है ऐसा करूंगा ऐसा करूंगा ऐसा करूंगा लेकिन *मानसिक इच्छाएं कितनी धीरे आप बटोरों सब पूरी नहीं होती और सब अधूरी नहीं रहती और जो पूरी होती है फिर भी ऐसे कैसे और अधूरी रहती है तो पीड़ा देती है लेकिन परमात्मा इच्छा एक बार पूरी हो गई तो फिर परमात्मा शाश्वत रहते हैं परमात्मा का सुख शाश्वत है परमात्मा का ज्ञान शाश्वत है परमात्मा का अस्तित्व शाश्वत है शरीर शाश्वत नहीं है शरीर से मिलने वाला सुख यह वस्तु शाश्वत नहीं है लेकिन मेरा परमात्मा और मेरा आत्मा शाश्वत है मैं उसका योग करने के लिए ही मनुष्य जीवन में आया हूं ऐसी एक बार पक्की धारणा कर लो*
✨️ रुपए का योग करते-करते मर गए कई लोग परेशान हो गए प्रेत होकर मुसलम जैसे भटकते हैं रुपए का योग सेठ के साथ कभी नहीं हो सकता प्रतीति होगी कि रुपए मेरे हैं मैंने इतने लाख कमा लिए इतने करोड़ कमा लिए कटेगा पिया बड़ा पिया कटे हैं पिया तो तिजोरी में कि दो नंबर एक नंबर में थे तो भटके भूत हो के यह नश्वर चीजों का मोह छोड़ दो
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*जितना हेत हराम में उतना हरि से होए*
*कहे कबीरा वादा सका पला न पकड़े को*
✨️तो बोले महाराज संसार की भी आवश्यकता तो है नहीं आवश्यकता सच्चे सुख की है इच्छा संसार की होती है और इच्छा होने से ही संसार मिल नहीं जाता है *संसार तो मिलता है अपने पुरुषार्थ से प्रारब्ध से और फिर छूट जाता है और भगवान मिलते हैं प्रेम से स्मृति से और कभी छूटते नहीं* मीरा ने भगवान की स्मृति की प्रेम किया गौरांग ने स्मृति की प्रेम किया ध्रुव ने स्मृति की धन्ना मे स्मृति की तो भगवान स्मृति मात्र से मिलते हैं पैसा स्मृति मात्र से लोभी को कभी नहीं मिल सकता है पैसा जड़ है और स्मृति से नहीं मिलेगा उद्योग से पुरुषार्थ से मिलेगा लेकिन सदा टिकेगा नहीं जिस पैसों का संबंध शरीर के साथ है वह शरीर सदा नहीं टिकेगा तो पैसा कैसे सदा साथ में रहेगा मित्र कभी कैसे साथ में रहेगा यह सब अपने आप छूट रहे हैं बचपन छूट गया और बचपन के खिलौने छूट गए ऐसे ही *जवानी की तरंगे कई तरंगों पर नाचते थे वह नृत्य छूट गया और जवानी के दोस्त भी बदल गए जवानी के वस्तुएं भी बदल गई लेकिन वह जिसकी आवश्यकता है वह परमात्मा नहीं बदला और जिसको आवश्यकता है वह जीवात्मा नहीं बदला*
✨️बचपन बदला जवानी बदली किशोरावस्था बदली सुख बदले दुख बदले लेकिन अभी सुख की सच्चे सुख की आवश्यकता मौजूद है नहीं मिला सच्चा सुख और कच्चे सुख में भटक-भटक के परेशान हो रहे हैं जो सच्चे सुख में ईमानदारी से आ जाते हैं उसके आगे कच्चे सुख के साधन तो इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं राजा जनक के पास महावीर के पास बुद्ध के पास और मीरा के पास अपने आप यह चीजें मंडराती थी तो भगवान तो स्मृति मात्र से मिलते हैं भावग्राही जनार्दना लेकिन धन कभी नहीं सोचता कि लोभी तुम मेरा स्मरण करते हो चलो मैं आ गया धन नहीं आएगा अपने आप और आएगा तो अपने आप टिकेगा या तुम्हारी सेवा करेगा संभव नहीं है
✨️जगन्नाथ महाराज थे वह भगवान की स्मृति करते थे वृद्ध हो गए बीमार हो गए दूसरे मंजरी पर उनका निवास था शौच जाना पड़ता था भक्त उठते बाबा को ले जाते शौच करा के सुला देते एक बार भक्त नीचे सोए रहे आपस में गपशप लगाते देर रात को सोए तो भक्त उन्हें आवाज सुनाने कि हे प्रभु अब क्या करें इतने में एक युवक आ गया बाबा को लेकर शौच करा के सुला दिया अब तो भक्तों ने कभी दो दिन रहते हैं कोई पांच दिन रहता है भक्त तो आते-जाते रहे लेकिन भक्तों का जो भक्त है भगवान वह तो सदा ध्यान रखता है ख्याल रखता है कई दिनों तक वह युवक के रूप में आते जगन्नाथ भगवान और उसको शौचालय का क्रिया करा के सुला देते एक दिन देखा कि तुम आते हो मेरे को उठना होता है और तुम हाजिर हो जाते हो तुम कहां के भक्त हो कौन हो क्या हो बोले मैं भक्तों का भक्त हूं तुम्हारा कोमल स्पर्श तुम कौन हो तो भगवान उस युवक के रूप में भगवान थे अपना जगन्नाथ के रूप में दर्शन दे दिया वह भक्त रो-रो कर चरणों पर पड़ गया जगन्नाथ दास कि प्रभु इतनी गंदी सेवा आप कर रहे थे इससे तो मेरा रोग ही मिटा देते आप इतनी मजदूरी क्यों किए बोले रोग मिटाते तो किसी अभी मिटाया है तभी भी तुम्हारा कर्म का तीव्र भोग है तो फिर भोगना पड़ेगा इसलिए वह तीव्र भोग तो रामावतार में कृष्णावतार में जैसा होता है हम भी फंसा करने देते हैं अपने भक्तों का क्यों बचा के रखेंगे लेकिन मैंने तुम्हारी सेवा कर ली मुझे आनंद है लेकिन रुपए से आकर उठा के और आपकी सेवा कर ले संभव नहीं है
📍रुपयों से व्यंजन मिल सकते हैं लेकिन भूख तो ईश्वर देता है
📍रुपयों से गद्दी तकिया मिल सकते हैं लेकिन नींद तो ईश्वर देता है
📍रुपयों से नौकर मिल सकते हैं लेकिन सुखद सेवा तो ईश्वर ही करवाता है
📍ऐसे ईश्वर की आवश्यकता है हमको और इच्छा करते हैं संसार की संसार की आवश्यकता नहीं है संसार की इच्छा हमको भटकाती है
✨️आवश्यकता है भोजन छाजन की लेकिन इच्छा होती है कि बढ़िया भोजन हो बढ़िया बिस्तर हो बढ़िया गाड़ी हो आवश्यकता है कुछ रुपए पैसे की लेकिन इतने पैसे हो इतने खप्पे खप्पे खप्पे में खप गए और खपते-खपते इतने खप गए कि अब पता ही नहीं चल रहा है कि खप रहे हैं कोई क्या हाल है बोले जी रहे हैं जी नहीं रहे हैं मारवाड़ी मर रहे हो जी नहीं रहे हो भैया अपन मर रहे हैं 68 साल की उम्र है 60 साल हो गए 60 साल मर गए बाकी 8 साल हैं अगर 75 साल की उम्र है तो 60 साल मर गए 15 साल है और 15 साल भी पक्के हैं यह नहीं कह सकते आप वो बोलेगा लगभग 75 लगभग 68 उसमें लगभग में कब भाग जाए कोई पता नहीं लेकिन *तुम्हारा परमात्मा पहले था अब भी है बाद में रहेगा तुम्हारा आत्मा पहले था अब भी है बाद में रहेगा तो उस आत्मा परमात्मा का योग कर दो और संसार से आसक्ति हटा दो बस आपके जीवन में दुख का संयोग नहीं होगा* जब दुख देने वाले वस्तुओं में ममता रखते हैं प्रीति रखते हैं उनको मैं और मेरा मानते हैं शरीर को मैं मानते हैं वस्तुओं को मेरा मानते हैं बस हम आवश्यकता की आग में पछते वो
*कहे कबीरा वादा सका पला न पकड़े को*
✨️तो बोले महाराज संसार की भी आवश्यकता तो है नहीं आवश्यकता सच्चे सुख की है इच्छा संसार की होती है और इच्छा होने से ही संसार मिल नहीं जाता है *संसार तो मिलता है अपने पुरुषार्थ से प्रारब्ध से और फिर छूट जाता है और भगवान मिलते हैं प्रेम से स्मृति से और कभी छूटते नहीं* मीरा ने भगवान की स्मृति की प्रेम किया गौरांग ने स्मृति की प्रेम किया ध्रुव ने स्मृति की धन्ना मे स्मृति की तो भगवान स्मृति मात्र से मिलते हैं पैसा स्मृति मात्र से लोभी को कभी नहीं मिल सकता है पैसा जड़ है और स्मृति से नहीं मिलेगा उद्योग से पुरुषार्थ से मिलेगा लेकिन सदा टिकेगा नहीं जिस पैसों का संबंध शरीर के साथ है वह शरीर सदा नहीं टिकेगा तो पैसा कैसे सदा साथ में रहेगा मित्र कभी कैसे साथ में रहेगा यह सब अपने आप छूट रहे हैं बचपन छूट गया और बचपन के खिलौने छूट गए ऐसे ही *जवानी की तरंगे कई तरंगों पर नाचते थे वह नृत्य छूट गया और जवानी के दोस्त भी बदल गए जवानी के वस्तुएं भी बदल गई लेकिन वह जिसकी आवश्यकता है वह परमात्मा नहीं बदला और जिसको आवश्यकता है वह जीवात्मा नहीं बदला*
✨️बचपन बदला जवानी बदली किशोरावस्था बदली सुख बदले दुख बदले लेकिन अभी सुख की सच्चे सुख की आवश्यकता मौजूद है नहीं मिला सच्चा सुख और कच्चे सुख में भटक-भटक के परेशान हो रहे हैं जो सच्चे सुख में ईमानदारी से आ जाते हैं उसके आगे कच्चे सुख के साधन तो इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं राजा जनक के पास महावीर के पास बुद्ध के पास और मीरा के पास अपने आप यह चीजें मंडराती थी तो भगवान तो स्मृति मात्र से मिलते हैं भावग्राही जनार्दना लेकिन धन कभी नहीं सोचता कि लोभी तुम मेरा स्मरण करते हो चलो मैं आ गया धन नहीं आएगा अपने आप और आएगा तो अपने आप टिकेगा या तुम्हारी सेवा करेगा संभव नहीं है
✨️जगन्नाथ महाराज थे वह भगवान की स्मृति करते थे वृद्ध हो गए बीमार हो गए दूसरे मंजरी पर उनका निवास था शौच जाना पड़ता था भक्त उठते बाबा को ले जाते शौच करा के सुला देते एक बार भक्त नीचे सोए रहे आपस में गपशप लगाते देर रात को सोए तो भक्त उन्हें आवाज सुनाने कि हे प्रभु अब क्या करें इतने में एक युवक आ गया बाबा को लेकर शौच करा के सुला दिया अब तो भक्तों ने कभी दो दिन रहते हैं कोई पांच दिन रहता है भक्त तो आते-जाते रहे लेकिन भक्तों का जो भक्त है भगवान वह तो सदा ध्यान रखता है ख्याल रखता है कई दिनों तक वह युवक के रूप में आते जगन्नाथ भगवान और उसको शौचालय का क्रिया करा के सुला देते एक दिन देखा कि तुम आते हो मेरे को उठना होता है और तुम हाजिर हो जाते हो तुम कहां के भक्त हो कौन हो क्या हो बोले मैं भक्तों का भक्त हूं तुम्हारा कोमल स्पर्श तुम कौन हो तो भगवान उस युवक के रूप में भगवान थे अपना जगन्नाथ के रूप में दर्शन दे दिया वह भक्त रो-रो कर चरणों पर पड़ गया जगन्नाथ दास कि प्रभु इतनी गंदी सेवा आप कर रहे थे इससे तो मेरा रोग ही मिटा देते आप इतनी मजदूरी क्यों किए बोले रोग मिटाते तो किसी अभी मिटाया है तभी भी तुम्हारा कर्म का तीव्र भोग है तो फिर भोगना पड़ेगा इसलिए वह तीव्र भोग तो रामावतार में कृष्णावतार में जैसा होता है हम भी फंसा करने देते हैं अपने भक्तों का क्यों बचा के रखेंगे लेकिन मैंने तुम्हारी सेवा कर ली मुझे आनंद है लेकिन रुपए से आकर उठा के और आपकी सेवा कर ले संभव नहीं है
📍रुपयों से व्यंजन मिल सकते हैं लेकिन भूख तो ईश्वर देता है
📍रुपयों से गद्दी तकिया मिल सकते हैं लेकिन नींद तो ईश्वर देता है
📍रुपयों से नौकर मिल सकते हैं लेकिन सुखद सेवा तो ईश्वर ही करवाता है
📍ऐसे ईश्वर की आवश्यकता है हमको और इच्छा करते हैं संसार की संसार की आवश्यकता नहीं है संसार की इच्छा हमको भटकाती है
✨️आवश्यकता है भोजन छाजन की लेकिन इच्छा होती है कि बढ़िया भोजन हो बढ़िया बिस्तर हो बढ़िया गाड़ी हो आवश्यकता है कुछ रुपए पैसे की लेकिन इतने पैसे हो इतने खप्पे खप्पे खप्पे में खप गए और खपते-खपते इतने खप गए कि अब पता ही नहीं चल रहा है कि खप रहे हैं कोई क्या हाल है बोले जी रहे हैं जी नहीं रहे हैं मारवाड़ी मर रहे हो जी नहीं रहे हो भैया अपन मर रहे हैं 68 साल की उम्र है 60 साल हो गए 60 साल मर गए बाकी 8 साल हैं अगर 75 साल की उम्र है तो 60 साल मर गए 15 साल है और 15 साल भी पक्के हैं यह नहीं कह सकते आप वो बोलेगा लगभग 75 लगभग 68 उसमें लगभग में कब भाग जाए कोई पता नहीं लेकिन *तुम्हारा परमात्मा पहले था अब भी है बाद में रहेगा तुम्हारा आत्मा पहले था अब भी है बाद में रहेगा तो उस आत्मा परमात्मा का योग कर दो और संसार से आसक्ति हटा दो बस आपके जीवन में दुख का संयोग नहीं होगा* जब दुख देने वाले वस्तुओं में ममता रखते हैं प्रीति रखते हैं उनको मैं और मेरा मानते हैं शरीर को मैं मानते हैं वस्तुओं को मेरा मानते हैं बस हम आवश्यकता की आग में पछते वो
इच्छा की आग में पचते रहते हैं
✨️कबीर जी कहते हैं कि क्या हालत है इन संसारी लोगों की कैसी बेवकूफी में जीवन गुजर जाता है
जन्म सब धोखे में खो दियो
द्वादश वर्ष बालपन बीते
12 साल तक बचपन में बीत गए हैं खेलने कूदने में है हूं में भजन नहीं किया द्वादश वर्ष बचपन में बीते
बीस में जवान भयो
नोट चाहिए यह चाहिए वह चाहिए
30 वर्ष माया के फेरे
गांव देश विदेश भागा यहां करेंगे वह करेंगे यह करेंगे
40 वर्ष अंत जब लागे बाढ़े मोह नयो
फिर नया 40 साल की उम्र नया मोह नई योजना नया आकर्षण वासनाएं अवश्य इच्छाएं हो गई
धन और धाम पुत्र के कारण...धन बढ़ाने में मकान बढ़ाने में कंपनियां बढ़ाने में...
✨️धन धाम और पुत्र के कारण... निश दिन सोच भयो अब सोच विचार में खोपड़ी चल गई मैं क्या हूं और क्या पाने को आया वह भूल गए इन्हीं के सोच विचार में धन के मकान के ग्राहक के इनकम टैक्स के सेल टैक्स के एक नंबर के दो नंबर में इधर करना है उधर करना है उसी में खोपड़ा लग गया परमात्मा के साथ योग करने के लिए जो बुद्धि मिली थी परमात्मा के साथ योग करने के लिए जो मनुष्य शरीर मिला उससे योग नहीं किया जिसमें दुख का संयोग है उसी में योग करके थपेड़े खा रहे हैं 40 के हो गए 50 के हो गए पुत्र
धन धाम पुत्र के कारण निश दिन सोच भयो
वर्ष 50 कमर भई टेढ़ी...
✨️50 साल हुए किडनी खराब हुई कमर में थकान हुई फलाना हुआ यह हुआ काले बाल सफेद हो गए शरीर का प्रभाव काम करने का ढीला हो गया 50 साल हुए यह नोटिस आए फिर भी वासना इतना बेवकूफ बना देती है हमको
वर्ष 50 कमर भई टेढ़ी सोचत खाट पड़यो
लड़की बहू और बोले बुढ़ऊ मरी न गयो
वर्ष 60 और 70 के भीतर केश सफेद भयो
कफ पित्त वात घेर लियो है नैनन नीर भयो
✨️60 70 साल के होए आंखों से पानी आ जाए नाक टेढ़ी हो रही है चश्मा भी टेढ़ा हो जाता है इसे सीधा करना पड़ता है क्या आखिर? कब तक संभालो संवारो चश्मा दूर काटा ऊपर रखो यह करो वह करो आंख का पहले जैसा तेज नहीं रहा कान का पहले जैसा श्रवण नहीं रहा फिर भी यह खपे वह खपे जो जला लेना है शरीर उसके लिए और जो छोड़ के मरना है उसी के लिए खपे जा रहे हैं तो भगवान बोलते हैं दुख संयोग... जिसमें दुख का संयोग नहीं ऐसा योग करो . जिसमें दुखही दुख भरा है उसका सयोग करके हे पुत्र हे बालक हे अमृत पुत्र तुम परेशान हो जाओगे
बरस 60 -70 के भीतर केस सफेद भयों
कफ पित्त वात घेर लियो है नैनन नीर भयो
ना गुरु भक्ति न साधु की सेवा ना शुभ कर्म कियों
ना गुरु भक्ति गुरु की आज्ञा पालन ही गुरु की भक्ति है.. गुरु मान जो लघु जीवन से ऊपर उठाने में हमको सहयोग करते हैं तो उनकी बात मे हमको चलना चाहिए.. हमारी बात में अगर उनको चलाया तो हमारा उत्थान कैसे होगा
ना गुरु भक्ति न साधु की सेवा ना शुभ कर्म कियों
कहे कबीर सुनो भाई साधु... चोला छूट गयो
मर गया... जला दिया भटकता रहा... फिर चंद्रमा के किरणों के द्वारा किसी मे पड़ा... कीसी गाय ने घोड़े ने भैंस ने खाया.. उनके शरीर के द्वारा मादा ले गया गर्भ ना मिला नाली में बह गया .. ऐसा दुःख सामने पड़ा है फिर भी पिया किते हैं पिया किते उनका तो भाई खुदा हाफिस है
✨️भगवान बोलते दुःख का जिसमें संयोग नहीं ऐसा योग उकताए चित्त के बिना तुम करो और वह सरल है कठिन नहीं है *संसार को रखना असंभव है और परमात्मा को छोड़ना असंभव है संसार में सदा सुखी रहना असंभव है और परमात्मा पाकर दुखी होना असंभव है* श्री कृष्ण के पास क्या कमी थी सोने की द्वारका थी रानियां थी पुत्र थे पौत्र थे संकल्प शक्ति थी कभी चतुर्भुजी बन जाते कभी द्विभुजी बन जाते इतनी सारी सुविधाएं यशोगान करते ऋषि मुनि यक्ष गंधर्व ऐसे कृष्ण भी द्वारका से इधर-उधर से अपने को एकांत में ले गए और 17 वर्ष एकांत में चले गए *कृष्ण को भी वैराग्य करना पड़ा बुद्ध को वैराग्य करना पड़ा महावीर को वैराग्य करना पड़ा मीरा को गार्गी को शांडिल्य को वैराग्य करना पड़ा और तुम संसार में कब तक सुख देखोगे*
✨️जयपुर के पास गलता तीर्थ है। वहां पर एक शांडिली नाम की कन्या रहती थी। और दुख का जिसमें संयोग नहीं ऐसे योग का वह आश्रय लेती थी। ध्यान करती थी, प्राणायाम करती थी, श्वासोच्छवास गिनकर परमात्मा में शांत रहती थी। इससे उसका प्रभाव बढ़ गया। एक दिन गरुड़ और गालव ऋषि गरुड़ और गालव वहां आए। यह छोरी का तेज देखकर हुआ कि यह तो धरती ऊपर की लक्ष्मी को भी नीचा दिखाए ऐसी दिव्य आत्मा है। ऐसी दिव्य आत्मा का विवाह तो भगवान नारायण से होना चाहिए। उनके मन में उसको विवाहित देखने की चाह हुई। शांडिली को बात कही। शांडिली ने कहा नहीं, विवाह करके भी आखिर में क्या? भगवान नारायण जिससे नारायण है उस आत्मा से मैं योग करूंगी, शरीरों से योग कब तक करूंगी? कई जन्मों तक पतियों से, पत्नियों से योग किया लेकिन वह सारे योग वियोग हो जाते हैं। जहां दुख का संयोग नहीं उस परमात्मा से मैं योग अभी पूर्ण करूंगी। लेकिन गालव को, गरुड़ को लगा कि
✨️कबीर जी कहते हैं कि क्या हालत है इन संसारी लोगों की कैसी बेवकूफी में जीवन गुजर जाता है
जन्म सब धोखे में खो दियो
द्वादश वर्ष बालपन बीते
12 साल तक बचपन में बीत गए हैं खेलने कूदने में है हूं में भजन नहीं किया द्वादश वर्ष बचपन में बीते
बीस में जवान भयो
नोट चाहिए यह चाहिए वह चाहिए
30 वर्ष माया के फेरे
गांव देश विदेश भागा यहां करेंगे वह करेंगे यह करेंगे
40 वर्ष अंत जब लागे बाढ़े मोह नयो
फिर नया 40 साल की उम्र नया मोह नई योजना नया आकर्षण वासनाएं अवश्य इच्छाएं हो गई
धन और धाम पुत्र के कारण...धन बढ़ाने में मकान बढ़ाने में कंपनियां बढ़ाने में...
✨️धन धाम और पुत्र के कारण... निश दिन सोच भयो अब सोच विचार में खोपड़ी चल गई मैं क्या हूं और क्या पाने को आया वह भूल गए इन्हीं के सोच विचार में धन के मकान के ग्राहक के इनकम टैक्स के सेल टैक्स के एक नंबर के दो नंबर में इधर करना है उधर करना है उसी में खोपड़ा लग गया परमात्मा के साथ योग करने के लिए जो बुद्धि मिली थी परमात्मा के साथ योग करने के लिए जो मनुष्य शरीर मिला उससे योग नहीं किया जिसमें दुख का संयोग है उसी में योग करके थपेड़े खा रहे हैं 40 के हो गए 50 के हो गए पुत्र
धन धाम पुत्र के कारण निश दिन सोच भयो
वर्ष 50 कमर भई टेढ़ी...
✨️50 साल हुए किडनी खराब हुई कमर में थकान हुई फलाना हुआ यह हुआ काले बाल सफेद हो गए शरीर का प्रभाव काम करने का ढीला हो गया 50 साल हुए यह नोटिस आए फिर भी वासना इतना बेवकूफ बना देती है हमको
वर्ष 50 कमर भई टेढ़ी सोचत खाट पड़यो
लड़की बहू और बोले बुढ़ऊ मरी न गयो
वर्ष 60 और 70 के भीतर केश सफेद भयो
कफ पित्त वात घेर लियो है नैनन नीर भयो
✨️60 70 साल के होए आंखों से पानी आ जाए नाक टेढ़ी हो रही है चश्मा भी टेढ़ा हो जाता है इसे सीधा करना पड़ता है क्या आखिर? कब तक संभालो संवारो चश्मा दूर काटा ऊपर रखो यह करो वह करो आंख का पहले जैसा तेज नहीं रहा कान का पहले जैसा श्रवण नहीं रहा फिर भी यह खपे वह खपे जो जला लेना है शरीर उसके लिए और जो छोड़ के मरना है उसी के लिए खपे जा रहे हैं तो भगवान बोलते हैं दुख संयोग... जिसमें दुख का संयोग नहीं ऐसा योग करो . जिसमें दुखही दुख भरा है उसका सयोग करके हे पुत्र हे बालक हे अमृत पुत्र तुम परेशान हो जाओगे
बरस 60 -70 के भीतर केस सफेद भयों
कफ पित्त वात घेर लियो है नैनन नीर भयो
ना गुरु भक्ति न साधु की सेवा ना शुभ कर्म कियों
ना गुरु भक्ति गुरु की आज्ञा पालन ही गुरु की भक्ति है.. गुरु मान जो लघु जीवन से ऊपर उठाने में हमको सहयोग करते हैं तो उनकी बात मे हमको चलना चाहिए.. हमारी बात में अगर उनको चलाया तो हमारा उत्थान कैसे होगा
ना गुरु भक्ति न साधु की सेवा ना शुभ कर्म कियों
कहे कबीर सुनो भाई साधु... चोला छूट गयो
मर गया... जला दिया भटकता रहा... फिर चंद्रमा के किरणों के द्वारा किसी मे पड़ा... कीसी गाय ने घोड़े ने भैंस ने खाया.. उनके शरीर के द्वारा मादा ले गया गर्भ ना मिला नाली में बह गया .. ऐसा दुःख सामने पड़ा है फिर भी पिया किते हैं पिया किते उनका तो भाई खुदा हाफिस है
✨️भगवान बोलते दुःख का जिसमें संयोग नहीं ऐसा योग उकताए चित्त के बिना तुम करो और वह सरल है कठिन नहीं है *संसार को रखना असंभव है और परमात्मा को छोड़ना असंभव है संसार में सदा सुखी रहना असंभव है और परमात्मा पाकर दुखी होना असंभव है* श्री कृष्ण के पास क्या कमी थी सोने की द्वारका थी रानियां थी पुत्र थे पौत्र थे संकल्प शक्ति थी कभी चतुर्भुजी बन जाते कभी द्विभुजी बन जाते इतनी सारी सुविधाएं यशोगान करते ऋषि मुनि यक्ष गंधर्व ऐसे कृष्ण भी द्वारका से इधर-उधर से अपने को एकांत में ले गए और 17 वर्ष एकांत में चले गए *कृष्ण को भी वैराग्य करना पड़ा बुद्ध को वैराग्य करना पड़ा महावीर को वैराग्य करना पड़ा मीरा को गार्गी को शांडिल्य को वैराग्य करना पड़ा और तुम संसार में कब तक सुख देखोगे*
✨️जयपुर के पास गलता तीर्थ है। वहां पर एक शांडिली नाम की कन्या रहती थी। और दुख का जिसमें संयोग नहीं ऐसे योग का वह आश्रय लेती थी। ध्यान करती थी, प्राणायाम करती थी, श्वासोच्छवास गिनकर परमात्मा में शांत रहती थी। इससे उसका प्रभाव बढ़ गया। एक दिन गरुड़ और गालव ऋषि गरुड़ और गालव वहां आए। यह छोरी का तेज देखकर हुआ कि यह तो धरती ऊपर की लक्ष्मी को भी नीचा दिखाए ऐसी दिव्य आत्मा है। ऐसी दिव्य आत्मा का विवाह तो भगवान नारायण से होना चाहिए। उनके मन में उसको विवाहित देखने की चाह हुई। शांडिली को बात कही। शांडिली ने कहा नहीं, विवाह करके भी आखिर में क्या? भगवान नारायण जिससे नारायण है उस आत्मा से मैं योग करूंगी, शरीरों से योग कब तक करूंगी? कई जन्मों तक पतियों से, पत्नियों से योग किया लेकिन वह सारे योग वियोग हो जाते हैं। जहां दुख का संयोग नहीं उस परमात्मा से मैं योग अभी पूर्ण करूंगी। लेकिन गालव को, गरुड़ को लगा कि
कुछ भी करके इसको समझाएं। समझाने पर नहीं मानी। रात्रि को चुपचाप उठे और उसको किडनैप करके ले जाने की नियत से उन्होंने अपना ताल बिठा दिया, तालमेल कर दिया। गालव ऋषि ने कहा मैं पकड़कर गरुड़ जी तुम पर बिठा दूंगा और हम दोनों उसको भगवान नारायण के पास ले चलेंगे। जब उस इरादे से शांडिली के पास गए तो शांडिली उठ खड़ी हुई और तनिक शांत हुई और जान लिया कि यह जबरदस्ती मुझे वैकुंठ ले जाना चाहते हैं नारायण के साथ विवाह कराकर। शांडिली ने कुपित होकर संकल्प किया और उन पर छींटा मारा तो ऐसी जोरों की हवा ऐसा वातावरण हो गया। गरुड़ के पंख गिरने लगे। गालव ऋषि गलने लगे। कुछ का कुछ होने लगा कि तुम क्या समझते हो? तुमने मेरे को इस प्रकार क्या समझा है? त्राहिमाम! पाहिमाम! क्षम्यताम्! शांडिली, शांडिली माफ करो, माफ करो। शांडिली ने कहा अच्छा है अब प्रभु रुक जाओ। गरुड़ ने गालव ने कहा, गालव ऋषि ने कि शांडिली तुम्हारे उस परमात्म योग के बल का लोगों को पता चलता रहे इसलिए आज से यह धरती, यह जगह गलता तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध होगी कि गरुड़ जैसों के पंख और गालव जैसे का शरीर गलाने का सामर्थ्य वाली कन्या का कैसा आत्म योग है, कैसा योग सामर्थ्य है लोगों को देखने, सोचने, समझने को मिलेगा।
जयपुर से 12-13 किलोमीटर के अंतर पर है और अपना जहां आश्रम बनना है वहां से दो-तीन किलोमीटर के अंतर पर है गलता तीर्थ। जहां शांडिली ने योग किया था। बोलो तो कैसी ऊंची बात भगवान चाहते हैं।
✨️तो एक तो है धारणा, ध्यान, समाधि का योग और दूसरा है निष्काम कर्म योग। आप किसी की बुराई ना देखें, किसी का बुरा ना सोचे, किसी का बुरा ना करने का व्रत ले लें। और जितनी हो सके भलाई सोचे, भलाई देखें और भलाई करें। तो इससे आपको अंतःकरण मलिन करने का गलती से बच जाएंगे और भला करेंगे तो सुख लेने की लालच से आप बच जाएंगे। तो जो सुख देने में लग जाता है वह अंतरात्मा के सुख में सहज में ही सुखी होने लगता है। एक व्यक्ति को बहुत बड़ा प्यारा आम मिला। आप उसके देखा कोई भूखा है उसको दे दिया। दूसरा आदमी देख रहा था। बोला आपको भूख भी थी, इतना बढ़िया आम मिला उसको क्यों दे दिया? बोले दूसरे को सुखी देखने का जो सुख है उससे अपने सुख की वासना मिटती है, मुझे बड़ा आनंद मिला है। अपना भोजन खाने का थाली आई और हमसे ज्यादा किसको आवश्यकता है अथवा हमारे बराबर ही है उसको दे देते तो उसको तो बाहर से पेट भरता है लेकिन हमारा हृदय भरता है सत्कर्म से।
✨️*सेवा लेने वाले से सेवा करने वाला दुगने फायदे में है। धन का संग्रह और अपने बच्चों के लिए, परिवार के लिए कर-करके मरने वाले की अपेक्षा धन का समाज के लिए सदुपयोग करने वाला ज्यादा बादशाह, ज्यादा वीर, ज्यादा बलवान हो जाता है, ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है। जो अपने लिए संग्रह करता है वह बेईमान बन जाएगा, कपटी बन जाएगा, कामी बन जाएगा, लोभी बन जाएगा, मोही बन जाएगा और अंत में विक्षिप्त होकर भटकेगा। लेकिन जो समाज के हित के लिए ही सब करता है उसको तो आनंद है, उसको तो त्याग है, उसको तो प्रेम है, उसका तो अंतःकरण का सामर्थ्य बढ़ जाता है।*
✨️तो आवश्यकता है परमात्म सुख की और वासना है संसार की। बोले महाराज वासना नहीं करेंगे तो कैसे गाड़ी चलेगा? अरे भाई ईश्वर ने तो ऐसी व्यवस्था की कि आप वासना ना करो फिर भी अच्छी तरह से चल जाए। मैंने बताई थी कथा परसों को एक व्यक्ति था जो पुजारी को टोकता था। क्या राम-राम करते, क्या ओम-ओम जपते। पुजारी ने कहा भाई जो जगत का पालनहार है, जो जगत का रक्षक है, पोषक है, प्रेरक है, पालनहार है उस जगदीशवर का नाम लेने से मन पवित्र अरे बोले कि अरे जो सारे विश्व को खिलाता है उस भगवान का नाम लेता हूं। बोले नहीं-नहीं विश्व को कौन खिलाता है? बोले भगवान खिलाते हैं। हम्म! बड़ा भगवान खिलाता है विश्व को। कौन कहां देखा भगवान खिलाता है? हम हम अनाज लाते हैं, घर में पिसता है, बाजार से पिसता है, पत्नी रोटी बनाती है, हम अपना कमा के खाते हैं। कौन ईश्वर खिलाने वाला है? बोले आप मानते नहीं सबका पोषक, पालक परमात्मा है। हम उसी का नाम लेते हैं। बोले क्या कीर्तन करते हैं हमको विघ्न होता है। अगर दोबारा कीर्तन करा तो बोले नहीं हम तो पुजारी ने कहा भाई हम तो अब क्या करें तुम्हारे पड़ोसी हमारा जगह है मंदिर है तो कीर्तन। तो बोले कीर्तन से कौन क्या काम की बात करो कमाओ खाओ। क्या यह सब भगवान का नाम लेते हैं? बोले जो भगवान ही भगवान के नाम की कमाई कीर्तन करते भगवान में शांत होते हैं फिर जो कुछ होता है भगवान की कृपा से भगवान खिला देते हैं, मिल जाता है कर लेते हैं। बोले भगवान खिलाता है यह बात बंद करो। पुजारी ने कहा नहीं यह भी बात है भगवान ही खिलाता है। बोले नहीं भगवान नहीं खिलाता। हम नहीं खाएंगे भगवान का खिलाया हुआ। बोले आप ऐसी जगह पर जाओ जहां कोई खिलाने वाला नहीं हो वहां भगवान आपको खिलाने आ जाएंगे। बोले हम्म! भगवान खिलाने आ जाएंगे। नहीं
जयपुर से 12-13 किलोमीटर के अंतर पर है और अपना जहां आश्रम बनना है वहां से दो-तीन किलोमीटर के अंतर पर है गलता तीर्थ। जहां शांडिली ने योग किया था। बोलो तो कैसी ऊंची बात भगवान चाहते हैं।
✨️तो एक तो है धारणा, ध्यान, समाधि का योग और दूसरा है निष्काम कर्म योग। आप किसी की बुराई ना देखें, किसी का बुरा ना सोचे, किसी का बुरा ना करने का व्रत ले लें। और जितनी हो सके भलाई सोचे, भलाई देखें और भलाई करें। तो इससे आपको अंतःकरण मलिन करने का गलती से बच जाएंगे और भला करेंगे तो सुख लेने की लालच से आप बच जाएंगे। तो जो सुख देने में लग जाता है वह अंतरात्मा के सुख में सहज में ही सुखी होने लगता है। एक व्यक्ति को बहुत बड़ा प्यारा आम मिला। आप उसके देखा कोई भूखा है उसको दे दिया। दूसरा आदमी देख रहा था। बोला आपको भूख भी थी, इतना बढ़िया आम मिला उसको क्यों दे दिया? बोले दूसरे को सुखी देखने का जो सुख है उससे अपने सुख की वासना मिटती है, मुझे बड़ा आनंद मिला है। अपना भोजन खाने का थाली आई और हमसे ज्यादा किसको आवश्यकता है अथवा हमारे बराबर ही है उसको दे देते तो उसको तो बाहर से पेट भरता है लेकिन हमारा हृदय भरता है सत्कर्म से।
✨️*सेवा लेने वाले से सेवा करने वाला दुगने फायदे में है। धन का संग्रह और अपने बच्चों के लिए, परिवार के लिए कर-करके मरने वाले की अपेक्षा धन का समाज के लिए सदुपयोग करने वाला ज्यादा बादशाह, ज्यादा वीर, ज्यादा बलवान हो जाता है, ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है। जो अपने लिए संग्रह करता है वह बेईमान बन जाएगा, कपटी बन जाएगा, कामी बन जाएगा, लोभी बन जाएगा, मोही बन जाएगा और अंत में विक्षिप्त होकर भटकेगा। लेकिन जो समाज के हित के लिए ही सब करता है उसको तो आनंद है, उसको तो त्याग है, उसको तो प्रेम है, उसका तो अंतःकरण का सामर्थ्य बढ़ जाता है।*
✨️तो आवश्यकता है परमात्म सुख की और वासना है संसार की। बोले महाराज वासना नहीं करेंगे तो कैसे गाड़ी चलेगा? अरे भाई ईश्वर ने तो ऐसी व्यवस्था की कि आप वासना ना करो फिर भी अच्छी तरह से चल जाए। मैंने बताई थी कथा परसों को एक व्यक्ति था जो पुजारी को टोकता था। क्या राम-राम करते, क्या ओम-ओम जपते। पुजारी ने कहा भाई जो जगत का पालनहार है, जो जगत का रक्षक है, पोषक है, प्रेरक है, पालनहार है उस जगदीशवर का नाम लेने से मन पवित्र अरे बोले कि अरे जो सारे विश्व को खिलाता है उस भगवान का नाम लेता हूं। बोले नहीं-नहीं विश्व को कौन खिलाता है? बोले भगवान खिलाते हैं। हम्म! बड़ा भगवान खिलाता है विश्व को। कौन कहां देखा भगवान खिलाता है? हम हम अनाज लाते हैं, घर में पिसता है, बाजार से पिसता है, पत्नी रोटी बनाती है, हम अपना कमा के खाते हैं। कौन ईश्वर खिलाने वाला है? बोले आप मानते नहीं सबका पोषक, पालक परमात्मा है। हम उसी का नाम लेते हैं। बोले क्या कीर्तन करते हैं हमको विघ्न होता है। अगर दोबारा कीर्तन करा तो बोले नहीं हम तो पुजारी ने कहा भाई हम तो अब क्या करें तुम्हारे पड़ोसी हमारा जगह है मंदिर है तो कीर्तन। तो बोले कीर्तन से कौन क्या काम की बात करो कमाओ खाओ। क्या यह सब भगवान का नाम लेते हैं? बोले जो भगवान ही भगवान के नाम की कमाई कीर्तन करते भगवान में शांत होते हैं फिर जो कुछ होता है भगवान की कृपा से भगवान खिला देते हैं, मिल जाता है कर लेते हैं। बोले भगवान खिलाता है यह बात बंद करो। पुजारी ने कहा नहीं यह भी बात है भगवान ही खिलाता है। बोले नहीं भगवान नहीं खिलाता। हम नहीं खाएंगे भगवान का खिलाया हुआ। बोले आप ऐसी जगह पर जाओ जहां कोई खिलाने वाला नहीं हो वहां भगवान आपको खिलाने आ जाएंगे। बोले हम्म! भगवान खिलाने आ जाएंगे। नहीं
आएंगे। बोले आएंगे। बोले हम खाएंगे नहीं तेरे भगवान का। बोले नहीं क्या खाओगे भगवान मार कर भी खिला देंगे। तुम जाओ जरा देखो। बोले देखो पुजारी मैं जाऊंगा जंगल में ऐसी जगह पर कोई है नहीं। 24 घंटे में तेरा भगवान मेरे को कैसे मार के खिलाता है मैं देखता हूं। अगर मार के खिलाए मैं खाऊंगा नहीं, मुंह नहीं खोलूंगा। बोले वह जबरदस्ती तेरा मुंह खोल के खिलाएंगे। अगर नहीं खिलाया तो तुम्हारा सिर काट दूंगा पुजारी। मुझे जानते हो मैं मलूक दास सेठ। बड़ा प्रसिद्ध महात्मा हो गए बाद में।
✨️अगर खिलाया तो बोले खिलाया तो फिर देखता हूं। वह चला गया जंगल में। जाकर ऊंची पेड़ की आखिरी डाल पर बैठ गया। कैसे आता है, कौन आता है भगवान-भगवान ही तो। एक आधा दो घंटा बीता कोई यात्री गया। जरा पेड़ के नीचे लेटा। फिर आराम करके चल दिया और भोजन का जो उसका बक्सा-बक्सा जो कुछ पोटली थी वह भूल गया। अब यह भगवान की लीला कहो कि यह यात्री को प्रेरणा देने की कृपा कहो कि भगवान का रूप कहो। एक दो घंटे बीते तो वहां से डाकू निकले। डाकुओं ने देखा कि यह वृक्ष तो बहुत बढ़िया है। बैठे यहां भूख लगी है। देखा यह क्या है तो देखा कि ओह! देखा यह क्या है तो देखा कि उसमें तो भोजन पड़ा है। तो डाकू के सरदार ने कहा यह भोजन पड़ा है तो इधर कौन भोजन रखने आया? जरूर कोई हमारे शत्रुओं ने या तो पुलिस ने रखवाया होगा। हो सकता है इसमें जहर मिला हो। हम खाएं और मर जाएं। ऐसा कुछ होगा। ऐसे कैसे कि पेड़ के नीचे पड़ा है भोजन और खा लें। देखो कौन रख गया। इधर कोई दिखता नहीं। बोले खोजो। यह कोई भूत रख गया क्या? कोई मनुष्य रखा होगा। इधर-उधर दौड़े देखा कोई है नहीं। बराबर खोजो। बराबर खोजते-खोजते ऊपर नजर गई। ए! अबे भोजन यहां रख के जहर मिलाकर ऊपर टुकुर-टुकुर देख रहा है। बोले नहीं-नहीं मैंने नहीं रखा। तो किसने रखा? बोले मैंने नहीं रखा। कोई यात्री आया भूल गया होगा। अरे यात्री के बच्चे नीचे उतर आओ। बोले नहीं उतरूंगा। नहीं कैसे उतरेगा? दो आदमी को चढ़ाया ऊपर। ना-ना करते कैसे भी झटकते-झटकते नीचे ले आए। अब देखा नहीं तो यह तो पटक देंगे। जख्म मार के नीचे आना पड़ा। नीचे आया बोले खा भोजन। बोले नहीं खाऊंगा। तो पक्का तूने जहर मिलाया है। अब तो तेरे को खिलाएंगे, खिलाएंगे। बोले मैंने जहर नहीं मिलाया। मैं खाने वाला नहीं। बोले नहीं-नहीं खा। मुंह में रखे। मुंह खोले नहीं। नाक दबाए तो मुंह खोलेगी। फिर मुंह बंद करे तो दांत दबाए। वह लकड़ी लाए मुंह में डाल दी। खा। गोदा मारे। डाकू तो डाकू होते हैं। दो डाकू, चार डाकू लग जाए खा तो क्या मना कर सकते हैं? खा, खा। जख्म मार के खाना पड़ा। देखते-देखते वह डाकू के रूप में कौन थे वही वही जाने। लेकिन बुद्धि में कुछ प्रकाश विशेष हो गया। पुजारी के पास गए। पुजारी मार के भी खिलाता है वह। पुजारी ने कहा यह तो मार के खिलाता है। मां के गर्भ से जन्म लेते तो कैसा दूध बना देता है। ना ज्यादा गर्म, ना ज्यादा ठंडा। ना ज्यादा मीठा, ना ज्यादा फीका। फीका हो तो छोरे को अच्छा नहीं लगे। ज्यादा मीठा हो तो डायबिटीज हो जाए। ठंडा हो तो वायु करे, गर्म हो तो मुंह जले। चकोर-चकोर चकोर पिया। जितना चाहिए पिया फिर मुंह घुमा दिया। ना फ्रिज करना पड़े, ना उबालना पड़े। ना ध्यान रखना पड़े और झूठा माना नहीं जाता। अपवित्र नहीं माना जाता है। यह कौन करता है?
*मुर्दे को प्रभु देत है कपड़ा, लकड़ा, आग।*
*जिंदा नर चिंता करे जिसका बड़ा अभाग।*
💥*संसार की यह चिंता है, यह काम है। तू प्रयत्न कर। तत्परता से खाने-पीने का कर। लेकिन आवश्यकता, वासना बढ़ा मत। अपने लिए कम से कम आवश्यकता और लोगों के सहाय में लग जा। अंतरात्मा से योग होना आसान हो जाएगा।*
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✨️अगर खिलाया तो बोले खिलाया तो फिर देखता हूं। वह चला गया जंगल में। जाकर ऊंची पेड़ की आखिरी डाल पर बैठ गया। कैसे आता है, कौन आता है भगवान-भगवान ही तो। एक आधा दो घंटा बीता कोई यात्री गया। जरा पेड़ के नीचे लेटा। फिर आराम करके चल दिया और भोजन का जो उसका बक्सा-बक्सा जो कुछ पोटली थी वह भूल गया। अब यह भगवान की लीला कहो कि यह यात्री को प्रेरणा देने की कृपा कहो कि भगवान का रूप कहो। एक दो घंटे बीते तो वहां से डाकू निकले। डाकुओं ने देखा कि यह वृक्ष तो बहुत बढ़िया है। बैठे यहां भूख लगी है। देखा यह क्या है तो देखा कि ओह! देखा यह क्या है तो देखा कि उसमें तो भोजन पड़ा है। तो डाकू के सरदार ने कहा यह भोजन पड़ा है तो इधर कौन भोजन रखने आया? जरूर कोई हमारे शत्रुओं ने या तो पुलिस ने रखवाया होगा। हो सकता है इसमें जहर मिला हो। हम खाएं और मर जाएं। ऐसा कुछ होगा। ऐसे कैसे कि पेड़ के नीचे पड़ा है भोजन और खा लें। देखो कौन रख गया। इधर कोई दिखता नहीं। बोले खोजो। यह कोई भूत रख गया क्या? कोई मनुष्य रखा होगा। इधर-उधर दौड़े देखा कोई है नहीं। बराबर खोजो। बराबर खोजते-खोजते ऊपर नजर गई। ए! अबे भोजन यहां रख के जहर मिलाकर ऊपर टुकुर-टुकुर देख रहा है। बोले नहीं-नहीं मैंने नहीं रखा। तो किसने रखा? बोले मैंने नहीं रखा। कोई यात्री आया भूल गया होगा। अरे यात्री के बच्चे नीचे उतर आओ। बोले नहीं उतरूंगा। नहीं कैसे उतरेगा? दो आदमी को चढ़ाया ऊपर। ना-ना करते कैसे भी झटकते-झटकते नीचे ले आए। अब देखा नहीं तो यह तो पटक देंगे। जख्म मार के नीचे आना पड़ा। नीचे आया बोले खा भोजन। बोले नहीं खाऊंगा। तो पक्का तूने जहर मिलाया है। अब तो तेरे को खिलाएंगे, खिलाएंगे। बोले मैंने जहर नहीं मिलाया। मैं खाने वाला नहीं। बोले नहीं-नहीं खा। मुंह में रखे। मुंह खोले नहीं। नाक दबाए तो मुंह खोलेगी। फिर मुंह बंद करे तो दांत दबाए। वह लकड़ी लाए मुंह में डाल दी। खा। गोदा मारे। डाकू तो डाकू होते हैं। दो डाकू, चार डाकू लग जाए खा तो क्या मना कर सकते हैं? खा, खा। जख्म मार के खाना पड़ा। देखते-देखते वह डाकू के रूप में कौन थे वही वही जाने। लेकिन बुद्धि में कुछ प्रकाश विशेष हो गया। पुजारी के पास गए। पुजारी मार के भी खिलाता है वह। पुजारी ने कहा यह तो मार के खिलाता है। मां के गर्भ से जन्म लेते तो कैसा दूध बना देता है। ना ज्यादा गर्म, ना ज्यादा ठंडा। ना ज्यादा मीठा, ना ज्यादा फीका। फीका हो तो छोरे को अच्छा नहीं लगे। ज्यादा मीठा हो तो डायबिटीज हो जाए। ठंडा हो तो वायु करे, गर्म हो तो मुंह जले। चकोर-चकोर चकोर पिया। जितना चाहिए पिया फिर मुंह घुमा दिया। ना फ्रिज करना पड़े, ना उबालना पड़े। ना ध्यान रखना पड़े और झूठा माना नहीं जाता। अपवित्र नहीं माना जाता है। यह कौन करता है?
*मुर्दे को प्रभु देत है कपड़ा, लकड़ा, आग।*
*जिंदा नर चिंता करे जिसका बड़ा अभाग।*
💥*संसार की यह चिंता है, यह काम है। तू प्रयत्न कर। तत्परता से खाने-पीने का कर। लेकिन आवश्यकता, वासना बढ़ा मत। अपने लिए कम से कम आवश्यकता और लोगों के सहाय में लग जा। अंतरात्मा से योग होना आसान हो जाएगा।*
🙏🙏🕉️
🥀💠❣️
📍*05.06.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
=====================
*1. योग का असली अर्थ* 🪔🧘♀️
*"दुख के संयोग का वियोग ही योग है"*
जहाँ दुख का कोई मिश्रण नहीं 💧, वही सच्चा योग है। संसार के सुखों में अज्ञान 😵💫, लाचारी और दुख मिला होता है। लेकिन भगवान का सुख शुद्ध है 🌟 - उसमें दुख का नामोनिशान नहीं।
_संदर्भ: गीता 6.23, 2.48_ 📖
*2. कामना vs आवश्यकता* ⚖️🔥
- *कामना*: संसार की बदलती इच्छाएं 🎭। पूरी नहीं होती, बस बदलती रहती हैं 🔄। "शादी होगी, नौकरी मिलेगी, तब सुखी होंगे" ⏳
- *आवश्यकता*: परमात्म सुख की 💖। वो अभी, यहीं पूरी हो सकती है 🙌। परमात्मा पहले था, अब भी है, बाद में रहेगा ♾️
*3. संसार vs आत्मा* 🌊🪞
संसार का सब कुछ सरकने वाला है 🏃♂️💨 - धन 💰, शरीर 🧍, भोग, इंद्रियों का सुख। कुछ भी सदा नहीं रहता 🍂।
लेकिन देखने वाला - *आत्मा/परमात्मा* 🕉️ सदा रहता है। उसी से योग करोगे तो दुख का संयोग कभी नहीं होगा 🚫😔
*4. अभ्यास कैसे करें* 🧘♀️🌿
- बिना उकताए, निश्चयपूर्वक ध्यान योग करो 🧘♀️🎯
- संसार की आसक्ति हटाओ ❌💔, परमात्मा से योग जोड़ो 🔗✨
- निष्काम कर्म करो 🤲: किसी का बुरा मत सोचो, भलाई करो 🌼। सेवा करने वाले को दोगुना लाभ मिलता है 🎁
*5. कहानी और सीख* 📖💡
- *शांडिली कन्या* 🧘♀️: ने शरीर के विवाह को ठुकराकर परमात्म योग चुना। उसके योगबल से गलता तीर्थ बना ⛰️
- *जगन्नाथ दास* 🙏: भगवान खुद सेवक बनकर सेवा करते थे। भगवान स्मृति मात्र से मिलते हैं 🪔
- *सीख*: समय अनिश्चित है ⏰। अभी से योग करो, "बाद में करूंगा" मत कहो 🚫⏳
---
🔥*सार बात* 🎯:
सच्चा सुख बाहर नहीं, आत्मा-परमात्मा के योग में है 🕉️💖। संसार रखना मुश्किल है, परमात्मा को छोड़ना असंभव है 🚫➡️🕉️
🙏🙏🕉️
📍*05.06.2026*
🌿 *सुबह संध्या सत्संग की सार बाते*..
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*1. योग का असली अर्थ* 🪔🧘♀️
*"दुख के संयोग का वियोग ही योग है"*
जहाँ दुख का कोई मिश्रण नहीं 💧, वही सच्चा योग है। संसार के सुखों में अज्ञान 😵💫, लाचारी और दुख मिला होता है। लेकिन भगवान का सुख शुद्ध है 🌟 - उसमें दुख का नामोनिशान नहीं।
_संदर्भ: गीता 6.23, 2.48_ 📖
*2. कामना vs आवश्यकता* ⚖️🔥
- *कामना*: संसार की बदलती इच्छाएं 🎭। पूरी नहीं होती, बस बदलती रहती हैं 🔄। "शादी होगी, नौकरी मिलेगी, तब सुखी होंगे" ⏳
- *आवश्यकता*: परमात्म सुख की 💖। वो अभी, यहीं पूरी हो सकती है 🙌। परमात्मा पहले था, अब भी है, बाद में रहेगा ♾️
*3. संसार vs आत्मा* 🌊🪞
संसार का सब कुछ सरकने वाला है 🏃♂️💨 - धन 💰, शरीर 🧍, भोग, इंद्रियों का सुख। कुछ भी सदा नहीं रहता 🍂।
लेकिन देखने वाला - *आत्मा/परमात्मा* 🕉️ सदा रहता है। उसी से योग करोगे तो दुख का संयोग कभी नहीं होगा 🚫😔
*4. अभ्यास कैसे करें* 🧘♀️🌿
- बिना उकताए, निश्चयपूर्वक ध्यान योग करो 🧘♀️🎯
- संसार की आसक्ति हटाओ ❌💔, परमात्मा से योग जोड़ो 🔗✨
- निष्काम कर्म करो 🤲: किसी का बुरा मत सोचो, भलाई करो 🌼। सेवा करने वाले को दोगुना लाभ मिलता है 🎁
*5. कहानी और सीख* 📖💡
- *शांडिली कन्या* 🧘♀️: ने शरीर के विवाह को ठुकराकर परमात्म योग चुना। उसके योगबल से गलता तीर्थ बना ⛰️
- *जगन्नाथ दास* 🙏: भगवान खुद सेवक बनकर सेवा करते थे। भगवान स्मृति मात्र से मिलते हैं 🪔
- *सीख*: समय अनिश्चित है ⏰। अभी से योग करो, "बाद में करूंगा" मत कहो 🚫⏳
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🔥*सार बात* 🎯:
सच्चा सुख बाहर नहीं, आत्मा-परमात्मा के योग में है 🕉️💖। संसार रखना मुश्किल है, परमात्मा को छोड़ना असंभव है 🚫➡️🕉️
🙏🙏🕉️
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