The Lok Sabha passed the three criminal laws — the Bharatiya Nyaya (Second) Sanhita, the Bharatiya Nagarik Suraksha (Second) Sanhita and the Bharatiya Sakshya (Second) Bill — on Wednesday. The three Bill were passed even as 97 Opposition MPs remain suspended from the Lower House amid protest over Parliament security breach.
राजस्थान एपीओ भर्ती नियम में संशोधन, अब प्री और मुख्य परीक्षा होगी
प्री ऑब्जेक्टिव होगी और मुख्य परीक्षा होगी लिखित
प्री ऑब्जेक्टिव होगी और मुख्य परीक्षा होगी लिखित
The Union Government has notified that the new criminal laws - Bharatiya Nyaya Sanhita, Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita and the Bharatiya Sakshya Adhiniyam- will come into effect from July 1,2024. The Ministry of Home Affairs issued three notifications today regarding the date of commencement of these three laws
राजस्थान APO भर्ती का नोटिफिकेशन जल्दी हो सकता है जारी, 180 पदों पर हो सकती है भर्ती, विभाग ने आरपीएससी को भेजी अभ्यर्थना
BB12D552832E4746933BB250E33814AE.pdf
3 MB
BB12D552832E4746933BB250E33814AE.pdf
आरपीएससी मेंबर संगीता आर्य के घर पहुंची एसीबी, ACB की टीम कर रही मामले में सर्च, एडिशनल एसपी एसीबी जयपुर सुरेंद्र सिंह के नेतृत्व में कार्रवाई, आरपीएससी मेंबर संगीता आर्य और अन्य लोगों से की कड़ी पूछताछ..!
1. UCC
2. Marital rape
3. Population and its challenges
4. Child abuse and law in India
5. Health in India
6. Same sex marriage
7. Cybercrime and security in India
8. Press and Indian democracy
9. Indian education system and new education policy
10.Women empowerment in India
2. Marital rape
3. Population and its challenges
4. Child abuse and law in India
5. Health in India
6. Same sex marriage
7. Cybercrime and security in India
8. Press and Indian democracy
9. Indian education system and new education policy
10.Women empowerment in India
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस नियम को बरकरार रखने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसमें राज्य में एडमिशन स्तर की न्यायिक सेवा के उम्मीदवारों के लिए कम से कम तीन साल की प्रैक्टिस या कानून स्नातक में 70 प्रतिशत अंक की पात्रता निर्धारित की गई।
प्रस्तुतियां सुनने के बाद जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के दृष्टिकोण में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। इस प्रकार, लागू आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज की।
वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा (भर्ती एवं सेवा की शर्तें) नियम, 1994 के नियम 7 में संशोधन किया गया। इस संशोधन के माध्यम से सिविल जज, जूनियर डिवीजन (प्रवेश स्तर) के पद के लिए अतिरिक्त पात्रता योग्यता शुरू की गई। संशोधन के संदर्भ में वे सभी जिन्होंने आवेदन जमा करने के लिए निर्धारित अंतिम तिथि तक कम से कम तीन साल तक वकील के रूप में लगातार प्रैक्टिस की, आवेदन करने के पात्र थे। इसके अलावा, वैकल्पिक रूप से शानदार अकादमिक करियर वाला उत्कृष्ट लॉ ग्रेजुएट, जिसने पहले प्रयास में कुल मिलाकर कम से कम 70% अंक हासिल करके सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण की हों, आवेदन करने के लिए पात्र था।
हाईकोर्ट के समक्ष वर्तमान याचिकाकर्ता ने इस संशोधन रद्द करने की मांग की और तर्क दिया कि यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) सहित संविधान के कई अनुच्छेदों के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
हालांकि, हाईकोर्ट का विचार है कि संशोधन का उद्देश्य "न्याय का गुणात्मक वितरण" है और "उत्कृष्टता को हमेशा सामान्यता पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।" ऐसा कहते हुए न्यायालय ने यह भी कहा कि संशोधन अवसर से इनकार नहीं करता है और उम्मीदवारों के लिए विकल्प दोहरे हैं।
न्यायालय ने यह रिकार्ड किया:
“यह सब निर्णयों की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए जाता है, जो बदले में बड़े पैमाने पर वादियों को प्रभावित करता है। हमारे विचार में इन परिणामों को प्राप्त करने के लिए हाईकोर्ट का उद्देश्य किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। जज बनना किसी उम्मीदवार का सिर्फ सपना नहीं हो सकता। न्यायपालिका में शामिल होने के लिए व्यक्ति के पास उच्चतम मानक होने चाहिए।”
हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों में वादकारियों के हितों को भी तौला। हाईकोर्ट ने कहा कि वादकारियों का हित व्यक्तिगत याचिकाकर्ता के हित से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की दलीलों को स्वीकार करने से मौजूदा घटिया मानक ही कायम रहेंगे, जो दशकों से कायम हैं। दशकों तक न्यूनतम योग्यता ही पर्याप्त है। गुणवत्ता में वृद्धि सुनिश्चित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा,
यह पहली बार है कि हाईकोर्ट ने ऐसा करने का प्रयास किया।
इन टिप्पणियों के आलोक में न्यायालय ने विवादित संशोधन को असंवैधानिक या संविधान के अधिकार क्षेत्र से बाहर घोषित करने से इनकार किया।
केस टाइटल: गरिमा खरे बनाम मध्य प्रदेश का उच्च न्यायालय, डायरी नंबर- 18316 - 2024
प्रस्तुतियां सुनने के बाद जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के दृष्टिकोण में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। इस प्रकार, लागू आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज की।
वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा (भर्ती एवं सेवा की शर्तें) नियम, 1994 के नियम 7 में संशोधन किया गया। इस संशोधन के माध्यम से सिविल जज, जूनियर डिवीजन (प्रवेश स्तर) के पद के लिए अतिरिक्त पात्रता योग्यता शुरू की गई। संशोधन के संदर्भ में वे सभी जिन्होंने आवेदन जमा करने के लिए निर्धारित अंतिम तिथि तक कम से कम तीन साल तक वकील के रूप में लगातार प्रैक्टिस की, आवेदन करने के पात्र थे। इसके अलावा, वैकल्पिक रूप से शानदार अकादमिक करियर वाला उत्कृष्ट लॉ ग्रेजुएट, जिसने पहले प्रयास में कुल मिलाकर कम से कम 70% अंक हासिल करके सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण की हों, आवेदन करने के लिए पात्र था।
हाईकोर्ट के समक्ष वर्तमान याचिकाकर्ता ने इस संशोधन रद्द करने की मांग की और तर्क दिया कि यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) सहित संविधान के कई अनुच्छेदों के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
हालांकि, हाईकोर्ट का विचार है कि संशोधन का उद्देश्य "न्याय का गुणात्मक वितरण" है और "उत्कृष्टता को हमेशा सामान्यता पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।" ऐसा कहते हुए न्यायालय ने यह भी कहा कि संशोधन अवसर से इनकार नहीं करता है और उम्मीदवारों के लिए विकल्प दोहरे हैं।
न्यायालय ने यह रिकार्ड किया:
“यह सब निर्णयों की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए जाता है, जो बदले में बड़े पैमाने पर वादियों को प्रभावित करता है। हमारे विचार में इन परिणामों को प्राप्त करने के लिए हाईकोर्ट का उद्देश्य किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। जज बनना किसी उम्मीदवार का सिर्फ सपना नहीं हो सकता। न्यायपालिका में शामिल होने के लिए व्यक्ति के पास उच्चतम मानक होने चाहिए।”
हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों में वादकारियों के हितों को भी तौला। हाईकोर्ट ने कहा कि वादकारियों का हित व्यक्तिगत याचिकाकर्ता के हित से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की दलीलों को स्वीकार करने से मौजूदा घटिया मानक ही कायम रहेंगे, जो दशकों से कायम हैं। दशकों तक न्यूनतम योग्यता ही पर्याप्त है। गुणवत्ता में वृद्धि सुनिश्चित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा,
यह पहली बार है कि हाईकोर्ट ने ऐसा करने का प्रयास किया।
इन टिप्पणियों के आलोक में न्यायालय ने विवादित संशोधन को असंवैधानिक या संविधान के अधिकार क्षेत्र से बाहर घोषित करने से इनकार किया।
केस टाइटल: गरिमा खरे बनाम मध्य प्रदेश का उच्च न्यायालय, डायरी नंबर- 18316 - 2024
राजस्थान सिविल जज भर्ती 2024 में कुछ अभ्यर्थियों के आवदेन में उनके हस्ताक्षर और फ़ोटो साफ दिखाई नहीं दे रहे है जिनकी सूची जारी की गई हैं कृप्या अपना नाम सूची में देखें और अपने आवेदन में संशोधन करें अन्यथा आपका आवेदन निरस्त कर दिया जायेगा