Seems, they want to take it again to high..to give supply. 23690 protected once
I was planning to make video, ki less than 5000 BTC5 reh gaye hain, but postponed for tomorrow.
Now sold out all of 1$ price.. Good luck to all holders
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🔥7
Long, I am avoiding at these levels.
No confirmation from Iran so far. And also not convinced ki Trump again gamble play na kar de..2 din se deal sign ho rahi hai, but nowhere in sight so far. Even jinse baat ki hai, GCC nations se, noone has confirmed that, only Munir is in picture..but pure world ko milke again befkuf na bana dein..Iran Toll nahi lega, also not confirmed..so avoid shorts in Oil and longs in mkt. Let the things will settle first. Agar sab settle ho gaya, to yahan options buy kiye hue niklege nahin, kyuki fir VIX ko hi patak denge.
No confirmation from Iran so far. And also not convinced ki Trump again gamble play na kar de..2 din se deal sign ho rahi hai, but nowhere in sight so far. Even jinse baat ki hai, GCC nations se, noone has confirmed that, only Munir is in picture..but pure world ko milke again befkuf na bana dein..Iran Toll nahi lega, also not confirmed..so avoid shorts in Oil and longs in mkt. Let the things will settle first. Agar sab settle ho gaya, to yahan options buy kiye hue niklege nahin, kyuki fir VIX ko hi patak denge.
👍3
55000 PE. Oversold. Above 120 it will fly. Till then it's on writers radar
Aaj 55000 level bach gaya.. due to excessive writing at this level. Hope kal jayega. Crude nd inr also not comfortable. Also seems fresh short create hue hain, BN mein OI seems so
👍2
Seems today action was due to retailers liquidation. Data is not so much negative jitna mkt ne react Kiya hai
Aaj expiry ki wajah se BN ko dabaya bhi gaya hai. Many banking shares especially large Pvt banks are at support.
16 साल तक एक शिक्षक ने बचाया हर रुपया… क्योंकि भगवान बालाजी ने स्वप्न में मांगा था 108 स्वर्ण मुद्राओं का हार!
कभी-कभी भक्ति ऐसी होती है, जिसे सुनकर तर्क भी मौन हो जाता है और आस्था सिर झुका लेती है।
यह कहानी है एक साधारण परिवार की, लेकिन उनकी श्रद्धा बिल्कुल असाधारण थी।
साल था 1980 के आसपास।
तिरुमला-तिरुपति देवस्थानम के प्रशासन में एक वरिष्ठ अधिकारी कार्यरत थे। एक दिन उन्हें मंदिर से अचानक संदेश मिला—
"सर, कुछ श्रद्धालु आए हैं। वे भगवान को 108 स्वर्ण मुद्राओं से बना हार अर्पित करना चाहते हैं। और उनकी एक ही इच्छा है—हार पहनाने के बाद प्रभु के दर्शन भी मिल जाएँ।"
पहली नज़र में यह कोई सामान्य अनुरोध लग सकता था।
लेकिन जब उस परिवार की कहानी सामने आई, तो सुनने वालों की आँखें नम हो गईं।
उन श्रद्धालुओं के मुखिया थे कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले के रहने वाले नागराज राव।
एक साधारण अध्यापक।
न कोई उद्योगपति।
न कोई जमींदार।
न कोई धनकुबेर।
उन्होंने धीमे स्वर में अपनी कहानी शुरू की।
"करीब 16 साल पहले एक रात मुझे स्वप्न में श्री बालाजी के दर्शन हुए।"
"उन्होंने कहा—मेरे लिए 108 स्वर्ण मुद्राओं का हार बनवाओ।"
सुबह उठते ही उन्हें लगा शायद यह केवल एक सपना था।
लेकिन उसी दिन कुछ तीर्थयात्री उनके घर आए और तिरुपति का प्रसाद देकर गए।
नागराज राव के मन में फिर वही स्वप्न कौंध गया।
उन्होंने बात को फिर भी गंभीरता से नहीं लिया।
लेकिन अगली रात फिर वही दिव्य आदेश मिला।
और उसके बाद लगातार कई बार।
अब उन्हें विश्वास हो चुका था कि यह कोई साधारण सपना नहीं है।
उन्होंने अपने परिवार को सब कुछ बताया।
पर एक समस्या थी।
बहुत बड़ी समस्या।
घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी।
ऐसी कि कभी-कभी पूरे परिवार का गुज़ारा भी मुश्किल से होता था।
सोने का हार तो दूर, चाँदी का छोटा सिक्का खरीदना भी कठिन था।
परिवार ने विचार किया—
"क्यों न ताँबे के सिक्कों का हार बनाकर उस पर सोने की परत चढ़ा दी जाए?"
योजना बन गई।
लेकिन उसी रात फिर स्वप्न आया।
इस बार संदेश बिल्कुल स्पष्ट था।
"मुझे ताँबा नहीं चाहिए। हार स्वर्ण का ही होना चाहिए।"
अब परिवार ने निर्णय ले लिया।
अगर प्रभु की यही इच्छा है, तो वही होगा।
चाहे 1 साल लगे या 20 साल।
उस दिन से घर में एक अनोखी तपस्या शुरू हुई।
परिवार के लोगों ने अपनी छोटी-छोटी इच्छाएँ त्याग दीं।
कई बार एक समय का भोजन छोड़ दिया।
जहाँ दूसरे लोग बचत भविष्य के लिए करते थे, वहाँ यह परिवार बचत भक्ति के लिए कर रहा था।
छह महीने की मेहनत के बाद केवल दो स्वर्ण मुद्राएँ बन पाईं।
लेकिन उनका उत्साह कम नहीं हुआ।
समय आगे बढ़ता गया।
बच्चे बड़े हुए।
किसी को नौकरी मिली।
किसी का व्यवसाय चल पड़ा।
बंजर जमीन उपजाऊ होने लगी।
धीरे-धीरे आर्थिक हालात सुधरते गए।
और आखिरकार...
16 वर्षों की प्रतीक्षा के बाद वह दिन आ गया।
108 स्वर्ण मुद्राओं से सजा भव्य हार तैयार था।
हर मुद्रा पर भगवान वेंकटेश्वर और उनकी देवियों की छवि उकेरी गई थी।
हार बनकर तैयार हुआ तो उसी रात फिर स्वप्न आया।
भगवान मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने कहा—
"अब मैं प्रसन्न हूँ। पूरे परिवार के साथ तिरुमला आओ। मुझे यह हार अर्पित करो और दर्शन करो। वहाँ एक व्यक्ति तुम्हारी सहायता करेगा।"
इतना कहकर उन्होंने एक चेहरा दिखाया।
और स्वप्न समाप्त हो गया।
कुछ दिनों बाद पूरा परिवार तिरुपति पहुँच गया।
लेकिन वहाँ एक नई समस्या खड़ी हो गई।
मंदिर की परंपरा के अनुसार यदि कोई भक्त कोई विशेष आभूषण भगवान को अर्पित कर उसी दिन उसे प्रभु पर सुशोभित देखना चाहता था, तो उसे अतिरिक्त राशि जमा करनी पड़ती थी।
यह राशि बहुत बड़ी थी।
और परिवार के पास तो घर लौटने भर के पैसे बचे थे।
तभी उनकी मुलाकात उसी अधिकारी से हुई।
उन्हें देखते ही नागराज राव की आँखें चमक उठीं।
वे भावुक होकर बोले—
"अरे! यही हैं वो व्यक्ति... जिन्हें मैंने स्वप्न में देखा था!"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अधिकारी भी स्तब्ध रह गए।
क्योंकि जिस चेहरे का वर्णन नागराज राव कर रहे थे, वह उनका ही था।
अब उनके सामने दुविधा थी।
एक ओर मंदिर की परंपरा।
दूसरी ओर 16 वर्षों की तपस्या।
एक ओर नियम।
दूसरी ओर निष्कपट श्रद्धा।
काफी विचार के बाद उन्होंने निर्णय लिया।
"यह परिवार हमारे लिए विशेष अतिथि है। इनके सम्मान और दर्शन की व्यवस्था की जाए।"
अगली सुबह एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला।
भगवान वेंकटेश्वर के श्रीविग्रह पर वही 108 स्वर्ण मुद्राओं वाला हार सुशोभित था।
पूरा परिवार भाव-विभोर होकर खड़ा था।
किसी की आँखों में आँसू थे।
किसी के होंठों पर मुस्कान।
और सभी के मुख से केवल एक ही नाम निकल रहा था—
"गोविंदा... गोविंदा..."
16 वर्षों की तपस्या उस क्षण सफल हो चुकी थी।
बाद में जब यह प्रसंग मंदिर प्रशासन के सामने रखा गया, तो सभी गहराई से प्रभावित हुए।
कभी-कभी भक्ति ऐसी होती है, जिसे सुनकर तर्क भी मौन हो जाता है और आस्था सिर झुका लेती है।
यह कहानी है एक साधारण परिवार की, लेकिन उनकी श्रद्धा बिल्कुल असाधारण थी।
साल था 1980 के आसपास।
तिरुमला-तिरुपति देवस्थानम के प्रशासन में एक वरिष्ठ अधिकारी कार्यरत थे। एक दिन उन्हें मंदिर से अचानक संदेश मिला—
"सर, कुछ श्रद्धालु आए हैं। वे भगवान को 108 स्वर्ण मुद्राओं से बना हार अर्पित करना चाहते हैं। और उनकी एक ही इच्छा है—हार पहनाने के बाद प्रभु के दर्शन भी मिल जाएँ।"
पहली नज़र में यह कोई सामान्य अनुरोध लग सकता था।
लेकिन जब उस परिवार की कहानी सामने आई, तो सुनने वालों की आँखें नम हो गईं।
उन श्रद्धालुओं के मुखिया थे कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले के रहने वाले नागराज राव।
एक साधारण अध्यापक।
न कोई उद्योगपति।
न कोई जमींदार।
न कोई धनकुबेर।
उन्होंने धीमे स्वर में अपनी कहानी शुरू की।
"करीब 16 साल पहले एक रात मुझे स्वप्न में श्री बालाजी के दर्शन हुए।"
"उन्होंने कहा—मेरे लिए 108 स्वर्ण मुद्राओं का हार बनवाओ।"
सुबह उठते ही उन्हें लगा शायद यह केवल एक सपना था।
लेकिन उसी दिन कुछ तीर्थयात्री उनके घर आए और तिरुपति का प्रसाद देकर गए।
नागराज राव के मन में फिर वही स्वप्न कौंध गया।
उन्होंने बात को फिर भी गंभीरता से नहीं लिया।
लेकिन अगली रात फिर वही दिव्य आदेश मिला।
और उसके बाद लगातार कई बार।
अब उन्हें विश्वास हो चुका था कि यह कोई साधारण सपना नहीं है।
उन्होंने अपने परिवार को सब कुछ बताया।
पर एक समस्या थी।
बहुत बड़ी समस्या।
घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी।
ऐसी कि कभी-कभी पूरे परिवार का गुज़ारा भी मुश्किल से होता था।
सोने का हार तो दूर, चाँदी का छोटा सिक्का खरीदना भी कठिन था।
परिवार ने विचार किया—
"क्यों न ताँबे के सिक्कों का हार बनाकर उस पर सोने की परत चढ़ा दी जाए?"
योजना बन गई।
लेकिन उसी रात फिर स्वप्न आया।
इस बार संदेश बिल्कुल स्पष्ट था।
"मुझे ताँबा नहीं चाहिए। हार स्वर्ण का ही होना चाहिए।"
अब परिवार ने निर्णय ले लिया।
अगर प्रभु की यही इच्छा है, तो वही होगा।
चाहे 1 साल लगे या 20 साल।
उस दिन से घर में एक अनोखी तपस्या शुरू हुई।
परिवार के लोगों ने अपनी छोटी-छोटी इच्छाएँ त्याग दीं।
कई बार एक समय का भोजन छोड़ दिया।
जहाँ दूसरे लोग बचत भविष्य के लिए करते थे, वहाँ यह परिवार बचत भक्ति के लिए कर रहा था।
छह महीने की मेहनत के बाद केवल दो स्वर्ण मुद्राएँ बन पाईं।
लेकिन उनका उत्साह कम नहीं हुआ।
समय आगे बढ़ता गया।
बच्चे बड़े हुए।
किसी को नौकरी मिली।
किसी का व्यवसाय चल पड़ा।
बंजर जमीन उपजाऊ होने लगी।
धीरे-धीरे आर्थिक हालात सुधरते गए।
और आखिरकार...
16 वर्षों की प्रतीक्षा के बाद वह दिन आ गया।
108 स्वर्ण मुद्राओं से सजा भव्य हार तैयार था।
हर मुद्रा पर भगवान वेंकटेश्वर और उनकी देवियों की छवि उकेरी गई थी।
हार बनकर तैयार हुआ तो उसी रात फिर स्वप्न आया।
भगवान मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने कहा—
"अब मैं प्रसन्न हूँ। पूरे परिवार के साथ तिरुमला आओ। मुझे यह हार अर्पित करो और दर्शन करो। वहाँ एक व्यक्ति तुम्हारी सहायता करेगा।"
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लेकिन वहाँ एक नई समस्या खड़ी हो गई।
मंदिर की परंपरा के अनुसार यदि कोई भक्त कोई विशेष आभूषण भगवान को अर्पित कर उसी दिन उसे प्रभु पर सुशोभित देखना चाहता था, तो उसे अतिरिक्त राशि जमा करनी पड़ती थी।
यह राशि बहुत बड़ी थी।
और परिवार के पास तो घर लौटने भर के पैसे बचे थे।
तभी उनकी मुलाकात उसी अधिकारी से हुई।
उन्हें देखते ही नागराज राव की आँखें चमक उठीं।
वे भावुक होकर बोले—
"अरे! यही हैं वो व्यक्ति... जिन्हें मैंने स्वप्न में देखा था!"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अधिकारी भी स्तब्ध रह गए।
क्योंकि जिस चेहरे का वर्णन नागराज राव कर रहे थे, वह उनका ही था।
अब उनके सामने दुविधा थी।
एक ओर मंदिर की परंपरा।
दूसरी ओर 16 वर्षों की तपस्या।
एक ओर नियम।
दूसरी ओर निष्कपट श्रद्धा।
काफी विचार के बाद उन्होंने निर्णय लिया।
"यह परिवार हमारे लिए विशेष अतिथि है। इनके सम्मान और दर्शन की व्यवस्था की जाए।"
अगली सुबह एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला।
भगवान वेंकटेश्वर के श्रीविग्रह पर वही 108 स्वर्ण मुद्राओं वाला हार सुशोभित था।
पूरा परिवार भाव-विभोर होकर खड़ा था।
किसी की आँखों में आँसू थे।
किसी के होंठों पर मुस्कान।
और सभी के मुख से केवल एक ही नाम निकल रहा था—
"गोविंदा... गोविंदा..."
16 वर्षों की तपस्या उस क्षण सफल हो चुकी थी।
बाद में जब यह प्रसंग मंदिर प्रशासन के सामने रखा गया, तो सभी गहराई से प्रभावित हुए।
उन्हें महसूस हुआ कि कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ नियमों से बड़ी चीज़ भक्त की भावना होती है।
और शायद यही इस कथा का सबसे सुंदर संदेश है।
भगवान को केवल सोना, चाँदी या भव्य उपहार नहीं चाहिए।
उन्हें चाहिए विश्वास।
ऐसा विश्वास जो परिस्थितियों से बड़ा हो।
ऐसा धैर्य जो वर्षों की प्रतीक्षा सह सके।
और ऐसी भक्ति जो लाभ नहीं, केवल प्रेम जानती हो।
क्योंकि जब श्रद्धा सच्ची हो...
तो प्रभु रास्ते भी बनाते हैं,
लोग भी भेजते हैं,
और असंभव दिखने वाले सपनों को भी पूरा कर देते हैं।
🙏 जय श्री वेंकटेश्वर बालाजी।
🙏 गोविंदा... गोविंदा... गोविंदा... 🌹
और शायद यही इस कथा का सबसे सुंदर संदेश है।
भगवान को केवल सोना, चाँदी या भव्य उपहार नहीं चाहिए।
उन्हें चाहिए विश्वास।
ऐसा विश्वास जो परिस्थितियों से बड़ा हो।
ऐसा धैर्य जो वर्षों की प्रतीक्षा सह सके।
और ऐसी भक्ति जो लाभ नहीं, केवल प्रेम जानती हो।
क्योंकि जब श्रद्धा सच्ची हो...
तो प्रभु रास्ते भी बनाते हैं,
लोग भी भेजते हैं,
और असंभव दिखने वाले सपनों को भी पूरा कर देते हैं।
🙏 जय श्री वेंकटेश्वर बालाजी।
🙏 गोविंदा... गोविंदा... गोविंदा... 🌹
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