Forwarded from ☀️
अकार्यकरणाद् भीतः कार्याणां च विवर्जनात् ।
अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येन्न तत् पिबेत् ॥
न करनेयोग्य काम करनेसे, करनेयोग्य काममें
प्रमाद करनेसे तथा कार्यसिद्धि होनेके पहले ही
मन्त्र प्रकट हो जानेसे डरना चाहिये और जिससे
नशा चढ़े, ऐसी मादक वस्तु नहीं पीनी चाहिये।
One should be afraid of undertaking an undesirable task, one should be afraid of delay in what is to be accomplished and leakage of secrets yet to be achieved.
One should not imbibe intoxicating liquor.
~ विदुर नीति
(महाभारत ५.३४.४३)
अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येन्न तत् पिबेत् ॥
न करनेयोग्य काम करनेसे, करनेयोग्य काममें
प्रमाद करनेसे तथा कार्यसिद्धि होनेके पहले ही
मन्त्र प्रकट हो जानेसे डरना चाहिये और जिससे
नशा चढ़े, ऐसी मादक वस्तु नहीं पीनी चाहिये।
One should be afraid of undertaking an undesirable task, one should be afraid of delay in what is to be accomplished and leakage of secrets yet to be achieved.
One should not imbibe intoxicating liquor.
~ विदुर नीति
(महाभारत ५.३४.४३)
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ब्रह्मन् ! भगवान् विष्णुकी स्वरूप भूता दो विद्याएँ हैं-एक परा और दूसरी अपरा। ऋक्, यजुः, साम और अथर्वनामक वेद, वेद के छहों अङ्ग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्यौतिष और छन्दःशास्त्र तथा मीमांसा, धर्मशास्त्र, पुराण, न्याय, वैद्यक (आयुर्वेद), गान्धर्व वेद (संगीत), धनुर्वेद और अर्थशास्त्र - यह सब अपरा विद्या है तथा परा विद्या वह है, जिससे उस अदृश्य, अग्राह्य, गोत्ररहित, चरणरहित, नित्य, अविनाशी ब्रह्मका बोध हो। इस अग्निपुराणको परा विद्या समझो।
(अग्निपुराण,२)
(अग्निपुराण,२)
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धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
अर्थ – धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना )। यही धर्म के दस लक्षण है।
ये धृति आदि ही धर्म की वास्तविक पहचान हैं।
इन्हीं को धारण करने से मानव पशुता से ऊपर उठता है।
जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम् ।
जय मनुवाद जय शिव शंकर जय आदिगुरू शंकराचार्य भगवान जय गौमाता जय सूर्य नारायण जय श्री गौ गीता गंगा गायत्री जय श्री रामचंद्र महाराज जय गुरुदेव
शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
अर्थ – धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना )। यही धर्म के दस लक्षण है।
ये धृति आदि ही धर्म की वास्तविक पहचान हैं।
इन्हीं को धारण करने से मानव पशुता से ऊपर उठता है।
जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम् ।
जय मनुवाद जय शिव शंकर जय आदिगुरू शंकराचार्य भगवान जय गौमाता जय सूर्य नारायण जय श्री गौ गीता गंगा गायत्री जय श्री रामचंद्र महाराज जय गुरुदेव
शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर शिव शंकर प्रलयंकर
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Forwarded from Sanatani Balika🚩
जगत जननी राजराजेश्वरी माँ शारदा भवानी जी के आज दिनांक 19 अगस्त 2026 दिन बुधवार के आरती श्रृंगार दर्शन
मैहर,मध्यप्रदेश
🌺 जय हो माई की🙏🌺🔱
𝕁𝕆𝕀ℕ 𝕌𝕊 @𝕊𝕒𝕟𝕒𝕥𝕒𝕟𝕚𝕓𝕒𝕝𝕚𝕜𝕒
मैहर,मध्यप्रदेश
🌺 जय हो माई की🙏🌺🔱
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🙏5
न चात्रातीव कर्तव्यं दोषदृष्टिपरं मनः ।
दोषो ह्यविद्यमानोऽपि तच्चित्तानां प्रकाशते ॥
One should never entertain a mindset which tends to see defects & flaws in things around him.
If one concentrates too much on them, he will see negativity even when none such exist.
"दोष न होने पर भी दोष देखनेवाले के मन में भर जाते हैं, इसलिए अपने दिल को साफ रखने के लिए दूसरे से दोष उधार मत लो।"
~ पूज्य स्वामीश्री अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज
दोषो ह्यविद्यमानोऽपि तच्चित्तानां प्रकाशते ॥
One should never entertain a mindset which tends to see defects & flaws in things around him.
If one concentrates too much on them, he will see negativity even when none such exist.
"दोष न होने पर भी दोष देखनेवाले के मन में भर जाते हैं, इसलिए अपने दिल को साफ रखने के लिए दूसरे से दोष उधार मत लो।"
~ पूज्य स्वामीश्री अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज
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स्तनदात्री गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया।
अभीष्टदेवपत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका॥
सगर्भजा या भगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसूः।
मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा॥
मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च।
जनानां वेदविहिता मातरः षोडश स्मृताः॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, गणेश० १५)
'स्तन पिलानेवाली, गर्भधारण करनेवाली, भोजन देनेवाली, गुरुपत्नी, इष्टदेवताकी पत्नी, पिताकी पत्नी (विमाता), पितृकन्या (सौतेली बहिन), सहोदरा बहिन, पुत्रवधू, सासु, नानी, दादी, भाईकी पत्नी, मौसी, बुआ और मामी वेदमें मनुष्योंके लिये ये सोलह प्रकारकी माताएँ बतलायी गयी हैं।'
नारायण🙏😊🚩
हर हर महादेव🙏🔱
★卐 🍃@ Shankarkisena_009
अभीष्टदेवपत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका॥
सगर्भजा या भगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसूः।
मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा॥
मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च।
जनानां वेदविहिता मातरः षोडश स्मृताः॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, गणेश० १५)
'स्तन पिलानेवाली, गर्भधारण करनेवाली, भोजन देनेवाली, गुरुपत्नी, इष्टदेवताकी पत्नी, पिताकी पत्नी (विमाता), पितृकन्या (सौतेली बहिन), सहोदरा बहिन, पुत्रवधू, सासु, नानी, दादी, भाईकी पत्नी, मौसी, बुआ और मामी वेदमें मनुष्योंके लिये ये सोलह प्रकारकी माताएँ बतलायी गयी हैं।'
नारायण🙏😊🚩
हर हर महादेव🙏🔱
★卐 🍃@ Shankarkisena_009
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गुरु सरस्वती कृपा
जय श्री मां सीता सती अनुसूया दमयंती सावित्री
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ।।
अत्यधिक कल्याण की इच्छा करने वाले इसके पितृजनों, भाइयों, पति तथा देवरों द्वारा कन्या
पूजा करने योग्य तथा वस्त्राभूषणों द्वारा
अलंकृत करने योग्य होती है।
~ मनुस्मृति ३.५५ 🌻✨
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ।।
अत्यधिक कल्याण की इच्छा करने वाले इसके पितृजनों, भाइयों, पति तथा देवरों द्वारा कन्या
पूजा करने योग्य तथा वस्त्राभूषणों द्वारा
अलंकृत करने योग्य होती है।
~ मनुस्मृति ३.५५ 🌻✨
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काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम
काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम
काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम काली दुर्गे राधे श्याम गोरी शंकर सीता राम
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में आरक्षण का पूर्ण पक्षधर हुँ लेकिन एक सेमिनार या संगोष्ठी होना चाहिए । आरक्षण का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप क्या हो सकता है ?और आरक्षण का सबसे विप्लव पूर्ण घातक स्वरूप क्या हो सकता है ? इसपर विचार किया जाय । हर व्यक्ति की जीविका जहाँ जन्म से आरक्षित हो वह आरक्षण की सर्वोत्कृष्ट विधा है । उसी का नाम सनातन वर्ण आश्रम धर्म है जिससे आजकल सबको परहेज है। जिनको कहा जाता है कि आर्थिक दृष्टि से बिपन्न बनाया गया सारे कुटीर उद्योग लघु उद्योग उन्ही के द्वारा क्रियान्वित होते थे। आरक्षण की वह व्यवस्था सबसे उत्तम मानी जाती है । जो जन्म से आरक्षित हो।
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पुरी शंकराचार्य महाभाग
#हिन्दूराष्ट्र #गो_हत्या_बंद
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rog nashak mantra II रोग नाशक मंत्र💜 @MegaSaverBot
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भगवान शिव का ये वाक्य जीवन बदल देगा! #rajendradasjimaharaj💜 @MegaSaverBot
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Forwarded from लोकशङ्करम्
*एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम् । लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम् ॥
— गणेश पुराण, उपासनाखण्ड
:He arrives to awaken devotion, and departs to dwell within the heart. Ganapati Bappa Morya! 🪔
गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं 🌸
— गणेश पुराण, उपासनाखण्ड
:He arrives to awaken devotion, and departs to dwell within the heart. Ganapati Bappa Morya! 🪔
गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं 🌸
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-पूज्य स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज
🙏3
Forwarded from ☀️
व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः।
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ।।
गुरु का चरण-वन्दन परस्पर विपरीत हाथों द्वारा करना चाहिए अर्थात् बाएँ हाथ से बायाँ पैर तथा दाहिने हाथ
से दाहिना पैर स्पर्श करना चाहिए।
~ मनुस्मृति २.७२
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ।।
गुरु का चरण-वन्दन परस्पर विपरीत हाथों द्वारा करना चाहिए अर्थात् बाएँ हाथ से बायाँ पैर तथा दाहिने हाथ
से दाहिना पैर स्पर्श करना चाहिए।
~ मनुस्मृति २.७२
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