Imam Mujtaba Khamenei — Hindi
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🇮🇷 | (30/04/2026) | कुछ देर में:

रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द); ख़लीज फ़ारस के क़ौमी दिन पर अपना सालाना पैग़ाम जारी करने वाले हैं।

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🇮🇷 | (30/04/2026) | रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द); का फ़ारस की खाड़ी के क़ौमी दिन की मुनासिबत पर पैग़ाम: (1/2)

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

हमारे ख़ित्ते की मुस्लिम अक़वाम, बिलख़ुसूस इस्लामी ममलिकत ईरान के मुअज़्ज़ज़ अवाम के लिए ख़ुदावंद-ए-मुतआल की एक बे-नज़ीर नेअमत, “फ़ारस की खाड़ी” का तोहफ़ा है। ये सिर्फ़ एक पानी का ख़ित्ता नहीं बल्कि इससे भी बढ़कर एक ऐसी नेअमत है जिसने हमारी शिनाख़्त और तहज़ीब का एक हिस्सा तशकील दिया है और क़ौमों के दरमियान राब्ते का मक़ाम होने के अलावा इसने आलमी मआशी की एक निहायत अहम और मुनफ़रिद गुज़रगाह स्ट्रेट ऑफ़ हुरमुज़ और उसके बाद दरिया-ए-ओमान मुहैया कराई है।

इस स्ट्रैटेजिक सरमाए ने सदियों से मुतअद्दिद शैतानी क़ुव्वतों की हिर्स-ओ-तमअ को लरज़ा दिया है और ख़ित्ते से बाहर की यूरोपी और अमरीकी क़ुव्वतों की बार-बार की यलग़ार, बदअमनी व तहफ़्फ़ुज़ के ख़िलाफ़, नुक़सानात और ख़ित्ते के ममालिक के लिए मुख़्तलिफ़ ख़तरात, दरअस्ल फ़ारस की खाड़ी के बाशिंदों के ख़िलाफ़ आलमी साम्राजी क़ुव्वतों की साज़िशों का सिर्फ़ एक हिस्सा हैं, जिनकी ताज़ा तरीन मिसाल हालिया बड़े शैतान अमरीका के यलग़ाराना इक़दामात थे।

ईरानी क़ौम ने, जिसके पास फ़ारस की खाड़ी का सबसे तवील कोस्टल इलाक़ा है, इसकी आज़ादी और बैरूनी ओ-यलग़ारकुना क़ुव्वतों से मुक़ाबले में सबसे ज़्यादा कोशिशें की हैं। [1622 में] स्ट्रेट ऑफ़ हुरमुज़ से पुर्तगालियों को बाहर निकालने और उसकी आज़ादी से लेकर, जिसकी बुनियाद पर 30 अप्रैल को फ़ारस की खाड़ी का क़ौमी दिन क़रार दिया गया, हॉलैंड की क़ुव्वत के ख़िलाफ़ जद्दोजहद और ब्रिटिश साम्राज के मुक़ाबले में मुक़ावमत की दास्तानों तक… इसी के साथ इस्लामी इंक़िलाब फ़ारस की खाड़ी के ख़ित्ते से साम्राजी क़ुव्वतों के हाथ काटने में, इन तमाम मुक़ावमतों का एक फ़ैसलाकुन मोड़ साबित हुआ और आज दुनिया के मुंहज़ोरों की सबसे बड़ी लश्करकशी और यलग़ार के दो महीने गुज़रने और अपनी साज़िश में अमरीका की इंतिहाई शर्मनाक शिकस्त के बाद, फ़ारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ़ हुरमुज़ के एक नए दौर की बुनियाद रखी जा रही है।

फ़ारस की खाड़ी के ख़ित्ते की क़ौमें, जो तवील अर्से से मुंहज़ोर ताक़तों के मुक़ाबले में अपने हुक्मरानों की ख़ामोशी और ज़िल्लत आमेज़ रवैय्ये की आदी हो चुकी थीं, पिछले साठ दिनों में अग़यार के तसल्लुत के इनकार में जुनूबी ईरान के अवाम और नौजवानों की ग़ैरत और बहादुरी और ईरान-ए-अज़ीज़ की नेवी अफ़्वाज की हिम्मत, होशियारी और मुजाहिदाना कारकर्दगी के जलवे अपनी आँखों से देख चुकी हैं।

आज ख़ुदावंद-ए-बुज़ुर्ग ओ-बरतर के फ़ज़्ल-ओ-करम और तीसरी मुसल्लत-कर्दा जंग के मज़लूम शुहदा, बिलख़ुसूस इस्लामी इंक़िलाब के अज़ीम और दूरअंदेश रहबर-ए-आला (र) के ख़ून की बरकत से न सिर्फ़ आलमी अवामी राय और ख़ित्ते की अक़वाम बल्कि ख़ुद हुक्मरानों और मुल्की सदारतों पर भी यह बात साबित हो चुकी है कि फ़ारस की खाड़ी के इलाक़ों में अमरीकी अग़यार की मौजूदगी और यहाँ उनका अपने लिए बिल और घोंसला बनाना, ख़ित्ते में बदअमनी और अदम-ए-तहफ़्फ़ुज़ का सबसे बड़ा सबब है। और उनके खोखले अड्डे ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त की ही सलाहियत नहीं रखते तो ख़ित्ते के अमरीका-परस्तों और उसके पिट्ठुओं को अमरीका की जानिब से तहफ़्फ़ुज़ फ़राहम करने की क्या उम्मीद रखी जा सकती है।

अल्लाह की मदद और नुसरत से फ़ारस की खाड़ी के ख़ित्ते का रोशन मुस्तक़बिल ऐसा होगा जो अमरीका से आरी और अपनी अक़वाम की तरक़्क़ी ओ-पेशरफ़्त, सुकून और खुशहाली के लिए होगा। फ़ारस की खाड़ी के इस आबी ख़ित्ते में अपने हमसाया ममालिक के साथ हमारा मुश्तरका मुस्तक़बिल है और उन अग़यार के लिए, जो हज़ारों किलोमीटर दूर से हिर्स ओ-तमअ के साथ यहाँ शैतानी हरकतें करते हैं, इसके पानी की गहराई में दफ़्न होने के अलावा यहाँ कोई जगह नहीं है। कामयाबियों का ये सिलसिला, जो ख़ुदावंद-ए-आलम के फ़ज़्ल-ओ-करम, मुक़ावमत की तदाबीर और पॉलिसियों और एक मज़बूत ईरान की स्ट्रैटेजी के नतीजे में हासिल हुआ है, एक नए इलाक़ाई और आलमी निज़ाम का पेश-ए-ख़ेमा बनेगा।

आज ईरानी क़ौम की मोजिज़ा-नुमा मौजूदगी, सहयुनियत और खूँरेज़ अमरीका के ख़िलाफ़ मुक़ाबले के लिए जान फ़िदा करने को तैयार करोड़ों ईरानियों तक ही महदूद नहीं रही बल्कि दुनिया भर में फैली उम्मत-ए-मुस्लिमा की सफ़ों में शामिल होकर, अंदरून ओ-बैरून-ए-मुल्क के नब्बे मिलियन ग़ैरत-मंद ईरानियों ने अपनी तमाम शिनाख़्ती, रूहानी, इंसानी, इल्मी, इंडस्ट्रियल और जदीद टेक्नोलॉजी की सलाहियतों, नैनो और बायो से लेकर न्यूक्लियर और मिसाइल टेक्नोलॉजी तक को अपना क़ौमी सरमाया फ़र्ज़ कर लिया है और वो उनकी हिफ़ाज़त ऐसे करेंगे जैसे अपनी ज़मीन, नेवी और आसमानी हुदूद की करते हैं।

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Imam Mujtaba Khamenei — Hindi
🇮🇷 | (30/04/2026) | रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द); का फ़ारस की खाड़ी के क़ौमी दिन की मुनासिबत पर पैग़ाम: (1/2) बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम हमारे ख़ित्ते की मुस्लिम अक़वाम, बिलख़ुसूस इस्लामी ममलिकत ईरान के मुअज़्ज़ज़ अवाम…
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इस्लामी ममलिकत-ए-ईरान स्ट्रेट ऑफ़ हुरमुज़ के मैनेजमेंट की नेअमत का अमली शुक्र अदा करते हुए, फ़ारस की खाड़ी के ख़ित्ते को महफ़ूज़ बनाएगा और इस वॉटर-वे से नाजायज़ फ़ायदा उठाने वाले दुश्मनों के रास्ते बंद कर देगा। स्ट्रेट ऑफ़ हुरमुज़ के नए क़ानूनी क़वाइद और इंतिज़ामी निज़ाम, ख़ित्ते की तमाम अक़वाम के फ़ायदे के लिए अमन, आसाइश और तरक़्क़ी का सबब बनेंगे और इसके इक़्तिसादी फ़वाइद अवाम के दिलों को ख़ुश करेंगे, इंशाअल्लाह, चाहे काफ़िरों को नागवार ही क्यों न गुज़रे।

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🇮🇷 | (01/05/2026) | कुछ देर में:

रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द); यौमे मज़दूर और यौमे मोअल्लिम पर अपना सालाना पैग़ाम जारी करने वाले हैं।

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🇮🇷 | (01/05/2026) | रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) का टीचर डे और लेबर डे पर पैग़ाम:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम


पहली और दूसरी मई के दो दिन, ऐसे अय्याम हैं जिनमें मेहनतकशों और टीचरों को ख़िराज-ए-तहसीन पेश किया जाता है। ज़बानी और अलामती ख़िराज-ए-तहसीन से अलग हटकर, जो अपने आप में एक बजा और सहीह काम है, किसी भी मुल्क की पेशरफ़्त, इल्म ओ-अमल के इन दो परों की मरहून-ए-मिन्नत है। टीचर, इस मक़सद को अमली जामा पहनाने के पहले मरहले में किरदार अदा करता है।

इल्म ओ-दानिश की तालीम, महारतों में इज़ाफ़े और आइंदा नस्ल की फ़िक्री नश्व-ओ-नुमा और उसके तशख़्ख़ुस के ढाँचे की तश्कील की बड़ी ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर है। वो स्टूडेंट्स और दीनी तलबा जो किसी भी उस्ताद के ज़ेरे साया परवरिश पाते हैं, मुस्तक़बिल क़रीब में अपनी सीखी हुई महारतों और हासिल किए गए उलूम को जामा-ए-अमल पहनाएँगे और इंशाअल्लाह ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ मैदानों, घर के मुहब्बत भरे माहौल से लेकर काम की जगहों और गली-कूचों तक में अपने अख़लाक़, रवय्ये और गुफ़्तगू में अपने टीचरों के किरदार और गुफ़्तार की झलक पेश करेंगे।

दूसरी तरफ़ काम का मैदान एक वसीअ मैदान है जो पूरे मुल्क पर मुहीत है, घरों, दफ़ातिर, कारोबारी मराकिज़ और मसाजिद से लेकर खेतों, वर्कशॉप्स, कारख़ानों, कानों और मुख़्तलिफ़ ख़िदमाती शोबों तक फैला हुआ है। जितना ज़्यादा ये वसीअ मैदान मेहनत और एहसास-ए-ज़िम्मेदारी जैसे दो बुनियादी अनासिर से आरास्ता होगा, जो हर बड़ी कामयाबी की बुनियाद हैं, उतनी ही ज़्यादा मुल्क की तरक़्क़ी की ज़मानत बेहतर और मज़बूत होगी।

हम जानते हैं कि एक मेहनतकश, अपने अज़्म और हुस्न-ए-अमल की वजह से कभी-कभी ऐसा बुलंद मक़ाम हासिल कर लेता है कि एक मेहरबान उस्ताद और मुरब्बी की तरह उसके तवाना और फ़नकार हाथ पर भी तशक्कुर ओ-इम्तिनान का बोसा देना चाहिए। अलबत्ता ये उस इब्तिदाई तरबियत का नतीजा होता है जो हर इंसान को अपने पहले टीचर यानी अपने वालिदैन से मिलती है और उसके बाद उस्ताद के सामने ज़ानू-ए-अदब तह करने से हासिल की जा सकती है।

अब जबकि इस्लामी जम्हूरिया-ए-ईरान ने सैंतालीस साल से ज़्यादा जद्दोजहद के बाद अल्लाह के फ़ज़्ल-ओ-करम से अपनी तरक़्क़ी ओ-पेशरफ़्त के मुख़ालिफ़ीन के साथ अस्करी मैदान में अपनी नुमायाँ ताक़त का कुछ हिस्सा दुनिया के सामने साबित कर दिया है तो इक़्तिसादी और सक़ाफ़ती मैदान में भी उन्हें मायूस करना और शिकस्त देना ज़रूरी है।

टीचर; सक़ाफ़ती मैदान में सबसे मोअस्सिर कड़ी और मेहनतकश मआशी ओ-इक़्तिसादी मैदान में अहम तरीन अनासिर होंगे, चुनाँचे कहा जा सकता है कि ये दोनों, सक़ाफ़त और मआशियत के ढाँचे की रीढ़ की हड्डी की हैसियत रखते हैं। लिहाज़ा ज़रूरी है कि वो अपनी अहम ख़ास हैसियत की अहमियत से, मुलाज़मत और काम से बढ़कर, जिसे अंजाम देने के बदले में उजरत मिलती है, बख़ूबी वाक़िफ़ हों।

जैसा कि इस काम के साथ इस बात पर भी तवज्जोह रखनी चाहिए कि हर साल या हर कुछ वक़्त बाद ज़बानी ख़िराज-ए-तहसीन पेश करना अपनी जगह मुनासिब है, लेकिन इन दोनों तबक़ों की कोशिशों की क़द्रदानी इससे कहीं ज़्यादा गहरी और अमली होनी चाहिए। मुझे लगता है कि जिस तरह क़ौम सड़कों और चौराहों पर मौजूदगी के ज़रिए अपनी अस्करी फ़ोर्सेज़ की हिमायत कर रही है, उसी तरह उसे टीचरों और मेहनतकशों की मदद के लिए भी मज़बूत अमली पुश्तपनाही का मुज़ाहिरा करना चाहिए।

जैसे स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों का इंतिज़ाम चलाने में तलबा के अहल-ए-ख़ाना का तआवुन पहले से ज़्यादा होना चाहिए और इसी तरह मुल्क में तैयार होने वाली मस्नूआत के इस्तिमाल को तरजीह देकर उनका प्रोडक्शन करने वाले मेहनतकशों, बिलख़ुसूस नुक़सान उठाने वाले ताजिरों और कारोबारियों की हिमायत की जानी चाहिए, ताकि वो मुलाज़िमीन की बरतरफ़ी से गुरेज़ करें, चाहे वो पैदावारी यूनिट्स के हों या सर्विसेज़ की यूनिट्स के, बल्कि हर मज़दूर को जहाँ वो काम करता है, उस प्रोडक्ट या सर्विस यूनिट का सरमाया समझें। अलबत्ता हुकूमत को भी इस ख़ैरख़्वाहाना अमल की इमकान हिमायत करनी चाहिए।

अज़ीज़ ईरान, जैसा कि वो बरसों कोशिश के बाद एक मिलिट्री पॉवर के तौर पर उभरा है, इंशाअल्लाह उसी तरह ईरानी-इस्लामी तशख़्ख़ुस के ख़ुतूत की तरसीम और उन्हें असातिज़ा के ज़रिए नौजवानों के दिल ओ-दिमाग़ में रासिख़ करके और मुल्की मस्नूआत के इस्तिमाल को तरजीह देकर, जो ईरानी मेहनतकशों की कोशिश का नतीजा हैं, तरक़्क़ी ओ-पेशरफ़्त की चोटियों की तरफ़ गामज़न रहेगा और ये सब इंशाअल्लाह, हमारे आक़ा इमाम ज़माना अजलल्लाह तआला फ़रजहूश्शरीफ़ की दुआ-ए-ख़ैर और वसीले से बहुत जल्द और बेहतर तरीक़े से अंजाम पाएगा। बि-इज़्निल्लाह तआला।

— सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई

01 मई 2026

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📹 | रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द); सेहतमंद हैं!

— आयतुल्लाह मोहसिन क़ुम्मी (ह)

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🇮🇷 | ईरान के प्रेसिडेंट जनाब मसउद पेज़ेश्कियान साहब का रहबर-ए-मुअज़्ज़म-ए-इंक़िलाब इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) से मुलाक़ात के बारे में बयान:

ईरान के प्रेसिडेंट डॉक्टर पज़ेश्कियान ने इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) से अपनी हालिया मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए इस मुलाक़ात के माहौल और उनकी शख़्सी, अख़लाक़ी और इंतिज़ामी पहलुओं पर तफ़्सीली बातचीत की है।

डॉक्टर मसऊद पज़ेश्कियान ने बताया कि ये मुलाक़ात बेहद बे-तकल्लुफ़ माहौल में हुई और बातचीत तक़रीबन ढाई घंटे जारी रही। उन्होंने कहा कि इस मुलाक़ात में मेरे लिए सबसे नुमायाँ पहलू रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी का तर्ज़-ए अमल, नज़रिया और उनका आज़िज़ाना व बे-तकल्लुफ़ रवैया था। ये वही अंदाज़ था जिसने बातचीत के माहौल को एतिमाद, सुकून, हमदर्दी और बिला-वास्ता गुफ़्तगू पर मब्नी फ़िज़ा में तब्दील कर दिया।

डॉक्टर मसऊद पज़ेश्कियान ने मुल्क के इंतिज़ामी सतहों पर हम-आहंगी, एतिमाद और हमदर्दी को मज़बूत करने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि जब मुल्क का सबसे आला ओहदेदार इस अख़लाक़ी किरदार, इन्किसारी और अवामी जज़्बे के साथ ज़िम्मेदारान और अफ़राद से पेश आता है, तो ये रवैया फ़ितरी तौर पर मुल्क के इंतिज़ामी और इदारती निज़ाम के लिए भी एक मिसाली नमूना बन सकता है। ये मिसाली नमूना ज़िम्मेदारी, अवाम से क़ुरबत और मसाइल व मुश्किलात को हक़ीक़ी मअनों में सुनने पर मब्नी है, जैसा कि शहीद रहबर अपने तरीक़े और अमल में पाबंद थे।

रहबर-ए-मुअज़्ज़म-ए-इंक़िलाब इमाम मुज्तबा ख़ामेनई ने भी इस मुलाक़ात में बिल्कुल इसी जज़्बे के साथ शिरकत की — एक ऐसा जज़्बा जो सादगी, इन्किसारी, गहराई और बाहमी एहतिराम पर मब्नी था — जिसकी वजह से बातचीत का माहौल मुकम्मल तौर पर बिला-वसिला, शफ़्फ़ाफ़ियत और क़ुर्बत व एतिमाद के एहसास से भरपूर था।

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🇮🇷 | ख़त्म-अल-अंबिया मरकज़ी हेडक्वार्टर के कमांडर मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही (ह) की तमाम ईरानी अफ़वाज के सुप्रीम कमाण्डर रहबर-ए-इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (ह) से अहम मुलाक़ात।

- ख़त्म-अल-अंबिया मरकज़ी हेडक्वार्टर के कमांडर मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही (ह) ने इमाम सय्यद मुज्तबा ख़ामेनई (ह) से मुलाक़ात के दौरान इस्लामी जम्हूरिया-ए-ईरान की मुसल्लह अफ़वाज की तैयारियों के हवाले से रिपोर्ट पेश की, जिसमें इस्लामी जम्हूरिया-ए-ईरान की फ़ौज, इस्लामी इंक़िलाबी गार्ड कॉर्प्स, मुल्की सिक्योरिटी और बॉर्डर पुलिस फ़ोर्सेज़, डिफेंस मिनिस्ट्री, और बसीज फ़ोर्सेज़ शामिल थीं।

- जनरल अली अब्दुल्लाही (ह) ने रहबर-ए-इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (ह) से कहा कि इस्लाम के तमाम मुजाहिदीन जंगी जज़्बे, दिफ़ाई व हमला-आवर सलाहियतों, स्ट्रैटेजिक मंसूबा-बंदी, और अमरीकी-सहयुनी दुश्मनों की कार्रवाइयों का मुक़ाबला करने के लिए दरकार साज़ो-सामान और असलहे के एतिबार से मुकम्मल आला सतह की तैयारी रखते हैं। दुश्मन की किसी भी स्ट्रैटेजिक ग़लती, ज़ुल्म का फ़ौरी, सख़्त और ताक़तवर जवाब दिया जाएगा।

- आपने रहबर-ए-इंक़िलाब को यक़ीन-दिहानी कराई कि वो उनके अहकामात की मुकम्मल इताअत करते हुए इस्लामी इंक़िलाब के नज़रियात, सरज़मीन-ए-ईरान, क़ौमी ख़ुदमुख़्तारी व मफ़ादात, और ईरानी क़ौम का आख़िरी साँस तक दिफ़ा करेंगे, और दुश्मनों को पशेमान कर देंगे।

- मुलाक़ात के दौरान सुप्रीम कमाण्डर इमाम सय्यद मुज्तबा ख़ामेनई (द) ने मुसल्लह अफ़वाज और मुल्क के मुजाहिदीन की क़ुर्बानियों और काविशों को सराहा। उन्होंने तीसरी मुसल्लत कर्दा जंग (जंग-ए-रमज़ान) के दौरान अपने साबिक़ा इक़दामात का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह के फ़ज़्ल से उन इक़दामात ने बड़ी कामयाबियाँ हासिल कीं और दुश्मनों को अपने अहदाफ़ हासिल करने से रोका। आपने कार्रवाइयों के तसलसुल और दुश्मन क़ुव्वतों के ख़िलाफ़ मज़ाहमत को मज़ीद मज़बूत बनाने के हवाले से नई हिदायात और इक़दामात भी जारी किए।

📍नोट: मालूम रहे कि आला ओहदेदारों के साथ रहबर की इस हफ़्ते होने वाली ये दूसरी तवील मुलाक़ात है। मग़रिबी मीडिया और उनके पिट्ठू हिंदुस्तानी मीडिया की जानिब से रहबर की सेहत के हवाले से फैलायी जाने वाली अफ़वाहें झूठी और बेबुनियाद हैं।

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📹 | रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) पूरी तरह से सेहतमंद हैं!

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📕 | मरजअ-ए-आली क़द्र आयतुल्लाह उज़मा नूरी हम्दानी (ह) की जानिब से शहीद रहबर इमाम सय्यद अली ख़ामेनई (र) के मुक़ल्लिदीन के जवाब में, जिन्होंने आपकी इजाज़त से अपनी साबिक़ा तक़लीद पर बाक़ी रहना इख़्तियार किया था, शरई वुजूहात रहबर-ए-इंक़िलाब इमाम आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) को अदा करने के बारे में जवाज़ का फ़तवा सादिर किया गया है और उन्हें जामेअ शरायत फ़क़ीह क़रार दिया गया है।

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🇮🇷 | (15/05/2026) | रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) का फ़ारसी ज़बान के तहफ़्फ़ुज़ और फ़ारसी अदब के अज़ीम शायर अबुल क़ासिम फ़िरदौसी (940-1020 ई०) की याद के पैग़ाम:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

फ़ारसी ज़बान बोलने और लिखने का ज़रिया होने के साथ ही ईरानियों की पहचान, अफ़कार से जुड़ने की कड़ी और उनके तशख़्ख़ुस की सरहदों को तश्कील देती है। फ़ारसी ज़बान-ओ-अदब, आलमी सतह पर इस्लामी ममलिकत-ए-ईरान के कल्चर और तहज़ीब को फ़रोग़ देने की सबसे ज़्यादा गुंजाइशों और सलाहियतों में से एक है और फ़ारसी ज़बान को मज़बूत बनाने के सिलसिले में हमारे हकीम-ओ-शहीद रहबर-ए-आला की सिफ़ारिश, “ईरानी-इस्लामी तहज़ीब” के इक़्तिदार की राह का चराग़ है।

ईरान की अज़ीज़ क़ौम ने तीसरे मुक़द्दस दिफ़ा में भी, पिछले दो मुसल्लत कर्दा जंगों की तरह साबित कर दिया कि फ़िरदौसी की असातिरी दास्तानें, उनकी ज़िंदगी की हक़ीक़त और उनकी बहादुर शख़्सियत की हक़ीक़ी तस्वीरें हैं। और शाहनामा के इंसान-साज़, शुजाअताना और क़ुरआनी मफ़ाहीम, ईरान की तमाम क़ौमियतों और तबक़ात को अपनी पहचान, असालत और ख़ुदमुख़्तारी के तहफ़्फ़ुज़ और इसी तरह “ज़ह्हाक़ सिफ़त” जाबिर दुश्मनों के ख़िलाफ़ जिद्द-ओ-जहद में हमदिल, हमराह और हमआहंग बनाते हैं। मौजूदगी, दिफ़ा और फ़तह का ये बेनज़ीर रज़मीया, कल्चर, अदब और हुनर से ताल्लुक़ रखने वाले अफ़राद के कंधों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी डालता है ताकि वो भी फ़िरदौसी की तरह उठ खड़े हों और अवाम की बेअसत के तसल्सुल में फ़नकारों की बेअसत भी दर्ज करें। फ़िक्र, क़लम और ज़बान को फ़न-ओ-हुनर से जोड़ दें और मिल्लत की अज़ीम बेदारी की दास्तान को तारीख़ में हमेशा के लिए अमर बना दें।

दूसरी जानिब, अफ़रीत-सिफ़त और आलमी शयातीन के हमलों के मुक़ाबिल ग़ैरत-मंदाना मज़ाहमत और इफ़्तिख़ार-आमेज़ फ़तह ने मिल्लत को तमद्दुनी ख़ुदमुख़्तारी के तहफ़्फ़ुज़ और अमरीका की ज़बानी, सक़ाफ़ती और तरीक़ा-ए-ज़िंदगी की यलग़ार के मुक़ाबिल मज़ीद आमादा कर दिया है ताकि सक़ाफ़ती मैदान के सरगर्म अफ़राद के जदीद तरीक़ा-ए-अमल और उनकी जदीद तराशियों के ज़रिए ज़बानी व फ़िक्री दिफ़ा और बच्चों, नौजवानों और जवानों के रुश्द-ओ-नुमू की सिम्त में, हत्मी कामयाबी तक बाक़ी मराहिल को ज़्यादा इस्तिक़ामत के साथ तय किया जा सके।

— सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई

15 मई 2026

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🇮🇷 | (20/05/2026) | रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) का शहीद सय्यद इब्राहिम रईसी (र) और उनके साथियों की शहादत की बरसी पर पैग़ाम।

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम


मई-2024 की फ़्लाइट के शहीदों और उन में सरफ़ेहरिस्त शहीद सद्र-ए-जम्हूरिया हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन रईसी की याद मनाना, इस्लामी जम्हूरिया-ए-ईरान में ख़िदमतगुज़ार शहीदों के अज़ीम कारवाँ की शहादत की याद ताज़ा करता है; मुतह्हरी, बेहिश्ती, रजाई और बाहुनर से लेकर रईसी, आल-ए-हाशिम, अमीर अब्दुल्लाहियान और लारीजानी तक, अज़ीम इमाम ख़ुमैनी और अज़ीज़ ख़ामेनई के मकतब के सैकड़ों नुमायाँ और तरबियत-याफ़्ता अफ़राद, जिन्होंने इस्लामी जम्हूरिया के ओहदेदारों की मुख़लिसाना और मुजाहिदाना ख़िदमत के दफ़्तर को अपने ख़ून-आलूद दस्तख़्त से मुज़य्यन किया।

शहीद रईसी की नुमायाँ ख़ुसूसियात में फ़र्ज़-शनासी, जवानों को आगे लाना, अद्ल-ओ-इंसाफ़ पर तवज्जो, फ़आल और नफ़अ-बख़्श डिप्लोमेसी, और ख़ुसूसन उनका अवामी होना शामिल था। ये ख़ुसूसियात ताक़तवर मज़ाहमती महाज़ के मुजाहिदों और निज़ाम के बहुत से ख़ैरख़्वाहों समेत ईरान के दोस्तों के हौसले बढ़ाने का सबब बनती थीं। अलबत्ता ये सब कुछ उस रूहानियत के साथ जुड़ा हुआ था जिसकी जड़ें उनके दिल-ओ-जान की गहराइयों में पैवस्त थीं।

ओहदेदारों और अवाम के दरमियान ताल्लुक़ में, मोअस्सिर मुस्बत ख़ुसूसियात, बाहमी क़द्रदानी का सबब बनती हैं। यही वजह है कि उनके मौला और आक़ा हज़रत अबुल हसन इमाम रज़ा सलवातुल्लाह व सलामुहू अलैह के जवार तक उनका आख़िरी सफ़र अदीमुल-मिसाल शान-ओ-शौकत के साथ अंजाम पाया।

इस शहीद के अधूरे रह जाने वाले अह्द-ए-सदारत ने क़ौम और मुल्क की ख़ुदमुख़्तारी को महफ़ूज़ रखते हुए, उसके लिए कोशिश और दिलसोज़ी का एक मेयार फ़राहम किया।

आज हम दो आलमी दहशतगर्द आर्मी के मुक़ाबिले में ईरानी क़ौम की अज़ीम और तारीख़ की बेनज़ीर शुजाअत के सामने खड़े हैं। ये चीज़ इस्लामी जम्हूरिया के ओहदेदारों; आला क़ियादत और इंतिज़ामिया, लेजिस्लेचर और अदलिया के सरबराहों से लेकर तमाम सतहों के ज़िम्मेदार अफ़राद तक की ज़िम्मेदारी को पहले से ज़्यादा संगीन बना देती है।

आज क़ौम, हुकूमत और इस्लामी जम्हूरिया के तमाम इदारों के माबैन इत्तिहाद की नेअमत का शुक्र, ओहदेदारों के जज़्बा-ए-ख़िदमत की तक़वियत और उनकी दोगुनी और मुजाहिदाना ख़िदमत, अवाम के मसाइल और परेशानियों, ख़ुसूसन इक़्तिसादी और मआशी मैदान में उनकी मुश्किलात को दूर करना, मैदान में बराह-ए-रास्त मौजूदगी और मुल्क की पेशरफ़्त और रोशन मुस्तक़बिल की जानिब उम्मीद-अफ़ज़ा हरकत की राह में मैदान में मौजूद अवाम के संजीदा किरदार की तारीफ़ पेश करना है।

राह-ए-ख़िदमत के शहीदों पर ख़ुदावंद की रहमत हो और हमारे मौला इमाम महदी अजलल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़ की दुआ ईरान के मुसलमान अवाम के ख़िदमतगुज़ारों की पुश्त-पनाह हो।

— सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई

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🇮🇷 | (26/05/2026) | कुछ देर में:

रहबर-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) अपना सालाना पैग़ाम-हज जारी करने वाले हैं।

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🇮🇷 | (26/05/2026) | रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) का सालाना पैग़ाम-हज: (1/3)

पैग़ामे हज

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

लब्बैक अल्लाहूम्मा लब्बैक, लब्बैक ला शरीका लका लब्बैक, इन्नल हम्दा वन-ने’मता लका वल-मुल्क।


अए ख़ुदा! मैं तेरी दावत पर हाज़िर हूँ, तेरा कोई शरीक नहीं, तमाम ता’रीफ़ें, तमाम नेअमतें, तमाम बादशाही और क़ुदरत तेरी ही तरफ़ से है और तुझ ही से मख़्सूस है। इस साल का मौसम-ए-हज भी आ पहुँचा और उम्मत-ए-इस्लाम के हाजियों ने बंदगी का एहराम बाँधा और ‘तलबिया’ पुकारा ताकि वो माद्दी और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से निकल कर एक इलाही और सआदतमंद ज़िंदगी की तरफ़ हिजरत करें; ऐसी तौहीदी ज़िंदगी जो उबूदियत-ए-हक़ के महवर पर क़ायम हो, और अल्लाह के शरीकों से नफ़ी, बेज़ारी और बराअत पर मबनी हो। लेकिन इस हिजरत का मौक़ा सिर्फ़ इस साल बैतुल्लाह के ज़ायरीन और हाजियों ही के लिए मख़्सूस नहीं, बल्कि ईरान और पूरी दुनिया के तमाम मुसलमान भाइयों और बहनों को शामिल करता है; उन लोगों को भी जो गुज़िश्ता बरसों में हज की सआदत पा चुके हैं, और उन्हें भी जो अभी तक हज की अदायगी में कामयाब नहीं हुए।

इस हिजरत की शर्त ये है कि इंसान हमेशा के लिए ज़िक्र-ए-इलाही का एहराम बाँध ले; हक़ के मरकज़ के गिर्द हमेशा तवाफ़ करे; इलाही फ़र्ज़ों की बुलंद और मुश्किल चोटियों के दरमियान हमेशा सई करता रहे; सरकश शैतान को; उसके फ़रेब देने वाले वसवसों और उसके तमाम पैरौकारों समेत, लगातार संगसार करता रहे; तवज्जोह और गिरया-ओ-ज़ारी से भरपूर ‘वुक़ूफ़’ इख़्तियार करे; फ़क़ीर और मुसाफ़िर को खाना खिलाए; नफ़्सानी ख़्वाहिशात और गुमराह करने वाले रुझानों को क़ुर्बान करे और अपने बातिन की गंदगियों को दूर करे; और हर हाल में ख़िदमत के लिए तैयार रहे और हक़ के दिफ़ा का परचम बुलंद रखे। इसी तरह मिल्लत-ए-ईरान ने भी इंक़िलाब-ए-इस्लामी के ‘मीक़ात’ में क़दम रखा और इसी हिजरत के रास्ते पर चल पड़ी। उसने इमाम ख़ुमैनी-ए-कबीर की इब्राहीमी सदा पर लब्बैक कहा, ग़ुलामी और दबाव क़ुबूल करने का लिबास उतार फेंका, दुनिया व आख़िरत की कामयाबी का एहराम ज़ेब-ए-तन किया, और लब्बैक कहते हुए और ‘हरवला’ करते हुए कोशिश की कि इस्लाम-ए-नाब-ए-मुहम्मदी (स) की तालीमात के मरकज़ पर तवाफ़ करे और ख़ुद को अद्ल-ए-जहानी और विलायत-ए-उज़्मा के रौशन आफ़ताब के क़रीब ले आए।

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिल-हम्द, अल्लाहु अकबर अला मा हदाना।

हाँ, ‘अल्लाहु अकबर’! और इसी असलहे; यानी अल्लाहु अकबर, के साथ 47 बरस पहले ईरान की मुसलमान क़ौम ने क़ियाम किया, सरकश, डिक्टेटरशिप और बैरूनी ताक़तों की ग़ुलाम पहलवी हुकूमत को गिरा दिया, लालची और घमंडी अमरीका के हाथ-पाँव इस मुल्क से काट दिए और सैहूनियत के असर-ओ-रसूख़ को मुकम्मल तौर पर ख़त्म कर दिया। इसी अल्लाहु अकबर के असलहे के ज़रिए, जब सद्दामी-बअसी हुकूमत ने ईरान की सरज़मीन पर हमला किया, तो ग़ैरतमंद मुजाहिदीन और जान-निसार नौजवानों ने आठ साल दिफ़ा-ए-मुक़द्दस की अज़ीम दास्तान रक़म की, और बावजूद इसके कि मशरिक़ व मग़रिब की तमाम ताक़तें बअसी हुकूमत की हिमायत कर रही थीं, उसे उसकी जगह पर रोक दिया। और यही इस्तिक़ामत उन्होंने उसके बाद भी, इक़्तिसादी घेराबंदी, बग़ावतों, ज़ालिमाना पाबंदियों, और इस्लामी जम्हूरिया के ख़िलाफ़ दुश्मनों के बेशुमार सियासी, तब्लीग़ाती और इक़्तिसादी हमलों के मुक़ाबिले में, मज़बूती और साबित-क़दमी के साथ सालों साल जारी रखी।

अल्लाहु अकबर! इसी अल्लाहु अकबर के हथियार ने उम्मत-ए-इस्लामी और रेज़िस्टेंस के मोर्चे के मुजाहिद नौजवानों के दरमियान ईरान से लेकर लेबनान, फ़िलस्तीन, इराक़ और शाम तक, अफ़्रीक़ा और यमन से अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान तक, बल्कि दुनिया की तमाम आज़ाद क़ौमों तक रिश्ता-ए-इत्तिसाल को मज़बूत बनाया, ताकि ये मज़बूत रस्सी क़ब्ज़ा करने वाले सैहूनी ज़ालिमों के मुक़ाबिल उम्मत-ए-इस्लामी के वुजूद के दिफ़ा के लिए उठ खड़ी हो, आईएसआईएस के फ़ित्ने को ख़त्म करे, ऑपरेशन तूफ़ानुल-अक़्सा बरपा करे और चरमरा रही सैहूनी हुकूमत की साँस उखाड़कर रख दे!

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🇮🇷 | (26/05/2026) | रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) का सालाना पैग़ाम-हज: (2/3)

अल्लाहु अकबर! हाँ, अल्लाह इससे कहीं बड़ा है कि उसकी हक़ीक़त को अल्फ़ाज़ में बयान किया जा सके। इसी अल्लाहु अकबर के असलहे के सहारे इस्लामी जम्हूरिया-ए-ईरान ख़ुरदाद 1404 की दूसरी थोपी गई जंग में सैहूनी हुकूमत को अपने सख़्त हमलों के नीचे बेबस करने में कामयाब हुआ, ज़ालिम अमरीका को सख़्त जवाब दिया, और दुश्मन को ईरान को झुकाने के अपने मक़सद में नाकाम बना दिया और इसी अल्लाहु अकबर के असलहे ने मिल्लत-ए-ईरान को ऐसी क़ुव्वत और तवानाई अता की कि आज के ज़ालिम तरीन लोगों के हाथों रहबर-ए-अज़ीमुश्शान, फ़र्ज़ंद-ए-सालेह-ए-रसूल-ए-अकरम (स), हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली हुसैनी ख़ामेनई आला अल्लाहु मक़ामहूश-शरीफ़ की अलमनाक शहादत के बाद, इस क़ौम ने एक नई इलाही बेदारी हासिल की, और जहाँ-जहाँ ज़रूरत पेश आई वहाँ भरपूर मौजूदगी के साथ ऐसे बड़े कारनामे अंजाम दिए कि दुनिया की निगाहें उसकी अज़मत और फ़ख़्र पर जम गईं।

बेशक अल्लाह इससे कहीं बड़ा है कि उसकी हक़ीक़त को बयान किया जा सके। इसी अल्लाहु अकबर के असलहे के ज़रिए इस्लामी ईरान के बहादुर मुजाहिदीन और जान-निसार फ़ौजों ने, रेज़िस्टेंस के मोर्चे के मुजाहिदों; ख़ुसूसन अज़ीज़ लेबनान की हमराही में, तीसरी थोपी गई जंग में अमरीकी-सैहूनी दहश्तगर्दों के मुक़ाबिल बड़ी कामयाबियाँ हासिल कीं। उन्होंने रब-ए- कायनात पर भरोसा करते हुए अपने मिसाइलों और ड्रोन्स के ज़रिए ज़मीन, हवा और समुंदर में शैतान-ए-बुज़ुर्ग यानी अमरीका और उसके पाले हुए दरिंदे; सैहूनी हुकूमत, को निशाना बनाया, और अपनी आँखों से अल्लाह के उस सच्चे वादे को पूरा होते देखा कि वो अपने रास्ते में जिहाद करने वालों की मदद फ़रमाता है और फिर एक बार अल्लाहु अकबर!

यक़ीनन अल्लाह, हर सिफ़त से बुलंदतर है, और उसके लश्कर हर ताक़त पर ग़ालिब हैं।

इसी अल्लाहु अकबर के असलहे के ज़रिए, मिल्लत-ए-ईरान और रेज़िस्टेंस के मोर्चे की बेदारी के बाद, पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा की बेदारी भी सामने आएगी, और मुशरिकीन से बराअत का पैग़ाम हज के ‘रमी-ए-जमरात’ से निकल कर मुसलमानों की ज़ाती, समाजी और सियासी ज़िंदगी के हर मैदान तक, दुनिया के हर हिस्से में फैल जाएगा। उम्मत-ए-मुस्लिमा और इस इलाक़े की क़ौमों के दरमियान बेशुमार साझा क़ाबिलियतें और फ़ायदे मौजूद हैं, जो मुस्तक़बिल के नए निज़ाम और इस इलाक़े व दुनिया की आने वाली सियासी और तहज़ीबी शक्ल को बनाएँगे।

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🇮🇷 | (26/05/2026) | रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी इमाम सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनई (द) का सालाना पैग़ाम-हज: (3/3)

मैं सच्चाई और ख़ुलूस के साथ तमाम इस्लामी मुल्कों और हुकूमतों को ख़ैर, नेकी, दोस्ती और बाहमी तआवुन की दावत देता हूँ ताकि हम सब मिल कर उम्मत-ए-मुस्लिमा की तरक़्क़ी और आलम-ए-इस्लाम के मसलों के हल के लिए क़दम उठाएँ। इस सिलसिले में एक हक़ीक़त बिल्कुल साफ़ है कि ज़माने का पहिया पीछे नहीं लौटेगा, और इस इलाक़े की क़ौमें और सरज़मीनें अब अमरीकी अड्डों के लिए मोर्चा और पनाहगाह नहीं बनेंगी।अमरीका न सिर्फ़ ये कि अब ख़ित्ते में शरारत और फ़ौजी अड्डों के क़ायम होने के लिए कोई महफ़ूज़ जगह नहीं पाएगा, बल्कि वो रोज़-ब-रोज़ अपनी पुरानी हैसियत और ताक़त से दूर होता जा रहा है।

इसी तरह चरमरा रही सैहूनी हुकूमत; ये कैन्सर का नासूर भी अपनी मनहूस उम्र के आख़िरी मराहिल के क़रीब पहुँच चुकी है, और इन् शा अल्लाह, अल्लाह के फ़ज़्ल से, दस साल क़ब्ल रहबर-ए-अज़ीमुश्शान के क़ातिअ और दूरअंदेश फ़रमान के मुताबिक़ वो इस तारीख़ के पच्चीस साल बाद का ज़माना नहीं देख सकेगी। इसी वजह से इस साल मुशरिकीन से बेज़ारी का मसला दो गुना अहमियत हासिल कर गया है, और अमरीका व सैहूनी हुकूमत से नफ़रत और दूरी का इज़हार सिर्फ़ मौसम-ए-हज और मीक़ात-ए-हज की रस्मों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ईरान और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, इन मुबारक दिनों के बाद भी, “मर्ग बर अमरीका”और “मर्ग बर इस्राईल”उम्मत-ए-मुस्लिमा, दुनिया के मज़लूमों, ख़ास तौर पर नौजवानों का आम और साफ़ नारा बना रहेगा।

मुस्तक़बिल उम्मत-ए-मुस्लिमा और नई इस्लामी तहज़ीब का है, और हम में से हर शख़्स अपनी हिम्मत, क़ाबिलियत और ज़िम्मेदारी के मुताबिक़ इस मुस्तक़बिल को हासिल करने और उसके क़रीब लाने में अपना हिस्सा अदा कर सकता है। इस साल के हज में ईरानी ज़ायरीन और हाजियों पर ये अहम और साफ़ ज़िम्मेदारी है कि वो अपने मुसलमान भाइयों और बहनों के सामने तीसरी थोपी गई जंग की फ़तह की दास्तान बयान करें और उन्हें रोशन मुस्तक़बिल की उम्मीद दिलाएँ। तमाम मुअज़्ज़ज़ हाजियों से दरख़्वास्त है कि वो हज़रत महदी अलैहिस्सलाम के ज़हूर के लिए ख़ास दुआ करें। वो उम्मत-ए-मुस्लिमा के इत्तिहाद,फ़िलस्तीन और मस्जिद-ए-अक़्सा की आज़ादी, मुसलमानों की मुश्किलात के ख़ातमे और दुश्मनों के मुक़ाबले में कामयाबी के लिए भी दुआ करें, और मुझे भी अपनी दुआओं में याद रखें।

अए परवरदिगार! मुहम्मद व आल-ए-मुहम्मद पर दुरूद भेज और अपनी लुत्फ़ व रहमत की नज़र हाजियों और पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा पर फ़रमा। उन्हें हज-ए-मक़बूल की तौफ़ीक़ अता फ़रमा, उनके दिलों को मआरिफ़त और बसीरत के अनवार से रौशन फ़रमा, और उनके अज़्म व इरादे को उम्मत की इस्लाह और इस्लाम के दुश्मनों पर हत्मी फ़तह के रास्ते में मज़ीद मज़बूत फ़रमा।

अए परवरदिगार! अपना फ़ज़्ल और अपनी वसीअ रहमत, राह-ए-ख़ुदा के तमाम पाक शहीदों की रूहों पर नाज़िल फ़रमा, ख़ास तौर पर रेज़िस्टेंस मोर्चे के शहीदों पर, और उन सब के सरदार शहीद रहबर पर अपनी ख़ास रहमतें नाज़िल फ़रमा। हाजियों के हज, इबादत करने वालों की इबादत, और मेहनत व कोशिश करने वालों की कोशिश और जद्दोजहद का भरपूर हिस्सा, जो शहीद रहबर-ए-उम्मत की हिदायत व रहनुमाई से फ़ैज़ पाते रहे, उस रूहानी रूह को अता फ़रमा और मिल्लत-ए-ईरान और पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा को उसके रास्ते, उसके मक़सद और उसके मिशन के सिलसिले में साबित-क़दमी और मदद अता फ़रमा।

अए परवरदिगार! अपनी आला-तरीन सलवात व सलाम हमारे आक़ा और मौला हज़रत इमाम महदी-ए-मुंतज़िर (सलवातुल्लाह व सलामुहू अलैहि व अला आबाइहित-ताहिरीन) पर नाज़िल फ़रमा, और हमें और पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा को उनकी दुआओं और मक़बूल मुनाजात का हिस्सा बना। और इस दुनिया को उनके मुबारक ज़हूर से मुनव्वर और मुज़य्यन फ़रमा, जैसा कि तूने वादा फ़रमाया है, और हमारे दिल इस यक़ीनी वादे पर मुकम्मल इत्मीनान से लबरेज़ हैं।

“अल्लाह ने उन लोगों से वादा फ़रमाया है जो तुम में से ईमान लाए और नेक अमल किए कि वो ज़रूर उन्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाएगा, जैसा कि उसने उनसे पहले लोगों को बनाया था, और वो ज़रूर उनके लिए उनके दीन को मज़बूत करेगा जिसे उसने उनके लिए पसंद फ़रमाया है, और उनके ख़ौफ़ के बाद उन्हें अमन अता फ़रमाएगा।”

और तमाम हमारे मुसलमान भाइयों पर सलाम हो, और अल्लाह की रहमत और बरकतें नाज़िल हों।

ज़िल-हिज्जा-1447


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