Head Digital Works की PROGA को चुनौती देने वाली याचिका में त्वरित सुनवाई (early hearing) के लिए दायर आवेदन गुरुवार को भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुआ।
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The hearing date is approaching, so stay aware and make informed decisions. The rest is up to you.
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Breaking: SC flags need for three judge bench, pushes Online Gaming Law challenge to January 2026
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को संकेत दिया कि Promotion and Regulation of Online Gaming Act (PROGA), 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई अब जनवरी 2026 में ही होगी। उद्योग ने कई बार तुरंत सुनवाई की मांग की, लेकिन अदालत ने कहा कि यह मामला तीन-न्यायाधीशों की पीठ के सामने ही जाएगा, क्योंकि यह संविधानिक वैधता (vires) और विधायी अधिकारक्षेत्र (legislative competence) से जुड़ा मुद्दा है।
क्या हुआ सुनवाई में
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने Head Digital Works (A23) द्वारा लगाई गई जल्दी सुनवाई की अर्जी सुनी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि PROGA अभी लागू भी नहीं हुआ, लेकिन उद्योग पहले ही लगभग बंद हो चुका है।
सीनियर एडवोकेट अरयमा सुंदरम और अरविंद दातार ने बताया कि मामला अचानक उस पीठ की सूची से हट गया था, जो पहले ऑनलाइन गेमिंग पर राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से जुड़े मामलों को सुन रही थी। उनका तर्क था कि उद्योग बंद हो चुका है, लोग बेरोजगार हो रहे हैं, और PROGA की संवैधानिकता ही चुनौती के दायरे में है, इसलिए जल्द सुनवाई जरूरी है।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि किसी भी कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल हो, तो वह आमतौर पर तीन-न्यायाधीशों की पीठ के सामने रखा जाता है। इसलिए पूरा मामला अब जनवरी में ही सूचीबद्ध होगा।
जब वकीलों ने उद्योग के पूर्ण ठप हो जाने का हवाला देकर पहले की तारीख मांगी, तो चीफ जस्टिस ने कहा:
“सब कुछ बंद पड़ा है… हम जनवरी में सूचीबद्ध कर रहे हैं। यही हमारा आश्वासन है।”
इससे स्पष्ट हो गया कि दिसंबर में कोई सुनवाई नहीं होगी।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
दो बड़े संवैधानिक प्रश्न जुड़े हुए हैं:
1. क्या राज्य सरकारें ऑनलाइन गेमिंग को बैन या नियंत्रित कर सकती हैं?
— यह मामला पहले ही जस्टिस पारडीवाला की पीठ सुनकर निर्णय सुरक्षित कर चुकी है।
2. क्या संसद (केंद्र) PROGA के जरिए पूरे देश में ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लगा सकती है?
अदालत ने माना कि ये दोनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
अगर राज्य विधायी अधिकार से बाहर पाए जाते हैं, तो केंद्र का अधिकार भी प्रभावित हो सकता है, और उल्टा भी।
इसी कारण मामला बड़ी पीठ के पास जाएगा।
उद्योग की स्थिति: लगभग पूरी तरह ठप
HDW ने बताया कि PROGA सिर्फ प्रकाशित हुआ है, लागू नहीं, फिर भी:
बैंक, पेमेंट गेटवे और मध्यस्थ कंपनियों ने डर के कारण तुरंत सेवाएं बंद कर दीं
UPI और पेमेंट सेटलमेंट रोक दिए गए
WhatsApp बिजनेस अकाउंट बंद कर दिए गए
तीन महीने से कोई राजस्व नहीं
मासिक खर्च 10 करोड़ रुपये से ज्यादा
कर्मचारियों की संख्या 606 से घटकर 178 रह गई
विदेशी निवेशक Clairvest ने 760 करोड़ रुपये की पूरी निवेश-राशि “write off” कर दी
विज्ञापन और उपयोगकर्ता गतिविधि लगभग खत्म
कंपनी ने कहा कि हर हफ्ते की देरी उद्योग को खत्म करने की तरफ धकेल रही है, जबकि पूरा सेक्टर दो लाख लोगों को रोजगार देता है।
केंद्र सरकार का रुख
केंद्र ने PROGA का बचाव करते हुए कहा:
अनियंत्रित ऑनलाइन मनी-गेमिंग से सामाजिक और आर्थिक नुकसान हो रहा था
कई ऑपरेटर विदेशी नियंत्रण, शेल कंपनियों, संदिग्ध एल्गोरिद्म और उपयोगकर्ताओं को धोखा देने वाली डिज़ाइनों के जरिए काम कर रहे थे
संसद को कानून बनाने का पूरा अधिकार है
जोखिम रोकने के लिए सख्त कानून आवश्यक था
अब आगे क्या
जनवरी 2026 में तीन-न्यायाधीशों की पीठ यह तय करेगी कि:
ऑनलाइन गेमिंग को नियंत्रित करने या प्रतिबंध लगाने का अधिकार राज्यों के पास है,
केंद्र के पास है,
या दोनों के पास।
फैसला पूरे 23,000 करोड़ रुपये के ऑनलाइन गेमिंग उद्योग का भविष्य तय करेगा – कराधान, निवेश, रोजगार और प्लेटफॉर्म संचालन सब इसी पर निर्भर होगा।
तब तक उद्योग अनिश्चितता में फंसा हुआ है, और सुनवाई का इंतजार कर रहा है।
क्या हुआ सुनवाई में
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने Head Digital Works (A23) द्वारा लगाई गई जल्दी सुनवाई की अर्जी सुनी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि PROGA अभी लागू भी नहीं हुआ, लेकिन उद्योग पहले ही लगभग बंद हो चुका है।
सीनियर एडवोकेट अरयमा सुंदरम और अरविंद दातार ने बताया कि मामला अचानक उस पीठ की सूची से हट गया था, जो पहले ऑनलाइन गेमिंग पर राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से जुड़े मामलों को सुन रही थी। उनका तर्क था कि उद्योग बंद हो चुका है, लोग बेरोजगार हो रहे हैं, और PROGA की संवैधानिकता ही चुनौती के दायरे में है, इसलिए जल्द सुनवाई जरूरी है।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि किसी भी कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल हो, तो वह आमतौर पर तीन-न्यायाधीशों की पीठ के सामने रखा जाता है। इसलिए पूरा मामला अब जनवरी में ही सूचीबद्ध होगा।
जब वकीलों ने उद्योग के पूर्ण ठप हो जाने का हवाला देकर पहले की तारीख मांगी, तो चीफ जस्टिस ने कहा:
“सब कुछ बंद पड़ा है… हम जनवरी में सूचीबद्ध कर रहे हैं। यही हमारा आश्वासन है।”
इससे स्पष्ट हो गया कि दिसंबर में कोई सुनवाई नहीं होगी।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
दो बड़े संवैधानिक प्रश्न जुड़े हुए हैं:
1. क्या राज्य सरकारें ऑनलाइन गेमिंग को बैन या नियंत्रित कर सकती हैं?
— यह मामला पहले ही जस्टिस पारडीवाला की पीठ सुनकर निर्णय सुरक्षित कर चुकी है।
2. क्या संसद (केंद्र) PROGA के जरिए पूरे देश में ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लगा सकती है?
अदालत ने माना कि ये दोनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
अगर राज्य विधायी अधिकार से बाहर पाए जाते हैं, तो केंद्र का अधिकार भी प्रभावित हो सकता है, और उल्टा भी।
इसी कारण मामला बड़ी पीठ के पास जाएगा।
उद्योग की स्थिति: लगभग पूरी तरह ठप
HDW ने बताया कि PROGA सिर्फ प्रकाशित हुआ है, लागू नहीं, फिर भी:
बैंक, पेमेंट गेटवे और मध्यस्थ कंपनियों ने डर के कारण तुरंत सेवाएं बंद कर दीं
UPI और पेमेंट सेटलमेंट रोक दिए गए
WhatsApp बिजनेस अकाउंट बंद कर दिए गए
तीन महीने से कोई राजस्व नहीं
मासिक खर्च 10 करोड़ रुपये से ज्यादा
कर्मचारियों की संख्या 606 से घटकर 178 रह गई
विदेशी निवेशक Clairvest ने 760 करोड़ रुपये की पूरी निवेश-राशि “write off” कर दी
विज्ञापन और उपयोगकर्ता गतिविधि लगभग खत्म
कंपनी ने कहा कि हर हफ्ते की देरी उद्योग को खत्म करने की तरफ धकेल रही है, जबकि पूरा सेक्टर दो लाख लोगों को रोजगार देता है।
केंद्र सरकार का रुख
केंद्र ने PROGA का बचाव करते हुए कहा:
अनियंत्रित ऑनलाइन मनी-गेमिंग से सामाजिक और आर्थिक नुकसान हो रहा था
कई ऑपरेटर विदेशी नियंत्रण, शेल कंपनियों, संदिग्ध एल्गोरिद्म और उपयोगकर्ताओं को धोखा देने वाली डिज़ाइनों के जरिए काम कर रहे थे
संसद को कानून बनाने का पूरा अधिकार है
जोखिम रोकने के लिए सख्त कानून आवश्यक था
अब आगे क्या
जनवरी 2026 में तीन-न्यायाधीशों की पीठ यह तय करेगी कि:
ऑनलाइन गेमिंग को नियंत्रित करने या प्रतिबंध लगाने का अधिकार राज्यों के पास है,
केंद्र के पास है,
या दोनों के पास।
फैसला पूरे 23,000 करोड़ रुपये के ऑनलाइन गेमिंग उद्योग का भविष्य तय करेगा – कराधान, निवेश, रोजगार और प्लेटफॉर्म संचालन सब इसी पर निर्भर होगा।
तब तक उद्योग अनिश्चितता में फंसा हुआ है, और सुनवाई का इंतजार कर रहा है।
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1. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:
अगर किसी खेल में पैसे लगाए जाते हैं (stake/wager), तो वह betting/gambling की श्रेणी में आ सकता है।
केवल यह कह देना कि गेम "skill based" है (जैसे Fantasy Sports, Rummy आदि) अब पर्याप्त बचाव नहीं है।
राज्यों के पास ऑनलाइन पैसे वाले गेम्स को रेगुलेट या बैन करने की संवैधानिक शक्ति है।
Betting/Gambling कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
---
2. PROG Act पर इसका क्या असर पड़ेगा?
PROG Act (2025) केंद्र सरकार का कानून है जिसने लगभग सभी Real Money Games को पूरे भारत में बैन कर दिया है।
इस कानून को चुनौती दी गई है क्योंकि:
संविधान में Betting/Gambling राज्य का विषय है।
इसलिए कई लोग कह रहे हैं कि केंद्र सरकार के पास ऐसा कानून बनाने की शक्ति ही नहीं थी।
---
3. क्या SC का नया फैसला PROG Act को मजबूत करता है?
हाँ भी और नहीं भी।
केंद्र सरकार को फायदा
SC ने कहा कि:
पैसे लगाकर खेले जाने वाले गेम्स पर सरकारें रोक लगा सकती हैं।
Addiction, mental health, fraud आदि कारणों से कड़े कानून बनाए जा सकते हैं।
इससे PROG Act के पीछे सरकार की दलील मजबूत होती है।
---
लेकिन केंद्र के लिए समस्या भी बढ़ी
SC ने साथ ही साफ कहा कि:
Betting/Gambling राज्य सूची (State List) का विषय है।
केवल "Online" शब्द जोड़ देने से वह केंद्र का विषय नहीं बन जाता।
यही बात PROG Act के खिलाफ सबसे बड़ा संवैधानिक तर्क है।
इसलिए अदालत में अब बड़ा सवाल यह रहेगा:
> अगर Betting/Gambling राज्य का विषय है, तो क्या केंद्र सरकार पूरे देश में इसे बैन कर सकती है?
---
4. Fantasy Sports (Dream11 आदि) के लिए इसका मतलब?
इस फैसले के बाद:
Skill vs Chance वाला पुराना बचाव काफी कमजोर हो गया है।
Dream11, Gameskraft जैसी कंपनियों की कानूनी स्थिति पहले से कठिन हो गई है।
राज्य सरकारें इन प्लेटफॉर्म्स पर बैन या सख्त नियंत्रण को अधिक आसानी से जस्टिफाई कर सकती हैं।
लेख में बताया गया है कि Dream11 पर लगभग ₹25,000 करोड़ और Gameskraft पर लगभग ₹21,000 करोड़ की GST देनदारी का खतरा बताया जा रहा है।
---
इस फैसले से Real Money Gaming इंडस्ट्री को बड़ा झटका लगा है।
लेकिन PROG Act अपने आप वैध साबित नहीं हो गया है।
अब PROG Act वाले मामले में मुख्य सवाल यह होगा:
> क्या संसद (केंद्र सरकार) को पूरे भारत में Real Money Gaming पर कानून बनाने या बैन लगाने का संवैधानिक अधिकार है, जबकि Betting/Gambling राज्य सूची का विषय है?
इस प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी आना बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:
अगर किसी खेल में पैसे लगाए जाते हैं (stake/wager), तो वह betting/gambling की श्रेणी में आ सकता है।
केवल यह कह देना कि गेम "skill based" है (जैसे Fantasy Sports, Rummy आदि) अब पर्याप्त बचाव नहीं है।
राज्यों के पास ऑनलाइन पैसे वाले गेम्स को रेगुलेट या बैन करने की संवैधानिक शक्ति है।
Betting/Gambling कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
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2. PROG Act पर इसका क्या असर पड़ेगा?
PROG Act (2025) केंद्र सरकार का कानून है जिसने लगभग सभी Real Money Games को पूरे भारत में बैन कर दिया है।
इस कानून को चुनौती दी गई है क्योंकि:
संविधान में Betting/Gambling राज्य का विषय है।
इसलिए कई लोग कह रहे हैं कि केंद्र सरकार के पास ऐसा कानून बनाने की शक्ति ही नहीं थी।
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3. क्या SC का नया फैसला PROG Act को मजबूत करता है?
हाँ भी और नहीं भी।
केंद्र सरकार को फायदा
SC ने कहा कि:
पैसे लगाकर खेले जाने वाले गेम्स पर सरकारें रोक लगा सकती हैं।
Addiction, mental health, fraud आदि कारणों से कड़े कानून बनाए जा सकते हैं।
इससे PROG Act के पीछे सरकार की दलील मजबूत होती है।
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लेकिन केंद्र के लिए समस्या भी बढ़ी
SC ने साथ ही साफ कहा कि:
Betting/Gambling राज्य सूची (State List) का विषय है।
केवल "Online" शब्द जोड़ देने से वह केंद्र का विषय नहीं बन जाता।
यही बात PROG Act के खिलाफ सबसे बड़ा संवैधानिक तर्क है।
इसलिए अदालत में अब बड़ा सवाल यह रहेगा:
> अगर Betting/Gambling राज्य का विषय है, तो क्या केंद्र सरकार पूरे देश में इसे बैन कर सकती है?
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4. Fantasy Sports (Dream11 आदि) के लिए इसका मतलब?
इस फैसले के बाद:
Skill vs Chance वाला पुराना बचाव काफी कमजोर हो गया है।
Dream11, Gameskraft जैसी कंपनियों की कानूनी स्थिति पहले से कठिन हो गई है।
राज्य सरकारें इन प्लेटफॉर्म्स पर बैन या सख्त नियंत्रण को अधिक आसानी से जस्टिफाई कर सकती हैं।
लेख में बताया गया है कि Dream11 पर लगभग ₹25,000 करोड़ और Gameskraft पर लगभग ₹21,000 करोड़ की GST देनदारी का खतरा बताया जा रहा है।
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इस फैसले से Real Money Gaming इंडस्ट्री को बड़ा झटका लगा है।
लेकिन PROG Act अपने आप वैध साबित नहीं हो गया है।
अब PROG Act वाले मामले में मुख्य सवाल यह होगा:
> क्या संसद (केंद्र सरकार) को पूरे भारत में Real Money Gaming पर कानून बनाने या बैन लगाने का संवैधानिक अधिकार है, जबकि Betting/Gambling राज्य सूची का विषय है?
इस प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी आना बाकी है।
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