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Forwarded from 𝗠𝗘𝗚𝗛 𝗨𝗣𝗗𝗔𝗧𝗘𝗦 (MeghUpdates)
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Virag Jain, a medical student who is in Ukraine praising Indian ambassy and Indian Government.

Don't believe that Pappu-Shappu, Paid Media and NDTV.

@MeghUpdatess
जहां जेट्स गरज रहे हों, क्रूज़ मिसाइल्स आग बरसा रही हों, गोलियों की बारिश हो रही हो, हेलीकाप्टर और टैंक्स शहर में घूम रहे हों....वहां आपकी गाड़ी पर लगा हुआ तिरंगा आपकी जान बचाने की गारंटी है।
कहने को छोटी बात है, सोचो तो बहुत बड़ी।
Please report this channel and share it in other groups.
#कुटाई ही दवा है...
बचपन में हमारे मोहल्ले में एक रज्जन चच्चा रहा करते थे...!

चच्चा चरसी थे और अक्सर ही उनका किसी न किसी से झगड़ा हो जाया करता था।

चच्चा के मुक़ाबिले चच्ची बहुत समझदार टाइप की थीं।

वो हमेशा चच्चा को समझाती रहती थीं और मोहल्ले वालों को भी..

उनके नशेड़ी होने की दुहाई देतीं और बतातीं कि किस तरह चच्चा अपने ही रिश्तेदारों के हाथों ज़मीन-जायदाद का मुक़दमा हार कर नशे की लत लगा बैठे हैं, अतः उन पर तरस किया जाए।

जब कभी चच्चा किसी से मारपीट कर बैठते तो चच्ची दौड़ कर झगड़ा रुकवातीं और चच्चा को समझा-बुझा कर घर ले जातीं।

अगले दिन चच्चा फिर किसी को मार बैठते।

धीरे-धीरे मोहल्ले वालों को एक बात साफ़ हुई कि चच्चा जब भी किसी से मारपीट करते हैं तो चच्ची बीचबचाव के दौरान हमेशा सामने वाले को पकड़ लेती थीं, उससे लिपट जाया करती हैं और समझाने लगती हैं।

इस का फ़ायदा उठा कर चच्चा न सिर्फ सामने वाले को दो घूंसे और जड़ देते हैं (क्यूंकि वो तो चच्ची के पकड़ने-लिपटने से बंधा हुआ होता), बल्कि मार कर मौके से ग़ायब भी हो जाया करते हैं। फ़िर शुरू होता चच्ची का रोना, पीटना, समझाने का दौर।

फिर यही पैटर्न हर बार नज़र आने लगा।

एक दिन ऐसे ही एक झगड़े के दौरान सामने वाले ने समझाने, लिपटने, चिपटने का प्रयास कर रही चच्ची को ही ठीक से कूट दिया।

अगली बार जब चच्चा लड़े तो चच्ची प्रकट नहीं हुईं, चच्चा भी अच्छे से कूटे गए..!!

उस दिन के बाद मोहल्ले में शांति हो गयी..

चच्चा कितना भी नशे में होते, किसी से उलझते नहीं थे..!!

वर्तमान में कुछ लिबरल/मीडियाकर्मी और राजनेता वही चच्ची का किरदार निभा रहे हैं।

आतंक या दहशतगर्दी की किसी घटना के होते ही ये पहले तो आतंकवादी की मजबूरिये-हालात बताने लगते हैं, उसके आतंकवादी बनने में सरकार और समाज का कितना दोष है समझाने लगते हैं, और..

फिर अपने वाक्जाल से मुल्क को ऐसा बांधते हैं की लोगों को आतंक की जड़ में खुद अपनी ग़लती समझ में आने लगती है। उधर आतंकवादी अपना अगला निशाना तय कर रहे होते हैं...

कुल मिला कर चच्ची के पिटे बगैर चच्चा के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है..!!!

😆😆😆😆

साभार : सामाजिक माध्यम।
तू इधर उधर की ना बात कर...
दिल्ली में जहां हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर हमला हुआ उस सड़क पर अवैध कब्जा कर के कबाड़ियों की दर्जनों दुकानें बनी हुई हैं। उन्हीं कबाड़ियों का सरगना है अंसार। हनुमानजी की शोभायात्रा पर हमले का मास्टरमाइंड भी वही है। सरेआम सड़क कब्जा कर के बनी, कबाड़ियों की उन दर्जनों दुकानों में से एक भी दुकान को अभी तक छुआ भी नहीं गया है, हटाना तो दूर की बात।
एक अन्य तथ्य पर भी ध्यान दीजिए। कबाड़ियों की वो दुकानें हनुमानजी की शोभायात्रा से एक दो दिन पहले नहीं बनी हैं। बरसों पुरानी हैं, सड़क पर अवैध कब्जा हटाने की जिम्मेदार पुलिस और दिल्ली नगरनिगम की ही है। यह दोनों ही भाजपा के पास हैं। दंगाई कबाड़ियों के गिरोह पर बरसों से क्यों मेहरबान है नगरनिगम पर काबिज भाजपा और दिल्ली पुलिस.? यहां तक कि इतनी बड़ी वारदात के बावजूद भी दंगाई कबाड़ियों की शत प्रतिशत अवैध दुकानों पर बुलडोजर चलाने के लिए भाजपा और दिल्ली पुलिस किस मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रही है.?
सातों सांसदों समेत दिल्ली के एक भी भाजपा नेता ने दंगाई कबाड़ियों की उन अवैध दुकानों पर बुलडोजर चलाने की मांग नहीं की है। दंगाई कबाड़ियों पर भाजपा की इस अथाह अपार शत प्रतिशत मेहरबानी का कारण क्या है.? वो केवल कड़ी निंदा और कठोर कार्रवाई के वायदे के झुनझुने से दिल्ली का दिल बहला रहे हैं।
अतः केजरीवाल को कोसने के राजनीतिक पाखंड से काम नहीं चलेगा।

सतीश चंद्र मिश्रा भैया की कलम से |
#द_कश्मीर_फाइल_का_असर
एक महिला पत्रकार की समीक्षा...
पढना इसे मजा आयेगा
दिल्ली में बस मे बैठे हुए थी कि अचानक मुझे आदेशात्मक शब्द सुनाई दिए "भैया सीट से हट जाओ, मेरे साथ मेरे बच्चे है।"
बुर्का ओढ़े महिला ने एक 25 साल के लड़के से कहा तो लड़के ने बड़ी शालीनता से कहा "आप महिला सीट पर जाओ। मै महिला सीट पर नहीं बैठा हूँ।"
वो बोली "वहां सब सीटों पर पहले से ही लेडीज बैठी हैं।"
लड़के ने अपने कान के हेडफोन को हटाते हुए कहा, "मैं क्या करूं? मुझे भजनपुरा जाना है जो अभी बहुत दूर है।"
वो अपने बच्चो की धौंस दिखाने लगी कि मेरे छोटे-छोटे 4 बच्चे हैं। आपको शर्म नही आती?
आप जेंटस हैं।
आप सीट नही छोड़ सकते?"
अब सब सवारियां मौन खड़ी तमाशा देखने लगी। मामला गर्म होने के साथ साथ मसालेदार हो रहा था। लड़के ने एक बड़ी अच्छी बात कही, "आप लोगो का यही ड्रामा है। हर साल एक बच्चा जनना और फिर अगले बच्चे की तैयारी। क्या आपने हमसे पूछकर बच्चे पैदा किये थे?
अजीब बात है?
बच्चे पैदा करो तुम और सीट छोड़े हम?
आपको बच्चों की इतनी ही फिक्र थी तो कैब करती या खाली बस में बैठती। अब तुम्हें सफर फ्री चाहिए, सीट भी चाहिये और दादागिरी भी चाहिए। जाइए मैं नही देता आपको सीट।"
तभी बस के कंडक्टर ने भी कहा "भाई दे दो सीट।" लड़का फिर बोला कि "मैं किसी महिला रिज़र्व सीट पर नही बैठा हुँ। भाई तू अपने टिकट काट।"
कंडक्टर शायद अरबी भेड़ था। कहने लगा "लेडी है! लगता है पेट से भी है!"
"तो मै क्या करूं?" युवक ने कहा..
कंडक्टर चुप होकर बस के बाहर देखने लगा। इतने में मुझे ये तो यकीन हो गया लड़का जागरूक है। वह उसको बातों ही बातों में धुनने को तैयार है। वो बुर्के वाली अक्कड से युवक के पास वाली सीट के पास ही खड़ी रही।
लड़का भी बुदबुदाता रहा कि बच्चे तुम पैदा करते रहो और सीट काफ़िर देंगे? फिर तुम्हें अपना घर देंगे? और फिर वही कश्मीर वाले हालात पैदा करोगे।"
उस महिला के आगे बैठै एक इन्सानियत के सेक्युलर कर्मचारी ने अपनी सीट ऑफर कर दी। वो धम्म से बैठ गयी। उसने दो शिशु शावक गोद मे बिठा दिए। परंतु दो शावकों को खडे रहना पडा। अब वो बगल वाले से अपने शावकों के लिए सीट मांगने लगी।"
लड़के ने जोर से उस सेक्युलर को ताना मारा "भाई साहब! घर भी दे दो अपना, ये बच्चे वहां अच्छा जीवन जिएंगे।"
इतने में कंडक्टर चिल्लाया "भाई! जिसे अप्सरा बॉर्डर उतरना हो उतर जाओ।"
बात वहीं रुक गयी और लड़का शांत हो गया। वो शाहीनबाग की शेरनी सीमापुरी उतर गई। मात्र 10 मिनट के सफर के लिये उस बुर्के वाली ने ये सब नाटक किया था।
ये घटना दिल्ली लोकल बस रूट नं• 33 की है जो नोएडा सेक्टर 37 से भजनपुरा की तरफ जाती है। रोज की तरह लोग इसमे घुसते है और अधिका़श अपने आफिस और दूसरे काम के लिए निकलते है। मैं महिला सीट पर बैठी ये सब नाटक देख रही थी। (दिल्ली एनसीआर की बसों में एक लाइन महिलाओ के लिए आरक्षित रहती है।)
मैं मंद-मंद मुसकराई और सोचने लगी कि "जागना जरूरी है। अरे ढेर सारे बच्चे पैदा वो करें और survive हमे करना पड़ रहा है।
वर्षों से यही चल आ रहा है लेकिन ये अब आगे नही चलना चाहिए। शायद ही नहीं बल्कि यकीनन अब लोगो में जागरूकता आ रही है जो अब हर शहर गांव व दूरदराज तक पहुंचनी चाहिए।"
--एक महिला पत्रकार..
😳 🙄 🤔 🙆‍♂️
ये सवाल नहीं है, बल्कि सवाल की आड़ में वैसी ही धमकी है जो इसके भाई ने दी थी. दिल्ली दंगों से लेकर दिल्ली जहांगीरपूरी हिंसा जैसे Pilot Projects करने के बाद इन्हें ये पूर्ण विश्वास हो चला है कि 1946 के डायरेक्ट एक्शन जैसा कुछ आराम से अंजाम दिया जा सकता है और इंडियन स्टेट उसको रोक पाने में अक्षम होगी.

इनका ये विश्वास काफी हद्द तक सही भी है क्योंकि इंडियन स्टेट उन दंगों को रोक पाने में बिल्कुल असमर्थ रही. स्टेट का पुलिस, प्रशासन इंटेलिजेंस समेत पूरा तंत्र Radicals के आगे बिल्कुल घुटनों पर नजर आया.

स्टेट बेकसूरों को उन दंगों की आग में मरने और झूलसने से नहीं रोक पाया. और ऐसा लगता है कि अगर फिर से ऐसे सुनियोजित दंगे हुए तो एक बार फिर स्टेट मशीनरी फेल ही होने वाली है.क्योंकि स्टेट अब भी गहरी नींद में है. अगर नींद में ना होते तो दिल्ली दंगों के बाद पुनः जहांगीरपुरी ना होता.

Jaruri gyaan wid manish
We need this type of Janjagrutka from every Hindu
🔥1
#प्रोफेसर_सिंह
आज मॉर्निंग वॉक पर मेरा प्रोफेसर सिंह से सामना हो गया। प्रो. सिंह DU के भौतिक विज्ञान के सेवानिवृत प्रध्यापक हैं। प्रो. सिंह आज बड़े गुस्से में थे। मुझे देखते ही बोले “अरब देशों को सबक सिखाने के लिए हमें मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार कर देना चाहिए”, मैं उन्हें समझाता इसके पहले ही वहां मौजूद हमारे एक और साथी इनायत हसन प्रो. सिंह से बहस में उलझ गये। इनायत हसन एक कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर हैं। इनायत हसन ने प्रो. सिंह से कहा “अगर आपने मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार किया तो हमारे अरब देश वहां नौकरी करने वाले लाखों हिंदुओं को निकाल देंगे, तब आप क्या करेंगे?” प्रो. सिंह ने इनायत से कहा “देखो मियां, अगर अरब देशों ने हिंदुओं को नौकरी से निकाला तो उन्हें हम भारत में नौकरी देंगे।” इनायत ने फिर सवाल दागा “प्रोफेसर साहब, देश में पहले से ही बेरोज़गारी है, अरब देशों से आये इतने सारे हिंदुओं को नौकरी कैसे देंगे?”
अब प्रोफेसर सिंह ठहरे भौतिक विज्ञान के शिक्षक, तर्क उनकी उपर की जेब में हमेशा रखे रहते हैं। सो, उन्होंने कहा “देखो इनायत मियां, मेरी बात को इस तरह से समझो। जैसे तुम एक कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर हो और अगर अरब से एक हिंदू वापस लौटता है, जो तुम्हारी ही तरह मार्केटिंग मैनेजर है, तो तुम्हें नौकरी से लात मारकर निकाला जाएगा और उसे नौकरी पर रख लिया जाएगा। जब बहिष्कार होगा तो सिर्फ दुकानदारों का ही नहीं होगा, नौकरी करने वालों का भी होगा।”
इनायत हसन को प्रोफेसर साहब की ये बातें काफी चुभ गईं। मुझे भी इनायत के लिए काफी बुरा और दुख महसूस हुआ। खैर, इनायत वहां से चले गये। इसी बीच प्रो. सिंह की पत्नी का फोन आया और आदेश मिला कि लौटते वक्त आलू और प्याज ले आइएगा। मैं और प्रोफेसर साहब घर लौटते हुए एक सब्जीवाले की दुकान पर रुके। प्रो. सिंह ने कड़ककर सब्जीवाले से पूछा “सुनो, तुम्हारा नाम क्या है?” सब्जीवाले ने अपना नाम बताया संतोष प्रसाद। अचानक प्रोफेसर साहब के लहज़े में नरमी आ गई और बोले “संतोष भाई, ज़रा 2 किलो आलू और प्याज़ दे दो।” मुझे लगा कि आज प्रोफेसर साहब को समझाना ठीक नहीं है, इनका दिमाग अभी अलग ही लेवल पर हैं। उनसे आज शाम को फिर बात करूंगा। देखते हैं, प्रोफेसर साहब क्या कहते हैं।
#खरी_बात_प्रखर_के_साथ
#प्रोफेसर_सिंह (PART 2)
आज शाम को जब मैं घर लौटा तो प्रोफेसर सिंह (सेवानिवृत्त प्राध्यापक, भौतिक विज्ञान, DU) मुझे कार पार्किंग में खड़े दिख गये। उनके साथ उनका ड्राइवर राजेश भी था। मैंने प्रो. सिंह से पूछा “सर काहे आज सुबह-सुबह जबरन में इनायत हसन को उल्टा-सीधा बोल दिया।” (प्रो. सिंह और इनायत के बीच हुए विवाद को जानने के लिये मेरा पिछला पोस्ट पढ़ें) प्रो. सिंह फिर भड़क गये, और मुझसे बोले “तुम आजकल बहुत सिकलुर होते जा रहे हो।”
मैंने उनसे कहा "सर, ऐसा नहीं है। आप जो मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार करने की बात कह रहे थे, वो प्रैक्टकली पॉसिबल नहीं है। आप ही बताइये कि फल-सब्जीवाला, मैकेनिक, नाई तो आप अपने हिसाब का ढूंढ लेंगे लेकिन अपनी पसंद का पंचरवाला कैसे ढूढेंगे?”
प्रोफेसर मेरी बात सुनकर मुस्कुराये और अपने ड्राइवर राजेश से बोले “राजेश ज़रा साहब को कार की डिक्की खोलकर दिखाओ।” राजेश ने जब कार की डिक्की खोली तो उसमें पंचर बनाने वाली किट रखी हुई थी। मैंने अचरज से पूछा “क्या आप खुद पंचर बनाते हैं?” प्रो. सिंह बोले “हां बिल्कुल बनाता हूं। अगर हम खुद अपने जूते पॉलिश कर सकते हैं तो पंचर क्यों नहीं बना सकते। इसमें कौन सा रॉकेट साइंस है। मैंने तो राजेश को भी पंचर बनाना सीखा दिया है।” प्रोफेसर सिंह का कहना था कि आजकल ज्यादातर गाड़ियां ट्यूबलैस होती हैं। उसका पंचर बनाना बहुत आसान है।
फिर प्रो. सिंह ने मुझे बताया कि इस रेडीमेड किट से पंचर बनाना कितना आसान है। उन्होंने बताया कि ये किट आसानी से अमेज़न पर ऑनलाइन मिल जाती है, वो भी सिर्फ 250 से 400 रुपये के बीच। जबकि एक पंचर बनाने वाला आपसे 70 से 100 रुपये ले लेता है। उन्होंने इस पंचर किट का लिंक भी मेरे साथ शेयर किया (लिंक नीचे दिया गया है)।
फिर मैंने प्रो. सिंह से पूछा कि “पंचर तो चलो बना लिया। लेकिन हवा कैसे भरेंगे? उसके लिये तो आपको पंचर वाले के पास जाना ही होगा।” प्रो. सिंह ने फिर मुझे कार की डिक्की से निकाल कर एक आटोमैटिक पंप दिखाया, जिससे आराम से हवा भरी जा सकती है। इसे कार की बैटरी से चार्ज भी किया जा सकता है, जैसे आप मोबाइल चार्ज करते हैं। ये पंप 1500 से 3000 रुपये के बीच मिल जाता है। प्रो. सिंह ने इस पंप का अमेजन लिंक भी मेरे साथ तत्काल शेयर कर दिया (लिंक नीचे दिया गया है)।
मैंने प्रोफेसर सिंह से कहा कि "सर, आपने तो ये तीन-चार हज़ार का एक्सट्रा खर्च बता दिया।" इस पर वो बोले "जब 7, 10, 15 लाख की गाड़ी चलाते हो तो क्या 4 हज़ार रुपये खर्च नहीं कर सकते? जब नई कार खरीदते हो तो इससे ज्यादा की तो एसेसरीज लगवा लेते हो।"
प्रोफेसर साहब ने ताना मारते हुए मुझसे पूछा “कोई और सवाल पूछना चाहते हो पत्रकार महोदय?” मैंने चुपचाप सिर हिलाया और कहा “नहीं सर, मैं समझ गया।” मैंने प्रो. सिंह से विदा लेने में ही भलाई समझी। जब मैं जाने लगा तो प्रोफेसर साहब बोले “कल मॉर्निंग वॉक पर फिर मिलेंगे।”
#खरी_बात_प्रखर_के_साथ
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