Defence Ceremony
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🇮🇳 𝐃𝐞𝐟𝐞𝐧𝐜𝐞 𝐂𝐞𝐫𝐞𝐦𝐨𝐧𝐲
🏅 𝗚𝗮𝗹𝗹𝗮𝗻𝘁𝗿𝘆 𝗔𝘄𝗮𝗿𝗱 𝗛𝗲𝗿𝗼𝗲𝘀
💂𝐀𝐫𝐦𝐲 🪂𝐀𝐢𝐫𝐟𝐨𝐫𝐜𝐞 🚢𝐍𝐚𝐯𝐲 🪖𝐂𝐀𝐏𝐅𝐬
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भारत के प्रथम परमवीर: मेजर सोमनाथ शर्मा 🇮🇳
​"दुश्मन हमसे केवल 50 गज की दूरी पर है। हम बहुत कम रह गए हैं। हम भीषण गोलाबारी का सामना कर रहे हैं, लेकिन मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपनी आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक लड़ता रहूंगा।" — यह मेजर सोमनाथ शर्मा के अंतिम शब्द थे।
​शौर्य गाथा (The Brave Act):
3 नवंबर 1947 को बडगाम की लड़ाई में, मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी पर 700 से अधिक दुश्मनों ने हमला किया। हाथ में चोट और प्लास्टर होने के बावजूद, उन्होंने अदम्य साहस दिखाया और खुद मैगजीन भरकर अपने जवानों को देते रहे। उनके सर्वोच्च बलिदान की वजह से ही श्रीनगर हवाई अड्डा सुरक्षित रहा।
​Quick Facts:
🔹 Unit: 4 Kumaon Regiment
🔹 Battle: 1947 Indo-Pak War (Badgam)
🔹 Honor: First recipient of Param Vir Chakra (Posthumous)
​Major Somnath Sharma’s bravery and leadership set a benchmark for the Indian Army. His sacrifice ensured that Kashmir remained an integral part of India. A true son of the soil.
​नमन है ऐसे वीर योद्धा को! 🙏
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Presented by: @DefenceCeremony
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मेजर शैतान सिंह: रेजांग ला का अमर बलिदानी 🇮🇳
​"रेजांग ला की बर्फ से ढकी चोटियों पर जब 120 भारतीय जांबाज 2000 से ज्यादा चीनी सैनिकों के सामने खड़े थे, तब उनके नेतृत्व की कमान मेजर शैतान सिंह के हाथों में थी।"
शौर्य गाथा (The Battle of Rezang La):
18 नवंबर 1962 को लद्दाख की 17,000 फीट की ऊंचाई पर मेजर शैतान सिंह और उनकी 'C' कंपनी (13 कुमाऊं) ने वीरता का वो इतिहास रचा जिसे दुनिया आज भी सलाम करती है। बुरी तरह घायल होने के बावजूद, मेजर साहब एक प्लाटून से दूसरी प्लाटून तक जाकर अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। उन्होंने अंतिम सांस तक हार नहीं मानी। उनके इस बलिदान की वजह से ही दुश्मन कभी रेजांग ला को पूरी तरह जीत नहीं सका।
Quick Facts:
🔹 Unit: 13 Kumaon Regiment
🔹 Battle: 1962 Indo-China War (Rezang La)
🔹 Honor: Param Vir Chakra (Posthumous)
​Major Shaitan Singh’s leadership at extreme altitude and sub-zero temperatures is one of the greatest stories of courage in world military history. A true legend who fought till the last man and the last bullet.
वीर योद्धा को कोटि-कोटि नमन! 🙏
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Presented by: @DefenceCeremony
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लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्ज़ोरजी तारापोर: 'पिलर ऑफ स्ट्रेंथ'
​1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, लेफ्टिनेंट कर्नल ए.बी. तारापोर ने वीरता और नेतृत्व की वह मिसाल पेश की, जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गई। उन्हें उनकी यूनिट (The Poona Horse) में प्यार और सम्मान से 'आदि' बुलाया जाता था।
​शौर्य की गाथा: चाविंडा का युद्ध
​11 सितंबर 1965 को, तारापोर जी को पाकिस्तान के फिलौरा सेक्टर पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
​अजेय साहस: जब उनकी रेजिमेंट आगे बढ़ रही थी, तो दुश्मन के टैंकों ने भारी जवाबी हमला किया। घायल होने के बावजूद, उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया।
​नेतृत्व: उन्होंने अपनी रेजिमेंट का नेतृत्व इस तरह किया कि भारतीय सेना ने दुश्मन के लगभग 60 टैंक तबाह कर दिए।
​अंतिम बलिदान: 16 सितंबर को चाविंडा के युद्ध के दौरान, वह वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

​जन्म: 18 अगस्त 1923, बॉम्बे।
​रेजिमेंट: 17 पूना हॉर्स।
​सम्मान: उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से नवाजा गया।
​"मैदान-ए-जंग में उनकी मौजूदगी ही जवानों के लिए जीत का भरोसा बन जाती थी।"
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