कई तस्वीरें साझा की जाती हैं जिनमें दिखाया जाता है कि मुसलमान ने मजार के नाम पर रेलवे स्टेशन में एरिया कब्जा किया हुआ है। देखा जाए तो यह गलत बात है।
लेकिन इस तस्वीर से आपको पता चलेगा कि कब्जा करने में सिर्फ मुसलमान आगे नहीं हैं। और भी लोग हैं इस दौड़ में।
लेकिन इस तस्वीर से आपको पता चलेगा कि कब्जा करने में सिर्फ मुसलमान आगे नहीं हैं। और भी लोग हैं इस दौड़ में।
घमंड करू भी तो किस बात का मरने के बाद मेरे अपने ही
मुझे छूने के बाद हाथ धोएंगे...
मुझे छूने के बाद हाथ धोएंगे...
मिट जायेगा गुनाहों का तसव्वुर इस जहां से..,
अगर हो जाये यकीं कि ख़ुदा देख रहा है.!!
अगर हो जाये यकीं कि ख़ुदा देख रहा है.!!
🟧🟧🟧🟧🟧🟧🟧
⬜⬜⬜🔵⬜⬜⬜
🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩
Happy Republic Day
जन गण मन अधिनायक जय हे,
भारत भाग्य विधाता।
पंजाब सिंधु गुजरात मराठा,
द्राविड़ उत्कल बंग।
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा,
उच्छल जलधि तरंग।
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशीष मांगे,
गाहे तव जय गाथा।
जन गण मंगल दायक जय हे,
भारत भाग्य विधाता।
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे।
━━━━━🫡━━━━━
⬜⬜⬜🔵⬜⬜⬜
🟩🟩🟩🟩🟩🟩🟩
Happy Republic Day
जन गण मन अधिनायक जय हे,
भारत भाग्य विधाता।
पंजाब सिंधु गुजरात मराठा,
द्राविड़ उत्कल बंग।
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा,
उच्छल जलधि तरंग।
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशीष मांगे,
गाहे तव जय गाथा।
जन गण मंगल दायक जय हे,
भारत भाग्य विधाता।
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे।
━━━━━🫡━━━━━
औरत पर्दा नहीं करना चाहती और
मर्द नजर नहीं झुकाना चाहता
मगर अफसोस दोनों को इज्जत की तलाश है
मर्द नजर नहीं झुकाना चाहता
मगर अफसोस दोनों को इज्जत की तलाश है
👌2
क़ुरआन में "हलाला" (हलाला शब्द) सीधा शब्द इस्तेमाल नहीं हुआ है, लेकिन सूरह बक़रह की आयत 230 में इसका मूल सिद्धांत बताया गया है। यह आयत तलाक़ और दोबारा निकाह से संबंधित है।
क़ुरआन क्या कहता है? (सूरह बक़रह 2:230)
🟢 "फिर अगर वह उसे (तीसरी बार) तलाक़ दे दे, तो वह औरत उसके लिए हलाल नहीं रहेगी, जब तक वह किसी और मर्द से निकाह न कर ले। फिर अगर वह (दूसरा पति) भी उसे तलाक़ दे दे, तो दोनों (पहला पति और पत्नी) वापस एक-दूसरे से निकाह कर सकते हैं, अगर उन्हें लगता है कि वे अल्लाह की हदों का पालन करेंगे..."
इसका मतलब:
अगर कोई आदमी अपनी पत्नी को तीन तलाक़ दे देता है, तो वह औरत उसके लिए ना जायज़ (हराम) हो जाती है।
वह तब तक पहले पति से दोबारा शादी नहीं कर सकती, जब तक कि वह किसी और मर्द से ईमानदारी से निकाह और फिर तलाक़ या मृत्यु के बाद आज़ाद न हो जाए।
क्या "हलाला" करने की इजाज़त है?
🟢 शर्त के साथ नहीं। क़ुरआन कहता है कि:
दूसरा निकाह फर्ज़ी या प्लान किया हुआ नहीं होना चाहिए।
यानी सिर्फ इसलिए किसी मर्द से शादी करना कि वह तलाक़ देकर औरत को पहले मर्द से मिलाए — ये इस्लाम में गुनाह है।
🟢 हदीस में क्या कहा गया है?
पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ.) ने फरमाया:
"हलाला करने वाले और करवाने वाले दोनों पर अल्लाह की लानत है।"
(हदीस: Sunan Ibn Majah, 1936)
निष्कर्ष (सारांश):
क़ुरआन में हलाला का असल नियम बताया गया है, लेकिन जबरदस्ती या दिखावटी हलाला हराम है।
हलाला सिर्फ तभी माना जाएगा जब दूसरा निकाह स्वाभाविक, ईमानदारी से किया जाए, और फिर अगर वह खत्म हो जाए तो पहला शौहर फिर निकाह कर सकता है।
क़ुरआन में "काफ़िर को क़त्ल" के बारे में क्या कहा गया है?
1. क़ुरआन किसी को केवल "काफ़िर" होने पर क़त्ल करने की इजाज़त नहीं देता।
"काफ़िर" शब्द का मतलब है — जो ईमान नहीं लाता। लेकिन क़ुरआन में साफ़ हिदायत है कि"धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है।" (सूरह अल-बक़रा 2:256)
2. लड़ाई की इजाज़त केवल उसी हालात में है जब दुश्मन पहले हमला करे या मुसलमानों को उनके घरों से निकाले। "और उनसे लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं, मगर हद से आगे न बढ़ो। निस्संदेह, अल्लाह हद से बढ़ने वालों को पसंद नहीं करता।" (सूरह अल-बक़रा 2:190)
3. अगर दुश्मन सुलह (शांति) की तरफ़ झुके, तो मुसलमान को भी शांति कबूल करनी है। (सूरह अल-अन्फ़ाल 8:61)
नतीजा: क़ुरआन में कहीं भी यह नहीं लिखा कि सिर्फ़ काफ़िर होने की वजह से किसी को क़त्ल करो। बल्कि क़ुरआन की असल शिक्षा है — इंसाफ़, रहमत, और शांति। लड़ाई सिर्फ़ उस वक़्त है जब दुश्मन खुद पहले हमला करे या मुसलमानों को सताए।
हिंदुस्तान में इस्लाम का आगमन मुगलों के आने से बहुत पहले हो चुका था। यहाँ इस्लाम के आगमन और इसके इतिहास के बारे में आपके सवालों के जवाब हिंदी में दिए जा रहे हैं:क्या हिंदुस्तान में इस्लाम मुगलों के आने के बाद आया या उससे पहले?
इस्लाम हिंदुस्तान में मुगलों (1526 ईस्वी में बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना) के आने से कई शताब्दियों पहले आ चुका था। मुगलों के आगमन से इस्लाम का प्रभाव और विस्तार जरूर बढ़ा, लेकिन इसका प्रवेश पहले ही हो चुका था।अगर इस्लाम मुगलों से पहले आया था, तो कब आया था?
इस्लाम का हिंदुस्तान में सबसे पहला आगमन 7वीं और 8वीं शताब्दी में हुआ। इसे दो मुख्य चरणों में समझा जा सकता है:7वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों के माध्यम से: इस्लाम के उदय (622 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद द्वारा मदीना में इस्लाम की स्थापना) के कुछ दशकों बाद, अरब व्यापारी भारत के पश्चिमी तट, खासकर मालाबार (केरल) और गुजरात के तटों पर व्यापार के लिए आने लगे। 636 ईस्वी के आसपास अरब व्यापारियों ने भारत के दक्षिण-पश्चिमी तटों पर संपर्क स्थापित किया। केरल के मालाबार क्षेत्र में 629 ईस्वी में चेरामन पेरुमल मस्जिद (Cheraman Perumal Masjid) बनाई गई, जिसे भारत की पहली मस्जिद माना जाता है। यह मस्जिद पैगंबर मुहम्मद के समय में या उनके तुरंत बाद बनी थी।8वीं शताब्दी में सैन्य अभियानों के माध्यम से: 711-712 ईस्वी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध (आधुनिक पाकिस्तान का हिस्सा) पर हमला किया और इसे उमय्यद खलीफा के अधीन कर लिया। यह इस्लाम का भारत में पहला सैन्य प्रवेश था। इस दौरान सिंध में इस्लाम का प्रसार शुरू हुआ।किसके वक्त में इस्लाम हिंदुस्तान में आया?अरब व्यापारियों के समय: 7वीं शताब्दी में इस्लाम का प्रसार व्यापारियों और सूफी संतों के माध्यम से हुआ। उस समय भारत में विभिन्न राजवंश सत्ता में थे, जैसे दक्षिण में चेर वंश (केरल), पश्चिम में गुर्जर-प्रतिहार, और उत्तर में हर्षवर्धन का शासन (606-647 ईस्वी)।मुहम्मद बिन कासिम के समय: 711-712 ईस्वी में जब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर विजय प्राप्त की, तब सिंध में राजा दाहिर (चच वंश) का शासन था। इस समय उमय्यद खलीफा वलीद प्रथम (705-715 ईस्वी) के अधीन अरब साम्राज्य था।बाद में, 10वीं-11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी (998-1030 ईस्वी) और 12वीं शताब्दी में मुहम्मद गोरी (1173-1206 ईस्वी) के हमलों से इस्लाम का प्रभाव उत्तर भारत में बढ़ा।इस्लाम का प्रसार कैसे हुआ?व्यापार: अरब और फारसी व्यापारियों ने दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में इस्लाम का प्रचार किया। स्थानीय लोग व्यापार और विवाह के माध्यम से इस्लाम को अपनाने लगे।सूफी संत: सूफी संतों जैसे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर), निजामुद्दीन औलिया (दिल्ली), और हजरत अली (हाजी अली, मुंबई) ने इस्लाम के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी शिक्षाएँ और समावेशी दृष्टिकोण ने लोगों को आकर्षित किया।सैन्य विजय: सिंध की विजय के बाद, गजनवी, गोरी, और बाद में दिल्ली सल्तनत (1206-1526 ईस्वी) ने इस्लाम को राजनैतिक संरक्षण दिया।स्थानीय लोगों का धर्मांतरण: कुछ लोग स्वेच्छा से, कुछ आर्थिक कारणों से (जैसे जजिया कर से बचने के लिए), और कुछ सैन्य दबाव में इस्लाम अपनाने लगे।सारांश:
हिंदुस्तान में इस्लाम का आगमन मुगलों से बहुत पहले, 7वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों और 8वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम के माध्यम से हुआ। यह व्यापार, सूफी संतों, और सैन्य विजयों के जरिए फैला। मुगलों (16वीं शताब्दी) के आने से पहले ही इस्लाम भारत में जड़ें जमा चुका था, खासकर सिंध, गुजरात, और दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में।
इस्लाम हिंदुस्तान में मुगलों (1526 ईस्वी में बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना) के आने से कई शताब्दियों पहले आ चुका था। मुगलों के आगमन से इस्लाम का प्रभाव और विस्तार जरूर बढ़ा, लेकिन इसका प्रवेश पहले ही हो चुका था।अगर इस्लाम मुगलों से पहले आया था, तो कब आया था?
इस्लाम का हिंदुस्तान में सबसे पहला आगमन 7वीं और 8वीं शताब्दी में हुआ। इसे दो मुख्य चरणों में समझा जा सकता है:7वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों के माध्यम से: इस्लाम के उदय (622 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद द्वारा मदीना में इस्लाम की स्थापना) के कुछ दशकों बाद, अरब व्यापारी भारत के पश्चिमी तट, खासकर मालाबार (केरल) और गुजरात के तटों पर व्यापार के लिए आने लगे। 636 ईस्वी के आसपास अरब व्यापारियों ने भारत के दक्षिण-पश्चिमी तटों पर संपर्क स्थापित किया। केरल के मालाबार क्षेत्र में 629 ईस्वी में चेरामन पेरुमल मस्जिद (Cheraman Perumal Masjid) बनाई गई, जिसे भारत की पहली मस्जिद माना जाता है। यह मस्जिद पैगंबर मुहम्मद के समय में या उनके तुरंत बाद बनी थी।8वीं शताब्दी में सैन्य अभियानों के माध्यम से: 711-712 ईस्वी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध (आधुनिक पाकिस्तान का हिस्सा) पर हमला किया और इसे उमय्यद खलीफा के अधीन कर लिया। यह इस्लाम का भारत में पहला सैन्य प्रवेश था। इस दौरान सिंध में इस्लाम का प्रसार शुरू हुआ।किसके वक्त में इस्लाम हिंदुस्तान में आया?अरब व्यापारियों के समय: 7वीं शताब्दी में इस्लाम का प्रसार व्यापारियों और सूफी संतों के माध्यम से हुआ। उस समय भारत में विभिन्न राजवंश सत्ता में थे, जैसे दक्षिण में चेर वंश (केरल), पश्चिम में गुर्जर-प्रतिहार, और उत्तर में हर्षवर्धन का शासन (606-647 ईस्वी)।मुहम्मद बिन कासिम के समय: 711-712 ईस्वी में जब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर विजय प्राप्त की, तब सिंध में राजा दाहिर (चच वंश) का शासन था। इस समय उमय्यद खलीफा वलीद प्रथम (705-715 ईस्वी) के अधीन अरब साम्राज्य था।बाद में, 10वीं-11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी (998-1030 ईस्वी) और 12वीं शताब्दी में मुहम्मद गोरी (1173-1206 ईस्वी) के हमलों से इस्लाम का प्रभाव उत्तर भारत में बढ़ा।इस्लाम का प्रसार कैसे हुआ?व्यापार: अरब और फारसी व्यापारियों ने दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में इस्लाम का प्रचार किया। स्थानीय लोग व्यापार और विवाह के माध्यम से इस्लाम को अपनाने लगे।सूफी संत: सूफी संतों जैसे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर), निजामुद्दीन औलिया (दिल्ली), और हजरत अली (हाजी अली, मुंबई) ने इस्लाम के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी शिक्षाएँ और समावेशी दृष्टिकोण ने लोगों को आकर्षित किया।सैन्य विजय: सिंध की विजय के बाद, गजनवी, गोरी, और बाद में दिल्ली सल्तनत (1206-1526 ईस्वी) ने इस्लाम को राजनैतिक संरक्षण दिया।स्थानीय लोगों का धर्मांतरण: कुछ लोग स्वेच्छा से, कुछ आर्थिक कारणों से (जैसे जजिया कर से बचने के लिए), और कुछ सैन्य दबाव में इस्लाम अपनाने लगे।सारांश:
हिंदुस्तान में इस्लाम का आगमन मुगलों से बहुत पहले, 7वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों और 8वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम के माध्यम से हुआ। यह व्यापार, सूफी संतों, और सैन्य विजयों के जरिए फैला। मुगलों (16वीं शताब्दी) के आने से पहले ही इस्लाम भारत में जड़ें जमा चुका था, खासकर सिंध, गुजरात, और दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में।
इस्लाम में कुरान में कुल 25 पैगंबरों (अलैहिस्सलाम) का नाम लिया गया है। इनका क्रम आमतौर पर कालानुक्रमिक (chronological order) या पैगंबरों की कहानियों के अनुसार रखा जाता है, जो सबसे पहले पैगंबर से शुरू होकर अंतिम पैगंबर तक जाता है।
यहाँ इनके नाम सीरियल वाइज (क्रमानुसार) दिए गए हैं:
1. हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम)
2. हज़रत इदरीस (अलैहिस्सलाम)
3. हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम)
4. हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम)
5. हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम)
6. हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम)
7. हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम)
8. हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम)
9. हज़रत इस्हाक (अलैहिस्सलाम)
10. हज़रत याकूब (अलैहिस्सलाम)
11. हज़रत यूसुफ (अलैहिस्सलाम)
12. हज़रत शुऐब (अलैहिस्सलाम)
13. हज़रत अय्यूब (अलैहिस्सलाम)
14. हज़रत ज़ुल-किफ़्ल (अलैहिस्सलाम)
15. हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम)
16. हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम)
17. हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम)
18. हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम)
19. हज़रत इलियास (अलैहिस्सलाम)
20. हज़रत अल-यासा (अलैहिस्सलाम)
21. हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम)
22. हज़रत ज़करीया (अलैहिस्सलाम)
23. हज़रत याह्या (अलैहिस्सलाम)
24. हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम)
25. हज़रत मुहम्मद ﷺ (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
नोट:
- ये 25 पैगंबर कुरान में नाम से उल्लिखित हैं। इस्लाम में कुल 1,24,000 पैगंबरों का विश्वास है, लेकिन इन 25 का नाम कुरान में स्पष्ट रूप से आया है।
- अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ हैं, जिन्हें खातम-उन-नबिय्यीन (पैगंबरों का मुहर) कहा जाता है।
अल्लाह तआला ने फरिश्तों से फरमाया:
“मैं ज़मीन में अपना ख़लीफ़ा (प्रतिनिधि) बनाने वाला हूँ।”
फरिश्तों ने अर्ज किया, “क्या आप वहाँ उनको रखेंगे जो फ़साद फैलाएंगे और ख़ून बहाएंगे?”
अल्लाह ने फरमाया: “मैं वो जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।” (सूरह अल-बकरा: ३०)
अल्लाह ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को ज़मीन की विभिन्न मिट्टियों (लाल, सफेद, काली) से बनाया। हदीस में है कि उनकी कद-काठी ६० हाथ (लगभग ३० मीटर) थी। अल्लाह ने उनमें अपनी रूह फूंकी। वे ज़िंदा हुए और सबसे पहले “अल्हम्दुलिल्लाह” कहा।
अल्लाह ने उन्हें सभी चीजों के नाम सिखाए। फिर फरिश्तों को हुक्म दिया: “आदम को सजदा करो।” सब फरिश्तों ने सजदा किया, लेकिन इब्लीस (शैतान) ने इनकार कर दिया और कहा, “मैं उससे बेहतर हूँ, तूने मुझे आग से बनाया और उसे मिट्टी से।”
यह तकब्बुर (घमंड) था। अल्लाह ने इब्लीस को लानत की और जन्नत से निकाल दिया। इब्लीस इंसानों का खुला दुश्मन बन गया।
सबक: इल्म इंसान को फरिश्तों से भी ऊंचा बनाता है। घमंड सबसे बड़ा गुनाह है।
“मैं ज़मीन में अपना ख़लीफ़ा (प्रतिनिधि) बनाने वाला हूँ।”
फरिश्तों ने अर्ज किया, “क्या आप वहाँ उनको रखेंगे जो फ़साद फैलाएंगे और ख़ून बहाएंगे?”
अल्लाह ने फरमाया: “मैं वो जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।” (सूरह अल-बकरा: ३०)
अल्लाह ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को ज़मीन की विभिन्न मिट्टियों (लाल, सफेद, काली) से बनाया। हदीस में है कि उनकी कद-काठी ६० हाथ (लगभग ३० मीटर) थी। अल्लाह ने उनमें अपनी रूह फूंकी। वे ज़िंदा हुए और सबसे पहले “अल्हम्दुलिल्लाह” कहा।
अल्लाह ने उन्हें सभी चीजों के नाम सिखाए। फिर फरिश्तों को हुक्म दिया: “आदम को सजदा करो।” सब फरिश्तों ने सजदा किया, लेकिन इब्लीस (शैतान) ने इनकार कर दिया और कहा, “मैं उससे बेहतर हूँ, तूने मुझे आग से बनाया और उसे मिट्टी से।”
यह तकब्बुर (घमंड) था। अल्लाह ने इब्लीस को लानत की और जन्नत से निकाल दिया। इब्लीस इंसानों का खुला दुश्मन बन गया।
सबक: इल्म इंसान को फरिश्तों से भी ऊंचा बनाता है। घमंड सबसे बड़ा गुनाह है।
अल्लाह ने हज़रत आदम को जन्नत में रखा। उनकी बाईं पसली से हज़रत हव्वा अलैहिस्सलाम को पैदा किया। दोनों जन्नत में रहते थे और अल्लाह की नेमतों का लुत्फ उठाते थे।
अल्लाह ने एक पेड़ से फल खाने से मना किया: “इसके पास न जाना, वरना ज़ालिमों में से हो जाओगे।”
इब्लीस ने दोनों को धोखा दिया। उसने कसम खाई कि “मैं तुम्हारा खैरख्वाह हूँ। तुम्हारा रब तुम्हें इस पेड़ से इसलिए रोका है ताकि तुम फरिश्ते न बन जाओ या हमेशा जिंदा न रहो।”
दोनों ने भूल से फल खा लिया। तुरंत उनके जन्नती कपड़े उतर गए। उन्होंने पत्तों से अपनी शर्म ढकी।
अल्लाह ने पुकारा। उन्होंने तुरंत तौबा की:
“रब्बना ज़लमना अनफुसना व इन लम तग़फिर लना व तरहमना लनकूनन्न मिनल ख़ासिरीन”
(ऐ हमारे रब! हमने अपने ऊपर ज़ुल्म किया। अगर तू हमें माफ़ न करे और रहम न फरमाए तो हम घाटे में पड़ने वालों में से हो जाएंगे।)
अल्लाह ने उनकी सच्ची तौबा क़बूल फरमा ली।
सबक: गलती इंसान से होती है, लेकिन सच्ची तौबा अल्लाह की रहमत को खोल देती है। शैतान का फुसलावा हमेशा सावधानी से देखें।
अल्लाह ने एक पेड़ से फल खाने से मना किया: “इसके पास न जाना, वरना ज़ालिमों में से हो जाओगे।”
इब्लीस ने दोनों को धोखा दिया। उसने कसम खाई कि “मैं तुम्हारा खैरख्वाह हूँ। तुम्हारा रब तुम्हें इस पेड़ से इसलिए रोका है ताकि तुम फरिश्ते न बन जाओ या हमेशा जिंदा न रहो।”
दोनों ने भूल से फल खा लिया। तुरंत उनके जन्नती कपड़े उतर गए। उन्होंने पत्तों से अपनी शर्म ढकी।
अल्लाह ने पुकारा। उन्होंने तुरंत तौबा की:
“रब्बना ज़लमना अनफुसना व इन लम तग़फिर लना व तरहमना लनकूनन्न मिनल ख़ासिरीन”
(ऐ हमारे रब! हमने अपने ऊपर ज़ुल्म किया। अगर तू हमें माफ़ न करे और रहम न फरमाए तो हम घाटे में पड़ने वालों में से हो जाएंगे।)
अल्लाह ने उनकी सच्ची तौबा क़बूल फरमा ली।
सबक: गलती इंसान से होती है, लेकिन सच्ची तौबा अल्लाह की रहमत को खोल देती है। शैतान का फुसलावा हमेशा सावधानी से देखें।
अल्लाह ने फरमाया: “तुम सब एक-दूसरे के दुश्मन होकर ज़मीन पर उतरो। ज़मीन पर तुम्हारा ठिकाना और एक मुद्दत तक गुज़ारा है।”
हज़रत आदम और हव्वा को अलग-अलग जगहों पर उतारा गया (कुछ रिवायतों में आदम भारत/श्रीलंका क्षेत्र में और हव्वा जद्दा में)। बाद में वे मिले।
ज़मीन पर जीवन मेहनत का था। अल्लाह ने उन्हें नबुव्वत दी। वे अपनी औलाद को तौहीद (एक अल्लाह की इबादत), नैतिकता और शैतान से बचने की तालीम देते रहे।
उनकी औलाद में क़ाबिल और हाबिल मशहूर हैं। हाबिल की कुर्बानी क़बूल हुई, क़ाबिल ने जलन में हाबिल को क़त्ल कर दिया – दुनिया का पहला खून।
हज़रत आदम ने लगभग ९३०-१००० साल जिए और अपनी औलाद को वसीयत की: “अल्लाह से डरो, शैतान से बचो और इंसाफ से रहो।”
मुख्य सबक:
* इल्म की अहमियत
* तकब्बुर (घमंड) से बचना
* शैतान दुश्मन है
* तौबा की ताकत
* इंसान ज़मीन का ख़लीफ़ा है
* फ़साद नहीं, सुधार करना है
* अल्लाह की रहमत अपार है
अगर पसंद आए तो ❤️ करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब रखें। जज़ाकल्लाहु खैरा!
हज़रत आदम और हव्वा को अलग-अलग जगहों पर उतारा गया (कुछ रिवायतों में आदम भारत/श्रीलंका क्षेत्र में और हव्वा जद्दा में)। बाद में वे मिले।
ज़मीन पर जीवन मेहनत का था। अल्लाह ने उन्हें नबुव्वत दी। वे अपनी औलाद को तौहीद (एक अल्लाह की इबादत), नैतिकता और शैतान से बचने की तालीम देते रहे।
उनकी औलाद में क़ाबिल और हाबिल मशहूर हैं। हाबिल की कुर्बानी क़बूल हुई, क़ाबिल ने जलन में हाबिल को क़त्ल कर दिया – दुनिया का पहला खून।
हज़रत आदम ने लगभग ९३०-१००० साल जिए और अपनी औलाद को वसीयत की: “अल्लाह से डरो, शैतान से बचो और इंसाफ से रहो।”
मुख्य सबक:
* इल्म की अहमियत
* तकब्बुर (घमंड) से बचना
* शैतान दुश्मन है
* तौबा की ताकत
* इंसान ज़मीन का ख़लीफ़ा है
* फ़साद नहीं, सुधार करना है
* अल्लाह की रहमत अपार है
हम सब हज़रत आदम और हव्वा की औलाद हैं। एक ही परिवार। जाति-रंग का फ़र्क़ नहीं – सबको अल्लाह की इबादत और इंसाफ करना है।
अल्लाह हम सबको इन सबकों पर अमल करने की तौफीक़ दे। आमीन।
📖 कुरान: सूरह अल-बकरा ३०-३९, सूरह अल-आराफ ११-२५
हदीस: बुखारी, तिर्मिज़ी
अगर पसंद आए तो ❤️ करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब रखें। जज़ाकल्लाहु खैरा!