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Current Affairs । 08 August 2020 । English.pdf
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Current Affairs । 08 August 2020 । English.pdf
"क्यों आया नई शिक्षानीति में तक्षशिला का उल्लेख?"

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के ड्राफ्ट में सैकड़ों बार हमारे प्राचीन गौरवमय शिक्षाकेंद्र नालन्दा एवं तक्षशिला का उल्लेख आया। आइये आज तक्षशिला के उस गौरवमय स्वरूप को जानते हैं।

तक्षशिला विश्वविद्यालय महाभारत काल से ही प्रख्यात था। यहीं पर धौम्य ऋषि के शिष्य उपमन्यु, आरुणि और वेद ने शिक्षा प्राप्त की थी। भारतीय शिक्षा और संस्कृति का सुप्रसिद्ध केंद्र तक्षशिला भारत के उत्तर पश्चिमी छोर पर गांधार प्रदेश की गौरवशालिनी राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित थी। लगभग 1000 वर्षों तक तक्षशिला की ख्याति देश-विदेश में व्याप्त रही और सुदूर प्रदेशों के सैकड़ों विद्यार्थी प्रतिवर्ष तक्षशिला के शिक्षा शिविरों में प्रविष्ट होते रहते थे।

घने जंगलों, दुर्दम्य पहाड़ों, हिंसक जंतुओं, वर्षा, धूप, बिजली, बवंडर, आंधी-तूफान की परवाह न कर चंपा, मगध, कौशल आदि दूरस्थ प्रांतों के उदीयमान छात्र इस ज्ञान कुंज की ओर सतत आकृष्ट होते रहते थे।

जातकों में ऐसे पिपासु छात्रों की यात्राओं की अनेक कथाएं भरी हैं। भारत के अतिरिक्त मध्य एशिया, अफगानिस्तान, यूनान, सीरिया, फारस आदि देशों से भी बहुसंख्यक विद्यार्थी विशेषत: विज्ञान की शिक्षा के लिए तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण करते थे। सातवीं सदी ईस्वी पूर्व में ही तक्षशिला को शिक्षा केंद्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो गई थी। छठी सदी ईस्वी पूर्व में सुप्रसिद्ध व्याकरण पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी के स्वप्न यहीं देखे थे। कुछ दिन बाद मौर्य साम्राज्य के महात्म्य तथा अर्थशास्त्र के सुप्रसिद्ध लेखक चाणक्य ने भी अर्थशास्त्र के प्रारंभिक पाठ्य यहीं ग्रहण किए थे। बुद्ध के समसामयिक राजगृह के सुप्रसिद्ध वैद्य जीवक ने ओषधिशास्त्र की शिक्षा यहीं प्राप्त की थी।

अपने वैभव के लम्बे इतिहास में तक्षशिला को कई बार दुर्दिन भी देखने पड़े। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण तक्षशिला को स्वभावत: विदेशी आक्रांताओं के निर्मम प्रहार सहने पड़े। ई. पूर्व छठी शताब्दी में पारसियों के द्वारा, ईसवी पूर्व दूसरी शताब्दी में भारतीय यूनानियों के द्वारा, ईसवी पूर्व प्रथम शताब्दी में शकों के द्वारा तथा कुषाणों के द्वारा यह क्रमशः अधिकृत हुई।

आक्रमणों तथा विदेशी प्रभुत्व में तक्षशिला की क्या दुर्दशा हुई होगी यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। इसके खंडहरों की खुदाई से यह स्पष्ट है कि विद्वानों की यह नगरी अनेक बार उजड़ी तथा बसी। आक्रमण की पाशविक बर्बरता में स्वभावतः यह विध्वंश कर दी जाती होगी तथा राज्य स्थापना के पश्चात यह पुनः विजेताओं के द्वारा बसाई जाती होगी। खंडहरों के पर्यवेक्षण से यही निष्कर्ष निकलता है।

ऐसे संकट काल में तक्षशिला के शिक्षा केंद्र कुछ समय तक अवश्य ही विश्रृंखल हो जाते थे, किंतु नगरी के पुनरुत्थान के पश्चात फिर यह नई ज्योति से जगमग होने लगते थे। यहां के शिक्षालयों का गौरव को इतना महान था कि लगातार भूचाल के पश्चात भी ये मिट नहीं सके, न मिटाये जा सके। हां, इनके स्वरूप में कुछ परिवर्तन अवश्य हुए जोकि अवश्यंभावी थे।

फारसी संसर्ग तथा आधिपत्य के कारण भारत की राष्ट्रीय लिपि 'ब्राह्मी' तक्षशिला से निष्कासित हुई। भारतीय यूनानियों के लगभग सवा 100 वर्ष के लंबे आधिपत्य में तक्षशिला के पाठ्य विषय तथा कार्यक्रम दोनों में ही यथेष्ट रूपांतर हुए। दो सुसमृद्ध सभ्यताओं के सम्मिलन में पारस्परिक आदान-प्रदान अपेक्षित ही था। तक्षशिला के शिक्षा केंद्रों में ग्रीक भाषा की शिक्षा दीक्षा होने लगी तथा यूनानी लेखक एवं दार्शनिक सम्मानित होने लगे। राज्य भाषा होने के कारण यूनानी भाषा का व्यावहारिक महत्व था। इस तथ्य से तक्षशिला के शिक्षालय स्वभावत: विमुख नहीं रह सकते थे।

इनके छात्रों में ऐसे भी थे जो कि उन्होंने राज्य में उच्च पदों की आकांक्षा रखते थे। इनकी आवश्यकता की पूर्ति भी शिक्षा केंद्रों को करनी थी। यूनानी कला कौशल भी तक्षशिला में संभवतः सिखाये जाने लगे थे। यहां के पाठ्य विषयों के 18 शिल्पों में यूनानी शिल्पकला भी सम्मिलित थी। किंतु तक्षशिला का रंग रूप अधिकतर भारतीय ही रहा। अपनी मूल मातृभूमि से भारतीय यूनानी लगभग विच्छिन्न से हो गए थे और फलत: उनकी सभ्यता और संस्कृति यूनान की अपेक्षा भारत से ही अधिक प्रभावित रही।

इस प्रकार तक्षशिला में यूनानी प्रभाव विशेष ना पड़ सका। शकों तथा कुषाणों के पास कुछ ऐसी संस्कृति की बातें न थी जिन्हें तक्षशिला को सीखना होता। संस्कृति क्षेत्र में इन्होंने भारत की अधीनता ही स्वीकार की और इसलिए तक्षशिला के आंतरिक स्वरूप में इन विजेताओं के कारण कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन लक्षित ना हुआ।

तक्षशिला की कीर्ति का श्रेय उसकी संस्था को ना था बल्कि तक्षशिला के उन शिक्षकों को था जिनके पांडित्य का यश देश विदेश में था। ये शिक्षक किसी एक विषय अथवा विषय समूह के पूर्ण ज्ञाता तथा विशेषज्ञ होते थे। अपन
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े विषय की उच्च शिक्षा यह स्वतंत्र रूप से अपने निवास स्थान पर ही संचालित करते थे। इस प्रकार तक्षशिला में अनेक ऐसे गुरुकुल अथवा विद्यालय थे जहां विषय विशेष की उच्च तथा विशेष शिक्षा प्रदान की जाती थी। ये विद्यालय अपने अपने विशेषज्ञ शिक्षक के द्वारा आयोजित तथा व्यवस्थित रहते थे। ये किसी संस्था विशेष से संयोजित संचालित या स्वीकृत नहीं थे। इस प्रकार तक्षशिला विश्वविद्यालय न था बल्कि एक शिक्षा केंद्र था, जहां तत्कालीन सभी विषयों की उच्चतम शिक्षा दी जाती थी। तक्षशिला के खंडहरों में एक भी ऐसा लंबा चौड़ा कमरा अभी तक नहीं मिला है जो कि विश्वविद्यालय के छात्रों के व्याख्यान के लिए उपयुक्त था। यह स्पष्ट है कि तक्षशिला की शिक्षा वैयक्तिक रूप में वहां के शिक्षकों के द्वारा ही संचालित रहती थी। जातकों के अनुसार तक्षशिला के सुविख्यात शिक्षकों के पास 500 विद्यार्थी एकत्र रहते थे। श्री अलतेकर की मान्यता में छात्रों द्वारा वर्णित यह संख्या अतिशयोक्ति है तथा एक शिक्षक के संरक्षण में 20 से अधिक छात्र नहीं रहते थे। किंतु यह युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विशेषज्ञ के पास 20 ही छात्र देश विदेश में पढ़ने आते होंगे। अतः यह भी अनुमान किया जा सकता है कि परम प्रसिद्ध शिक्षकों के पास 500 या उसके लगभग शिक्षार्थी रहते होंगे।

इतनी बड़ी संख्या की शिक्षा तथा देखरेख एक व्यक्ति के द्वारा असंभव थी। यह बहुत संभव है कि एक सुप्रसिद्ध शिक्षक के कई सहायक होते होंगे तथा उसके अनुभव एवं सुयोग्य विद्यार्थी भी उसकी सहायता किया करते होंगे। प्राचीन भारत में तो यह पद्धति पूर्णता प्रचलित थी। अतः जातकों के उपर्युक्त कथन सर्वथा असत्य नहीं जान पड़ते। स्वयं अलतेकर ने सुतसोम जातक में वर्णित 103 राजकुमारों का एक शिक्षक के अंतर्गत धनुर्विद्या सीखना संभव माना है। यह शिक्षक भी उनकी सम्मति में कई सहायकों के द्वारा सम्बलित था। स्पष्ट यह बात 130 से अधिक छात्रों के लिए भी लागू हो सकती थी।

तक्षशिला का परवर्ती इतिहास पूर्णतया ज्ञात नहीं। संभव है यह कुषाण वंश के अंत तक क्रियाशील रही। कुषाणों के उत्तराधिकारी जंगली थे। उनके राजत्व काल में तक्षशिला की दशा अवश्य ही काफी गिर गई थी। पांचवी सदी के प्रारंभ में प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने तक्षशिला में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं पाया। स्पष्ट है तक्षशिला के शिक्षालय मृतप्राय हो गए होंगे। पांचवी शताब्दी ई. के प्रारम्भ में हूणों का आक्रमण हुआ। तक्षशिला की बची खुची गुरुता सर्वदा के लिए विलुप्त हो गयी। ह्वेनसांग को यहाँ के निकट विहारों के भग्नावशेष के अतिरिक्त कुछ देखने को नहीं मिला था।

अगले लेख में नालन्दा विश्वविद्यालय का सम्पूर्ण चित्रण.....

स्रोत पुस्तक: 1. भारतीय शिक्षा के मूल तत्व।

2. प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति।

✒️अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
"कैसा स्वरूप था भारत के सबसे महान प्राचीन शिक्षाकेंद्र नालन्दा का?"

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के ड्राफ्ट में नालन्दा और तक्षशिला का इतस्ततः जिक्र इन केंद्रों के बारे में अधिक जानने की हमारी जिज्ञासा को बढ़ा देता है। आइये जानते है प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय के गौरवमयी स्वरूप को।

वर्तमान बिहार राज्य में राजगीर से 7 मील उत्तर में स्थित प्राचीन नालंदा विहार किसी समय एक विश्वविख्यात विश्वविद्यालय हुआ करता था। नालंदा ग्राम महावीर तथा बुद्ध दोनों को प्रिय था। जैन धर्मग्रंथों के अनुसार महावीर ने यहां 14 वर्ष वर्षाऋतु में व्यतीत किए थे। स्वयं भगवान बुद्ध ने नालंदा के वन में रहकर कई बार धर्म का उपदेश दिया था। नालंदा बिहार का संस्थापक सम्राट अशोक को कहां जा सकता है किंतु एक शिक्षा संस्था के रूप में नालंदा का उद्भव तीसरी शताब्दी बाद हुआ। सुदूर दक्षिण से नागार्जुन तथा उनके शिष्य आर्यदेव क्रमशः 300 तथा 330 ईसवी के लगभग यहां अध्ययन अध्यापन के निमित्त आए थे। चीनी यात्री फाह्यान ने नालंदा के दर्शन 410 ईसवी में किए। संभवत उस समय यह ब्राह्मण शिक्षा केंद्र होने के कारण फाहियान ने इसके बारे में ज्यादा नहीं लिखा। ह्वेनसांग (629-645) के समय में भारत का सबसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र था। ह्वेनसांग के अनुसार नालंदा बिहार की भूमि 500 व्यापारियों ने 10 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के मूल्य पर खरीद कर बुद्ध को समर्पित की थी। गुप्त सम्राटों ने भी नालंदा की समृद्धि में अपना योगदान दिया था।

खंडहरों की खुदाई से स्पष्ट है कि नालंदा विश्वविद्यालय के भवन तथा विश्राम आधार आदि लगभग 1 मील लंबे तथा आधा मील चौड़े एक समतल तथा सुरंग में भूखंड पर स्थित थे कुछ छोटे परिमाण के 300 अलग-अलग कमरे थे जिनमें व्याख्यान दिए जाते थे। परिसर में नीलकमल से शोभायमान तालाब भी थे और चारों तरफ चारदीवारी थी।

नालंदा की शिक्षा सर्वथा नि:शुल्क थी। विद्यार्थियों के भोजन वस्त्र तथा औषधि का प्रबंध भी विश्वविद्यालय की ओर से ही होता था। लगभग 10000 विद्यार्थी यहां पर अध्ययनरत रहते थे। चीन कोरिया तिब्बत मंगोलिया तथा अन्य देशों से परम ज्ञान की प्राप्ति के इच्छुक छात्र यहां आया करते थे। ह्वेनसांग के अनुसार यहां पर द्वार प्रवेश परीक्षा में केवल 20% परीक्षार्थी उत्तीर्ण होते थे उन्हें ही विश्वविद्यालय में प्रवेश की अनुमति मिलती थी।

ह्वेनसांग के समय यहाँ आचार्यों की संख्या 1410 थी। ह्वेनसांग स्वयं यहाँ के 10 श्रेष्ठ आचार्यों में गिने जाते थे। शीलभद्र विश्वविद्यालय के प्रधान थे। यहां केवल बौद्ध साहित्य का ही ज्ञान नहीं दिया जाता था बल्कि हर विषय और दर्शन तथा भौतिक विषयों की जानकारी गहनता से दी जाती थी। नालन्दा को 200 दिए हुए थे। जिससे उसका खर्चा चलता था।

उस समय अध्ययन अध्यापन के 3 तरीके थे प्रथम पुस्तकों से पढ़ना द्वितीय आचार्य के साथ संवाद या प्रश्नोत्तर करना तृतीय शास्त्रार्थ करना। शिक्षक और शिक्षित का पारस्परिक व्यवहार इतना स्निग्ध था कि विश्वविद्यालय के 700 वर्ष के इतिहास में एक भी दृष्टांत ऐसा नहीं मिलता जिसमें छात्रों की ओर से शिक्षकों के प्रति किसी प्रकार की अवज्ञा तथा अवहेलना हुई हो।

विश्वविद्यालय में एक संपन्न सुसज्जित पुस्तकालय था, जिस भाग में पुस्तकालय स्थित था वह धर्मगंज के नाम से प्रसिद्ध था। पुस्तकालय के लिए तीन बड़े भवन अलग-अलग किए हुए थे जो कि रत्नसागर रत्नोदधि तथा रत्नरंजक के नाम से विख्यात थे और ये 9 मंजिल के थे। तीनों पुस्तकालयों में नौ लाख पुस्तकें थी। आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगा दी उसका पुस्तकालय छह माह तक चलता रहा।

उपयुक्त स्रोत के अभाव में उस महान शिक्षा व्यवस्था के बारे में हम कम ही जान पाये है लेकिन नई शिक्षा व्यवस्था में इन शिक्षा केंद्रों का कुछ अंश भी आ गया तो कल्याण है।

✒️अर्जुन सिंह साँखला, प्राचार्य, लक्की इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
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"सजा-ए-काला पानी"

देश को आजाद देखने वाले उन वीरों को भारत के अलग अलग भागों से सुदूर समुंद्र में जब अंडमान एवं निकोबार द्वीप के पोर्ट ब्लेयर स्थित सेलुलर जेल में जहाज़ से ले जाया जाता था तो वे भारत के वीर लड़ाके अन्तिम बार जी भर के अपनी मातृभूमि को आंखों से ओझल होने तक निहारते रहते थे।

1857 की क्रान्ति के बाद अंग्रेजों के खिलाफ उठने वाले स्वर बुलंद होने लगे। उस समय पोर्ट ब्लेयर लगभग एक निर्जन द्वीप था, वहाँ कोई जेल नहीं बनी थी। भारत और बर्मा से कैदियों को वहाँ ले जाया जाने लगा। वहाँ यातनाओं और मलेरिया जैसे कई रोगों से ग्रस्त होकर अधिकांश कैदी शहीद हो जाते थे।

1889 के बाद एक जेल की जरूरत वहाँ अनुभव की गई। अंग्रेज अफसर ल्याल और लेथब्रिज के निर्देशन में साईकल के पहिये में लगे अरचक्रों की भांति जेल के सात विंग्स बनाये गए। प्रत्येक विंग तीन मंजिल की थी। 1896 में निर्माण शुरू हुआ एवं 1906 में जेल का निर्माण पूर्ण हुआ। कुल मिलाकर 696 छोटी कोठरिया बनाई गई जो आकार में बहुत छोटी थी। कहा जाता है कि कैदियों को पीने के लिए 2 कटोरी जल और नहाने के लिए 3 कटोरी जल रोजाना दिया जाता था। सूखी रोटियों को दिया जाता था तथा अमानवीय यंत्रणाएं उनको दी जाती थी। जेल की संरचना ऐसी थी कि एक कैदी दूसरे को कभी देख नहीं पाता था।

ऐसा माना जाता था कि उस जगह लगभग 80000 स्वतंत्रता सेनानियों को विभिन्न वर्षों में कैदी बनाया गया जिनमें नाम मात्र के लोग ही जिन्दा बचे। कुछ प्रमुख सेनानियों में बटुकेश्वर दत्त वीर सावरकर बंधु, सचिंद्रनाथ सान्याल, भाई परमानंद, सोहन सिंह, सुबोध राय त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती, फजले हक खैराबादी, योगेंद्र शुक्ला जैसे नाम गिनाए जा सकते हैं।

अमानवीय यातनाओं के चलते कई वीरों ने विद्रोह किया भागने की कोशिश भी की लेकिन मीलों मील फैले समुंद्र को पार करना उस जमाने में नामुमकिन था। भारत में स्वतंत्रता सेनानियों के लगातार विद्रोह के चलते तथा महात्मा गाँधी और रवींद्रनाथ टैगोर के प्रयासों से 1939 में जेल को खाली करवाया गया।

1942 में द्वीप पर जापान ने अपना कब्जा जमा लिया। आजाद हिंद फौज के सेनानी सुभाष चंद्र बोस ने भारत का झंडा वहाँ फहराया। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान द्वारा समर्पण किये जाने के पश्चात अंग्रेजों ने 7 अक्टूबर 1945 को अंग्रेजों ने पुनः द्वीप पर पुनः कब्जा जमा लिया।

आज वह गौरवशाली स्थल एक स्मारक के रूप में जाना जाता है। लेकिन आने वाली पीढ़ी को यह संदेश स्पष्ट जाना चाहिए कि उन काल कोठरियों में जिंदगी कुर्बान कर देने वाली हुतात्माओं को हमने उनके सपनों का भारत निर्मित कर परलोक में नेत्रभर खुशी के आँसू दिए है या नहीं?

✒️अर्जुन सिंह साँखला, प्राचार्य, लक्की इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।