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02_अप्रैल,_2020_दैनिक_सामयिकी_All_Exams.pdf
5.2 MB
02 अप्रैल, 2020 दैनिक सामयिकी (All Exams).pdf
आपने निर्मल सर को बना दिया ट्रेंडिंग गुरू 📣
🇮🇳 भारत को जानो 🇮🇳
कल की क्लास भी ट्रेंडिंग (Trending #11 ) में है।चार क्लास ली है अब तक व चारों की चारों क्लास ट्रेंडिंग में।आज भी YouTube के टॉप-50 विडियो में आपके भाई के 3 विडियो #Trending में चल रहे हैं,जो अत्यधिक दुर्लभ होता है।इतने स्नेह व विश्वास के लिए दिल की गहराईयों से आपका व खासतौर से आपके परिवारजनों का हार्दिक आभार।आपने तो हीरो बना दिया यार 😔🙏
- निर्मल गहलोत ‘उत्कर्ष’
Test-4.pdf
251 KB
Test-04 Answer Key Bharat Ko Jano Contest
"हमने ऐसे जीना उस खेजड़ी से सीखा है"

बाबा नागार्जुन की एक कविता की ये अग्रिम पंक्तियां मुझे बहुत प्यारी लगती है। हालांकि मेरी सलाह है कि एक बार आपको उनकी पूरी कविता पढ़नी चाहिए।

"जो नहीं हो सके पूर्ण काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम"

अभावों के दौर का वो बचपन याद करता हूँ तो रोमांचित हो जाता हूँ। जब हर घाव का ईलाज पेड़ की छाल के उस 'घासे' से हो जाता था। यहाँ तक कि पेट का दर्द भी 'घासे' को पानी में मिलाकर पिलाने से दूर होता था। भैंस के पास खड़े खड़े धारोष्ण दूध को हमने वर्षों तक पिया। गाँव के तालाबों पर मटमैले पानी को कई बार पालतू मवेशियों के साथ पिया था।

स्कूल में गुड़ रोटी का टिफ़िन भी बड़े नाज़ से 'आधी छुट्टी' में स्कूल के पीछे इमली के पेड़ के सबसे ऊँचे डालों पर बैठकर खाया है।
घर का सबसे बड़ा 'मिष्ठान्न' शक्कर का एक डिब्बा होता था जिसमें से चोरी करके शक्कर खाया करते थे।

दादी ने नीम के कई प्रयोगों से सैकड़ों मर्ज ठीक किये थे। खेजड़ी के खोखों, प्याज, लहसुन और 'दूध के बफारों' से कई बार कई रोगों का ईलाज हो जाया करता था। घाव पर बीड़ी पत्ता और आक का दूध लगाकर उसके ठीक हो जाने को लेकर शत प्रतिशत आश्वस्त हो जाते थे।
हर मौहल्ले में एक नस चटकाने वाले मामा, हड्डी ठीक करने वाली दादी, झाड़ा देने वाली 'भू', आँख से फूस निकालने वाले काका और 'गोला पेचुटी' ठीक करने वाली दादी होती थी।

अपने खेतों में खेजड़ी के नीचे सोते सोते कई बार सोचा है। ये भयंकर अकाल में भी सूखती क्यों नहीं है? बडेरों ने बताया "इसकी जड़ें पाताल लोक तक जाती है इसलिए यह कभी नहीं सूखती" हमने ऐसे पेड़ की छांव में अपने अस्तित्व को संभालना सीखा जो कभी हारता नहीं है। जिसकी जड़ों को इस दुनियां का कोई तूफान आज तक नहीं उखाड़ पाया।

हमने रेत के बवंडरों में किरकिरी को रोटी के साथ खाया है। हमने खुशियों की तलाश जो कुछ था उसी में किया। हमने खेत के धोरों पर उगाए धनिये और पुदीने की खुशबू में नशा ढूंढा है। छाछ पर भुरकाया जीरा हमारी सबसे बड़ी 'लक्ज़री' थी।

नहा कर धूप में शरीर सुखाते थे। रईसी ऐसी मानों सूरज को नौकर रखा हुआ हो। बिना खिलौने के 'पकङ्म्पकडायी' के खेलों ने इतना हँफ़ाया की आज भी स्पन्दित जीवन में उसकी ताजगी फेंफड़ों में महसूस होती है।

ऐसे जीवन से हमने जीवन को हृदय की कोमलता से कठोर बनाया है और शरीर की कठोरता से हृदय को कोमल रखा है।

जीवन के 14 वर्ष कठोरता से बिताने वाले भगवान राम के बारे में भवभूति की उत्तररामचरितम् में कहा गया है।

वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणाम् चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति।।

महापुरुषों के वज्र से भी कठोर तथा पुष्प से भी कोमल हृदयों को भला कौन जान सकता है।

ऐसे ही अलौकिक महापुरुष भगवान राम के प्राकट्य दिवस पर भावों की एक वन्दन माला मेरे मानस पर उतरे उनके चित्र को समर्पित।

लेखक

अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य,
लक्की इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
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NIRMAL SIR IS LIVE NOW..🎥
आज के इस लाइव सेशन में निर्मल सर Test-5 के सभी 50 प्रश्नों का विस्तृत हल बताएंगे और साथ ही ऑनलाइन Test-4 Live लॉटरी के माध्यम से 100 लकी विजेताओं की घोषणा भी करेंगे।
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उत्कर्ष द्वारा UTKARSH App पर आयोजित 𝗕𝗛𝗔𝗥𝗔𝗧 𝗞𝗢 𝗝𝗔𝗔𝗡𝗢 प्रतियोगिता के Test-4( 01.04.2020 ) के सभी भाग्यशाली विजेताओं को उत्कर्ष परिवार की ओर से बधाई और उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं💐


Test-4 के 100 lucky Winners की सूची 👇🏻
03_अप्रैल,_2020_दैनिक_सामयिकी_All_Exams.pdf
5.5 MB
03 अप्रैल, 2020 दैनिक सामयिकी (All Exams).pdf
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प्रिय अभ्यर्थियों,

कोरोना का प्रभाव, कभी नहीं ला पायेगा आपकी तैयारी में अभाव
बस यही हमारा प्रयास, कि आप पहुंचे अपनी मंजिल के और पास


विश्व में कोरोना के प्रभाव के चलते एक संकट का दौर चल रहा है। लेकिन हर रात का एक सवेरा होता ही है। दिनांक 8 अप्रैल को हनुमान जयन्ती है। हमारी मान्यताओं में हनुमान जी संकटमोचक के रूप में जाने जाते है और हम उम्मीद करते हैं कि जल्दी ही ये संकट दूर होगा।

लॉकडाउन के इस दौर में प्रतिभागी अभी कई परीक्षाओं की घर बैठे जमकर तैयारी कर रहे हैं। फेसबुक , यूट्यूब व ईमेल के माध्यम लगातार संदेश मिल रहे है कि अभी वे सभी घर बैठे पढ़ना चाह रहे हैं उनके लिए एक दिन का ऑफर लेकर आए हैं क्योंकि आपका उत्कर्ष इन संकट के दिनों में है आपके साथ ।

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"नया सूरज: नयासवेरा"

बीते हुए कल से अगर कुछ लेना है तो सिर्फ अनुभव लेकर आगे बढ़ चलो। आपको जीवन में मिले सबसे बड़े धोखे, सबसे बड़ी असफलता, सबसे बड़े दुःख और आपकी सबसे बड़ी लापरवाही के लिए किसी को कोसने की इच्छा हो रही है तो खूब सारे नाम मिल जायेंगे। लेकिन आने वाला कल अच्छा बनाना है तो सारे दोष खुद के सिर ही मढ़ लेना।

हम खुद की ही गलती से हारते और जीतते है बाकी सारा भ्रम है। एक बहुत सरल उदाहरण से समझते है।

आप उन्नीन्दा होकर बिस्तर पर लेटे हो। तेज चलते हुए पंखे को रेगुलेटर के पास जाकर कम करना चाहते हो। लेकिन आलस्य के भारी प्रभाव के कारण आप उठकर पंखे तक नहीं जा पाए हो और आधा घंटा तेज हवा को झेलते रहे हो।" आप आधा घंटा हारे हो।"

जिन लोगों ने दुनियां को जिया है उन्होंने आँसुओं को गिराया नहीं पिया है। गजलकार इन्दीवर ने 'सब कुछ' और 'कुछ-कुछ' के भेद को दशकों पहले ऐसे समझाया।

"छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए
प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं
प्यार सब कुछ नहीं ज़िंदगी के लिए"

गीतकार इन्दीवर ने उस जमाने में ऐसा लिखकर युवाओं का दर्शन ही बदल दिया था। लेकिन उन्होंने यह विस्तार से नहीं बताया कि ये "जरूरी कई काम" कौनसे हैं।

जरूरी यह है कि हम भीड़चाल और भेड़चाल के बजाय खुद की चाल की एक अलग पहचान बनायें।

जरूरी यह है कि आप यह जल्दी ही भांप लेते है कि आपके कीमती वक्त को कौन बर्बाद करने पर तुला है?

जरूरी यह समझना है कि आप किसी काम को हाथ में लेते ही नहीं है, और अगर लेते है तो दुनियां आपको उस काम को करते समय 'मिस्टर भरोसेमन्द' की नजर से देखती है।

जरूरी यह है कि आपकी सफलता की कोंपलें उगने तक दुनियां के तानों, उपहासी ठहाकों और उत्साह को ठंडा करने वाली सलाहों के लिए कान बन्द कर दें।

जरूरी यह है आप अपनी पीठ थपथपाने और खुद को डाँटने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहें।

जरूरी यह है कि आपको पता हो कि आप जा कहाँ रहे हो? और उससे भी जरूरी यह है कि आज कितना चले हो?

अन्त में सबसे जरूरी समझना यह है कि जब 'कई काम' करने हो तो यह तय करना कि इनमें से कौन- कौन से मेरे सपनों से वास्ता रखते है और किन-किन को अनाज के दानों पर मौजूद भूसी की मानिंद उड़ा देना है।


@अर्जुन सिंह साँखला
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"हारेगा कोरोना और जीतेगा हर एक भारतीय"

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प्रिय अभ्यर्थियों,
आज ( 4 अप्रैल )की समसामयिकी की डेली करंट अफेयर वाली क्लास तकनीकी कारणों के चलते नहीं हो पाई है।

आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है। 🙏
- टीम उत्कर्ष
घर पर ही रहना है 🏠
सीखते रहना है 🙋🏻‍♂️
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भारत को जानो प्रतियोगिता में भाग लें ✅
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उत्कर्ष द्वारा UTKARSH App पर आयोजित 𝗕𝗛𝗔𝗥𝗔𝗧 𝗞𝗢 𝗝𝗔𝗔𝗡𝗢 प्रतियोगिता के Test-5 ( 02.04.2020 ) के सभी भाग्यशाली विजेताओं को उत्कर्ष परिवार की ओर से बधाई और उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं💐


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"उन किरदारों के लिए ही तालियां परदा गिरने के बाद भी बजती रहती है"

"बन्द घरों में कितना सीखा
कैसे जाऊँ भूल
ना कोई बस्ता और
ना कोई स्कूल"

बालकनी में में कैदी सा बैठा इन दिनों आसमाँ में उड़ते चहचहाते पक्षियों को देखता हूँ तो देखता ही रह जाता हूँ।

प्रकृतिवादी सदियों से सीख दी रहे है, आदमी के मनोरंजन के लिए चिड़ियाघर मत बनाओ। आज चन्द दिनों की कैद से सब समझ आ गया कि वे ऐसा क्यों बोलते थे।

दुनियां के चौधरी बने 'अंकल सैम' के चेहरे पर चिन्ता की लकीरों से स्पष्ट हो गया अंकल ऐसे ही दुनियां को व्यर्थ की चौधराहट से हांक रहे थे।

'पेट भर खाना' और 'भर पेट खाना' वाला मुहावरा अब जाकर समझ आया। इटालियन पिज़्ज़ा और चायनीज मंचूरियन पर दाल रोटी की सत्ता अब जाकर स्थापित हुई है। अब घर की दाल मुर्गी के बराबर नहीं, बहुत बड़ी लगती है।

असली हीरो को ढूँढने कहाँ कहाँ नहीं गया अब तक। अब कुछ नज़र आये हैं। परदा गिरने के बाद भी तालियां किनके लिए बजती हैं अब समझ आया।

जरूरी नहीं है कि देश की सेवा के लिए सारे लोग संसद या विधानसभा में ही हो। बहुत सारे 'हीरोज' तन, मन और धन की थाती लेकर गुमनाम गाँव, गलियों में भी बैठे हैं और कुछ बड़े थे पर हमारे अनुमान से और बड़े निकले।

मन्दिर, मस्जिद गिरजे, गुरुद्वारे के द्वार भी जब आपके लिए बन्द हो जाये तब कौनसे द्वार खटखटाने चाहिए इसका इल्म इंसान को होना चाहिए।

कुछ लोगों ने कीमतें बढ़ा कर खुद की कीमतें गिरा दी। वक्त तो यह भी निकल जायेगा साहब, लेकिन जब हम घरों से निकलेंगे कुछ लोग हमेशा के लिए दिलों में कैद होंगे और हमें उनको दिलों में रखने का फक्र होगा।

प्रकृति कितनी महान है। चन्द दिनों में खुद ने ही नदी, तालाब समन्दर, हवा और वनस्पति सब को कितना संवार दिया। इन्सान बड़े बड़े जतन करके आज तक यह नहीं कर पाया।

जब आधी दुनियां घरों की कोटरों में बैठकर सहमी सी बाहर टुकुर टुकुर झाँकती है ना तब समझ आता है कि हमारी उछलकूद पर भी कोई निगरानी है।

बिना स्कूल गये बहुत सीखा है इन दिनों।इस दौर के कुछ किरदारों का पोस्टर जेहन में हमेशा हमेशा चस्पा रहेगा।

कुछ लोग, बाद अपने,
छोड़ जाते हैं।
चीजें नहीं,
बातें।
बाद के लोग काट देते हैं
जिनके सहारे,
अँधेरी से अँधेरी
रातें।

लेखक:

अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य,
लक्की इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
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