🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮
*आज का प्रेरक प्रसंग*👇👇
*सफलता की तैयारी*
*शहर से कुछ दूर एक बुजुर्ग दम्पत्ती रहते थे . वो जगह बिलकुल शांत थी और आस -पास इक्का -दुक्का लोग ही नज़र आते थे .*
*एक दिन भोर में उन्होंने देखा की एक युवक हाथ में फावड़ा लिए अपनी साइकिल से कहीं जा रहा है , वह कुछ देर दिखाई दिया और फिर उनकी नज़रों से ओझल हो गया .दम्पत्ती ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया , पर अगले दिन फिर वह व्यक्ति उधर से जाता दिखा .अब तो मानो ये रोज की ही बात बन गयी , वह व्यक्ति रोज फावड़ा लिए उधर से गुजरता और थोड़ी देर में आँखों से ओझल हो जाता .*
*दम्पत्ती इस सुन्सान इलाके में इस तरह किसी के रोज आने -जाने से कुछ परेशान हो गए और उन्होंने उसका पीछा करने का फैसला किया .अगले दिन जब वह उनके घर के सामने से गुजरा तो दंपत्ती भी अपनी गाडी से उसके पीछे -पीछे चलने लगे . कुछ दूर जाने के बाद वह एक पेड़ के पास रुक और अपनी साइकिल वहीँ कड़ी कर आगे बढ़ने लगा . १५-२० कदम चलने के बाद वह रुका और अपने फावड़े से ज़मीन खोदने लगा .*
*दम्पत्ती को ये बड़ा अजीब लगा और वे हिम्मत कर उसके पास पहुंचे ,“तुम यहाँ इस वीराने में ये काम क्यों कर रहे हो ?”*
*युवक बोला , “ जी, दो दिन बाद मुझे एक किसान के यहाँ काम पाने क लिए जाना है , और उन्हें ऐसा आदमी चाहिए जिसे खेतों में काम करने का अनुभव हो , चूँकि मैंने पहले कभी खेतों में काम नहीं किया इसलिए कुछ दिनों से यहाँ आकार खेतों में काम करने की तैयारी कर रहा हूँ!!”*
*दम्पत्ती यह सुनकर काफी प्रभावित हुए और उसे काम मिल जाने का आशीर्वाद दिया .*
*शिक्षा :- किसी भी चीज में सफलता पाने के लिए तैयारी बहुत ज़रूरी है . जिस sincerity के साथ युवक ने खुद को खेतों में काम करने के लिए तैयार किया कुछ उसी तरह हमें भी अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।*
*आज का प्रेरक प्रसंग*👇👇
*सफलता की तैयारी*
*शहर से कुछ दूर एक बुजुर्ग दम्पत्ती रहते थे . वो जगह बिलकुल शांत थी और आस -पास इक्का -दुक्का लोग ही नज़र आते थे .*
*एक दिन भोर में उन्होंने देखा की एक युवक हाथ में फावड़ा लिए अपनी साइकिल से कहीं जा रहा है , वह कुछ देर दिखाई दिया और फिर उनकी नज़रों से ओझल हो गया .दम्पत्ती ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया , पर अगले दिन फिर वह व्यक्ति उधर से जाता दिखा .अब तो मानो ये रोज की ही बात बन गयी , वह व्यक्ति रोज फावड़ा लिए उधर से गुजरता और थोड़ी देर में आँखों से ओझल हो जाता .*
*दम्पत्ती इस सुन्सान इलाके में इस तरह किसी के रोज आने -जाने से कुछ परेशान हो गए और उन्होंने उसका पीछा करने का फैसला किया .अगले दिन जब वह उनके घर के सामने से गुजरा तो दंपत्ती भी अपनी गाडी से उसके पीछे -पीछे चलने लगे . कुछ दूर जाने के बाद वह एक पेड़ के पास रुक और अपनी साइकिल वहीँ कड़ी कर आगे बढ़ने लगा . १५-२० कदम चलने के बाद वह रुका और अपने फावड़े से ज़मीन खोदने लगा .*
*दम्पत्ती को ये बड़ा अजीब लगा और वे हिम्मत कर उसके पास पहुंचे ,“तुम यहाँ इस वीराने में ये काम क्यों कर रहे हो ?”*
*युवक बोला , “ जी, दो दिन बाद मुझे एक किसान के यहाँ काम पाने क लिए जाना है , और उन्हें ऐसा आदमी चाहिए जिसे खेतों में काम करने का अनुभव हो , चूँकि मैंने पहले कभी खेतों में काम नहीं किया इसलिए कुछ दिनों से यहाँ आकार खेतों में काम करने की तैयारी कर रहा हूँ!!”*
*दम्पत्ती यह सुनकर काफी प्रभावित हुए और उसे काम मिल जाने का आशीर्वाद दिया .*
*शिक्षा :- किसी भी चीज में सफलता पाने के लिए तैयारी बहुत ज़रूरी है . जिस sincerity के साथ युवक ने खुद को खेतों में काम करने के लिए तैयार किया कुछ उसी तरह हमें भी अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।*
*आज का प्रेरक प्रसङ्ग*
!! *सत्य का साथ कभी न छोड़े* !!
--------------------------------------------
स्वामी विवेकानंद जी प्रारंभ से ही मेधावी छात्र थे और सभी लोग उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित रहते थे | जब वह अपने साथी छात्रों से कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो कर उन्हें सुनते थे | एक दिन कक्षा में वो कुछ मित्रों को कहानी सुना रहे थे, सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे की उन्हें पता ही नहीं चला की कब मास्टर जी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया | मास्टर जी ने अभी पढ़ाना शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी | “कौन बात कर रहा है ?” मास्टर जी ने तेज आवाज़ में पूछा |
सभी छात्रों ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ़ इशारा कर दिया | मास्टर जी क्रोधित हो गए | उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबंधित प्रश्न पूछने लगे | जब कोई भी उत्तर नहीं दे पाया तब मास्टर जी ने स्वामी जी से वही प्रश्न किया, स्वामी जी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते हो | उन्होनें आसानी से उस प्रश्न का उत्तर दे दिया | यह देख कर मास्टर जी को यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बात – चीत कर रहे थे |
फिर क्या था | उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी | सभी छात्र एक एक कर बेंच पर खड़े होने लगे | स्वामी जी ने भी यही किया | मास्टर जी बोले नरेन्द्र तुम बैठ जाओ ! नहीं सर, मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि वो मैं ही था जो इन छात्रों से बात कर रहा था | स्वामी जी ने आग्रह किया | सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए |
*कहानी से सीख* :-
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हों | सदा सत्य का साथ देना चाहिए |
!! *सत्य का साथ कभी न छोड़े* !!
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स्वामी विवेकानंद जी प्रारंभ से ही मेधावी छात्र थे और सभी लोग उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित रहते थे | जब वह अपने साथी छात्रों से कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो कर उन्हें सुनते थे | एक दिन कक्षा में वो कुछ मित्रों को कहानी सुना रहे थे, सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे की उन्हें पता ही नहीं चला की कब मास्टर जी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया | मास्टर जी ने अभी पढ़ाना शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी | “कौन बात कर रहा है ?” मास्टर जी ने तेज आवाज़ में पूछा |
सभी छात्रों ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ़ इशारा कर दिया | मास्टर जी क्रोधित हो गए | उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबंधित प्रश्न पूछने लगे | जब कोई भी उत्तर नहीं दे पाया तब मास्टर जी ने स्वामी जी से वही प्रश्न किया, स्वामी जी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते हो | उन्होनें आसानी से उस प्रश्न का उत्तर दे दिया | यह देख कर मास्टर जी को यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बात – चीत कर रहे थे |
फिर क्या था | उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी | सभी छात्र एक एक कर बेंच पर खड़े होने लगे | स्वामी जी ने भी यही किया | मास्टर जी बोले नरेन्द्र तुम बैठ जाओ ! नहीं सर, मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि वो मैं ही था जो इन छात्रों से बात कर रहा था | स्वामी जी ने आग्रह किया | सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए |
*कहानी से सीख* :-
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हों | सदा सत्य का साथ देना चाहिए |
मुश्किलें जरुर है, मगर ठहरा नही हूँ मैं.
मंज़िल से जरा कह दो, अभी पहुंचा नही हूँ मैं.
कदमो को बाँध न पाएंगी, मुसीबत कि जंजीरें,
रास्तों से जरा कह दो, अभी भटका नही हूँ मैं.
सब्र का बाँध टूटेगा, तो फ़ना कर के रख दूंगा,
दुश्मन से जरा कह दो, अभी गरजा नही हूँ मैं.
" साथ चलता है, दुआओ का काफिला,
किस्मत से जरा कह दो, अभी तनहा नही हूँ मैं...
#Goals🎯
मंज़िल से जरा कह दो, अभी पहुंचा नही हूँ मैं.
कदमो को बाँध न पाएंगी, मुसीबत कि जंजीरें,
रास्तों से जरा कह दो, अभी भटका नही हूँ मैं.
सब्र का बाँध टूटेगा, तो फ़ना कर के रख दूंगा,
दुश्मन से जरा कह दो, अभी गरजा नही हूँ मैं.
" साथ चलता है, दुआओ का काफिला,
किस्मत से जरा कह दो, अभी तनहा नही हूँ मैं...
#Goals🎯
*🍁 TODAY'S INSPIRATION 🍁*
You are not the mistakes you have made! You are the embodiment of virtues; virtues are your innate, inherent and eternal sanskaars.
👉 *TODAY ONWARDS LET'S* learn from our mistakes, instead of just regretting...
🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃
You are not the mistakes you have made! You are the embodiment of virtues; virtues are your innate, inherent and eternal sanskaars.
👉 *TODAY ONWARDS LET'S* learn from our mistakes, instead of just regretting...
🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃
1️⃣7️⃣❗1️⃣2️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣0️⃣
*👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*
*!! कर्मों का खेल !!*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
एक बार एक गरीब लकड़हारा सूखी लकडि़यों की तलाश में जंगल में भटक रहा था। साथ में बोझा ढोने के लिये उसका गधा भी था। लकडि़याँ बटोरते-बटोरते उसे पता ही नहीं चला कि दिन कब ढल गया। शाम का अंधेरा तेजी से बढ़ता जा रहा था लेकिन वह अपने गाँव से बहुत दूर निकल आया था और उधर मौसम भी बिगड़ रहा था। ऐसे में वापस गाँव पहुँचना सम्भव न था, इसलिये वह उस जंगल में आसरा ढूंढने लगा। अचानक उसे एक साधु की कुटिया नजर आई। वह खुशी-खुशी अपने गधे के साथ वहाँ जा पहुँचा और रात काटने के लिये साधु से जगह माँगी। साधु ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया और सोने की जगह के साथ भोजन- पानी की व्यवस्था भी कर दी। वह लकड़हारा सोने की तैयारी करने लगा लेकिन तभी एक और समस्या खड़ी हो गई। दरअसल उसने काफी ज्यादा लकड़ी इकट्ठा कर ली थी और उसे बाँधने के लिये उसने सारी रस्सी इस्तेमाल कर ली थी। यहाँ तक कि अब उसके पास गधे को बाँधने के लिये भी रस्सी नहीं बची थी। उसकी परेशानी देखकर वह साधु उसके पास आये और उसे एक बड़ी रोचक युक्ति बताई। उन्होंने कहा कि गधे को बाँधने के लिये रस्सी की कोई जरूरत नहीं, बस उसके पैरों के पास बैठकर रोज की तरह बाँधने का क्रम पूरा कर लो। इस झूठ-मूठ के दिखावे को गधा समझ नहीं पायेगा और सोचेगा कि उसे बाँध दिया गया है। फिर वह कहीं जाने के लिये पैर नहीं उठायेगा। लकड़हारे ने और कोई चारा न देखकर घबराते-सकुचाते साधु की बात मान ली और गधे को बाँधने का दिखावा करके भगवान से उसकी रक्षा की प्रार्थना करता हुआ सो गया।
रात बीती, सुबह हुई, मौसम भी साफ हो गया। जंगल में पशु-पक्षियों की हलचल शुरू हो गई। आहट से लकड़हारे की नींद खुल गई। जागते ही उसे गधे की चिन्ता हुई और वह उसे देखने के लिये बाहर भागा। देखा तो गधा बिल्कुल वहीं खड़ा था जहाँ रात उसने छोड़ा था। लकड़हारा बड़ा खुश हुआ और साधु को धन्यवाद करके अपने गधे को साथ लेकर जाने लगा लेकिन यह क्याॽ गधा तो अपनी जगह से हिलने को तैयार ही नहीं। लकड़हारे ने बड़ा जोर लगाया, डाँटा-डपटा भी लेकिन गधा तो जैसे अपनी जगह पर जमा हुआ था। उसकी मुश्किल देखकर साधु ने आवाज लगाकर कहा- अरे भई, गधे को खोल तो लो। लकड़हारा रात की बात भूल चुका था, बोला- महाराज, रस्सी तो बाँधी ही नहीं फिर खोलूं क्याॽ
साधु बोले- रस्सी छोड़ो, बन्धन खोलो जो रात को डाले थे। जैसे बाँधने का दिखावा किया था वैसे ही खोलने का भी करना पड़ेगा। उलझन में पड़े लकड़हारे ने सुस्त हाथों से रस्सी खोलने का दिखावा किया और गधा तो साथ ही चल पड़ा। आश्चर्यचकित लकड़हारे को समझाते हुये साधु ने कहा- कर्म तो कर्म हैं चाहे वह स्थूल हों या सूक्ष्म। हम भले ही अपने कर्मों को भूल जायें पर उनका फल तो सामने आता ही है और फिर उसका भुगतान करने के लिये, उसे काटने के लिये नया कर्म करना पड़ता है। वहाँ कोई मनमर्जी या जोर-जबर्दस्ती नहीं चलती।
कर्म मात्र में ही मनुष्य का अधिकार है कर्मानुसार फल तो प्रकृति स्वयं ही जुटा देती है किन्तु फल की प्राप्ति पुन: कर्म की प्रेरणा देती है। अत: एक प्राणी का कर्तव्य है कि प्रत्येक कर्म विचार पूर्वक तथा जिम्मेदारी के साथ करे। कर्म के रहस्य को समझ कर ही हम सुखी हो सकते हैं अन्यथा पग-पग पर हमें उलझन का ही सामना करना पड़ेगा!
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️
*👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*
*!! कर्मों का खेल !!*
एक बार एक गरीब लकड़हारा सूखी लकडि़यों की तलाश में जंगल में भटक रहा था। साथ में बोझा ढोने के लिये उसका गधा भी था। लकडि़याँ बटोरते-बटोरते उसे पता ही नहीं चला कि दिन कब ढल गया। शाम का अंधेरा तेजी से बढ़ता जा रहा था लेकिन वह अपने गाँव से बहुत दूर निकल आया था और उधर मौसम भी बिगड़ रहा था। ऐसे में वापस गाँव पहुँचना सम्भव न था, इसलिये वह उस जंगल में आसरा ढूंढने लगा। अचानक उसे एक साधु की कुटिया नजर आई। वह खुशी-खुशी अपने गधे के साथ वहाँ जा पहुँचा और रात काटने के लिये साधु से जगह माँगी। साधु ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया और सोने की जगह के साथ भोजन- पानी की व्यवस्था भी कर दी। वह लकड़हारा सोने की तैयारी करने लगा लेकिन तभी एक और समस्या खड़ी हो गई। दरअसल उसने काफी ज्यादा लकड़ी इकट्ठा कर ली थी और उसे बाँधने के लिये उसने सारी रस्सी इस्तेमाल कर ली थी। यहाँ तक कि अब उसके पास गधे को बाँधने के लिये भी रस्सी नहीं बची थी। उसकी परेशानी देखकर वह साधु उसके पास आये और उसे एक बड़ी रोचक युक्ति बताई। उन्होंने कहा कि गधे को बाँधने के लिये रस्सी की कोई जरूरत नहीं, बस उसके पैरों के पास बैठकर रोज की तरह बाँधने का क्रम पूरा कर लो। इस झूठ-मूठ के दिखावे को गधा समझ नहीं पायेगा और सोचेगा कि उसे बाँध दिया गया है। फिर वह कहीं जाने के लिये पैर नहीं उठायेगा। लकड़हारे ने और कोई चारा न देखकर घबराते-सकुचाते साधु की बात मान ली और गधे को बाँधने का दिखावा करके भगवान से उसकी रक्षा की प्रार्थना करता हुआ सो गया।
रात बीती, सुबह हुई, मौसम भी साफ हो गया। जंगल में पशु-पक्षियों की हलचल शुरू हो गई। आहट से लकड़हारे की नींद खुल गई। जागते ही उसे गधे की चिन्ता हुई और वह उसे देखने के लिये बाहर भागा। देखा तो गधा बिल्कुल वहीं खड़ा था जहाँ रात उसने छोड़ा था। लकड़हारा बड़ा खुश हुआ और साधु को धन्यवाद करके अपने गधे को साथ लेकर जाने लगा लेकिन यह क्याॽ गधा तो अपनी जगह से हिलने को तैयार ही नहीं। लकड़हारे ने बड़ा जोर लगाया, डाँटा-डपटा भी लेकिन गधा तो जैसे अपनी जगह पर जमा हुआ था। उसकी मुश्किल देखकर साधु ने आवाज लगाकर कहा- अरे भई, गधे को खोल तो लो। लकड़हारा रात की बात भूल चुका था, बोला- महाराज, रस्सी तो बाँधी ही नहीं फिर खोलूं क्याॽ
साधु बोले- रस्सी छोड़ो, बन्धन खोलो जो रात को डाले थे। जैसे बाँधने का दिखावा किया था वैसे ही खोलने का भी करना पड़ेगा। उलझन में पड़े लकड़हारे ने सुस्त हाथों से रस्सी खोलने का दिखावा किया और गधा तो साथ ही चल पड़ा। आश्चर्यचकित लकड़हारे को समझाते हुये साधु ने कहा- कर्म तो कर्म हैं चाहे वह स्थूल हों या सूक्ष्म। हम भले ही अपने कर्मों को भूल जायें पर उनका फल तो सामने आता ही है और फिर उसका भुगतान करने के लिये, उसे काटने के लिये नया कर्म करना पड़ता है। वहाँ कोई मनमर्जी या जोर-जबर्दस्ती नहीं चलती।
कर्म मात्र में ही मनुष्य का अधिकार है कर्मानुसार फल तो प्रकृति स्वयं ही जुटा देती है किन्तु फल की प्राप्ति पुन: कर्म की प्रेरणा देती है। अत: एक प्राणी का कर्तव्य है कि प्रत्येक कर्म विचार पूर्वक तथा जिम्मेदारी के साथ करे। कर्म के रहस्य को समझ कर ही हम सुखी हो सकते हैं अन्यथा पग-पग पर हमें उलझन का ही सामना करना पड़ेगा!
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*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
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Forwarded from RRB Exam 2026 - TargetOn
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Lecture - 64 || Trigonometry || (Part - 1) || By -Er. Sandeep Sir
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Lecture - 67 || HEIGHT AND DISTANCE || By -Er. Sandeep Sir
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Lecture - 68 || HEIGHT AND DISTANCE (Part -2) || By -Er. Sandeep Sir
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Lecture - 69 || HEIGHT AND DISTANCE (Part -2) Continue... || By -Er. Sandeep Sir
Full trigonometry hai concept k sath समझ लेना सभी स्टूडेंट्स
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Lecture - 105 II Maths II PROBABILITY -1 II By- Sandeep Sir
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Lecture - 106 II Maths II PROBABILITY -2 II By- Sandeep Sir
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Lecture - 102 II Maths II ALGEBRA QUADRATIC EQUATION II By- Sandeep Sir
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Lecture - 103 II Maths II ALGEBRA LINEAR EQUATION IN TWO VARIABLE II By- Sandeep Sir
Full Geometry classes
सभी छात्र कॉन्सेप्ट समझ ले
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