UP Board 10th & 12th (NEET/JEE)
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*✍हम गरीब इतने हैं कि अपनी सांसे भी हमारी नहीं हैं और,*

*अमीर इतने हैं कि तीनों लोकों का मालिक हमारा है🙏*
❤️आन्तरिक या कोशिकीय श्वसन एवं उसके प्रकार👉👇👇👇👇
(Internal or Cellular Respiration and its Types)

श्वसन में भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण की क्रिया अनेक पदों में सम्पन्न होती है। इस क्रिया जब को दो पदों में बाँट सकते हैं : (1) ग्लाइकोलाइसिस, (2) क्रेब्स चक्र।

👉(1) ग्लाइकोलाइसिस (glycolysis) में ग्लूकोज जैसे पदार्थ को पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) में बदला जाता है। यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में होती है। इसके बाद की क्रियाएँ ऑक्सीजन (O2) की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति पर निर्भर करती हैं।

👉(2) क्रेब्स चक्र (Krebs cycle) में पाइरुविक अम्ल के पूर्ण ऑक्सीकरण से जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनते हैं। यह क्रिया ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) में सम्पन्न होती है। इसे ऑक्सी या वायवीय श्वसन (aerobic respiration) कहते हैं।
ऑक्सीजन के अभाव में कोशिकाद्रव्य में ही पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) के अपूर्ण ऑक्सीकरण से एथिल ऐल्कोहॉल (ethyl alcohol) तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनती है। इस प्रक्रिया को अनॉक्सी या अवायवीय श्वसन (anaerobic respiration) कहते हैं।


❤️ATP की उत्पत्ति (Generation of ATP)

👉श्वसन क्रिया में ग्लूकोज के एक अणु से कुल 38 ATP अणु निम्नलिखित चक्रों के अन्तर्गत प्राप्त होते हैं

(i) ग्लाइकोलाइसिस के अन्तर्गत 10 ATP अणु प्राप्त होते हैं और 2 ATP अणु खर्च हो जाते हैं; अत: 8 ATP अणु प्राप्त होते हैं।

(ii) एसीटिल को एन्जाइम ‘ए’ के बनते समय 6 ATP अणु प्राप्त होते हैं।

(iii) क्रेब्स चक्र में 24 ATP अणु प्राप्त होते हैं।

❤️श्वसन चक्र एवं श्वसन दर (Respiratory Cycle and Rate of Respiration)

श्वसन चक्र में वायु को ग्रहण करने तथा फेफड़ों से वायु निकालने की दोनों क्रियाएँ होती हैं। एक मिनट में जितनी बार वायु का निश्वसन होता है, उसे श्वसन दर कहते हैं। यह बच्चों में अधिक एवं वयस्कों में कम होता है। विश्रामावस्था में इसकी दर औसतन 12-15 प्रति मिनट होती है।


👉श्वसन दर पर ऊँचाई का प्रभाव (Effect of Height on Respiratory Rate)

वायु का घनत्व (density of air) समुद्र सतह से ऊपर उठने पर कम होता जाता हैं। जिससे इसमें उपस्थित गैसों का वायुदाब भी कम होता जाता है। अतः पहाड़ों पर चढ़ते समय ऊँचाई के साथ-साथ O2 की मात्रा कम होती जाती है। शरीर में O2 की कमी के कारण श्वास फूलने लगता है एवं श्वसन दर बढ़ जाती है। विभिन्न ऊँचाइयों का श्वसन दर पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है।

(1) 3,500-4,000 मीटर की ऊँचाई पर O2 की अधिक कमी के कारण थकावट, शिथिलता, सिर दर्द व मिचली आदि का आभास होता है।

(2) 5,000-6,000 मीटर की ऊँचाई पर शरीर के रुधिर से CO2 के निकलने से pH बढ़ जाता है। जिससे श्वसन दर
बढ़ जाती है।

(3) 6,000 से अधिक की ऊँचाई पर O2 की मात्रा बहुत कम हो जाती है और व्यक्ति को मूर्छा आने लगती है। इस समय कृत्रिम O2 की आवश्यकता होती है।

(4) 11,000 मीटर या उससे ऊपर कृत्रिम O2 से भी काम नहीं चलता। इसी कारण हवाई जहाज वायुरुद्ध बनाये जाते हैं।



@upbordnotes
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*👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*

*!! असली शिक्षा !!*
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एक बड़ी सी गाड़ी आकर बाजार में रूकी, कार में ही मोबाईल से बातें करते हुए महिला ने अपनी बच्ची से कहा, जा उस बुढिया से पूछ सब्जी कैंसे दी, बच्ची कार से उतरतें ही- अरें बुढिया ! यें सब्जी कैंसे दी?
40 रूपयें किलो, बेबी जी...

सब्जी लेते ही उस बच्ची ने सौ रूपयें का नोट उस सब्जी वाली को फेंक कर दिया और आकर कार पर बैठ गयी, कार जाने लगी तभी अचानक किसी ने कार के सीसे पर दस्तक दी, एक छोटी सी बच्ची जो हाथ में 60 रूपयें कार में बैठी उस औरत को देते हुए, बोलती हैं आंटी जी यें आपके सब्जी के बचें 60 रूपयें हैं, आपकी बेटी भूल आयी हैं। कार में बैठी औरत ने कहा तुम रख लों, उस बच्ची ने बड़ी ही मिठी और सभ्यता से कहा- नहीं आंटी जी हमारें जितने पैंसे बनते थें हमने ले लियें, हम इसे नहीं रख सकतें, मैं आपकी आभारी हूं, आप हमारी दुकान पर आए और आशा करती हूं कि सब्जी आपको अच्छी लगें, जिससे आप हमारें ही दुकान पर हमेशा आए। उस लड़की ने हाथ जोड़े और अपनी दुकान लौट गयी...

कार में बैठी महिला उस लड़की से बहुत प्रभावित हुई और कार से उतर कर फिर सब्जी की दुकान पर जाने लगी, जैसें ही वहाँ पास गयी, सब्जी वाली अपनी बच्ची को पूछते हुयें, तुमने तमीज से बात की ना, कोई शिकायत का मौका तो नहीं दिया ना..?

बच्ची ने कहा, हाँ माँ मुझे आपकी सिखाई हर बात याद है, कभी किसी बड़े का अपमान मत करो, उनसे सभ्यता से बात करो, उनकी कद्र करो, क्यूंकि बड़े-बुजर्ग बड़े ही होते हैं, मुझे आपकी सारी बात याद है और मैं सदैव इन बातों का स्मरण रखूंगी। बच्ची ने फिर कहा, अच्छा माँ अब मैं स्कूल चलती हूं, शाम में स्कूल से छुट्टी होते ही, दुकान पर आ जाऊंगी...

कार वाली महिला शर्म से पानी पानी थी, क्यूंकि एक सब्जी वाली अपनी बेटी को इंसानियत और बड़ों से बात करने के शिष्टाचार का पाठ सीखा रही थी और वह महिला अपनी बेटी को छोटा-बड़ा, ऊंच-नीच का मन में बीज बो रही थी..!!

*शिक्षा:-*
सबसे अच्छा तो वो कहलाता है जो आसमान पर भी रहता है और जमींन से भी जुड़ा रहता है। बस इंसानियत, भाईचारें, सभ्यता, आचरण, वाणी में मिठास, सब की इज्जत करने की सीख दीजिए अपने बच्चों को, क्यूंकि अब बस यहीं पढ़ाई है जो आने वाले समय में बहुत ही ज्यादा मुश्किल होगी इसे पढ़ने, इसे याद रखने, इसे ग्रहण करने में और जीवन को उपयोगी बनानें में !!

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
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❤️❤️विद्युत-रासायनिक श्रेणी (Electrochemical Series)👇👇

विभिन्न इलेक्ट्रोडों या उन पर होने वाली अर्द्ध-अभिक्रियाओं के मानक इलेक्ट्रोड विभवों को बढ़ते हुए क्रम में रखने पर जो श्रेणी प्राप्त होती है उसे विद्युत-रासायनिक श्रेणी कहते हैं। इस श्रेणी में सभी धातु अपनी सक्रियता (reactivity) के घटते हुए क्रम में स्थित हैं।

[ नोट-वास्तव में विद्युत-रासायनिक श्रेणी में विभिन्न इलेक्ट्रोडों या उन पर होने वाली अर्द्धअभिक्रियाओं के मानक इलेक्ट्रोड विभवों को किसी भी (बढ़ते हुए या घटते हुए) क्रम में रखा जा सकता है।


👉 सूचना :-चूँकि उ०प्र० बोर्ड की परीक्षाओं में अब तक सभी प्रश्न इस आधार पर पूछे गये हैं कि विद्युत-रासायनिक श्रेणी में मानक इलेक्ट्रोड विभव बढ़ते क्रम में रखे जायें,

❤️विद्युत-रासायनिक श्रेणी के मुख्य उपयोग

1. विद्युत-रासायनिक श्रेणी की सहायता से धातुओं की क्रियाशीलता की तुलना की जा सकती है।

विद्युत-रासायनिक श्रेणी में जो धातु ऊपर की ओर स्थित हैं उनके इलेक्ट्रोड विभव कम होते हैं,
अर्थात् उनके अपचयन विभव कम होते हैं,
अर्थात् उनके ऑक्सीकरण विभव अधिक होते हैं,

अर्थात् उन पर होने वाली अर्द्ध-अभिक्रियाओं में ऑक्सीकरण होने की प्रवृत्ति अधिक होती है,

अर्थात् उन धातुओं की ऑक्सीकृत होने की प्रवृत्ति अधिक होती है, अर्थात् उन धातुओं की इलेक्ट्रॉन त्याग कर धनायन बनाने की प्रवृत्ति अधिक होती है,

अर्थात् वे धातु अधिक क्रियाशील होती हैं।

अत: धातुओं की क्रियाशीलता उनके इलेक्ट्रोड विभवों के बढ़ते हुए क्रम में घटती है तथा विद्युत-रासायनिक श्रेणी में धातुओं को उनकी सक्रियता (reactivity) के घटते हुए क्रम में रखा गया है।

उदाहरणार्थ-अग्रांकित सारणी में Fe, Cu से ऊपर स्थित है। अत: Fe, Cu से अधिक क्रियाशील धातु है। कुछ प्रमुख धातुओं की सक्रियता का घटता हुआ क्रम इस प्रकार है

K> Na > Mg > Al > Zn > Fe > Cu > Ag > Pt > Au

किसी अधिक सक्रिय धातु को किसी कम सक्रिय धातु के धनायनों के विलयन में डाल देने से कम सक्रिय धातु मुक्त हो जाती है।

उदाहरणार्थ- Fe विद्युत-रासायनिक श्रेणी में Cu के ऊपर स्थित है तथा Cu से अधिक क्रियाशील है। अत: Fe को CuSO4 विलयन में डालने से यह Cu को मुक्त कर देता है।

Fe + CuSO4→ FeSO4 +Cu

विद्युत-रासायनिक श्रेणी की सहायता से विभिन्न धातुओं द्वारा अम्लों में से हाइड्रोजन विस्थापित कर पाने की क्षमता की जानकारी प्राप्त होती है।

विद्युत-रासायनिक श्रेणी में जो धातु हाइड्रोजन से ऊपर स्थित हैं, हाइड्रोजन की तुलना मेंउनके इलेक्ट्रोड विभव कम होते हैं, अर्थात्
उनके अपचयन विभव कम होते हैं,
अर्थात् उनके ऑक्सीकरण विभव अधिक होते हैं,
अर्थात् उन पर होने वाली अर्द्ध-अभिक्रियाओं में ऑक्सीकरण होने की प्रवृत्ति अधिक होती है,
अर्थात् उनकी ऑक्सीकृत होने की प्रवृत्ति अधिक होती है,
अर्थात् उन धातुओं की धनायन बनाने की प्रवृत्ति अधिक होती है,
अर्थात् वे धातु अम्लों में से हाइड्रोजन को विस्थापित कर सकती हैं।

👉अत: विद्युत-रासायनिक श्रेणी में जो धातु हाइड्रोजन से ऊपर स्थित हैं, वे अम्लों में से हाइड्रोजन को विस्थापित कर देती हैं।

दूसरे शब्दों में, जिन धातुओं के इलेक्ट्रोड विभव हाइड्रोजन के इलेक्ट्रोड विभव से कम होते हैं, वे धातु अम्लों में से हाइड्रोजन को विस्थापित कर देती हैं। जिन धातुओं के इलेक्ट्रोड विभव हाइड्रोजन के इलेक्ट्रोड विभव से अधिक होते हैं,वे धातु अम्लों में से हाइड्रोजन विस्थापित नहीं करती हैं।

उदाहरणार्थ-ऐलुमिनियम तथा जिंक विद्युत-रासायनिक श्रेणी में हाइड्रोजन से ऊपर स्थित हैं। Al, Zn तथा हाइड्रोजन के मानक इलेक्ट्रोड विभव क्रमश: -1.66,
- 0.76 तथा 0 वोल्ट हैं। अत: Al तथा Zn, HCI में से हाइड्रोजन विस्थापित कर देते हैं। Al की HCl से अभिक्रिया की गति, Zn की HCl से अभिक्रिया की गति से तीव्र होती है।

2Al + 6HCl→ 2AlCl3 + 3H2

Zn + 2HCl ---> ZnCl2 + H2

कॉपर विद्युत-रासायनिक श्रेणी में हाइड्रोजन से नीचे स्थित है। Cu का मानक इलेक्ट्रोड विभव +0.34 वोल्ट है जो हाइड्रोजन के मानक इलेक्ट्रोड विभव से अधिक है। अत: Cu, HCI में से हाइड्रोजन विस्थापित नहीं करता है।

3. विद्युत-रासायनिक श्रेणी की सहायता से विभिन्न ऑक्सीकारकों की ऑक्सीकारक क्षमताओं तथा विभिन्न अपचायकों की अपचायक क्षमताओं की तुलना की जा सकती है।

4. विद्युत-रासायनिक श्रेणी से किसी गैल्वेनिक (या वोल्टीय) सेल के E.M.F की गणना की जा सकती है।

@upbordnotes
👉👉विघुत रासायनिक श्रेणी को सक्रियता श्रेणी भी कहते हैं
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*👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*

*!! परोपकार की ईंट !!*
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बहुत समय पहले की बात है. एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे. उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।

वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी, “आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं।”

आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।

ऋषिवर बोले, “प्रिय शिष्यों, आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है. मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें.

यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा.”

तो क्या आप सब तैयार हैं?”

” हाँ, हम तैयार हैं ”, शिष्य एक स्वर में बोले.

दौड़ शुरू हुई.

सभी तेजी से भागने लगे. वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे. वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमें जगह-जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था.

सभी असमंजस में पड़ गए, जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीं अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे; खैर, सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।

“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया, भला ऐसा क्यों ?”, ऋषिवर ने प्रश्न किया।

यह सुनकर एक शिष्य बोला, “ गुरु जी, हम सभी लगभग साथ-साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी... कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल-संभल कर आगे बढ़ रहा था और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा-उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े… इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की.”

“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ”, ऋषिवर ने आदेश दिया.

आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे. पर ये क्या जिन्हें वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे. सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे.

“मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों को देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं.” ऋषिवर बोले।

“दरअसल इन्हें मैंने ही उस सुरंग में डाला था और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।”

पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम-भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है. पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम-भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है.

*शिक्षा:-*
अतः यहाँ से जाते-जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमें परोपकार की ईंटें लगाना कभी ना भूलें, अंततः वही आपकी सबसे अनमोल जमा-पूँजी होगी।”
Photo from Dear Sir😊😊😊😊
❤️(ii) झाग प्लवन विधि (Froth floatation method)-


इस विधि के द्वारा मुख्यतः सल्फाइड अयस्कों [जैसे-कॉपर पायराइट (CuFeS2), सिल्वर ग्लान्स (Ag2S) तथा गैलेना (PbS)] का सान्द्रण किया जाता है। जब सल्फाइड अयस्कों को तेल और जल के मिश्रण में डालते हैं, तब सल्फाइड अयस्क उनमें उपस्थित अशुद्धियों की तुलना में तेल द्वारा शीघ्र भीगते हैं तथा सल्फाइड अयस्कों में उपस्थित अशुद्धियाँ सल्फाइड अयस्कों की तुलना में पानी द्वारा शीघ्र भीगती हैं। इस प्रकार तेल और पानी में बने हुऐ सल्फाइड अयस्क के निलम्बन (suspension) में जब वायु प्रवाहित करते हैं, तब सल्फाइड अयस्क के कण झाग बनकर ऊपरी सतह पर आ जाते हैं तथा अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं। इस विधि को फेन उत्प्लावन विधि भी कहते हैं।


@upbordnotes
👍1
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️

परावर्तनी भट्टी (Reverberatory Furnace)👇

यह भट्टी अग्निसह ईंटों (fire proof bricks) की दीवारों से बनी होती है। इसके मुख्यत: तीन भाग होते हैं

(i) भट्टी (Furnace)—यह ईंधन (fuel) के जलाने की जगह होती है। वायु की उपस्थिति में भट्टी में रखा ईंधन जलाया जाता है,

(ii) चूल्हा (Hearth)-इस भाग में जिस पदार्थ को गर्म करना होता है, उसे रखा जाता है। गर्म करने वाले पदार्थ को घान (charge) कहते हैं।

(iii) चिमनी (Chimney)—इस भाग से बनी हुई गर्म गैसें (hot gases) जो बेकार होती हैं निकल जाती हैं।

गर्म करने वाले पदार्थ को जिसे घान (charge) कहते हैं, चूल्हे में रख कर भट्टी को जला देते हैं। गर्म गैसें निकलती हैं और चूल्हे पर रखे घान को गर्म कर देती हैं। घान (charge) को इतना गर्म करते हैं कि उसकी नमी निकल जाये अथवा वायु की उपस्थिति में घान (charge) का ऑक्सीकरण (oxidation) हो जाये परन्तु घान पिघलने न पाये। इस भट्टी में निस्तापन (calcination) तथा भर्जन (roasting) की क्रियाएँ भली-भाँति कराई जाती हैं। इस भट्टी में ईंधन का तथा गर्म किये जाने वाले पदार्थ का सीधा सम्पर्क नहीं होता है। अतः इसे ऑक्सीकरण अथवा अपचयन दोनों क्रियाओं के लिए उपयोग कर सकते हैं। इस भट्टी की यही विशेषता है।

ताँबा, लेड, टिन आदि धातुओं का निस्तापन (calcination) एवं भर्जन (roasting) इसके द्वारा किया जाता है।


@upbordnotes
परावर्तनी भट्टी
My school
👌💐दुनिया के फैसले से अपना फैसला मत बदलो।।
बल्कि
अपने फैसले से दुनिया को बदल दो।।👍
ह्रदय(Heart)-
Heart हमारे शरीर का सबसे व्यस्त अंग है। यह Cardiac mussel का बना होता है।
◾✍ Heart हल्का गुलाबी रंग का होता है। इसकी भार लगभग 300 ग्राम होता है। यह दोनों फेफड़ो(Lungs) के मध्य होता है। Heart का एक तिहाई भाग दाहिनीं तरफ शेष भाग बायीं तरफ होता है।

{शेष आप लोगो को Heart के बारे में नोट्स भेज दिया जायेगा}
अब आप लोगो का जीव विज्ञान में जैव प्रक्रम 1 चलेगा। बहुत आसान है। मै लगातार नोट्स भेजता रहूँगा।
तो चलिए शुरू करते हैं।
@nitinashishyadav
जैव प्रक्रम(Life Process)-
प्रत्येक जीवधारी को जीवित रहने के लिए स्वयं में कुछ क्रियाओ को करना पड़ता है।
अतः वे सभी क्रियाएँ जो जीव को जीवित बनाये रखने के लिए आवश्यक होती हैं, उन्हें जीवन की प्रक्रियाएं अर्थात जैव प्रक्रम कहते है।

जैसे- पोषण, श्वसन, परिवहन,उत्सर्जन इत्यादि।

✴ जीवित रहने के लिए जैव शारीर के अंदर कुछ ऐसी क्रियाएँ होती हैं,जिनमे संश्लेषण होता है तथा कुछ क्रियाएँ ऐसी होती हैं,जिनमे विखंडन होता है।

(1) - उपचयी अभिक्रिया(Anabolic Reaction)--
वे अभिक्रियाएँ जिनमे सरल कार्बनिक पदार्थो से जटिल कार्बनिक पदार्थो का निर्माण होता है।
जैसे-- प्रकाश संश्लेषण

(2)-- अपचयी अभिक्रिया(Catabolic Reaction)--
जैव शारीर के अंदर होने वाली वे अभिक्रिया जिनमे जटिल कार्बनिक यौगिकों के विखंडन से सरल अणुओ का निर्माण होता है,उसे अपचयी अभिक्रिया कहते हैं।
जैसे-- श्वशन,पाचन।

{अब आप लोग अपने Chapter के खास Topic के करीब हो। आगे का नोट्स भी मिल जायेगा}
@nitinashishyadav
सुविचार

मिलता तो बहुत है
इस जिंदगी में,
बस हम गिनती उसी
की करते है,
जो हासिल न हो सका

सुप्रभात
Magic. ...✍
UP Board 10th & 12th (NEET/JEE) pinned «जैव प्रक्रम(Life Process)- प्रत्येक जीवधारी को जीवित रहने के लिए स्वयं में कुछ क्रियाओ को करना पड़ता है। अतः वे सभी क्रियाएँ जो जीव को जीवित बनाये रखने के लिए आवश्यक होती हैं, उन्हें जीवन की प्रक्रियाएं अर्थात जैव प्रक्रम…»