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सूत्रधार:[ serious ] घने जंगलों के बीच बसा काकीनाड़ा का पुराना रेलवे स्टेशन रात के सन्नाटे में किसी मुर्दे की तरह खामोश पड़ा हुआ था।
सूत्रधार:[ scared ] सालों पहले यहाँ एक भयानक हादसा हुआ था, जिसके बाद से इस स्टेशन को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।
सूत्रधार:[ whispering ] स्थानीय लोग कहते हैं कि आधी रात के ठीक दो बजकर तेरा मिनट पर यहाँ एक भूतिया ट्रेन आती है।
सूत्रधार:[ serious ] उस काली और भयानक ट्रेन के आखिरी डिब्बे में एक चुड़ैल का साया आज भी भटकता रहता है।
अमित:[ anxious ] रोहन भाई, मुझे तो लगता है कि हम लोग किसी बहुत गलत रास्ते पर आ गए हैं।
रोहन:[ nervous ] हमारी गाड़ी का टायर भी तो इसी सुनसान जंगल में फटना था, किस्मत ही खराब है अपनी।
रिया:[ worried ] चारों तरफ इतना घना अँधेरा है कि हाथ को हाथ भी दिखाई नहीं दे रहा है।
अमित:[ curious ] सामने देखो, पटरियों के पास एक पुराना और टूटा हुआ बोर्ड लगा हुआ दिखाई दे रहा है।
रोहन:[ confused ] काकीनाड़ा जंक्शन? पर यह स्टेशन तो पंद्रह साल पहले ही पूरी तरह बंद कर दिया गया था।
रिया:[ scared ] तो फिर यहाँ पटरियों के बीच में यह हल्की पीली रोशनी कहाँ से आ रही है?
सूत्रधार:[ serious ] तीनों दोस्त खौफ से कांपते हुए स्टेशन के मुख्य प्लेटफॉर्म की तरफ धीरे-धीरे बढ़ने लगे।
सूत्रधार:[ whispering ] हवा में एक अजीब सी सड़न और पुरानी जली हुई लकड़ियों की बदबू फैली हुई थी।
अमित:[ nervous ] रिया, तुम मेरा हाथ कसकर पकड़ लो, यहाँ की हवा में बहुत अजीब सी ठंडक है।
रिया:[ scared ] अमित, मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कोई दूर से छुपकर हम तीनों पर नज़र रख रहा है।
रोहन:[ angry ] तुम दोनों बेकार में डर रहे हो, कोई नहीं है यहाँ सिवाय उल्लू और चमगादड़ के।
हरिलाल:[ serious ] अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी है तो यहाँ से तुरंत भाग जाओ लड़कों, यह जगह इंसानों के लिए नहीं है।
रिया:[ shocked ] अरे बाप रे! यह बूढ़ा आदमी अचानक अँधेरे में से कहाँ से निकल आया?
अमित:[ confused ] बाबा, आप कौन हैं और इस बंद पड़े स्टेशन पर इतनी रात को क्या कर रहे हैं?
हरिलाल:[ serious ] मैं इस काकीनाड़ा स्टेशन का आखिरी लालटेन मैन हरिलाल हूँ, और तुम्हें चेतावनी देने आया हूँ।
रोहन:[ sarcastic ] चेतावनी? बाबा जी, हमारी कार खराब हुई है, बस थोड़ी देर ट्रेन की पटरी के पास रुकेंगे।
हरिलाल:[ angry ] बेवकूफी मत करो लड़के, रात के दो बजने वाले हैं और वह काली एक्सप्रेस आती ही होगी।
रिया:[ curious ] काली एक्सप्रेस? पर इंटरनेट पर तो लिखा था कि इस रूट पर कोई ट्रेन नहीं चलती।
हरिलाल:[ sad ] जो ट्रेन पंद्रह साल पहले खाई में गिरकर जल गई थी, वह किसी टाइम टेबल में नहीं लिखी होती।
सूत्रधार:[ serious ] हरिलाल की आँखें खौफ से फैली हुई थीं और उसके कांपते हाथों में एक पुरानी लालटेन जल रही थी।
सूत्रधार:[ whispering ] लालटेन की रोशनी में हरिलाल का चेहरा किसी सूखी हुई खोपड़ी जैसा लग रहा था।
अमित:[ curious ] हरिलाल बाबा, आप किस हादसे की बात कर रहे हैं, हमें पूरी बात साफ़-साफ़ बताइए।
हरिलाल:[ sad ] पंद्रह साल पहले इसी स्टेशन पर मोहिनी नाम की एक बदकिस्मत औरत को ट्रेन से फेंक दिया गया था।
रिया:[ shocked ] क्या कहा आपने? किसी ने उसे चलती हुई ट्रेन से नीचे फेंक दिया था?
हरिलाल:[ emotional ] हाँ बेटी, उसके ढोंगी पति ने जेवरों की खातिर उसे चलती एक्सप्रेस से नीचे ढकेल दिया था।
हरिलाल:[ serious ] तड़प-तड़पकर मरते वक्त मोहिनी ने उस पूरी ट्रेन को एक भयानक श्राप दे दिया था।
रोहन:[ nervous ] श्राप? बाबा, आप कहानियाँ तो बहुत अच्छी गढ़ लेते हैं, पर हम इन बातों पर यकीन नहीं करते।
हरिलाल:[ angry ] तुम्हें यकीन नहीं है तो सुनो, उस रात के बाद से वह ट्रेन रोज रात दो बजकर तेरा मिनट पर आती है।
रिया:[ scared ] और उस ट्रेन में क्या होता है हरिलाल बाबा, क्या वह मोहिनी आज भी वहीं है?
हरिलाल:[ whispering ] वह एक भयानक चुड़ैल बन चुकी है, जो भी उस ट्रेन में चढ़ता है, वह कभी वापस नहीं आता।
अमित:[ anxious ] रोहन, मुझे लगता है कि हमें बाबा की बात मानकर वापस सड़क की तरफ चलना चाहिए।
रोहन:[ nervous ] पर हमारी गाड़ी तो बंद पड़ी है, इस घने जंगल में पैदल कहाँ जाएँगे हम लोग?
सूत्रधार:[ serious ] तभी अचानक हवा का रुख बदला और दूर पटरियों से लोहे के रगड़ने की कर्कश आवाज आने लगी।
सूत्रधार:[ scared ] सन्नाटे को चीरती हुई एक भयानक सीटी की आवाज गूँजी, जो किसी इंसान के चीखने जैसी लग रही थी।
रिया: अमित! वह देखो दूर अँधेरे में red light जल रही है, क्या सच में कोई ट्रेन आ रही है?
हरिलाल: अरे सर्वनाश हो गया! दो बजकर तेरा मिनट हो गए, वह मोहिनी की भूतिया ट्रेन आ गई!
रोहन:[ shocked ] यह कैसे हो सकता है? बंद पड़ी पटरियों पर बिना बिजली के ट्रेन कैसे चल सकती है?
अमित:[ worried ] बाबा, आप कहाँ जा रहे हैं? हमारी मदद कीजिए, हमें यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता बताइए!
हरिलाल:[ shouting ] भागो यहाँ से! प्लेटफॉर्म के पीछे वाले जंगल की तरफ भागो, वरना वह तुम्हें मार डालेगी!
सूत्रधार:[ serious ] बूढ़ा हरिलाल अपनी लालटेन फेंककर घने जंगलों की तरफ पागलों की तरह भाग खड़ा हुआ।
सूत्रधार:[ whispering ] तभी पटरियों पर एक काली-सड़ी हुई भाप वाली ट्रेन आकर रुक गई, जिससे खून जैसी बदबू आ रही थी।
रिया:[ crying ] अमित, मेरे पैर जम गए हैं, मुझसे भागा नहीं जा रहा है, मुझे बहुत डर लग रहा है!
अमित:[ shouting ] हिम्मत मत हारो रिया, मेरा हाथ पकड़ो और उस टूटे हुए सिग्नल रूम की तरफ भागो!
रोहन:[ confused ] रुको अमित! ट्रेन का दरवाजा अपने आप खुल गया है, और अंदर बहुत तेज़ पीली रोशनी है।
मोहिनी:[ whispering ] आओ मेरे बच्चों... कब से तुम लोगों का इंतज़ार कर रही थी... अंदर आ जाओ...
रिया:[ shocked ] यह किसकी आवाज थी? ऐसा लग रहा है जैसे कोई सीधे मेरे दिमाग के अंदर बोल रहा है।
अमित:[ anxious ] यह उसी चुड़ैल की आवाज है, रोहन पीछे हटो, ट्रेन के दरवाजे के पास मत जाओ!
रोहन:[ curious ] अमित, ट्रेन के अंदर देखो, पुराने ज़माने के गद्देदार सोफे लगे हैं और टेबल पर खाना रखा है।
रिया:[ scared ] रोहन! तुम पगला गए हो क्या? सड़ी हुई ट्रेन में खाना कहाँ से आएगा?
सूत्रधार:[ serious ] रोहन जैसे किसी सम्मोहन के वश में होकर धीरे-धीरे ट्रेन के डिब्बे की सीढ़ियों पर चढ़ने लगा।
सूत्रधार:[ scared ] उसकी आँखों की पुतलियाँ पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं और चेहरे से डर गायब हो चुका था।
अमित:[ shouting ] रोहन! नीचे उतरो! तुम क्या कर रहे हो, होश में आओ रोहन!
रिया:[ pleading ] रोहन भाई, अमित की बात सुनो, बाहर आ जाओ, वह तुम्हें मार डालेगी!
रोहन:[ calm ] तुम दोनों भी अंदर आ जाओ, यहाँ बहुत आराम है, बाहर बहुत ठंड और अँधेरा है।
सूत्रधार:[ serious ] इससे पहले कि अमित रोहन को खींचे, भूतिया ट्रेन का भारी लोहे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
सूत्रधार:[ whispering ] ट्रेन एक झटके के साथ आगे बढ़ने लगी और उसकी गति पलक झपकते ही बहुत तेज़ हो गई।
अमित:[ angry ] धिक्कार है! रोहन अंदर छूट गया, रिया हमें कैसे भी करके अगले डिब्बे में चढ़ना होगा!
रिया:[ crying ] अमित, ट्रेन बहुत तेज़ चल रही है, अगर हम गिरे तो हमारी हड्डियाँ भी नहीं मिलेंगी!
अमित:[ determined ] अगर हम यही खड़े रहे तो भी मरेंगे, आओ उस पीछे वाले गार्ड के डिब्बे पर छलांग लगाते हैं!
सूत्रधार:[ serious ] अमित और रिया ने अपनी जान हथेली पर रखकर चलती हुई भूतिया ट्रेन के पिछले पायदान को पकड़ लिया।
सूत्रधार:[ scared ] डिब्बे के अंदर का माहौल बाहर से भी ज्यादा डरावना और जमा देने वाला ठंडा था।
रिया: अमित... यहाँ का तापमान तो माइनस में लग रहा है, मेरी साँसें जम रही हैं।
अमित:[ worried ] रिया, अपना टॉर्च जलाओ और देखो कि रोहन किस तरफ गया है, हमें उसे ढूँढना होगा।
रिया:[ scared ] टॉर्च काम नहीं कर रही है अमित, इसकी बैटरी अचानक अपने आप खत्म हो गई।
सूत्रधार:[ serious ] तभी डिब्बे के बीच में लगी हुई पुरानी बल्ब की बत्तियाँ अपने आप जलने और बुझने लगीं।
सूत्रधार:[ whispering ] डिब्बे के फर्श पर लाल रंग का गाढ़ा खून धीरे-धीरे बहकर उनकी तरफ आ रहा था।
रिया: अमित! नीचे देखो! यह क्या है? फर्श पर इतना सारा खून कहाँ से आ रहा है?
अमित:[ anxious ] ऊपर छत की तरफ मत देखना रिया, ऊपर से कुछ टपक रहा है।
रिया:[ crying ] मुझसे नहीं रहा जाता अमित, मैं हिम्मत हार रही हूँ, हम यहाँ से कभी जिंदा नहीं बचेंगे।
अमित: घबराओ मत रिया, जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।
मोहिनी:[ laughing ] हाहाहा! कितना प्यार है तुम दोनों में... पंद्रह साल पहले मेरे पति ने भी यही कहा था...
सूत्रधार:[ serious ] डिब्बे के कोने में अँधेरे से एक ढीले-ढाले लाल जोड़े में लिपटी हुई चुड़ैल प्रकट हुई।
सूत्रधार:[ scared ] उसके बाल फर्श तक लंबे थे, चेहरे की चमड़ी उधड़ी हुई थी और पैर पीछे की तरफ मुड़े हुए थे।
रिया:[ shocked ] अमित... वह देखो... मोहिनी की आत्मा... उसके हाथ के नाखून कितने लंबे और नुकीले हैं!
अमित:[ shouting ] पीछे हटो शैतान! हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, हमें और हमारे दोस्त को जाने दो!
मोहिनी:[ angry ] जाने दूँ? इस ट्रेन में जो एक बार चढ़ जाता है, वह सिर्फ राख बनकर बाहर निकलता है!
रोहन:[ laughing ] अमित... रिया... तुम दोनों भी मेरी तरह इस ट्रेन का हिस्सा बन जाओ, बहुत मज़ा आएगा।
रिया:[ shocked ] रोहन! तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों हो गया है? तुम्हारी आँखों से खून क्यों बह रहा है?
रोहन:[ mocking ] दर्द तो सिर्फ शुरुआत है रिया, जब मोहिनी माँ तुम्हारी आत्मा निचोड़ेंगी तब असली मज़ा आएगा!
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अमित:[ angry ] रोहन होश में आओ! वह चुड़ैल तुम्हारे दिमाग पर कब्ज़ा कर चुकी है, उसे पहचानो!
सूत्रधार:[ serious ] अमित ने रोहन को जोर से धक्का दिया और रिया का हाथ पकड़कर दूसरे डिब्बे की तरफ भागा।
सूत्रधार:[ whispering ] ट्रेन की खिड़कियों के शीशे अपने आप टूटने लगे और बाहर से भयानक चीखें आने लगीं।
रिया: अमित, मैं और नहीं भाग सकती, मेरे पैर जवाब दे रहे हैं।
अमित:[ nervous ] बस थोड़ा सा और रिया, हमें इस ट्रेन के इंजन तक पहुँचना होगा और इमरजेंसी ब्रेक खींचना होगा।
मोहिनी: तुम इस ट्रेन से कभी नहीं भाग सकते! यह ट्रेन मेरी नफरत से चलती है!
सूत्रधार:[ serious ] मोहिनी हवा में तैरते हुए अमित और रिया के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई।
सूत्रधार:[ scared ] उसके कटे हुए गले से काला खून बह रहा था और आँखों की जगह सिर्फ दो गहरे गड्ढे थे।
रिया:[ pleading ] मोहिनी जी, हम आपके गुनहगार नहीं हैं, जिसने आपके साथ अन्याय किया वह तो कब का मर चुका है!
मोहिनी:[ sad ] अन्याय? मेरे साथ जो हुआ उसकी सजा इस दुनिया के हर इंसान को भुगतनी होगी!
अमित: पर निर्दोषों को मारकर तुम्हें क्या मिलेगा? तुम्हें शांति कभी नहीं मिलेगी मोहिनी!
मोहिनी:[ angry ] मुझे शांति नहीं, मुझे सिर्फ बदला चाहिए! और आज तुम दोनों मेरी भूख मिटाओगे!
सूत्रधार:[ serious ] मोहिनी ने अपने लंबे काले नाखूनों वाले हाथ अमित की गर्दन की तरफ बढ़ाए।
सूत्रधार:[ whispering ] अमित की साँसें रुकने लगीं और उसका चेहरा ऑक्सीजन की कमी से नीला पड़ने लगा।
रिया:[ crying ] अमित! नहीं! मोहिनी माँ, अमित को छोड़ दो, बदले में मेरी जान ले लो!
अमित: रिया... भागो... इंजन की तरफ जाओ... लाल हैंडल खींचो...
रिया:[ determined ] नहीं अमित, मैं तुम्हें छोड़कर अकेले कभी नहीं जाऊँगी!
सूत्रधार:[ serious ] रिया ने देखा कि हरिलाल की दी हुई पीतल की पुरानी ताबीज उसके गले में लटक रही थी।
सूत्रधार:[ scared ] जब हरिलाल ने रिया का हाथ पकड़ा था, तब उसने चुपके से यह ताबीज रिया की जेब में डाल दी थी।
रिया:[ hopeful ] हरिलाल बाबा ने कहा था कि पवित्र धातु से यह चुड़ैल डरती है!
रिया:[ shouting ] मोहिनी! यह देखो! इस पवित्र मंत्र के आगे तेरी काली शक्ति काम नहीं करेगी!
सूत्रधार:[ serious ] रिया ने गले से ताबीज निकाली और सीधे मोहिनी के जलते हुए चेहरे पर चिपका दी।
सूत्रधार:[ shouting ] मोहिनी की एक भयानक चीख पूरे जंगल में गूँज उठी, जैसे सौ शेर एक साथ दहाड़ रहे हों।
मोहिनी: आअाह्हह! यह क्या जलन है! दूर हटाओ इसे मेरे चेहरे से!
अमित:[ relieved ] रिया... तुमने कमाल कर दिया... मेरी गर्दन छूट गई...
रिया:[ anxious ] अमित जल्दी करो! ताबीज का असर ज्यादा देर तक नहीं रहेगा, हमें इंजन तक पहुँचना होगा!
सूत्रधार:[ serious ] अमित और रिया पागलों की तरह बोगी के दरवाजे तोड़ते हुए इंजन के केबिन की तरफ भागे।
सूत्रधार:[ whispering ] पीछे-पीछे रोहन भी एक लोहे की रॉड लेकर भूतिया रूप में उनके पीछे दौड़ रहा था।
रोहन:[ shouting ] तुम मोहिनी माँ से नहीं बच सकते! मैं तुम दोनों के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा!
अमित:[ angry ] रोहन, मुझे माफ़ कर देना भाई, मुझे यह मजबूरी में करना पड़ रहा है!
सूत्रधार:[ serious ] अमित ने इंजन के पास पड़ा एक भारी अग्निशामक सिलेंडर उठाकर रोहन के पैरों पर दे मारा।
सूत्रधार:[ scared ] रोहन दर्द से चिल्लाता हुआ फर्श पर गिर पड़ा और उसके दिमाग से चुड़ैल का वशीकरण टूटने लगा।
रोहन:[ confused ] अमित? रिया? मैं कहाँ हूँ? मेरा सिर इतना भारी क्यों लग रहा है?
रिया:[ excited ] रोहन! तुम वापस आ गए! अमित, रोहन का होश वापस आ गया है!
अमित: रोहन, सवाल पूछने का वक्त नहीं है, जल्दी उठो और इस लोहे के हैंडल को नीचे खींचो!
सूत्रधार:[ serious ] तीनों दोस्तों ने मिलकर इंजन के उस लाल और जंग लगे इमरजेंसी ब्रेक के लीवर को पूरा जोर लगाकर खींचा।
सूत्रधार: पहियों से भयानक चिंगारियाँ निकलने लगीं और पूरी ट्रेन हिंसक रूप से हिलने लगी।
मोहिनी:[ shouting ] नहीं! तुम मेरी ट्रेन को नहीं रोक सकते! मैं तुम सबको अपने साथ खाई में ले जाऊँगी!
रिया:[ scared ] अमित! देखो सामने पटरी खत्म हो रही है, आगे गहरी खाई है!
अमित:[ shouting ] दरवाजा खोलो! जब मैं कहूँ तो सब लोग बाहर छलांग लगा देना!
रोहन: इतनी तेज़ स्पीड में कूदेंगे तो हम पत्थरों पर गिरकर मर जाएँगे!
अमित:[ determined ] ट्रेन में रहे तो जलकर राख हो जाएँगे, कूदने में कम से कम बचने का मौका तो है!
सूत्रधार:[ serious ] ट्रेन खाई के मुहाने तक पहुँच चुकी थी और मोहिनी का भूतिया साया उनके बिल्कुल सिर पर आ पहुँचा था।
अमित:[ shouting ] अब कूदो! सब लोग एक साथ कूद जाओ!
सूत्रधार:[ serious ] तीनों दोस्तों ने एक साथ ट्रेन के खुले दरवाजे से बाहर रात के घने अँधेरे में छलांग लगा दी।
सूत्रधार:[ scared ] भूतिया ट्रेन एक भयानक धमाके के साथ खाई में गिरकर आग के विशाल गोले में तब्दील हो गई।
सूत्रधार:[ whispering ] मोहिनी की आखिरी चीख पूरे आसमान में गूँजी और फिर अचानक हर तरफ गहरा सन्नाटा छा गया।
रिया: ओह... मेरा पैर... अमित, रोहन, क्या तुम लोग जिंदा हो?
अमित:[ relieved ] मैं... मैं ठीक हूँ रिया... रोहन तुम्हारे पास है?
रोहन:[ crying ] हाँ अमित, मैं भी जिंदा हूँ... पर मेरा हाथ छिल गया है।
सूत्रधार:[ serious ] सुबह की हल्की पहली किरण जंगलों के ऊपर चमकने लगी थी।
सूत्रधार:[ whispering ] काकीनाड़ा स्टेशन अब एक साधारण, टूटा-फूटा और पुराना निर्जन ढांचा लग रहा था।
अमित:[ surprised ] रिया, रोहन... देखो सामने सड़क पर पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी हैं और लोग हमें ढूँढ रहे हैं।
हरिलाल:[ relieved ] भगवान का लाख-लाख शुक्र है! तुम तीनों बच्चे उस काल के मुंह से जिंदा वापस लौट आए!
रिया:[ confused ] हरिलाल बाबा! आप पुलिस को लेकर आए हैं?
हरिलाल:[ sad ] हाँ बेटी, मैं भागकर मुख्य सड़क पर गया था और गश्ती पुलिस को पूरी बात बताई।
रोहन:[ anxious ] बाबा, वह ट्रेन... वह मोहिनी... क्या वह हमेशा के लिए खत्म हो गई?
हरिलाल:[ serious ] जब तक उस खाई में मोहिनी की अस्थियों को शांति नहीं मिलती, यह श्राप पूरी तरह खत्म नहीं होगा।
सूत्रधार:[ serious ] अमित, रिया और रोहन ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और उस खौफनाक स्टेशन को आखिरी बार देखा।
सूत्रधार:[ whispering ] उन्हें दूर खाई के धुएँ में आज भी एक औरत का लाल जोड़ा लहराता हुआ दिखाई दे रहा था।
सूत्रधार:[ scared ] काकीनाड़ा का वह भूतिया स्टेशन आज भी वहीं है, अपनी अगली शिकार वाली रात के इंतज़ार में।
अमित:[ worried ] रिया, क्या तुम्हें भी ऐसा लग रहा है कि कोई अभी भी हमारे पीछे-पीछे आ रहा है?
रिया:[ scared ] अमित, बातें मत करो, जल्दी गाड़ी में बैठो, मुझे इस जगह से जितनी जल्दी हो सके दूर जाना है।
रोहन:[ nervous ] मैं तो कभी ज़िंदगी में दोबारा किसी रात के सफर पर नहीं निकलूँगा, चाहे कुछ भी हो जाए।
हरिलाल:[ sad ] सही कहते हो लड़के, कुछ रहस्य इंसान की समझ से बहुत परे होते हैं, उन्हें छेड़ना नहीं चाहिए।
सूत्रधार:[ serious ] पुलिस की गाड़ी तीनों दोस्तों को लेकर काकीनाड़ा के उस मनहूस जंगल से बाहर निकल गई।
सूत्रधार:[ whispering ] पर उस रात का खौफ और मोहिनी की वह भयानक चीख उनके दिलों में उम्र भर के लिए दफन हो गई।
सूत्रधार:[ scared ] अगर आप भी कभी रात में किसी सुनसान स्टेशन पर रुकें, तो पटरियों की तरफ देखने की भूल हरगिज मत करना।
सूत्रधार:[ serious ] क्योंकि हो सकता है कि दो बजकर तेरा मिनट पर आने वाली वह काली एक्सप्रेस आपका भी इंतज़ार कर रही हो।
अमित: रोहन, क्या तुम्हें वाकई लगता है कि हम उस ट्रेन से पूरी तरह सुरक्षित बाहर आ चुके हैं?
रोहन:[ confused ] तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो अमित? हम तो अपनी पुलिस वाली गाड़ी में बैठे हैं और शहर की तरफ जा रहे हैं।
रिया:[ surprised ] अमित के कहने का मतलब है कि क्या मोहिनी का श्राप सच में उस खाई में जलकर भस्म हो गया?
हरिलाल:[ serious ] आत्माएं कभी मरती नहीं हैं बच्चों, वे सिर्फ अपनी जगह और अपना रूप बदल लेती हैं।
सूत्रधार:[ serious ] हरिलाल की यह बात सुनकर गाड़ी में बैठे तीनों दोस्तों के रोंगटे एक बार फिर खड़े हो गए।
सूत्रधार:[ whispering ] पुलिस की गाड़ी के पिछले शीशे पर अचानक दो खूनी हाथों के निशान उभरने लगे थे।
रिया: अमित! गाड़ी का शीशा देखो! वह हाथों के निशान... वह मोहिनी के हैं!
अमित:[ shocked ] नहीं! यह कैसे संभव है? क्या वह ट्रेन के साथ खत्म नहीं हुई थी?
मोहिनी:[ laughing ] हाहाहा! तुम मुझसे कभी पीछा नहीं छुड़ा सकते... मैं तुम सबके अंदर समा चुकी हूँ...
रोहन: बचाओ! मुझे बचाओ! मेरे गले में जलन हो रही है!
सूत्रधार:[ serious ] रोहन का चेहरा फिर से पीला पड़ने लगा और उसकी आँखों में वही काली भूतिया चमक वापस आने लगी।
सूत्रधार:[ scared ] पुलिस का ड्राइवर घबराकर गाड़ी से नियंत्रण खो बैठा और गाड़ी सड़क किनारे बने एक बड़े पेड़ से टकरा गई।
अमित: रिया... रोहन... क्या सब ठीक हो? कोई जवाब दो!
रिया:[ crying ] अमित, मेरा सिर घूम रहा है... हरिलाल बाबा कहाँ गए? वे तो हमारे साथ ही बैठे थे ना?
सूत्रधार:[ serious ] अमित ने मुड़कर देखा तो पीछे वाली सीट पूरी तरह खाली थी, वहाँ कोई हरिलाल बाबा नहीं थे।
सूत्रधार:[ whispering ] सीट पर सिर्फ वही पुरानी, जंग लगी लालटेन रखी हुई थी जो हरिलाल के हाथ में हुआ करती थी।
अमित:[ shocked ] हरिलाल बाबा भी कोई इंसान नहीं थे... वे भी उसी भूतिया स्टेशन का एक हिस्सा थे!
रोहन:[ mocking ] हाहाहा! तुमने पहचाने में बहुत देर कर दी अमित भाई... हरिलाल तो मोहिनी माँ का पहला शिकार था!
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रिया: अमित, रोहन का शरीर पूरी तरह बदल रहा है! इसके मुँह से काला धुआँ निकल रहा है!
अमित:[ determined ] रिया, गाड़ी का दरवाजा खोलो और बाहर भागो! हमें इस जंगल के पवित्र मंदिर तक पहुँचना होगा!
सूत्रधार:[ serious ] अमित और रिया दुर्घटनाग्रस्त कार से बाहर निकले और जंगल के बीच बने एक पुराने शिव मंदिर की तरफ भागे।
सूत्रधार:[ scared ] पीछे-पीछे रोहन और मोहिनी की संयुक्त रूहानी ताकत उनके ऊपर काल बनकर मँडरा रही थी।
रिया:[ pleading ] हे भगवान! हमारी रक्षा करो! हमें इस भयानक साये से बचा लो!
अमित:[ shouting ] रिया, मंदिर का घंटा बजाओ! उस पवित्र आवाज से यह बुरी आत्मा पास नहीं आ पाएगी!
सूत्रधार:[ serious ] रिया ने अपनी पूरी ताकत लगाकर मंदिर के विशाल पीतल के घंटे को बजाना शुरू कर दिया।
सूत्रधार: टन-टन की गूँजती हुई आवाज से पूरा जंगल कांपने लगा और मोहिनी की रूह दर्द से तड़पने लगी।
मोहिनी: बंद करो इस आवाज को! यह आवाज मेरी शक्तियों को जला रही है!
रोहन:[ crying ] अमित... बचाओ मुझे... मेरे शरीर के अंदर बहुत जलन हो रही है!
अमित: रोहन, हिम्मत रखो! मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ आओ, यहाँ मोहिनी का साया तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता!
सूत्रधार:[ serious ] रोहन किसी तरह घिसटते हुए मंदिर के गर्भगृह के अंदर पहुँच गया और शिवलिंग के सामने गिर पड़ा।
सूत्रधार:[ whispering ] जैसे ही रोहन ने शिवलिंग पर माथा रखा, उसके शरीर से मोहिनी का काला साया छिटककर बाहर निकल गया।
मोहिनी:[ shouting ] तुम मुझे हरा नहीं सकते! मैं फिर आऊँगी... मैं हर रात दो बजकर तेरा मिनट पर वापस आऊँगी!
रिया:[ hopeful ] अमित देखो! सूरज की लालिमा आसमान में फैल रही है! सुबह की रोशनी आ गई!
सूत्रधार:[ serious ] सूर्य की पहली किरण जैसे ही मोहिनी के काले साये पर पड़ी, वह चीखती हुई हवा में भाप बनकर उड़ गई।
सूत्रधार:[ calm ] जंगल का भयानक सन्नाटा धीरे-धीरे चिड़ियों की चहचहाहट में बदलने लगा।
अमित:[ relieved ] आख़िरकार... आख़िरकार वह खौफनाक रात खत्म हो ही गई।
रोहन:[ emotional ] अमित, रिया... मुझे माफ़ कर दो, मेरी वजह से तुम दोनों की जान इतने बड़े खतरे में पड़ गई थी।
रिया:[ sympathetic ] तुम्हारी कोई गलती नहीं थी रोहन, उस चुड़ैल ने तुम्हारे दिमाग पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था।
अमित:[ serious ] अब हमें यहाँ एक पल भी नहीं रुकना चाहिए, सुबह हो गई है, चलो गाँव की तरफ चलते हैं।
सूत्रधार:[ serious ] तीनों दोस्त खौफ और थकान से चूर होकर धीरे-धीरे जंगल के रास्ते से मुख्य हाईवे की तरफ बढ़ने लगे।
सूत्रधार:[ whispering ] काकीनाड़ा का वह भूतिया स्टेशन अब पीछे छूट चुका था, पर उसकी खौफनाक यादें हमेशा के लिए जीवित रहीं।
सूत्रधार:[ scared ] लेकिन याद रखिए, अगर कभी आपको रात के सन्नाटे में बिना किसी ट्रेन के सीटी की आवाज सुनाई दे...
सूत्रधार:[ serious ] तो समझ जाना कि मोहिनी आज भी किसी नए मुसाफिर की तलाश में अपनी भूतिया एक्सप्रेस चला रही है।
अमित: रिया, क्या तुम्हें लगता है कि काकीनाड़ा स्टेशन का वह खौफनाक राज अब दुनिया के सामने आना चाहिए?
रिया:[ anxious ] नहीं अमित, अगर लोग वहाँ जाएँगे तो उत्सुकता में अपनी जान गंवा बैठेंगे।
रोहन:[ serious ] सही कह रही है रिया, उस जगह को ऐसे ही वीरान और बंद ही रहने देना चाहिए।
हरिलाल:[ whispering ] पर जो सच छुपाया जाता है, वह और भी ज्यादा भयानक बनकर वापस लौटता है मेरे बच्चों...
रिया:[ shocked ] यह किसकी आवाज थी? क्या फिर से हरिलाल बाबा बोल रहे हैं?
अमित: पीछे मत देखो रिया! सीधे चलते रहो, किसी भी आवाज पर ध्यान मत दो!
सूत्रधार:[ serious ] हवा में तैरती वह पुरानी लालटेन की रोशनी एक बार फिर अँधेरे में गायब हो गई।
सूत्रधार:[ whispering ] काकीनाड़ा का स्टेशन आज भी उसी जगह खामोश खड़ा है, जहाँ समय थम चुका है।
सूत्रधार:[ scared ] और हर रात दो बजकर तेरा मिनट पर... पटरियों पर खून की नदियाँ बहती हैं।
सूत्रधार:[ serious ] क्या आप कभी उस काकीनाड़ा एक्सप्रेस का टिकट लेना चाहेंगे? जवाब अपने दिल से पूछिएगा।
अमित:[ nervous ] रिया, रोहन, चलो जल्दी पाँव बढ़ाओ, सामने हाईवे दिख रहा है।
रिया:[ hopeful ] हाँ अमित, सामने से एक बस आ रही है, अब हम पूरी तरह सुरक्षित हैं।
रोहन:[ relieved ] भगवान का शुक्रिया कि हम सब सही-सलामत इस दुस्वप्न से बाहर निकल आए।
सूत्रधार:[ serious ] और इस तरह काकीनाड़ा के भूतिया स्टेशन की यह रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी यहाँ समाप्त होती है।
सूत्रधार:[ whispering ] सावधान रहें, सुरक्षित रहें, क्योंकि अँधेरा हमेशा किसी न किसी कोने में आपका इंतज़ार कर रहा होता है।
अमित:[ curious ] रिया, एक बात बताओ, जब तुम उस डिब्बे में मोहिनी के सामने खड़ी थीं, तो तुम्हें सबसे ज्यादा डर किस बात का लग रहा था?
रिया:[ sad ] मुझे लग रहा था कि शायद मैं तुम दोनों को कभी दोबारा जिंदा नहीं देख पाऊँगी।
रोहन:[ emot
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बिल्कुल Gufran Sir। इस कहानी में आगे से मैं Narration कम और Characters के Dialogues ज्यादा रखूँगा। हर Scene को इतना detailed रखेंगे कि पूरी कहानी आराम से 20+ मिनट की बने। Suspense को भी एकदम धीरे-धीरे build करेंगे, ताकि शुरुआत से ही viewer वीडियो छोड़कर न जाए।

यह रहा Scene 1 का विस्तृत और ज्यादा engaging version:

Scene 1 — सुनसान कालाघाट स्टेशन

घने जंगलों के बीच एक पुराना रेलवे स्टेशन था—कालाघाट स्टेशन।

स्टेशन इतना सुनसान था कि दिन के समय भी वहाँ ट्रेन से उतरने वाले गिने-चुने लोग ही दिखाई देते थे। चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे पेड़, झाड़ियाँ और दूर तक फैला हुआ घना जंगल था।

शाम होते ही स्टेशन पर अजीब-सी खामोशी छा जाती थी।

और रात के बाद...

इस स्टेशन का नाम लेना भी आसपास के गाँवों के लोग पसंद नहीं करते थे।

उस रात करीब 10 बजे रघु स्टेशन के छोटे-से ऑफिस में बैठा रजिस्टर में कुछ लिख रहा था।

तभी दरवाजा खोलकर मोहन अंदर आया।

मोहन: “रघु भाई...”

रघु ने बिना सिर उठाए कहा—

रघु: “क्या हुआ? इतनी घबराई हुई आवाज में क्यों बुला रहे हो?”

मोहन धीरे-धीरे उसके पास आया और कुर्सी खींचकर बैठ गया।

मोहन: “आज रात तुम्हारी ड्यूटी है ना?”

रघु: “हाँ, तो?”

मोहन: “तो मैं कह रहा हूँ... आज रात तुम मेरे साथ ही रहना।”

रघु ने रजिस्टर बंद किया और मोहन की तरफ देखकर हँसने लगा।

रघु: “तुम्हारी ड्यूटी तो कल है। आज मेरी ड्यूटी है। फिर तुम मेरे साथ क्यों रहोगे?”

मोहन ने इधर-उधर देखा और धीमी आवाज में बोला—

मोहन: “क्योंकि आज अमावस की रात है।”

रघु कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर हँसकर बोला—

रघु: “अच्छा! तो अमावस की रात में स्टेशन पर भूतों की हाजिरी लगती है क्या?”

मोहन: “मजाक मत करो रघु भाई।”

रघु: “मैं मजाक नहीं कर रहा। तुम सच में डरे हुए लग रहे हो।”

मोहन ने खिड़की के बाहर देखा।

बाहर अंधेरा गहराने लगा था।

हवा तेज चल रही थी और पेड़ों की टहनियाँ आपस में टकराकर अजीब आवाजें कर रही थीं।

मोहन: “तुम्हें यहाँ की कहानी नहीं पता, इसलिए हँस रहे हो।”

रघु: “कौन-सी कहानी?”

मोहन कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक स्टेशन के बाहर से—

ठक... ठक... ठक...

की आवाज आई।

दोनों चुप हो गए।

रघु ने मोहन की तरफ देखा।

रघु: “ये कैसी आवाज थी?”

मोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।

फिर वही आवाज आई—

ठक... ठक... ठक...

इस बार आवाज पहले से ज्यादा साफ थी।

मोहन तुरंत कुर्सी से उठ गया।

रघु: “अरे बैठो! बाहर हवा से कुछ गिरा होगा।”

मोहन: “नहीं... ये हवा की आवाज नहीं है।”

रघु: “तो फिर क्या है?”

मोहन ने धीरे से कहा—

मोहन: “प्लेटफॉर्म नंबर दो।”

रघु ने भौंहें सिकोड़ लीं।

रघु: “प्लेटफॉर्म नंबर दो पर क्या है?”

मोहन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

मोहन: “कुछ नहीं।”

रघु: “तो?”

मोहन: “यही तो डर की बात है।”

कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

फिर रघु टॉर्च उठाकर खड़ा हो गया।

रघु: “चलो देखते हैं।”

मोहन ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

मोहन: “नहीं!”

रघु: “क्यों?”

मोहन: “मैंने कहा ना, मत जाओ।”

रघु: “मोहन, अगर स्टेशन पर कोई जानवर घुस आया होगा तो?”

मोहन: “जानवर होता तो ठीक था।”

रघु ने उसकी तरफ देखा।

रघु: “तुम कहना क्या चाहते हो?”

मोहन ने गहरी साँस ली।

फिर बहुत धीमी आवाज में बोला—

मोहन: “तुमने कभी उस ट्रेन के बारे में सुना है?”

रघु: “कौन-सी ट्रेन?”

मोहन: “जो रात के बारह बजे आती है।”

रघु कुछ पल चुप रहा।

रघु: “कौन-सी ट्रेन? हमारे स्टेशन पर रात के बारह बजे तो कोई ट्रेन नहीं आती।”

मोहन: “मैं भी यही कह रहा हूँ।”

रघु: “तो फिर?”

मोहन ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—

मोहन: “एक ट्रेन आती है... लेकिन वो रेलवे की ट्रेन नहीं है।”

रघु के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

रघु: “क्या मतलब?”

मोहन: “उसका कोई नंबर नहीं है।”

रघु: “कोई नंबर नहीं?”

मोहन: “न कोई टाइम-टेबल... न कोई ड्राइवर... न कोई गार्ड।”

रघु कुछ सेकंड तक चुप रहा।

फिर हँसकर बोला—

रघु: “और तुमने वो ट्रेन देखी है?”

मोहन ने सिर हिलाया।

मोहन: “हाँ।”

रघु: “कब?”

मोहन: “पिछले साल।”

रघु: “फिर?”

मोहन की आवाज काँपने लगी।

मोहन: “उस रात मेरे साथ जो हुआ... उसके बाद मैंने कसम खा ली कि रात के बारह बजे के बाद इस स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर दो पर कभी नहीं जाऊँगा।”

रघु ने गौर से उसकी तरफ देखा।

रघु: “क्या हुआ था?”

मोहन ने जवाब देने के बजाय कहा—

मोहन: “तुम्हें स्टेशन मास्टर शर्मा जी ने कुछ नहीं बताया?”

रघु: “नहीं।”

मोहन: “उन्होंने जानबूझकर नहीं बताया होगा।”

रघु: “ऐसा क्या राज है?”

मोहन कुछ बोलता, उससे पहले ही ऑफिस के बाहर लगी पुरानी घड़ी ने आवाज की—

टन्... टन्... टन्...

रघु ने घड़ी की तरफ देखा।

10:30 बजे।

मोहन तुरंत खड़ा हो गया।

मोहन: “मैं जा रहा हूँ।”

रघु: “अरे इतनी जल्दी?”

मोहन: “मुझे घर पहुँचना है।”

रघु: “अभी तो दस बजकर तीस मिनट हुए हैं।”

मोहन दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोला—

मोहन: “तुम नहीं समझोगे।”

रघु उसके पीछे गया।

रघु: “कम से कम ये तो बताओ कि वो ट्रेन आखिर है क्या?”

मोहन दरवाजे पर रुक गया।

उसने पीछे मुड़कर रघु को देखा।

कुछ पल तक वह चुप रहा।

फिर बोला—

मोहन: “अगर आज रात बारह बजे ट्रेन की सीटी सुनाई दे...”

रघु ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।

मोहन: “तो प्लेटफॉर्म पर मत जाना।”

रघु: “क्यों?”

मोहन ने धीमे से कहा—

मोहन: “क्योंकि उस ट्रेन में जो बैठी है... वो इंसान नहीं है।”

रघु का चेहरा गंभीर हो गया।

रघु: “कौन बैठी है?”

मोहन ने जवाब दिया—

मोहन: “एक औरत।”

रघु: “कौन औरत?”

मोहन ने दरवाजा खोल दिया।

मोहन: “लोग उसे... चुड़ैल कहते हैं।”

इतना कहकर मोहन तेजी से बाहर निकल गया।

रघु कुछ पल दरवाजे पर खड़ा उसे जाता देखता रहा।

फिर खुद से बोला—

रघु: “पता नहीं इस आदमी ने कौन-सी कहानी बना रखी है।”

वह वापस ऑफिस में आया और कुर्सी पर बैठ गया।

लेकिन इस बार उसका ध्यान रजिस्टर में नहीं लग रहा था।

उसने सामने रखी पुरानी रेलवे फाइल उठाई।

रघु: “देखता हूँ... कालाघाट स्टेशन में ऐसी कौन-सी ट्रेन आती है जिसके बारे में मुझे पता नहीं।”

वह फाइल के पन्ने पलटने लगा।

एक-एक करके पुराने रिकॉर्ड सामने आते गए।

फिर अचानक उसकी नजर एक पुराने पीले पड़े कागज पर पड़ी।

उस पर लिखा था—

“कालाघाट स्टेशन — विशेष घटना रिपोर्ट।”

रघु ने कागज उठाया।

नीचे तारीख लिखी थी—

25 साल पुरानी।

रघु ने जैसे ही आगे पढ़ना शुरू किया...

अचानक ऑफिस की लाइट बंद हो गई।

टक!

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

रघु तुरंत खड़ा हो गया।

रघु: “क्या हो गया?”

उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।

रघु: “मोहन!”

कोई जवाब नहीं आया।

रघु ने खिड़की से बाहर देखा।

पूरा प्लेटफॉर्म अंधेरे में था।

सिर्फ दूर जंगल में किसी जानवर की आवाज सुनाई दे रही थी।

रघु: “शायद बिजली चली गई है।”

तभी...

प्लेटफॉर्म नंबर दो की तरफ से किसी लड़की की बहुत धीमी आवाज आई—

“रघु...”

रघु का शरीर जैसे जम गया।

उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।

रघु: “कौन?”

कोई जवाब नहीं।

कुछ सेकंड बाद फिर आवाज आई—

“रघु...”

इस बार आवाज और साफ थी।

रघु ने टॉर्च उठाई।

रघु: “कौन है वहाँ?”

वह ऑफिस से बाहर निकला।

धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म नंबर दो की तरफ बढ़ने लगा।

जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, उसके कदमों की आवाज पूरे खाली स्टेशन में गूँज रही थी।

ठक... ठक... ठक...

अचानक उसकी टॉर्च की रोशनी पटरी के पास पड़ी किसी चीज पर पड़ी।

रघु रुक गया।

वहाँ एक पुरानी लाल रंग की चूड़ी पड़ी थी।

उसने चूड़ी उठाई।

रघु: “ये यहाँ कैसे आई?”

तभी पीछे से किसी के चलने की आवाज आई।

छप... छप... छप...

रघु तुरंत पीछे मुड़ा।

कोई नहीं था।

लेकिन जमीन पर...

गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

रघु ने टॉर्च नीचे की।

पैरों के निशान उसके पीछे से शुरू होकर...

सीधे जंगल की तरफ जा रहे थे।

रघु धीरे से बोला—

रघु: “यहाँ तो बारिश भी नहीं हुई... फिर ये पैर गीले कैसे हैं?”

उसी समय स्टेशन की घड़ी ने 11 बजे का समय बताया।

टन्... टन्... टन्...

रघु ने घड़ी की तरफ देखा।

फिर उसके हाथ में पकड़ी लाल चूड़ी की तरफ।

और तभी...

दूर जंगल के अंदर से एक लंबी, डरावनी ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

फूँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ!

रघु के चेहरे का रंग उड़ गया।

उसने धीरे से रेलवे लाइन की तरफ देखा।

लेकिन वहाँ कोई ट्रेन नहीं थी।

फिर दूसरी सीटी सुनाई दी...

इस बार आवाज पहले से कहीं ज्यादा करीब थी।

फूँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ!

रघु के हाथ से लाल चूड़ी जमीन पर गिर गई।

और तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

रघु ने काँपते हाथों से फोन उठाया।

रघु: “हैलो?”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक बिल्कुल खामोशी रही।

फिर एक लड़की की धीमी आवाज आई—

“रघु... आज रात... आखिरी ट्रेन में मत बैठना।”

रघु की आँखें फैल गईं।

रघु: “तुम कौन हो?”

फोन के दूसरी तरफ से हल्की-सी हँसी सुनाई दी।

“मैं वही हूँ... जिसका इंतजार ये स्टेशन पिछले पच्चीस सालों से कर रहा है।”

कॉल अचानक कट गया।

रघु कुछ समझ पाता, उससे पहले...

स्टेशन की घड़ी की सुई 11:01 पर आकर रुक गई।

और उसी पल...

जंगल के अंधेरे के बीच दो छोटी-सी पीली रोशनियाँ दिखाई दीं।

रघु ने टॉर्च उस दिशा में की।

लेकिन रोशनी अब धीरे-धीरे...

रेल की पटरियों के साथ उसकी तरफ बढ़ रही थी।

रघु ने फुसफुसाकर कहा—

“क्या... ये वही ट्रेन है?”

और अंधेरे में पहली बार...

एक बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

“रघु...”

“मुझे लेने... ट्रेन आ गई है...”
अब Scene 2 को पिछले Scene की continuity में रखते हुए ज्यादा Dialogue, कम narration, धीरे-धीरे बढ़ता suspense और आखिर में strong hook के साथ लिखते हैं।

Scene 2 — पहला अजीब संकेत

रात के करीब 11:45 बजे थे।

कालाघाट स्टेशन पर चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था।

ऑफिस में बैठा रघु बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था।

उसके सामने वही पुरानी फाइल खुली हुई थी, जिसे वह पिछले कुछ देर से पढ़ने की कोशिश कर रहा था।

लेकिन उसका ध्यान बार-बार उसी फोन कॉल पर जा रहा था।

“रघु... आज रात आखिरी ट्रेन में मत बैठना।”

रघु ने खुद से कहा—

रघु: “आखिर वो लड़की थी कौन?”

वह कुछ देर सोचता रहा।

फिर फाइल का एक और पन्ना पलटा।

अचानक...

टिम... टिम...

ऑफिस की लाइट दो बार झपकी।

रघु ने ऊपर देखा।

रघु: “अब क्या हुआ?”

लाइट फिर सामान्य हो गई।

रघु ने राहत की सांस ली और वापस फाइल पढ़ने लगा।

लेकिन अगले ही पल—

टिम... टिम... टिम...

इस बार स्टेशन की लगभग सारी लाइटें एक साथ झपकने लगीं।

रघु कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

रघु: “ये बिजली की समस्या है या कुछ और?”

उसने मेन स्विच की तरफ देखा।

सब कुछ ठीक था।

फिर अचानक प्लेटफॉर्म की एक लाइट पूरी तरह बंद हो गई।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

कुछ ही सेकंड में प्लेटफॉर्म का आधा हिस्सा अंधेरे में डूब गया।

रघु ने अपनी टॉर्च उठाई।

रघु: “लगता है जनरेटर चेक करना पड़ेगा।”

वह ऑफिस से बाहर निकला।

जैसे ही उसने प्लेटफॉर्म पर कदम रखा...

उसे लगा जैसे किसी ने दूर से उसे देखा है।

रघु रुक गया।

उसने सामने टॉर्च की रोशनी डाली।

कुछ नहीं था।

रघु: “कौन है?”

कोई जवाब नहीं आया।

रघु ने थोड़ी तेज आवाज में पूछा—

रघु: “कौन है वहाँ?”

फिर भी कोई आवाज नहीं।

रघु कुछ कदम आगे बढ़ा।

तभी उसे प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर पर...

एक लड़की खड़ी दिखाई दी।

लंबे बाल।

सफेद कपड़े।

और उसका चेहरा अंधेरे की तरफ था।

रघु ने आँखें सिकोड़कर देखने की कोशिश की।

रघु: “अरे... कौन हो तुम?”

लड़की बिल्कुल शांत खड़ी रही।

न उसने सिर घुमाया...

न कोई जवाब दिया।

रघु ने टॉर्च सीधे उसके ऊपर कर दी।

लेकिन अजीब बात थी—

टॉर्च की रोशनी उसके शरीर तक पहुँच रही थी, फिर भी उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

जैसे उसके चेहरे के सामने कोई काला धुआँ हो।

रघु ने एक कदम आगे बढ़ाया।

रघु: “सुनो! रात में यहाँ अकेले खड़ा होना मना है।”

लड़की ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

रघु ने फिर कहा—

रघु: “अगर ट्रेन का इंतजार कर रही हो तो ऑफिस में आ जाओ। यहाँ प्लेटफॉर्म पर मत खड़ी रहो।”

इस बार लड़की ने बहुत धीरे से अपना सिर थोड़ा-सा घुमाया।

रघु वहीं रुक गया।

उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

रघु: “तुम... सुन रही हो ना?”

लड़की ने धीरे से अपना हाथ उठाया।

और...

पटरी की तरफ इशारा किया।

रघु ने उसी दिशा में देखा।

वहाँ कुछ नहीं था।

वह वापस लड़की की तरफ देखने लगा।

लेकिन...

लड़की गायब थी।

रघु की आँखें फैल गईं।

रघु: “कहाँ गई?”

वह तेजी से आगे बढ़ा।

रघु: “सुनो!”

उसने प्लेटफॉर्म के दोनों तरफ टॉर्च घुमाई।

रघु: “तुम कहाँ हो?”

कोई जवाब नहीं।

रघु ने पीछे देखा।

सामने देखा।

स्टेशन का पूरा प्लेटफॉर्म खाली था।

रघु: “इतनी जल्दी कोई जा भी नहीं सकता...”

तभी उसे कुछ दिखाई दिया।

जमीन पर...

पानी के निशान।

रघु धीरे-धीरे उन निशानों के पास गया।

उसने टॉर्च नीचे की।

एक के बाद एक...

गीले पैरों के निशान।

रघु घुटनों के बल बैठ गया।

उसने उंगली से जमीन छूकर देखी।

उसकी उंगली सचमुच गीली हो गई।

रघु: “पानी...?”

वह खड़ा हुआ।

चारों तरफ देखा।

रघु: “लेकिन बारिश तो हुई ही नहीं।”

उसने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

आसमान बिल्कुल साफ था।

फिर उसने पैरों के निशानों को गौर से देखा।

वे प्लेटफॉर्म से शुरू होकर...

रेल की पटरी की तरफ जा रहे थे।

रघु ने धीमे से कहा—

रघु: “ये लड़की पटरी की तरफ गई है?”

वह निशानों के पीछे चल पड़ा।

एक...

दो...

तीन...

हर कदम के साथ निशान और साफ होते जा रहे थे।

फिर अचानक...

निशान पटरी के ठीक बीच में जाकर रुक गए।

रघु वहीं खड़ा रह गया।

रघु: “यहाँ आकर... निशान खत्म क्यों हो गए?”

उसने आगे टॉर्च की रोशनी डाली।

करीब दस-पंद्रह मीटर दूर तक पटरी बिल्कुल खाली थी।

लेकिन तभी...

छन... छन...

रघु को पायल की बहुत हल्की आवाज सुनाई दी।

उसने तुरंत पीछे देखा।

कोई नहीं।

फिर आवाज आई—

छन... छन... छन...

इस बार आवाज बिल्कुल उसके पीछे से आई थी।

रघु धीरे-धीरे पलटा।

उसकी टॉर्च की रोशनी प्लेटफॉर्म पर घूमी।

कुछ नहीं।

रघु ने हिम्मत करके कहा—

रघु: “अगर यहाँ कोई है... तो सामने आओ।”

सन्नाटा।

रघु: “मैं डरने वाला नहीं हूँ।”

कुछ सेकंड तक कोई आवाज नहीं आई।

फिर बहुत धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

“रघु...”

रघु का चेहरा पीला पड़ गया।

उसने चारों तरफ देखा।

रघु: “कौन?”

फिर वही आवाज—

“रघु...”

इस बार आवाज पटरी के दूसरी तरफ से आई।

रघु ने टॉर्च उस तरफ की।

एक पेड़ के पीछे कोई सफेद-सी चीज दिखाई दी।

रघु ने टॉर्च वहीं रोक दी।

रघु: “कौन है वहाँ?”

सफेद कपड़ा थोड़ा हिला।

रघु आगे बढ़ा।

रघु: “मैंने तुम्हें देख लिया है। बाहर आओ।”

वह पेड़ के पास पहुँचा।

लेकिन वहाँ...

कोई नहीं था।

सिर्फ पेड़ की एक सूखी शाखा हवा में हिल रही थी।

रघु ने राहत की सांस ली।

रघु: “शायद मेरी आँखों का धोखा था।”

वह वापस प्लेटफॉर्म की तरफ मुड़ा।

लेकिन तभी...

उसकी नजर उसी जगह पड़ी जहाँ अभी कुछ देर पहले पैरों के निशान खत्म हुए थे।

अब वहाँ...

एक नया निशान था।

रघु धीरे-धीरे उसके पास गया।

वह निशान बाकी निशानों से अलग था।

वह किसी इंसान के पैर का निशान नहीं था।

वह ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने...

खून से अपना पैर रखकर जमीन पर निशान बनाया हो।

रघु पीछे हट गया।

रघु: “ये क्या है...?”

उसी समय दूर से किसी ट्रेन के पहियों जैसी आवाज सुनाई दी।

खड़... खड़... खड़...

रघु ने तुरंत पटरी की तरफ देखा।

रघु: “ट्रेन?”

लेकिन रेलवे कंट्रोल के हिसाब से इस समय कोई ट्रेन आने वाली नहीं थी।

आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई।

खड़... खड़... खड़...

रघु ने अपनी घड़ी देखी।

11:50 बजे।

उसने तुरंत रेलवे वॉकी-टॉकी उठाया।

रघु: “कंट्रोल रूम, सुन रहे हैं?”

कुछ सेकंड तक सिर्फ खरखराहट सुनाई दी।

रघु: “कंट्रोल रूम, कालाघाट स्टेशन से बोल रहा हूँ। क्या कोई ट्रेन हमारी लाइन पर आ रही है?”

वॉकी-टॉकी में अचानक आवाज आई—

“नहीं... कालाघाट लाइन पर इस समय कोई ट्रेन नहीं है।”

रघु ने राहत की सांस लेने की कोशिश की।

लेकिन तभी कंट्रोल रूम से दूसरी आवाज आई—

“रघु... तुम प्लेटफॉर्म नंबर दो पर हो?”

रघु: “हाँ।”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर आवाज आई—

“तुरंत वहाँ से हट जाओ।”

रघु चौंक गया।

रघु: “क्यों?”

कंट्रोल रूम की आवाज इस बार काँप रही थी।

“क्योंकि... तुम्हारे स्टेशन की तरफ कोई ट्रेन नहीं आ रही...”

कुछ सेकंड की खामोशी।

फिर—

“लेकिन हमारे ट्रैक सेंसर पर कोई चीज बहुत तेज रफ्तार से तुम्हारी तरफ बढ़ रही है।”

रघु के हाथ से वॉकी-टॉकी लगभग गिर गया।

उसने धीरे-धीरे सामने देखा।

दूर...

पटरी के बीचों-बीच...

अंधेरे में एक छोटी-सी रोशनी दिखाई दे रही थी।

रघु ने अपनी टॉर्च बंद कर दी।

अब वह रोशनी साफ दिखाई दे रही थी।

वह रोशनी धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही थी।

और उसके साथ...

एक भयानक ट्रेन की सीटी की आवाज जंगल में गूँज उठी—

फूँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ!

रघु पीछे हटने लगा।

उसकी घड़ी में समय था—

11:55 बजे।

रघु ने घबराकर कहा—

रघु: “अभी पाँच मिनट बाकी हैं...”

फिर उसने उस आती हुई रोशनी को देखा।

और उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई देने लगा।

रघु: “तो फिर... ये ट्रेन पाँच मिनट पहले क्यों आ रही है?”

अचानक...

उसके पीछे से किसी लड़की की आवाज आई—

“क्योंकि आज... ट्रेन सिर्फ तुम्हारे लिए आई है, रघु...”

रघु ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

और इस बार...

वही लड़की उसके ठीक पीछे खड़ी थी।
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Story ideas (Prompt)

Main ek story Hindi mein likhane ja raha hun Kya aap Meri madad karenge

Is scene ko aur jyada words aur alag style mein likho, aur ise aur bhi jyada engaging bnao, yad Rahe ki jo Ham story likhva rahe hain usmein narration jyada nahin Ho characters aapas mein baten jyada kar rahe hon, bich mein suspense bhi rakhna, story hamari 20 minut Se Kam nahin banni chahie uske liye chahe jitne words likhane pade, Is Wale part ko detailed aur long likho abhi dusra part bhi dunga use bhi detailed aur long likhna hai.
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