Forwarded from GKPAD Official
भगत सिंह की बुक "मैं नास्तिक क्यों हूँ?" डाउनलोड करने के लिए इस लिंक को ओपन करें - https://www.gkpad.com/download.php?u=https://anuvadasampada.azimpremjiuniversity.edu.in/3901/1/मैं%20नास्तिक%20क्यों%20हूँ.pdf
❤1
"गुनाहों का देवता - धर्मवीर भारती"
इस बुक बड़ा नाम सुना था तो सोचा पढ़ ही लूं ।
But इसकी कहानी इतनी बकवास लगी की आधा पढ़कर ही छोड़ दिया
पता नहीं क्या सोचकर UPSC में भी इससे सवाल पूछे जाते हैं?
साधारण शब्दों में यह एक Sad प्रेम कहानी वाला उपन्यास है ।
इसके दो मुख्य पात्र "चन्दर" और "सुधा" हैं, जो एक दूसरे से बचपन से ही बहुत प्रेम करते हैं ।
हालांकि वे एक दूसरे से कभी कहते नहीं है, लेकिन एक दूसरे के बिना रह भी नहीं पाते ।
सुधा दूसरे से शादी नहीं करना चाहती है, लेकिन चन्दर ही खुद उसे दूसरे से शादी करने के लिए मनाता है।
"हमारा प्रेम बहुत ऊंचा है", "एक दूसरे से अलग होकर हमारा प्रेम महान हो जाएगा", "मेरी सुधा मेरी बात नहीं मानेगी",
कुछ इस तरह की lines हैं, और कुछ टीचर्स सच में इसकी बड़ाई करते हैं
लेकिन यही मुझे इतना घटिया लगा कि मैने आधा ही पढ़कर छोड़ दिया ।
जब तुम्हारी सुधा है तो तुम उसको दूसरे को क्यों दे रहे हो? जब तुमको पता है की वह तुमसे बहुत प्रेम करती है, तुमको देवता समझती है, फिर उसको कहीं और क्यूं भेज रहे हो
वह तो तुमको देवता पहले ही मान चुकी है, जिससे उसकी शादी होगी, उसकी वह कितनी इज्जत करेगी? क्या कभी उसको उससे प्रेम हो पाएगा?
तुम लोग तो अपने समझ में महान बन गए लेकिन उस तीसरे व्यक्ति की क्या गलती थी जो उसकी लाइफ खराब कर दिए?
इस बात पर कोई भी UPSC टीचर बहस नहीं करना चाहता ।
और शायद लास्ट में सुधा मर भी जाती है और चन्दर अपनी गलती पर पछतावा करता है । (हालांकि मैने लास्ट तक पढ़ा नहीं है)
यह बस एक कहानी ही है, but ऐसा real life में भी होता है ।
मुझे मध्य प्रदेश की एक लड़की ने बताया कि उसकी शादी एक लड़के से हुई है, जो sub-inspector है ।
वह लड़का किसी और से प्रेम करता है और शादी के 6 महीने हो गए लेकिन उसने इस लड़की (अपनी पत्नी) की तरह आंख उठाकर देखा भी नहीं ।
अब बताओ, इस तरह का पागलपन करके इसकी लाइफ खराब कर दी उसने ।
इस बुक बड़ा नाम सुना था तो सोचा पढ़ ही लूं ।
But इसकी कहानी इतनी बकवास लगी की आधा पढ़कर ही छोड़ दिया
पता नहीं क्या सोचकर UPSC में भी इससे सवाल पूछे जाते हैं?
साधारण शब्दों में यह एक Sad प्रेम कहानी वाला उपन्यास है ।
इसके दो मुख्य पात्र "चन्दर" और "सुधा" हैं, जो एक दूसरे से बचपन से ही बहुत प्रेम करते हैं ।
हालांकि वे एक दूसरे से कभी कहते नहीं है, लेकिन एक दूसरे के बिना रह भी नहीं पाते ।
सुधा दूसरे से शादी नहीं करना चाहती है, लेकिन चन्दर ही खुद उसे दूसरे से शादी करने के लिए मनाता है।
"हमारा प्रेम बहुत ऊंचा है", "एक दूसरे से अलग होकर हमारा प्रेम महान हो जाएगा", "मेरी सुधा मेरी बात नहीं मानेगी",
कुछ इस तरह की lines हैं, और कुछ टीचर्स सच में इसकी बड़ाई करते हैं
लेकिन यही मुझे इतना घटिया लगा कि मैने आधा ही पढ़कर छोड़ दिया ।
जब तुम्हारी सुधा है तो तुम उसको दूसरे को क्यों दे रहे हो? जब तुमको पता है की वह तुमसे बहुत प्रेम करती है, तुमको देवता समझती है, फिर उसको कहीं और क्यूं भेज रहे हो
वह तो तुमको देवता पहले ही मान चुकी है, जिससे उसकी शादी होगी, उसकी वह कितनी इज्जत करेगी? क्या कभी उसको उससे प्रेम हो पाएगा?
तुम लोग तो अपने समझ में महान बन गए लेकिन उस तीसरे व्यक्ति की क्या गलती थी जो उसकी लाइफ खराब कर दिए?
इस बात पर कोई भी UPSC टीचर बहस नहीं करना चाहता ।
और शायद लास्ट में सुधा मर भी जाती है और चन्दर अपनी गलती पर पछतावा करता है । (हालांकि मैने लास्ट तक पढ़ा नहीं है)
यह बस एक कहानी ही है, but ऐसा real life में भी होता है ।
मुझे मध्य प्रदेश की एक लड़की ने बताया कि उसकी शादी एक लड़के से हुई है, जो sub-inspector है ।
वह लड़का किसी और से प्रेम करता है और शादी के 6 महीने हो गए लेकिन उसने इस लड़की (अपनी पत्नी) की तरह आंख उठाकर देखा भी नहीं ।
अब बताओ, इस तरह का पागलपन करके इसकी लाइफ खराब कर दी उसने ।
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"ठेका" वर्ड तो सबको ही पता होगा, अलग अलग जगहों पर अलग अलग मीनिंग होता है इसका
वाइन शॉप को भी देशी भाषा में ठेका बोलते हैं | जैसे अगर किसी को वाइन शॉप खोलने की लाइसेंस मिल गयी हो तो लोग कहते हैं की "फलाने" को ठेका मिल गया है
लोग जाते हैं शराब खरीदने और फिर नशे में झूम जाते हैं |
पता है इसमें किसको फायदा होता है? उस ठेका वाले "फलाने" को, खरीदने वाले लोग तो नशे में बर्बाद होते हैं |
"ठेका" शब्द का एक दूसरा उपयोग "ठेकेदार" (कांट्रेक्टर) के साथ भी होता है | जैसे एक दुसरे फलाने व्यक्ति को इस बिल्डिंग या रोड का ठेका मिला है |
इस वर्क को कम्पलीट करने में पता है किसकी कमाई होती है?
उस "ठेके" वाली व्यक्ति की | और कमाई भी इतनी होती है की वह मालामाल हो जाता है |
खैर यह सब तो ठीक भी है |
लेकिन कुछ वर्षों से हमारे देश में अब नए तरह के "ठेका वाले" (ठेकेदार) पनप रहे हैं |
"धर्म" और "जाति" के |
कोई उनको इस चीज़ का ठेका दिया नही है बस वह खुद से ही किसी विशेष जाति और धर्म के मसीहा बन गये हैं |
और इस प्रोफेशन में भी उन्नति और कमाई इन्ही ठेके वालों की ही हो रही है, बाकि लोगों को तो वह "धर्म" और "जाति" का नशा पिलाकर झुमा रहे हैं |
"जाति" और "धर्म" का नशा करने वालों में और शराब के नशा करने वालों में ज्यादा अंतर नही है | दोनों same हैं |
शुरुवात में दोनों में मजा आता है, पता ही नही चलता की यह बर्बादी का रास्ता है | और समझ भी तब आता है जब बहुत देर हो जाती है |
जब सबकुछ बर्बाद हो चूका होता है, और उस नशे की लत लग चुकी होती है |
हमारे देश में ऐसे "नशा" बाँटने वाले "ठेकेदार" आपको बहुत से मिलेंगे | लेकिन आपको उनसे बच के रहना है |
कोई आपको धर्म के हिसाब से बंटेगा तो कोई जाति और क्षेत्र के हिसाब से | लेकिन आपको बस "हिन्दुस्तानी" बनकर रहना है |
जय हिन्द 🇮🇳
वाइन शॉप को भी देशी भाषा में ठेका बोलते हैं | जैसे अगर किसी को वाइन शॉप खोलने की लाइसेंस मिल गयी हो तो लोग कहते हैं की "फलाने" को ठेका मिल गया है
लोग जाते हैं शराब खरीदने और फिर नशे में झूम जाते हैं |
पता है इसमें किसको फायदा होता है? उस ठेका वाले "फलाने" को, खरीदने वाले लोग तो नशे में बर्बाद होते हैं |
"ठेका" शब्द का एक दूसरा उपयोग "ठेकेदार" (कांट्रेक्टर) के साथ भी होता है | जैसे एक दुसरे फलाने व्यक्ति को इस बिल्डिंग या रोड का ठेका मिला है |
इस वर्क को कम्पलीट करने में पता है किसकी कमाई होती है?
उस "ठेके" वाली व्यक्ति की | और कमाई भी इतनी होती है की वह मालामाल हो जाता है |
खैर यह सब तो ठीक भी है |
लेकिन कुछ वर्षों से हमारे देश में अब नए तरह के "ठेका वाले" (ठेकेदार) पनप रहे हैं |
"धर्म" और "जाति" के |
कोई उनको इस चीज़ का ठेका दिया नही है बस वह खुद से ही किसी विशेष जाति और धर्म के मसीहा बन गये हैं |
और इस प्रोफेशन में भी उन्नति और कमाई इन्ही ठेके वालों की ही हो रही है, बाकि लोगों को तो वह "धर्म" और "जाति" का नशा पिलाकर झुमा रहे हैं |
"जाति" और "धर्म" का नशा करने वालों में और शराब के नशा करने वालों में ज्यादा अंतर नही है | दोनों same हैं |
शुरुवात में दोनों में मजा आता है, पता ही नही चलता की यह बर्बादी का रास्ता है | और समझ भी तब आता है जब बहुत देर हो जाती है |
जब सबकुछ बर्बाद हो चूका होता है, और उस नशे की लत लग चुकी होती है |
हमारे देश में ऐसे "नशा" बाँटने वाले "ठेकेदार" आपको बहुत से मिलेंगे | लेकिन आपको उनसे बच के रहना है |
कोई आपको धर्म के हिसाब से बंटेगा तो कोई जाति और क्षेत्र के हिसाब से | लेकिन आपको बस "हिन्दुस्तानी" बनकर रहना है |
जय हिन्द 🇮🇳
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