क्या भारत में रहकर भविष्य सुरक्षित है? 🇮🇳💔
अगर आपके पास किसी दूसरे देश की नागरिकता लेने का मौका है, तो इसे गंवाना नहीं चाहिए। आज नहीं तो कल, आपको पछतावा जरूर होगा।
हमारा भारत धीरे-धीरे गर्त में जा रहा है, और इसे बचाने वाला कोई नहीं है। देश को जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक पर ध्यान देना चाहिए था, वहाँ लोग जाति और धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि असली मुद्दों पर कोई चर्चा ही नहीं होती। आम जनता बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से जूझ रही है, लेकिन नेता केवल अपने वोट बैंक की राजनीति में लगे हैं।
भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ चुका है कि न्यायपालिका तक बिक चुकी है। जिन पर न्याय दिलाने की जिम्मेदारी थी, वे खुद घूसखोरी और राजनीतिक दबाव में फैसले कर रहे हैं। आम आदमी की आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है।
यहाँ इनोवेशन (Innovation) और उद्यमिता (Entrepreneurship) की कोई कद्र नहीं है। नई तकनीकों पर काम करने वाले, देश में स्टार्टअप शुरू करने वाले, और मेहनत से कुछ बड़ा करने वाले लोगों को कोई समर्थन नहीं मिलता। दूसरी ओर, सरकारी नौकरी ही सब कुछ मानी जाती है। IAS और सरकारी बाबू ही देश के हर बड़े पद पर बैठे हैं, चाहे उन्हें बिज़नेस और इंडस्ट्री की ABC भी न आती हो। सरकारी कंपनियों में CEO और MD ऐसे लोग बनाए जा रहे हैं, जिन्हें न तो मार्केट की समझ है और न ही बिज़नेस चलाने का अनुभव। ऐसे में देश कैसे आगे बढ़ेगा?
सोचिए, अगर कोई व्यक्ति रिश्वत देकर भी सरकारी नौकरी ले ले, तो समाज उसे इज़्ज़त देगा। लेकिन अगर कोई दिन-रात मेहनत करके, खुद कुछ बड़ा बन जाए, फिर भी उसे सम्मान नहीं मिलेगा, सिर्फ इसलिए कि उसके पास सरकारी नौकरी नहीं है!
बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, महंगाई चरम पर है, और देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। फिर भी आम लोग वही पुरानी राजनीति, जात-पात और धर्म की बहस में उलझे हुए हैं। अगर किसी को बाहर जाने का मौका मिले, तो क्यों न अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाया जाए?
क्या हम वाकई ऐसे माहौल में अपनी ज़िंदगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद करना चाहते हैं? सोचिए... और जो कर सकते हैं, सही समय पर सही फैसला लीजिए! 🙏💔
अगर आपके पास किसी दूसरे देश की नागरिकता लेने का मौका है, तो इसे गंवाना नहीं चाहिए। आज नहीं तो कल, आपको पछतावा जरूर होगा।
हमारा भारत धीरे-धीरे गर्त में जा रहा है, और इसे बचाने वाला कोई नहीं है। देश को जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक पर ध्यान देना चाहिए था, वहाँ लोग जाति और धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि असली मुद्दों पर कोई चर्चा ही नहीं होती। आम जनता बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से जूझ रही है, लेकिन नेता केवल अपने वोट बैंक की राजनीति में लगे हैं।
भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ चुका है कि न्यायपालिका तक बिक चुकी है। जिन पर न्याय दिलाने की जिम्मेदारी थी, वे खुद घूसखोरी और राजनीतिक दबाव में फैसले कर रहे हैं। आम आदमी की आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है।
यहाँ इनोवेशन (Innovation) और उद्यमिता (Entrepreneurship) की कोई कद्र नहीं है। नई तकनीकों पर काम करने वाले, देश में स्टार्टअप शुरू करने वाले, और मेहनत से कुछ बड़ा करने वाले लोगों को कोई समर्थन नहीं मिलता। दूसरी ओर, सरकारी नौकरी ही सब कुछ मानी जाती है। IAS और सरकारी बाबू ही देश के हर बड़े पद पर बैठे हैं, चाहे उन्हें बिज़नेस और इंडस्ट्री की ABC भी न आती हो। सरकारी कंपनियों में CEO और MD ऐसे लोग बनाए जा रहे हैं, जिन्हें न तो मार्केट की समझ है और न ही बिज़नेस चलाने का अनुभव। ऐसे में देश कैसे आगे बढ़ेगा?
सोचिए, अगर कोई व्यक्ति रिश्वत देकर भी सरकारी नौकरी ले ले, तो समाज उसे इज़्ज़त देगा। लेकिन अगर कोई दिन-रात मेहनत करके, खुद कुछ बड़ा बन जाए, फिर भी उसे सम्मान नहीं मिलेगा, सिर्फ इसलिए कि उसके पास सरकारी नौकरी नहीं है!
बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, महंगाई चरम पर है, और देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। फिर भी आम लोग वही पुरानी राजनीति, जात-पात और धर्म की बहस में उलझे हुए हैं। अगर किसी को बाहर जाने का मौका मिले, तो क्यों न अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाया जाए?
क्या हम वाकई ऐसे माहौल में अपनी ज़िंदगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद करना चाहते हैं? सोचिए... और जो कर सकते हैं, सही समय पर सही फैसला लीजिए! 🙏💔
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शहीद दिवस 🙏🙏💐💐
ये लोग अगर कहीं से देखते होंगे तो अपने देश को देखकर कितना निराश होते होंगे की क्या इसी देश के लिए हमने अपना जीवन कुर्बान कर दिया था? क्या इसी देश के लिए हम भरी जवानी में हंसते हंसते फांसी पर चढ़ गए थे?
सच में कैसा हो गया है अपना देश 😔😢
जहां देखो बस धर्म और जाति की बातें हो रही हैं । हिंदू मुस्लिम, मंदिर मस्जिद, अगड़ा पिछड़ा बस यही हो रहा है
सरकार भी वही कर रही है और विपक्ष के लोग भी वही कर रहे हैं, कोई एक वर्ग की बात करता है तो कोई दूसरे वर्ग की लेकिन कोई भी पूरे भारत की बात नहीं करता
स्वास्थ्य, शिक्षा, इनोवेशन, उद्यमिता, टेक्नोलॉजी, पर्यावरण की कोई बात नहीं करता 😢
जाति, धर्म, वर्ग, भाषा, स्थान के नाम पर सब लोग बटे हुए हैं 😢
प्रशासन में इतना भ्रष्टाचार है, बेइमानी है, घूसखोरी है
Judge तक घुस ले रहे हैं 😔
इसको ठीक करने और सुधारने की बात कोई नहीं करता ।
इस देश को भगवान ही बचाएं 🙏
ये लोग अगर कहीं से देखते होंगे तो अपने देश को देखकर कितना निराश होते होंगे की क्या इसी देश के लिए हमने अपना जीवन कुर्बान कर दिया था? क्या इसी देश के लिए हम भरी जवानी में हंसते हंसते फांसी पर चढ़ गए थे?
सच में कैसा हो गया है अपना देश 😔😢
जहां देखो बस धर्म और जाति की बातें हो रही हैं । हिंदू मुस्लिम, मंदिर मस्जिद, अगड़ा पिछड़ा बस यही हो रहा है
सरकार भी वही कर रही है और विपक्ष के लोग भी वही कर रहे हैं, कोई एक वर्ग की बात करता है तो कोई दूसरे वर्ग की लेकिन कोई भी पूरे भारत की बात नहीं करता
स्वास्थ्य, शिक्षा, इनोवेशन, उद्यमिता, टेक्नोलॉजी, पर्यावरण की कोई बात नहीं करता 😢
जाति, धर्म, वर्ग, भाषा, स्थान के नाम पर सब लोग बटे हुए हैं 😢
प्रशासन में इतना भ्रष्टाचार है, बेइमानी है, घूसखोरी है
Judge तक घुस ले रहे हैं 😔
इसको ठीक करने और सुधारने की बात कोई नहीं करता ।
इस देश को भगवान ही बचाएं 🙏
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यह कहानी बचपन में पढ़ा था, आज अचानक से मिल गई ।
बहुत ही emotional story है, अगर आपको कहानियां पढ़ने का शौक हो तो जरूर पढ़ें 😊
बहुत ही emotional story है, अगर आपको कहानियां पढ़ने का शौक हो तो जरूर पढ़ें 😊
Samsung फोन लिया था बड़े शौक से — सबने कहा था कि कैमरा iPhone से बेहतर है, डिस्प्ले देखकर आंखें चौंधिया जाएंगी। लेकिन किसी ने ये नहीं बताया कि गर्मियों में ये फोन गैस चूल्हे पर रखी कुकर बन जाएगा।
जैसे ही लाइट जाती है, ये ऐसा गर्म हो जाता है जैसे सास के चाय मांगते ही बहू का माथा — फटने को तैयार!
AC के सामने VIP सीट पर रखा है, लेकिन बिजली चली गई तो ये ऐसा तपता है जैसे ससुराल में नई बहू की बर्थडे पार्टी हो।
अब तो हालत ये है कि दिन में 4-5 बार ठंडे पानी से नहाना ज़रूरी है — फोन को! वरना लगेगा कहीं "विस्फोट" ना हो जाए।
लोग फोन चार्ज करते हैं, मैं ठंडा पानी डालकर शांति पाठ करता हूँ।
बैटरी? अरे पूछो मत! इतनी तेज़ी से डाउन होती है जैसे सास की बात सुनते ही बहू की हिम्मत।
पुराना iPad घर में रखा है, वो बिना चार्ज के ऐसे चलता है जैसे दादी की चप्पल — सालों तक टिकाऊ।
अब इस फोन को देखता हूँ तो लगता है, ये स्मार्टफोन नहीं बल्कि "सास बहू वाला सीरियल" है — ड्रामा, हीट और चार्जिंग का कॉम्बो!
😆😆😆
जैसे ही लाइट जाती है, ये ऐसा गर्म हो जाता है जैसे सास के चाय मांगते ही बहू का माथा — फटने को तैयार!
AC के सामने VIP सीट पर रखा है, लेकिन बिजली चली गई तो ये ऐसा तपता है जैसे ससुराल में नई बहू की बर्थडे पार्टी हो।
अब तो हालत ये है कि दिन में 4-5 बार ठंडे पानी से नहाना ज़रूरी है — फोन को! वरना लगेगा कहीं "विस्फोट" ना हो जाए।
लोग फोन चार्ज करते हैं, मैं ठंडा पानी डालकर शांति पाठ करता हूँ।
बैटरी? अरे पूछो मत! इतनी तेज़ी से डाउन होती है जैसे सास की बात सुनते ही बहू की हिम्मत।
पुराना iPad घर में रखा है, वो बिना चार्ज के ऐसे चलता है जैसे दादी की चप्पल — सालों तक टिकाऊ।
अब इस फोन को देखता हूँ तो लगता है, ये स्मार्टफोन नहीं बल्कि "सास बहू वाला सीरियल" है — ड्रामा, हीट और चार्जिंग का कॉम्बो!
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कभी कभी छोड़ देना ही बेहतर होता है...
जैसे की,,, वो सवाल जिसका जवाब ना हो,
वो हाथ जो वक्त पर साथ ना दे,
वो रिश्ता जो कदर,,,,, ना करे,
और वो प्यार जो सिर्फ मतलब के लिए जुड़ा रहा हो।
~ Er. Satyapal Singh Yadav, Delhi Police
जैसे की,,, वो सवाल जिसका जवाब ना हो,
वो हाथ जो वक्त पर साथ ना दे,
वो रिश्ता जो कदर,,,,, ना करे,
और वो प्यार जो सिर्फ मतलब के लिए जुड़ा रहा हो।
~ Er. Satyapal Singh Yadav, Delhi Police
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"अगर सिर्फ एक बेटे को ही इतना प्यार करना था, तो दो बेटों की जरूरत ही क्यों थी?
आज जब हमें अपना हक़ मांगने का हक़ नहीं मिलता, तो दिल में यही सवाल उठता है।
क्यों हम उस प्यार के लायक नहीं थे?
क्या हमारा हर दर्द सिर्फ इसलिए था ताकि किसी एक को सब कुछ मिल सके, और हमें कुछ नहीं?
अगर सिर्फ एक ही बेटा चाहिए था, तो क्यूं हमें इस दुनिया में लाया?
क्यों हमें उम्मीदें दी, क्यों हमें ज़िन्दगी दी, अगर वो प्यार सिर्फ एक को ही देना था?
---
"फिर किस मुंह से लोग मां-बाप को भगवान कहते हैं?"
जब वो खुद ही अपने बच्चों के हक़ को रौंद देते हैं,
जब वो खुद ही अपने बच्चों के दिलों में दर्द और घाव छोड़ जाते हैं,
तो फिर किस आधार पर हम उन्हें भगवान कह सकते हैं?
जब एक बेटे को अपनी मां से सिर्फ एक छोटे से हिस्से की उम्मीद होती है,
और वो हिस्सा भी उसे मिलना मुश्किल हो जाता है,
तो फिर क्या वो मां-बाप के सिवा किसी और के लिए भगवान हो सकते हैं?
क्या वो सच में उसी प्यार के हक़दार हैं, जो उन्होंने हमें बचपन में दिया था?
---
एक मां अगर अपने दोनों बेटों को बराबरी का प्यार नहीं दे सकती,
अगर एक को सिर पे बैठा कर दूसरे के हिस्से को जान-बूझकर छीनने दे रही है,
तो फिर उसका दिल कहां है?
और एक बेटा — जो सालों से शांति से रहा, इंतज़ार करता रहा कि उसकी मां एक दिन न्याय करेगी,
लेकिन जब उसने देखा कि उसकी ही मां, उसके साथ अन्याय कर रही है —
तो उसके दिल में कौन से तूफान उठे होंगे?
---
क्या बेटे की इज़्ज़त तभी तक है जब वो खामोश रहे?
क्या वो तभी तक अच्छा बेटा है जब वो अपने हिस्से की मांग न करे?
और दूसरी तरफ़, वही भाई, जो चालाकी और लालच से मां को अपनी तरफ मिला लेता है,
जो सामने वाले के हक़ को हड़पकर भी मुस्कुराता है,
क्या वो बेटा कहलाने लायक है?
---
यह सिर्फ़ ज़मीन का मामला नहीं है — यह आत्मा की पीड़ा है।
यह न्याय और अन्याय की लड़ाई है — अपने ही घर की चारदीवारी के अंदर।
---
हर वो मां-बाप जो अपने बच्चों में भेदभाव करते हैं,
एक दिन उनकी यही नाइंसाफ़ी उन्हें बूढ़ी उम्र में तन्हा छोड़ देती है।
क्योंकि बेटा अगर पत्थर बन जाए — तो मां ने ही उसे तपाकर पत्थर बनाया होगा।
---
"फिर किस मुंह से लोग मां-बाप को भगवान कहते हैं?"
जब वही मां-बाप एक बेटे को ठुकराकर, उसके हिस्से की ज़मीन को छीनकर, दूसरे बेटे की जेब में डाल देते हैं —
तो क्या वह भगवान कहलाने लायक रह जाते हैं?
---
जब हम अपना हक मांगते हैं, तो हमें समझाया जाता है,
लेकिन जब दूसरे भाई ने सब कुछ अपने नाम कर लिया, तो वो मां-बाप के लिए सही कैसे हो सकता है?
क्या हम केवल इसलिए चुप रहें, क्योंकि हम इज्जत के नाम पर खुद को चुप रखते हैं?
---
आज ज़मीन के झगड़ों में हज़ारों मामले सामने आते हैं।
कहीं बेटे ने मां को मारा, कहीं पिता ने बेटे को घर से निकाल दिया।
समाज इसे "अपराध" कहता है — पर कोई ये नहीं पूछता कि उस बेटे की मजबूरी क्या थी?
किस दर्द ने उसे इतना तोड़ दिया कि उसने जननी को ही निशाना बना डाला?
---
यह सिर्फ़ एक बेटे का दर्द नहीं है — यह उस सच्चाई का दर्द है जिसे समाज और परिवार कभी पूरी तरह से समझ नहीं पाते।
---
"क्या किसी का दिल तोड़कर, क्या किसी के सपनों को चुराकर, क्या किसी को अकेला छोड़कर हम सही कर रहे हैं?"
यह एक बेटे का दर्द है, वह जो अपनी मां और पिता से केवल एक छोटा सा हिस्सा चाहता था — ताकि वह अपना घर बना सके, ताकि वह अपनी ज़िन्दगी जी सके।
लेकिन उस बेटे को ऐसा कुछ भी नहीं मिला।
और वह उस दर्द से जूझ रहा है, जो सालों से उसके दिल में है, और जो शायद कभी खत्म नहीं होगा।
आज जब हमें अपना हक़ मांगने का हक़ नहीं मिलता, तो दिल में यही सवाल उठता है।
क्यों हम उस प्यार के लायक नहीं थे?
क्या हमारा हर दर्द सिर्फ इसलिए था ताकि किसी एक को सब कुछ मिल सके, और हमें कुछ नहीं?
अगर सिर्फ एक ही बेटा चाहिए था, तो क्यूं हमें इस दुनिया में लाया?
क्यों हमें उम्मीदें दी, क्यों हमें ज़िन्दगी दी, अगर वो प्यार सिर्फ एक को ही देना था?
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"फिर किस मुंह से लोग मां-बाप को भगवान कहते हैं?"
जब वो खुद ही अपने बच्चों के हक़ को रौंद देते हैं,
जब वो खुद ही अपने बच्चों के दिलों में दर्द और घाव छोड़ जाते हैं,
तो फिर किस आधार पर हम उन्हें भगवान कह सकते हैं?
जब एक बेटे को अपनी मां से सिर्फ एक छोटे से हिस्से की उम्मीद होती है,
और वो हिस्सा भी उसे मिलना मुश्किल हो जाता है,
तो फिर क्या वो मां-बाप के सिवा किसी और के लिए भगवान हो सकते हैं?
क्या वो सच में उसी प्यार के हक़दार हैं, जो उन्होंने हमें बचपन में दिया था?
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एक मां अगर अपने दोनों बेटों को बराबरी का प्यार नहीं दे सकती,
अगर एक को सिर पे बैठा कर दूसरे के हिस्से को जान-बूझकर छीनने दे रही है,
तो फिर उसका दिल कहां है?
और एक बेटा — जो सालों से शांति से रहा, इंतज़ार करता रहा कि उसकी मां एक दिन न्याय करेगी,
लेकिन जब उसने देखा कि उसकी ही मां, उसके साथ अन्याय कर रही है —
तो उसके दिल में कौन से तूफान उठे होंगे?
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क्या बेटे की इज़्ज़त तभी तक है जब वो खामोश रहे?
क्या वो तभी तक अच्छा बेटा है जब वो अपने हिस्से की मांग न करे?
और दूसरी तरफ़, वही भाई, जो चालाकी और लालच से मां को अपनी तरफ मिला लेता है,
जो सामने वाले के हक़ को हड़पकर भी मुस्कुराता है,
क्या वो बेटा कहलाने लायक है?
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यह सिर्फ़ ज़मीन का मामला नहीं है — यह आत्मा की पीड़ा है।
यह न्याय और अन्याय की लड़ाई है — अपने ही घर की चारदीवारी के अंदर।
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हर वो मां-बाप जो अपने बच्चों में भेदभाव करते हैं,
एक दिन उनकी यही नाइंसाफ़ी उन्हें बूढ़ी उम्र में तन्हा छोड़ देती है।
क्योंकि बेटा अगर पत्थर बन जाए — तो मां ने ही उसे तपाकर पत्थर बनाया होगा।
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"फिर किस मुंह से लोग मां-बाप को भगवान कहते हैं?"
जब वही मां-बाप एक बेटे को ठुकराकर, उसके हिस्से की ज़मीन को छीनकर, दूसरे बेटे की जेब में डाल देते हैं —
तो क्या वह भगवान कहलाने लायक रह जाते हैं?
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जब हम अपना हक मांगते हैं, तो हमें समझाया जाता है,
लेकिन जब दूसरे भाई ने सब कुछ अपने नाम कर लिया, तो वो मां-बाप के लिए सही कैसे हो सकता है?
क्या हम केवल इसलिए चुप रहें, क्योंकि हम इज्जत के नाम पर खुद को चुप रखते हैं?
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आज ज़मीन के झगड़ों में हज़ारों मामले सामने आते हैं।
कहीं बेटे ने मां को मारा, कहीं पिता ने बेटे को घर से निकाल दिया।
समाज इसे "अपराध" कहता है — पर कोई ये नहीं पूछता कि उस बेटे की मजबूरी क्या थी?
किस दर्द ने उसे इतना तोड़ दिया कि उसने जननी को ही निशाना बना डाला?
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यह सिर्फ़ एक बेटे का दर्द नहीं है — यह उस सच्चाई का दर्द है जिसे समाज और परिवार कभी पूरी तरह से समझ नहीं पाते।
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"क्या किसी का दिल तोड़कर, क्या किसी के सपनों को चुराकर, क्या किसी को अकेला छोड़कर हम सही कर रहे हैं?"
यह एक बेटे का दर्द है, वह जो अपनी मां और पिता से केवल एक छोटा सा हिस्सा चाहता था — ताकि वह अपना घर बना सके, ताकि वह अपनी ज़िन्दगी जी सके।
लेकिन उस बेटे को ऐसा कुछ भी नहीं मिला।
और वह उस दर्द से जूझ रहा है, जो सालों से उसके दिल में है, और जो शायद कभी खत्म नहीं होगा।
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ये लोग दिन में क्यूं नहीं पढ़ रहे हैं? 🤔🤣🤣