*क्या आप पंद्रह सौ वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में खड़े बाणस्तम्भ की विलक्षणता के विषय मे जानते हैं?* 🙏🏻🕉
इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय है!! इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता है!!की हम आश्चर्य में पड जाते हैं!!
पहले हम स्वयं से पूछते हैं, यह कैसे संभव है..?
डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था!!
इस पर विश्वास ही नहीं होता..!
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती है!!
वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है!!
१२ ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ..!
एक वैभवशाली, सुंदर शिवलिंग..!! इतना समृध्द की उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी!!
अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए!!
उसे लूटा गया। सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए!!
इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था!!
लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं है!!
सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है!! विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता है!!और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है!!
न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई है!!
इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) है!!
यह बाणस्तंभ" नाम से जाना जाता है!!
यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन है!! लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है!!लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ है!!
उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा!!
यह एक दिशादर्शक स्तंभ_है!! जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है!!
इस बाणस्तंभ पर लिखा है - आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग.’
इसका अर्थ यह हुआ, इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेखामें एक भी अवरोध या बाधा नहीं_है अर्थात,इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है।
यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था..?
कैसे संभव है.? और यदि यह सच हैं, तो कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम संजोये हैं..!
संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं!!
इस पंक्ति का सरल अर्थ यह हैं!!की...
#सोमनाथ_मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण धृव तक (अर्थात अंटार्टिका तक), एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है!!
क्या यह सच है..? आज के इस तंत्रविज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो है, लेकिन उतना आसान नहीं।
गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता है!!
लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘ज़ूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता है!!
वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम हैं. लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड
अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड. उससे छोटा पकड में नहीं आता हैं!!नहीं आता है। अर्थात हम मान कर चले की उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है।
किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है। अगर मान कर भी चलते हैं की सन ६०० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था, तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी धृव है, यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहांसे आया..? अच्छा, दक्षिण धृव ज्ञात था यह मान भी लिया तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी भूखंड नहीं आता है, यह ‘मैपिंग’ किसने किया..? कैसे किया..? सब कुछ अद्भुत..!!
इसका अर्थ यह हैं की ‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है, इसका ज्ञान था। इतना ही नहीं, पृथ्वी का दक्षिण धृव है (अर्थात उत्तर धृव भी है) यह भी ज्ञान था। यह कैसे संभव हुआ..? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था..? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था..?
नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता है। अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं.) कहते है। यह प्राचीन शास्त्र है। इसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे। परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं है।
हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है। इनका कालखंड इसा पूर्व ६११ से ५४६ वर्ष था। किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था, बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया है। इस लिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण धृव दिखने का कोई कारण ही नहीं था।
आज की दुनिया के वास्तविक रूप के कर
इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय है!! इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता है!!की हम आश्चर्य में पड जाते हैं!!
पहले हम स्वयं से पूछते हैं, यह कैसे संभव है..?
डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था!!
इस पर विश्वास ही नहीं होता..!
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती है!!
वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है!!
१२ ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ..!
एक वैभवशाली, सुंदर शिवलिंग..!! इतना समृध्द की उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी!!
अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए!!
उसे लूटा गया। सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए!!
इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था!!
लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं है!!
सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है!! विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता है!!और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है!!
न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई है!!
इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) है!!
यह बाणस्तंभ" नाम से जाना जाता है!!
यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन है!! लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है!!लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ है!!
उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा!!
यह एक दिशादर्शक स्तंभ_है!! जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है!!
इस बाणस्तंभ पर लिखा है - आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग.’
इसका अर्थ यह हुआ, इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेखामें एक भी अवरोध या बाधा नहीं_है अर्थात,इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है।
यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था..?
कैसे संभव है.? और यदि यह सच हैं, तो कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम संजोये हैं..!
संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं!!
इस पंक्ति का सरल अर्थ यह हैं!!की...
#सोमनाथ_मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण धृव तक (अर्थात अंटार्टिका तक), एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है!!
क्या यह सच है..? आज के इस तंत्रविज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो है, लेकिन उतना आसान नहीं।
गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता है!!
लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘ज़ूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता है!!
वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम हैं. लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड
अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड. उससे छोटा पकड में नहीं आता हैं!!नहीं आता है। अर्थात हम मान कर चले की उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है।
किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है। अगर मान कर भी चलते हैं की सन ६०० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था, तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी धृव है, यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहांसे आया..? अच्छा, दक्षिण धृव ज्ञात था यह मान भी लिया तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी भूखंड नहीं आता है, यह ‘मैपिंग’ किसने किया..? कैसे किया..? सब कुछ अद्भुत..!!
इसका अर्थ यह हैं की ‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है, इसका ज्ञान था। इतना ही नहीं, पृथ्वी का दक्षिण धृव है (अर्थात उत्तर धृव भी है) यह भी ज्ञान था। यह कैसे संभव हुआ..? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था..? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था..?
नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता है। अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं.) कहते है। यह प्राचीन शास्त्र है। इसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे। परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं है।
हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है। इनका कालखंड इसा पूर्व ६११ से ५४६ वर्ष था। किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था, बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया है। इस लिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण धृव दिखने का कोई कारण ही नहीं था।
आज की दुनिया के वास्तविक रूप के कर
ीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन १४९० के आसपास तैयार किया था। ऐसा माना जाता हैं, की कोलंबस ने इसी नक़्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था।
‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था। ‘एनेक्सिमेंडर’ इसा पूर्व ६०० वर्ष, पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था। ‘एरिस्टोटल’ (इसा पूर्व ३८४ – इसा पूर्व ३२२) ने भी पृथ्वी को गोल माना था।
लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते है। इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर आर्यभट्ट ने सन ५०० के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास ४,९६७ योजन हैं (अर्थात नए मापदंडों के अनुसार ३९,९६८ किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया। आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास ४०,०७५ किलोमीटर माना गया है। इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र ०.२६% का अंतर आ रहा है, जो नाममात्र है..! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया..?
सन २००८ में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया की इसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष, भारत में नकाशा शास्त्र अत्यंत विकसित था। नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही, परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे।
भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण आशिया में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं, उससे यह ज्ञात होता है की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे। सन १९५५ में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं। इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन, उस समय के भारतियों को था यह निश्चित है। लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता है की दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है, ऐसा बाद में खोज निकाला, या दक्षिण धृव से भारत के पश्चिम तट पर, बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं, वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया..?
उस बाण स्तंभ पर लिखी गयी उन पंक्तियों में,
(‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत, अबाधित ज्योतिरमार्ग..’)
जिसका उल्लेख किया गया है, वह ‘ज्योतिरमार्ग’ क्या है..?
यह आज भी प्रश्न ही है..!क्योंकि सुदूर दक्षिण में जाने वाले मार्ग का उत्तर काल के थपेड़ों में कहीं लुप्त हो गया है!!
Har Har Mahadev 🙏🏻🕉
‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था। ‘एनेक्सिमेंडर’ इसा पूर्व ६०० वर्ष, पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था। ‘एरिस्टोटल’ (इसा पूर्व ३८४ – इसा पूर्व ३२२) ने भी पृथ्वी को गोल माना था।
लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते है। इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर आर्यभट्ट ने सन ५०० के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास ४,९६७ योजन हैं (अर्थात नए मापदंडों के अनुसार ३९,९६८ किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया। आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास ४०,०७५ किलोमीटर माना गया है। इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र ०.२६% का अंतर आ रहा है, जो नाममात्र है..! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया..?
सन २००८ में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया की इसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष, भारत में नकाशा शास्त्र अत्यंत विकसित था। नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही, परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे।
भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण आशिया में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं, उससे यह ज्ञात होता है की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे। सन १९५५ में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं। इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन, उस समय के भारतियों को था यह निश्चित है। लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता है की दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है, ऐसा बाद में खोज निकाला, या दक्षिण धृव से भारत के पश्चिम तट पर, बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं, वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया..?
उस बाण स्तंभ पर लिखी गयी उन पंक्तियों में,
(‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत, अबाधित ज्योतिरमार्ग..’)
जिसका उल्लेख किया गया है, वह ‘ज्योतिरमार्ग’ क्या है..?
यह आज भी प्रश्न ही है..!क्योंकि सुदूर दक्षिण में जाने वाले मार्ग का उत्तर काल के थपेड़ों में कहीं लुप्त हो गया है!!
Har Har Mahadev 🙏🏻🕉
किसी ने साजिश तो जरूर की होगी वरना हिंदुस्तान सिर्फ ताजमहल से शुरू होकर लाल किले तक खत्म नही होता ..
ग्वालियर का किला
ग्वालियर का किला
द्वारकाधीश मन्दिर गुजरात ।
जिसे जगत मंदिर भी कहते हैं मंदिर का सबसे लंबा शिखर निज शिखर के नाम से जाना जाता है और यह लगभग 78.3 मीटर की ऊंचाई तक फैला है।
ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ द्वारा इस मन्दिर का निर्माण करवाया गया।
जय श्री कृष्ण 🙏
#IncredibleIndia🚩
जिसे जगत मंदिर भी कहते हैं मंदिर का सबसे लंबा शिखर निज शिखर के नाम से जाना जाता है और यह लगभग 78.3 मीटर की ऊंचाई तक फैला है।
ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ द्वारा इस मन्दिर का निर्माण करवाया गया।
जय श्री कृष्ण 🙏
#IncredibleIndia🚩
#रानीजी_की_बावड़ी, पाटन. #गुजरात
ये थी भारत के सनातन हिन्दू की कलाकृतियां व कलाकारी ।
विदेशी आक्रमणकारियों ने प्रवेश किया और भारत भी उन्हीं की तरह तहस-नहस होता चला गया।
जल प्रबंधन प्रणाली में भूजल संसाधनों के उपयोग की तकनीक का बेहतरीन उदाहरण मान कर 'रानी की वाव' को विश्व विरासत की नई सूची में शामिल किए जाने का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है।
पानी की #शुद्धता को उजागर करने वाले एक उल्टे #मंदिर के रूप में #डिजाइन किया गया कदम,
#मूर्तिकला पैनलों के साथ सीढ़ियों के 7 स्तरों में विभाजित है। यह 64 * 20 * 27 क्यूबिक मीटर मापता है।
#रानीजी की #बावड़ी गुजरात के पाटन में स्थित एक #कुआं है, जो #सरस्वती नदी के तट पर स्थित है।
इसके निर्माण का श्रेय सौराष्ट्र के खेंगारा की बेटी #उदयमाती को दिया जाता है, जो 11 वीं शताब्दी के चौलुक्य वंश की रानी और भीम प्रथम की पत्नी हैं।
(नोट: हर सनातन शिल्प की तरह ये भी विज्ञान की नवीनतम कसौटी पे खरा उतरता है।)
ये थी भारत के सनातन हिन्दू की कलाकृतियां व कलाकारी ।
विदेशी आक्रमणकारियों ने प्रवेश किया और भारत भी उन्हीं की तरह तहस-नहस होता चला गया।
जल प्रबंधन प्रणाली में भूजल संसाधनों के उपयोग की तकनीक का बेहतरीन उदाहरण मान कर 'रानी की वाव' को विश्व विरासत की नई सूची में शामिल किए जाने का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है।
पानी की #शुद्धता को उजागर करने वाले एक उल्टे #मंदिर के रूप में #डिजाइन किया गया कदम,
#मूर्तिकला पैनलों के साथ सीढ़ियों के 7 स्तरों में विभाजित है। यह 64 * 20 * 27 क्यूबिक मीटर मापता है।
#रानीजी की #बावड़ी गुजरात के पाटन में स्थित एक #कुआं है, जो #सरस्वती नदी के तट पर स्थित है।
इसके निर्माण का श्रेय सौराष्ट्र के खेंगारा की बेटी #उदयमाती को दिया जाता है, जो 11 वीं शताब्दी के चौलुक्य वंश की रानी और भीम प्रथम की पत्नी हैं।
(नोट: हर सनातन शिल्प की तरह ये भी विज्ञान की नवीनतम कसौटी पे खरा उतरता है।)
आश्चर्य घोषित करने का क्राइटेरिया क्या है ? क्योंकि असली आश्चर्य तो यहाँ है ।
"रामप्पा मंदिर” यह शायद विश्व का एक मात्र मंदिर है जिसका नाम भगवान के नाम पर ना होकर उसके शिल्पी के नाम पर है। कई शक्तिशाली भूकंपो के बाद भी इस मंदिर को नुकसान नहीं पहुँचा तब विशेषज्ञों ने इसकी जाँच शुरू की और अंततः इस मंदिर के एक पत्थर को तोड़कर पानी में डाला तो वह पानी पर तैरने लगा । बाद में पता चला कि ऐसे हल्के पत्थरो से बने होने के कारण ही इस मंदिर को क्षति नहीं पहुँचती । अब सवाल है कि जब दुनियाँ में इस तरह के पत्थर कहीं नहीं मिलते तो क्या रामप्पा ने ही 800 साल पहले ये पत्थर खुद बनाये ?
है ना आश्चर्य ?
(रामप्पा मंदिर, तेलंगाना)
"रामप्पा मंदिर” यह शायद विश्व का एक मात्र मंदिर है जिसका नाम भगवान के नाम पर ना होकर उसके शिल्पी के नाम पर है। कई शक्तिशाली भूकंपो के बाद भी इस मंदिर को नुकसान नहीं पहुँचा तब विशेषज्ञों ने इसकी जाँच शुरू की और अंततः इस मंदिर के एक पत्थर को तोड़कर पानी में डाला तो वह पानी पर तैरने लगा । बाद में पता चला कि ऐसे हल्के पत्थरो से बने होने के कारण ही इस मंदिर को क्षति नहीं पहुँचती । अब सवाल है कि जब दुनियाँ में इस तरह के पत्थर कहीं नहीं मिलते तो क्या रामप्पा ने ही 800 साल पहले ये पत्थर खुद बनाये ?
है ना आश्चर्य ?
(रामप्पा मंदिर, तेलंगाना)
कोई कह रहा था कि आगरा से बाहर कोई आश्चर्य ही नहीं है ..
मंदिर की भीतरी छत को देखिए । इसको देखकर हैरान होते समय याद रखना कि इसे आज से सैकड़ो साल पहले 12वीं शताब्दी में बनाया गया है । ऐसी संरचनाएँ हमारे पाठ्यक्रम में क्यों नहीं है ?
इतिहास लिखना तो वामपंथियों के हाथ में था लेकिन सबको इतिहास बताना हमारे हाथों में है ।
आओ हम इसका प्रचार करें ।
(चेन्नकेशव मंदिर, कर्नाटक)
मंदिर की भीतरी छत को देखिए । इसको देखकर हैरान होते समय याद रखना कि इसे आज से सैकड़ो साल पहले 12वीं शताब्दी में बनाया गया है । ऐसी संरचनाएँ हमारे पाठ्यक्रम में क्यों नहीं है ?
इतिहास लिखना तो वामपंथियों के हाथ में था लेकिन सबको इतिहास बताना हमारे हाथों में है ।
आओ हम इसका प्रचार करें ।
(चेन्नकेशव मंदिर, कर्नाटक)
क्या सात आश्चर्यों की लिस्ट बनाने वाले जवाब देंगे कि इस मंदिर को लिस्ट में शामिल क्यों नहीं किया गया ?
ये विट्टल मंदिर के स्तंभ हैं, ये सारे स्तंभ एक ही तरह के ग्रेनाइट पत्थर से बने हैं लेकिन प्रत्येक स्तंभ एक अलग ध्वनि उत्पन्न करता है,
क्या इसके पीछे की टेक्नोलॉजी आज के वास्तुकारों को पता है ?
अगर नहीं पता तो यह सात आश्चर्यों में क्यों नहीं है
(विट्टल मंदिर, कर्नाटक)
ये विट्टल मंदिर के स्तंभ हैं, ये सारे स्तंभ एक ही तरह के ग्रेनाइट पत्थर से बने हैं लेकिन प्रत्येक स्तंभ एक अलग ध्वनि उत्पन्न करता है,
क्या इसके पीछे की टेक्नोलॉजी आज के वास्तुकारों को पता है ?
अगर नहीं पता तो यह सात आश्चर्यों में क्यों नहीं है
(विट्टल मंदिर, कर्नाटक)
यह गर्भ प्रतिमा कुंडादम वडक्कुनाथ स्वामी मंदिर (कोयंबटूर से लगभग 60 किमी) की एक दीवार पर खुदी हुई है।
कल्पना कीजिए कि एक्स-रे की खोज से एक हजार साल पहले उस समय के लोगों को यह जानकारी कैसे मिली होगी।
मंदिर की अन्य दीवारों पर, हर महीने अजन्मे बच्चे की स्थिति की एक मूर्ति उकेरी जाती है।
सनातन वैदिक धर्म दुनिया का सबसे पुराना, पहला और अंतिम वैज्ञानिक धर्म है। सनातन ने दुनिया को विज्ञान दिया, उसे दृष्टि दी, जीने की कला दी, साहित्य दिया, संस्कृति दी, विज्ञान दिया, विमान का विज्ञान दिया, चिकित्सा विज्ञान दिया, अर्थशास्त्र दिया।
इसलिए मैं कहता हूं,
सनातन धर्म जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं है।
सनातन धर्म लाखों वर्षों से वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहा है, हमारे ऋषियों ने विज्ञान की नींव रखी है,
सनातन ऋषियों ने अपनी हड्डियों को पिघलाने के बाद, विज्ञान और दर्शन को दुनिया के लिए दृश्यमान बना दिया है।
पूरी दुनिया कभी भी सनातन ऋषियों के ऋण से मुक्त नहीं होगी, हमारे ऋषियों ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है।
शेयर कर अपने सनातनी इतिहास को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए
कल्पना कीजिए कि एक्स-रे की खोज से एक हजार साल पहले उस समय के लोगों को यह जानकारी कैसे मिली होगी।
मंदिर की अन्य दीवारों पर, हर महीने अजन्मे बच्चे की स्थिति की एक मूर्ति उकेरी जाती है।
सनातन वैदिक धर्म दुनिया का सबसे पुराना, पहला और अंतिम वैज्ञानिक धर्म है। सनातन ने दुनिया को विज्ञान दिया, उसे दृष्टि दी, जीने की कला दी, साहित्य दिया, संस्कृति दी, विज्ञान दिया, विमान का विज्ञान दिया, चिकित्सा विज्ञान दिया, अर्थशास्त्र दिया।
इसलिए मैं कहता हूं,
सनातन धर्म जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं है।
सनातन धर्म लाखों वर्षों से वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहा है, हमारे ऋषियों ने विज्ञान की नींव रखी है,
सनातन ऋषियों ने अपनी हड्डियों को पिघलाने के बाद, विज्ञान और दर्शन को दुनिया के लिए दृश्यमान बना दिया है।
पूरी दुनिया कभी भी सनातन ऋषियों के ऋण से मुक्त नहीं होगी, हमारे ऋषियों ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है।
शेयर कर अपने सनातनी इतिहास को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए
😱 *कोई क्रेन नहीं, कोई आधुनिक उपकरण नहीं, कोई इंजीनियरिंग तकनीक नहीं, कोई प्लानर नहीं, लेकिन हमारे पूर्वजों ने आधुनिक उपकरणों के बिना, बिना बिजली, कम्प्यूटर आदि के 100% सटीकता के साथ इसे बनाया . . .*
🙏🏻 *600 ईसवी में निर्मित 1000 खंभों वाले इस मंदिर को देखिए . . .*
📡 *क्या सच में टेक्नोलॉजी नहीं थी ? क्या सच में हम अशिक्षित थे ? क्या सच में उस समय गहन ज्ञान रखने वाले इंजीनियर नहीं थे ? हजारों वर्ष के लिए सुदृढ़ निर्माण करने वाले प्लानर नहीं थे ? उत्कृष्ट आर्किटेक्ट नहीं थे ?*
😡 *या फिर वामपंथी इतिहासकारों ने हमसे झूठ बोला ताकि हम फिर से कभी गर्वित, शिक्षित, समृद्ध भारतवर्ष के इतिहास और वर्तमान ना बन सकें । कभी स्वाभिमान से मस्तक ऊँचा न कर सकें ? ( एकम्बरेश्वर मंदिर, कांचीपुरम, तमिलनाडु )*
🙏🏻 *600 ईसवी में निर्मित 1000 खंभों वाले इस मंदिर को देखिए . . .*
📡 *क्या सच में टेक्नोलॉजी नहीं थी ? क्या सच में हम अशिक्षित थे ? क्या सच में उस समय गहन ज्ञान रखने वाले इंजीनियर नहीं थे ? हजारों वर्ष के लिए सुदृढ़ निर्माण करने वाले प्लानर नहीं थे ? उत्कृष्ट आर्किटेक्ट नहीं थे ?*
😡 *या फिर वामपंथी इतिहासकारों ने हमसे झूठ बोला ताकि हम फिर से कभी गर्वित, शिक्षित, समृद्ध भारतवर्ष के इतिहास और वर्तमान ना बन सकें । कभी स्वाभिमान से मस्तक ऊँचा न कर सकें ? ( एकम्बरेश्वर मंदिर, कांचीपुरम, तमिलनाडु )*
*🦁 हिन्दू गर्जना 🦁*
📢 *अमृतसर* के स्वर्ण मंदिर🚩 के बारे में तो आप सभी जानते हैं...
आईये आपको दक्षिण भारत के *स्वर्ण मंदिर* 🛕 की सैर कराते हैं....
⤵️ तमिलनाडु के वेल्लोर नगर के *मलाईकोड़ी* पहाड़ों पर स्थित इस मंदिर की *सुंदरता* देखते ही बनती है....
👉 पता है इसके निर्माण में *15* हजार किलोग्राम *शुद्ध सोने* का प्रयोग किया गया है, इसीलिए इसे *दक्षिण भारत* का *स्वर्ण मंदिर* कहा जाता है...
रात्रि के समय इसकी छटा देखते ही बनती है....
*(श्री #महालक्ष्मी मंदिर, वेल्लोर, तमिलनाडु)*
https://www.facebook.com/938397972910871/posts/2914841875266461/
🙏🚩🇮🇳🔱🏹🐚🕉
📢 *अमृतसर* के स्वर्ण मंदिर🚩 के बारे में तो आप सभी जानते हैं...
आईये आपको दक्षिण भारत के *स्वर्ण मंदिर* 🛕 की सैर कराते हैं....
⤵️ तमिलनाडु के वेल्लोर नगर के *मलाईकोड़ी* पहाड़ों पर स्थित इस मंदिर की *सुंदरता* देखते ही बनती है....
👉 पता है इसके निर्माण में *15* हजार किलोग्राम *शुद्ध सोने* का प्रयोग किया गया है, इसीलिए इसे *दक्षिण भारत* का *स्वर्ण मंदिर* कहा जाता है...
रात्रि के समय इसकी छटा देखते ही बनती है....
*(श्री #महालक्ष्मी मंदिर, वेल्लोर, तमिलनाडु)*
https://www.facebook.com/938397972910871/posts/2914841875266461/
🙏🚩🇮🇳🔱🏹🐚🕉
छठी शताब्दी में बनी नागराज की प्रतिमा . . .
नागराज की पांच सर के साथ
एक मानव सर भी है
जो अंदर से बाहर आते हुए प्रतीत हो रहे है ,
शानदार त्रिविमीय (3D) तक्षणकला
ज़रा सोचिए कितने उन्नत थे
हमारे पूर्वज एवम कितनी अद्भुत थी
उनकी स्थापत्यकला . . .
वो भी आज से 1400 साल पहले l
( बादामी गुफा मंदिर ) कर्नाटक
नागराज की पांच सर के साथ
एक मानव सर भी है
जो अंदर से बाहर आते हुए प्रतीत हो रहे है ,
शानदार त्रिविमीय (3D) तक्षणकला
ज़रा सोचिए कितने उन्नत थे
हमारे पूर्वज एवम कितनी अद्भुत थी
उनकी स्थापत्यकला . . .
वो भी आज से 1400 साल पहले l
( बादामी गुफा मंदिर ) कर्नाटक