राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*प्रेम हरदम रहता है, पर दर्शन हरदम नहीं रहते। दर्शन की इच्छा दोषी नहीं है, पर तुलना करें तो दर्शन की अपेक्षा प्रेम ऊंचा है । दर्शन होने पर प्रेम हो जाए - यह नियम नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या 179*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*प्रेम हरदम रहता है, पर दर्शन हरदम नहीं रहते। दर्शन की इच्छा दोषी नहीं है, पर तुलना करें तो दर्शन की अपेक्षा प्रेम ऊंचा है । दर्शन होने पर प्रेम हो जाए - यह नियम नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या 179*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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