राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन - विरुद्ध बात न आए तो समझो बहुत काम हो गया ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४*
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*साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन - विरुद्ध बात न आए तो समझो बहुत काम हो गया ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् के सामने अपने पाप कहने से पाप नष्ट हो जाते हैं । भगवान् निर्दोषता की अंतिम सीमा हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४*
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*भगवान् के सामने अपने पाप कहने से पाप नष्ट हो जाते हैं । भगवान् निर्दोषता की अंतिम सीमा हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*मनुष्य योनि भोगयोनि नहीं है, प्रत्युत साधनयोनि है, प्रेमयोनि है, भक्तियोनि है । भोगयोनि वह होती है, जिसमें नया कर्म करने का अधिकार न हो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५५*
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*मनुष्य योनि भोगयोनि नहीं है, प्रत्युत साधनयोनि है, प्रेमयोनि है, भक्तियोनि है । भोगयोनि वह होती है, जिसमें नया कर्म करने का अधिकार न हो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५५*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् का होने से ऐसा नहीं होता कि "मैं भगवान् का हूं, दूसरे भगवान् के नहीं हैं," प्रत्युत ऐसा भाव होता है कि सारा संसार भगवान् का है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५८*
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*भगवान् का होने से ऐसा नहीं होता कि "मैं भगवान् का हूं, दूसरे भगवान् के नहीं हैं," प्रत्युत ऐसा भाव होता है कि सारा संसार भगवान् का है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५८*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन विरुद्ध बात आए तो समझो बहुत काम हो गया ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६६*
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*साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन विरुद्ध बात आए तो समझो बहुत काम हो गया ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६६*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*परमात्म प्राप्ति के लिए किसी को भी मना नहीं है । अतः परमात्म प्राप्ति में कभी किसी को निराश नहीं होना चाहिए । मां की गोद में जाने के लिए कौन सा बालक अयोग्य है ?*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६७*
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*परमात्म प्राप्ति के लिए किसी को भी मना नहीं है । अतः परमात्म प्राप्ति में कभी किसी को निराश नहीं होना चाहिए । मां की गोद में जाने के लिए कौन सा बालक अयोग्य है ?*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६७*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*काम - क्रोध न चेतन में रहते हैं, न जड़ में रहते हैं, प्रत्युत "मैं हूं" इस मान्यता में रहते हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७५*
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*काम - क्रोध न चेतन में रहते हैं, न जड़ में रहते हैं, प्रत्युत "मैं हूं" इस मान्यता में रहते हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७५*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*सब ज्ञानी प्रेमी हों - यह नियम नहीं है, पर सब प्रेमी ज्ञानी होंगे - यह नियम है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७६*
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*सब ज्ञानी प्रेमी हों - यह नियम नहीं है, पर सब प्रेमी ज्ञानी होंगे - यह नियम है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७६*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*प्रेम हरदम रहता है, पर दर्शन हरदम नहीं रहते। दर्शन की इच्छा दोषी नहीं है, पर तुलना करें तो दर्शन की अपेक्षा प्रेम ऊंचा है । दर्शन होने पर प्रेम हो जाए - यह नियम नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या 179*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*प्रेम हरदम रहता है, पर दर्शन हरदम नहीं रहते। दर्शन की इच्छा दोषी नहीं है, पर तुलना करें तो दर्शन की अपेक्षा प्रेम ऊंचा है । दर्शन होने पर प्रेम हो जाए - यह नियम नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या 179*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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