राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*कभी किसी को किंचिन्मात्र भी कष्ट न हो, यह भाव उपकार के भाव से भी ऊंचा है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*कभी किसी को किंचिन्मात्र भी कष्ट न हो, यह भाव उपकार के भाव से भी ऊंचा है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*सेवा अपने घर से शुरू करे । जो घर में सेवा नहीं कर सकता, वह बाहर भी सेवा नहीं कर सकता । वह मान बड़ाई का भूखा है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*सेवा अपने घर से शुरू करे । जो घर में सेवा नहीं कर सकता, वह बाहर भी सेवा नहीं कर सकता । वह मान बड़ाई का भूखा है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
👏👏
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*घर से सेबा क्यों शुरू करें ? क्योंकि घर वालों से सुख लिया है, सेवा ली है । उनको सुख देकर कर्जा उतारो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*घर से सेबा क्यों शुरू करें ? क्योंकि घर वालों से सुख लिया है, सेवा ली है । उनको सुख देकर कर्जा उतारो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*मां के उपकार से कोई उऋण हो ही नहीं सकता । पहले कर्जा उतारो, फिर दान - पुण्य करो । ईमानदार आदमी पहले कर्जा उतारता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*मां के उपकार से कोई उऋण हो ही नहीं सकता । पहले कर्जा उतारो, फिर दान - पुण्य करो । ईमानदार आदमी पहले कर्जा उतारता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
👏👏
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*संसार की प्रवृत्ति रोकने से परमात्मा की तरफ गति अपने आप होती है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
👏👏
*संसार की प्रवृत्ति रोकने से परमात्मा की तरफ गति अपने आप होती है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
👏👏
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*हम भगवान् के हैं, भगवान् हमारे हैं - इस प्रकार भगवान् के साथ सम्बन्ध जोड़ने से ज्ञानी और भक्त के सब लक्षण अपने - आप आ जाएंगे ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*हम भगवान् के हैं, भगवान् हमारे हैं - इस प्रकार भगवान् के साथ सम्बन्ध जोड़ने से ज्ञानी और भक्त के सब लक्षण अपने - आप आ जाएंगे ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
👏👏
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*प्रेम के भोक्ता भगवान् हैं, निष्काम भाव से यदि कुत्ते से भी प्रेम करें तो वह भगवान् तक पहुंचता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*प्रेम के भोक्ता भगवान् हैं, निष्काम भाव से यदि कुत्ते से भी प्रेम करें तो वह भगवान् तक पहुंचता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*मनुष्य में यह सामर्थ्य और योग्यता है कि वह अपना उद्धार भी कर सकता है और जगत् तथा परमात्मा को प्रसन्न भी कर सकता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*
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*मनुष्य में यह सामर्थ्य और योग्यता है कि वह अपना उद्धार भी कर सकता है और जगत् तथा परमात्मा को प्रसन्न भी कर सकता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन - विरुद्ध बात न आए तो समझो बहुत काम हो गया ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४*
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*साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन - विरुद्ध बात न आए तो समझो बहुत काम हो गया ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् के सामने अपने पाप कहने से पाप नष्ट हो जाते हैं । भगवान् निर्दोषता की अंतिम सीमा हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४*
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*भगवान् के सामने अपने पाप कहने से पाप नष्ट हो जाते हैं । भगवान् निर्दोषता की अंतिम सीमा हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*मनुष्य योनि भोगयोनि नहीं है, प्रत्युत साधनयोनि है, प्रेमयोनि है, भक्तियोनि है । भोगयोनि वह होती है, जिसमें नया कर्म करने का अधिकार न हो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५५*
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*मनुष्य योनि भोगयोनि नहीं है, प्रत्युत साधनयोनि है, प्रेमयोनि है, भक्तियोनि है । भोगयोनि वह होती है, जिसमें नया कर्म करने का अधिकार न हो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५५*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् का होने से ऐसा नहीं होता कि "मैं भगवान् का हूं, दूसरे भगवान् के नहीं हैं," प्रत्युत ऐसा भाव होता है कि सारा संसार भगवान् का है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५८*
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*भगवान् का होने से ऐसा नहीं होता कि "मैं भगवान् का हूं, दूसरे भगवान् के नहीं हैं," प्रत्युत ऐसा भाव होता है कि सारा संसार भगवान् का है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५८*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन विरुद्ध बात आए तो समझो बहुत काम हो गया ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६६*
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*साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन विरुद्ध बात आए तो समझो बहुत काम हो गया ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६६*
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❤1
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*परमात्म प्राप्ति के लिए किसी को भी मना नहीं है । अतः परमात्म प्राप्ति में कभी किसी को निराश नहीं होना चाहिए । मां की गोद में जाने के लिए कौन सा बालक अयोग्य है ?*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६७*
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*परमात्म प्राप्ति के लिए किसी को भी मना नहीं है । अतः परमात्म प्राप्ति में कभी किसी को निराश नहीं होना चाहिए । मां की गोद में जाने के लिए कौन सा बालक अयोग्य है ?*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६७*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*काम - क्रोध न चेतन में रहते हैं, न जड़ में रहते हैं, प्रत्युत "मैं हूं" इस मान्यता में रहते हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७५*
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*काम - क्रोध न चेतन में रहते हैं, न जड़ में रहते हैं, प्रत्युत "मैं हूं" इस मान्यता में रहते हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७५*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*सब ज्ञानी प्रेमी हों - यह नियम नहीं है, पर सब प्रेमी ज्ञानी होंगे - यह नियम है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७६*
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*सब ज्ञानी प्रेमी हों - यह नियम नहीं है, पर सब प्रेमी ज्ञानी होंगे - यह नियम है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७६*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*प्रेम हरदम रहता है, पर दर्शन हरदम नहीं रहते। दर्शन की इच्छा दोषी नहीं है, पर तुलना करें तो दर्शन की अपेक्षा प्रेम ऊंचा है । दर्शन होने पर प्रेम हो जाए - यह नियम नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या 179*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*प्रेम हरदम रहता है, पर दर्शन हरदम नहीं रहते। दर्शन की इच्छा दोषी नहीं है, पर तुलना करें तो दर्शन की अपेक्षा प्रेम ऊंचा है । दर्शन होने पर प्रेम हो जाए - यह नियम नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या 179*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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