DR NARAYAN DUTT SHRIMALI
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*परमात्मा की प्राप्ति केवल लगन से होती है, उसमें क्रिया और प्रारब्ध (भाग्य) की जरूरत नहीं है । कारण यह है कि परमात्मा नित्यप्राप्त है । नित्यप्राप्त की प्राप्ति में उद्योग काम नहीं करता ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

गया समय फिर मिलेगा नहीं, पर जो समय हाथ में है, उसे अच्छे - से - अच्छे काम में लगाओ । जब तक थोड़ी भी रस्सी हाथ में है, कुएं से जल निकाल सकते हैं, पर रस्सी हाथ से निकल गई तो ?

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*दूसरे को भगवान् में लगाने के समान कोई पुण्य नहीं है। दूसरे को भोजन दोगे तो उसे पुनः भूख लग जाएगी, पर भगवान् में लगा दोगे तो अनंत जन्मों की भूख मिट जाएगी ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

सेवा करने में पहला नंबर घर वालों का है । परंतु आज घर वालों की सेवा न करके बाहर जाकर दूसरों की सेवा करते हैं , क्योंकि बाहर मान आदर मिलता है । यह वास्तव में सेवा नहीं है । ऐसा करने वाले "स्वयं सेवक" हैं अर्थात् अपनी ही सेवा करने वाले हैं ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

शरीर और शरीरी को अलग-अलग जानें तो बहुत लाभ होगा। हमारे साथ शरीर आदि कुछ भी नहीं है - इस प्रकार अपने अकेलेपन का अनुभव करें। भजन स्वयं से होता है, शरीर से नहीं l

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*जो सच्चे हृदय से परमात्मा में लग जाता है, उसके द्वारा दुनिया का भी बड़ा हित होता है और अपना भी ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*बहुत सी बातें जान (सीख) लेने पर तत्व ज्ञान में बाधा लग जाती है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*साधक के लिए खास ध्यान देने की बात है - साधन में कमी न रखना । साधन है - जड़ता का त्याग । साधन में ध्यान दें, सिद्धि की चिंता न करें ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*अग्नि से अलग होने पर ही कोयला काला है । अग्नि से जुड़ने पर कोयला उज्जवल हो जाता है । चमकते हुए कोयले से भी लकीर खींचे तो काली ही खिंचेगी । ऐसे ही परमात्मा से अलग होने पर सब काली लकीर है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*भगवान् को अपना मान लो तो फिर संसार की गुलामी, गरज नहीं करनी पड़ेगी । प्रत्युत संसार ही आपकी गरज करेगा ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

परा, अपरा और परमात्मा - तीनों वास्तव में एक ही हैं । परंतु इनमें राग- द्वेष करके द्वेधी भाव करने से जन्म - मरण होता है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

अपना कोई है तो केवल भगवान् हैं, मनुष्य के सिवाय किसी में भी ताकत नहीं कि भगवान् को मेरा कह दे । *मनुष्य ही भगवान् को अपना मान सकता है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४८*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*जैसे पहले पुत्र उत्पन्न होता है, फिर व्यक्ति पिता बनता है। पुत्र हुए बिना पिता कैसे हुआ ?शिष्य का कल्याण हुए बिना गुरु कैसे हुआ ?*


*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४९*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*चेला बनाने का अधिकार उसी को है, जो उद्धार करने की शक्ति रखता हो ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*कभी किसी को किंचिन्मात्र भी कष्ट न हो, यह भाव उपकार के भाव से भी ऊंचा है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*सेवा अपने घर से शुरू करे । जो घर में सेवा नहीं कर सकता, वह बाहर भी सेवा नहीं कर सकता । वह मान बड़ाई का भूखा है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*घर से सेबा क्यों शुरू करें ? क्योंकि घर वालों से सुख लिया है, सेवा ली है । उनको सुख देकर कर्जा उतारो ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*मां के उपकार से कोई उऋण हो ही नहीं सकता । पहले कर्जा उतारो, फिर दान - पुण्य करो । ईमानदार आदमी पहले कर्जा उतारता है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५०*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*संसार की प्रवृत्ति रोकने से परमात्मा की तरफ गति अपने आप होती है ।*


*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*हम भगवान् के हैं, भगवान् हमारे हैं - इस प्रकार भगवान् के साथ सम्बन्ध जोड़ने से ज्ञानी और भक्त के सब लक्षण अपने - आप आ जाएंगे ।*


*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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