DR NARAYAN DUTT SHRIMALI
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*ज्ञान मार्ग में समझना बढ़िया है, भक्ति मार्ग में मानना बढ़िया है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११७*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*अगर हमारा उद्देश्य सिद्ध होता है तो प्रतिकूलता सहने में क्या हर्ज है ? रात भर गाड़ी में भीड़ के बीच खड़े रहें तो भी एक प्रसन्नता होती है कि घर तो पहुंच जाएंगे !*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११७*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*जैसे विवाहिता स्त्री को पीहर की याद आ जाए तो वह पीहर की (कुंवारी) नहीं हो जाती, ऐसे ही हम भगवान् के हो गए तो अब भले ही संसार की याद आ जाए, याद आने से हम संसार के थोड़े हो जाएंगे !*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२०*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*भगवान् को अपनापन जितना प्रिय है, उतना त्याग, तपस्या आदि भी प्रिय नहीं है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२३*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*परमात्म तत्व तो विद्यमान है ही, केवल संसार का निषेध करना है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२३*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

शरीर के साथ, परिवार के साथ हमारा संबंध माना हुआ है, है नहीं - इतनी बात समझ में आ जाए तो बहुत काम हो गया ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*जिस निष्ठा में गुरुजी हैं, उसी निष्ठा में अपने को तल्लीन कर देना "गुरु निष्ठा" है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*संत "स्वभाव" होता है, गृहस्थ या साधु नहीं होता ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

रामायण में भक्त और भगवान् - दोनों मिल गए हैं । यह भक्त की वाणी है और भगवान् की लीला !

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

परमात्मा अद्वितीय हैं, अतः उनकी अभिलाषा भी अद्वितीय होनी चाहिए । इसका उपाय है - हरदम नाम जप करो और बार-बार प्रार्थना करो कि हे नाथ मैं आपको भूलूं नहीं ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२५*

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*धर्म पालन में कष्ट सहना पड़ता है । सुख - आराम चाहें तो धर्म का पालन कैसे होगा ? भूख सहन नहीं कर सकें तो एकादशी व्रत कैसे होगा ? मनुष्य का उद्देश्य अपना कल्याण करने का है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*जिसका मन कहीं लगता नहीं, मन में अशांति रहती है, वे ही "काम" के वशीभूत होते हैं । भजन करने वाले, भगवान् में लगे हुए, वैराग्यवान पुरुष "काम" में नहीं लगते ।*


*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२७*

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*संसार की प्राप्ति में तो इच्छा, क्रिया और प्रारब्ध - तीनों होने चाहिए, पर भगवान् की प्राप्ति में केवल इच्छा होनी चाहिए* ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२८*

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*अगर मरने से डर लगता है तो हमने मनुष्य जन्म में करने योग्य काम नहीं किया है । यदि मनुष्य जन्म में करने योग्य काम कर लें तो मृत्यु से डर नहीं लगेगा ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १३९*

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*गुरु की प्रसन्नता से जो विद्या आती है, वह अपने उद्योग से नहीं आती । गुरु की प्रसन्नता से विद्या फलीभूत होती है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १३९*

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*अनंत ब्रह्मांडो में अनंत वस्तुएं हैं, पर कोई भी वस्तु हमारी और हमारे लिए नहीं है । वे ब्रह्मांड जिनके रोम रोम में स्थित हैं, वे परमात्मा ही हमारे हैं ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४१*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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शुभ दीपावली 🪔
आपका जीवन खुशियों, सफलता और समृद्धि से जगमगाता रहे!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!


*भगवान् का होकर नाम लेने का जो माहात्म्य है, उतना केवल नाम लेने का नहीं । भगवान् का होकर नाम लेने का विशेष माहात्म्य है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४४*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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