राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
" *परा प्रकृति" अपरा से संबंध जोड़ ले तो "जीव" है, अपरा से संबंध तोड़ ले तो "ब्रह्म" है, और परमात्मा से संबंध जोड़ ले तो "प्रेम" है, प्रेमी नहीं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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" *परा प्रकृति" अपरा से संबंध जोड़ ले तो "जीव" है, अपरा से संबंध तोड़ ले तो "ब्रह्म" है, और परमात्मा से संबंध जोड़ ले तो "प्रेम" है, प्रेमी नहीं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*ज्ञान मार्ग में समझना बढ़िया है, भक्ति मार्ग में मानना बढ़िया है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*ज्ञान मार्ग में समझना बढ़िया है, भक्ति मार्ग में मानना बढ़िया है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अगर हमारा उद्देश्य सिद्ध होता है तो प्रतिकूलता सहने में क्या हर्ज है ? रात भर गाड़ी में भीड़ के बीच खड़े रहें तो भी एक प्रसन्नता होती है कि घर तो पहुंच जाएंगे !*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*अगर हमारा उद्देश्य सिद्ध होता है तो प्रतिकूलता सहने में क्या हर्ज है ? रात भर गाड़ी में भीड़ के बीच खड़े रहें तो भी एक प्रसन्नता होती है कि घर तो पहुंच जाएंगे !*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*जैसे विवाहिता स्त्री को पीहर की याद आ जाए तो वह पीहर की (कुंवारी) नहीं हो जाती, ऐसे ही हम भगवान् के हो गए तो अब भले ही संसार की याद आ जाए, याद आने से हम संसार के थोड़े हो जाएंगे !*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*जैसे विवाहिता स्त्री को पीहर की याद आ जाए तो वह पीहर की (कुंवारी) नहीं हो जाती, ऐसे ही हम भगवान् के हो गए तो अब भले ही संसार की याद आ जाए, याद आने से हम संसार के थोड़े हो जाएंगे !*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् को अपनापन जितना प्रिय है, उतना त्याग, तपस्या आदि भी प्रिय नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*भगवान् को अपनापन जितना प्रिय है, उतना त्याग, तपस्या आदि भी प्रिय नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*परमात्म तत्व तो विद्यमान है ही, केवल संसार का निषेध करना है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*परमात्म तत्व तो विद्यमान है ही, केवल संसार का निषेध करना है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
शरीर के साथ, परिवार के साथ हमारा संबंध माना हुआ है, है नहीं - इतनी बात समझ में आ जाए तो बहुत काम हो गया ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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शरीर के साथ, परिवार के साथ हमारा संबंध माना हुआ है, है नहीं - इतनी बात समझ में आ जाए तो बहुत काम हो गया ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*जिस निष्ठा में गुरुजी हैं, उसी निष्ठा में अपने को तल्लीन कर देना "गुरु निष्ठा" है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*जिस निष्ठा में गुरुजी हैं, उसी निष्ठा में अपने को तल्लीन कर देना "गुरु निष्ठा" है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*संत "स्वभाव" होता है, गृहस्थ या साधु नहीं होता ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*
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*संत "स्वभाव" होता है, गृहस्थ या साधु नहीं होता ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
रामायण में भक्त और भगवान् - दोनों मिल गए हैं । यह भक्त की वाणी है और भगवान् की लीला !
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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रामायण में भक्त और भगवान् - दोनों मिल गए हैं । यह भक्त की वाणी है और भगवान् की लीला !
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परमात्मा अद्वितीय हैं, अतः उनकी अभिलाषा भी अद्वितीय होनी चाहिए । इसका उपाय है - हरदम नाम जप करो और बार-बार प्रार्थना करो कि हे नाथ मैं आपको भूलूं नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परमात्मा अद्वितीय हैं, अतः उनकी अभिलाषा भी अद्वितीय होनी चाहिए । इसका उपाय है - हरदम नाम जप करो और बार-बार प्रार्थना करो कि हे नाथ मैं आपको भूलूं नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*धर्म पालन में कष्ट सहना पड़ता है । सुख - आराम चाहें तो धर्म का पालन कैसे होगा ? भूख सहन नहीं कर सकें तो एकादशी व्रत कैसे होगा ? मनुष्य का उद्देश्य अपना कल्याण करने का है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*धर्म पालन में कष्ट सहना पड़ता है । सुख - आराम चाहें तो धर्म का पालन कैसे होगा ? भूख सहन नहीं कर सकें तो एकादशी व्रत कैसे होगा ? मनुष्य का उद्देश्य अपना कल्याण करने का है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*जिसका मन कहीं लगता नहीं, मन में अशांति रहती है, वे ही "काम" के वशीभूत होते हैं । भजन करने वाले, भगवान् में लगे हुए, वैराग्यवान पुरुष "काम" में नहीं लगते ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*जिसका मन कहीं लगता नहीं, मन में अशांति रहती है, वे ही "काम" के वशीभूत होते हैं । भजन करने वाले, भगवान् में लगे हुए, वैराग्यवान पुरुष "काम" में नहीं लगते ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*संसार की प्राप्ति में तो इच्छा, क्रिया और प्रारब्ध - तीनों होने चाहिए, पर भगवान् की प्राप्ति में केवल इच्छा होनी चाहिए* ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२८*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*संसार की प्राप्ति में तो इच्छा, क्रिया और प्रारब्ध - तीनों होने चाहिए, पर भगवान् की प्राप्ति में केवल इच्छा होनी चाहिए* ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२८*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अगर मरने से डर लगता है तो हमने मनुष्य जन्म में करने योग्य काम नहीं किया है । यदि मनुष्य जन्म में करने योग्य काम कर लें तो मृत्यु से डर नहीं लगेगा ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १३९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*अगर मरने से डर लगता है तो हमने मनुष्य जन्म में करने योग्य काम नहीं किया है । यदि मनुष्य जन्म में करने योग्य काम कर लें तो मृत्यु से डर नहीं लगेगा ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १३९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*गुरु की प्रसन्नता से जो विद्या आती है, वह अपने उद्योग से नहीं आती । गुरु की प्रसन्नता से विद्या फलीभूत होती है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १३९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*गुरु की प्रसन्नता से जो विद्या आती है, वह अपने उद्योग से नहीं आती । गुरु की प्रसन्नता से विद्या फलीभूत होती है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १३९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अनंत ब्रह्मांडो में अनंत वस्तुएं हैं, पर कोई भी वस्तु हमारी और हमारे लिए नहीं है । वे ब्रह्मांड जिनके रोम रोम में स्थित हैं, वे परमात्मा ही हमारे हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*अनंत ब्रह्मांडो में अनंत वस्तुएं हैं, पर कोई भी वस्तु हमारी और हमारे लिए नहीं है । वे ब्रह्मांड जिनके रोम रोम में स्थित हैं, वे परमात्मा ही हमारे हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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