DR NARAYAN DUTT SHRIMALI
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

भोगी की कभी पूर्ति नहीं होती और त्यागी को कभी कमी नहीं होती ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९३*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*क्रिया, चिंतन और स्थिरता से अलग होकर चुप हो जाओ, तब अनुभव हो जायेगा, नहीं तो बातें सीख जाओगे । मुझे तो सबसे बढ़िया बात यह लगती है कि "हे नाथ ! हे मेरे नाथ !" कहते रहो ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

भगवान् से प्रार्थना करने पर भी संकल्प - विकल्प न मिटे तो इसमें हमारे विश्वास की कमी है । वास्तव में मिटे या न मिटे, हमें क्या मतलब ? भगवान् को कहकर निश्चिंत हो जाओ ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*भगवान् के साथ किसी भी तरह जोड़ा गया संबंध सदा कल्याण करने वाला ही होता है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*भगवान् श्वास से भी सस्ते हैं ! श्वास भी लेने पड़ते हैं, पर भगवान् लेने नहीं पड़ते ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

जिस वस्तु की सत्ता है, उसे लेते नहीं और जिस वस्तु की सत्ता नहीं है, उसे लेना चाहते हैं - यह समस्या है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*प्रेम की प्राप्ति में युक्ति काम नहीं करती, लगन काम करती है* ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

तत्वज्ञान होने के बाद महापुरुष अपनी आयु दूसरे को दे सकता है । दूसरे को संपत्ति देने का अधिकार बालिग को होता है । नाबालिग को नहीं । जब तक तत्व ज्ञान न हो तब तक सब नाबालिग हैं ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*मनुष्य शरीर से नीचा नहीं गिरना है - इसका नाम धर्म है । धर्म के साथ संबंध कल्याण का होना चाहिए, सुख का नहीं ।* *सुख के लिए धर्म का पालन नहीं किया जाता । धर्म का पालन मनुष्यता है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९८*

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

संसार पर किसी का भी हक नहीं लगता, पर परमात्मा पर सबका हक लगता है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९९*

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

जब मनुष्य भगवान् से कहता है कि "हे नाथ ! मैं आपका हूं, आप मेरे हो" तो इसे सुनकर भगवान् बड़े प्रसन्न होते हैं । यह भीतर की मार्मिक बात है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १००*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*साधु का काम दंड देना नहीं है । साधु प्रार्थना करता है, दंड नहीं देता।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १००*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

भोग भोगना और संग्रह करना - इन दो में ही सब पाप, ताप, नरक, रोग आदि भरे पड़े हैं ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १०८*

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

चुपचाप बैठे-बैठे विचार करो कि सबका कल्याण कैसे हो ? हित कैसे हो ? आपका कल्याण तो हो ही जाएगा, दूसरे का हित चाहने से अपना परम हित होता है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १०८*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*घर में रहने वाले सभी प्राणी* *अपने को सेवक और दूसरे को सेव्य समझें तो सेवा भी सबकी हो जाएगी और कल्याण भी सबका हो जाएगा ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११०*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*मरने वालों के लोक में रहते हुए आप निश्चिंत कैसे बैठे हो ?*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११२*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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श्रीभाईजीके नित्य स्मरणीय अमृत वचन



यह सत्य है और ध्रुव सत्य है कि भगवान् नित्य तुम्हारे साथ हैं, वे सर्वथा तुम्हारा संरक्षण करते हैं। और आत्मदृष्टि से तुम्हारा स्वरुप भी नित्य-शुद्ध-बुद्ध और निष्पाप है।

*पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*


गीतावाटिका प्रकाशन