DR NARAYAN DUTT SHRIMALI
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

हम संसार को जितना अपना मानते हैं, उतना भगवान् से अपनापन हट जाता है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

दूसरों का हित करने में जो घाटा आ जाए, वह घाटा भी बड़े काम का है - (रघुवंश ५/१६)

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

परिस्थिति का सदुपयोग करें, उसे बदलने की चेष्टा न करें । परिस्थिति को बदल तो नहीं सकते, पर सदुपयोग कर सकते हैं ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८७*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*🍁 श्रद्धेय स्वामी शरणानन्दजी महाराज*

ज्ञानपूर्वक अनुभव करें कि *सृष्‍टि में मेरा कुछ नहीं है!* सृष्‍टि से सम्बन्ध तोड़ने की प्रेरणा और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की प्रेरणा स्वधर्म देता है!

*स्वधर्म का मतलब है, स्व का धर्म!* श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सर्वधर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

' भगवत् कृपा ही जिनकी प्राप्ति का कारण है, वे मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व (मुक्ति की इच्छा) और महापुरुषों का संग - ये तीनों ही दुर्लभ हैं ।'

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८९*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

भोगी की कभी पूर्ति नहीं होती और त्यागी को कभी कमी नहीं होती ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९३*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*क्रिया, चिंतन और स्थिरता से अलग होकर चुप हो जाओ, तब अनुभव हो जायेगा, नहीं तो बातें सीख जाओगे । मुझे तो सबसे बढ़िया बात यह लगती है कि "हे नाथ ! हे मेरे नाथ !" कहते रहो ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

भगवान् से प्रार्थना करने पर भी संकल्प - विकल्प न मिटे तो इसमें हमारे विश्वास की कमी है । वास्तव में मिटे या न मिटे, हमें क्या मतलब ? भगवान् को कहकर निश्चिंत हो जाओ ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*भगवान् के साथ किसी भी तरह जोड़ा गया संबंध सदा कल्याण करने वाला ही होता है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*भगवान् श्वास से भी सस्ते हैं ! श्वास भी लेने पड़ते हैं, पर भगवान् लेने नहीं पड़ते ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

जिस वस्तु की सत्ता है, उसे लेते नहीं और जिस वस्तु की सत्ता नहीं है, उसे लेना चाहते हैं - यह समस्या है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*प्रेम की प्राप्ति में युक्ति काम नहीं करती, लगन काम करती है* ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

तत्वज्ञान होने के बाद महापुरुष अपनी आयु दूसरे को दे सकता है । दूसरे को संपत्ति देने का अधिकार बालिग को होता है । नाबालिग को नहीं । जब तक तत्व ज्ञान न हो तब तक सब नाबालिग हैं ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*मनुष्य शरीर से नीचा नहीं गिरना है - इसका नाम धर्म है । धर्म के साथ संबंध कल्याण का होना चाहिए, सुख का नहीं ।* *सुख के लिए धर्म का पालन नहीं किया जाता । धर्म का पालन मनुष्यता है ।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९८*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

संसार पर किसी का भी हक नहीं लगता, पर परमात्मा पर सबका हक लगता है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९९*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

जब मनुष्य भगवान् से कहता है कि "हे नाथ ! मैं आपका हूं, आप मेरे हो" तो इसे सुनकर भगवान् बड़े प्रसन्न होते हैं । यह भीतर की मार्मिक बात है ।

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १००*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

*साधु का काम दंड देना नहीं है । साधु प्रार्थना करता है, दंड नहीं देता।*

*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १००*

*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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