राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
"हूं" जीव है और "है" परमात्मा है । "हूं" मैं ही "है" है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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"हूं" जीव है और "है" परमात्मा है । "हूं" मैं ही "है" है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
धन का संग्रह करते हैं तो धन आगे काम नहीं आएगा । धन तो पीछे (दूसरों के) काम आएगा, आगे काम आएंगे पाप ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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धन का संग्रह करते हैं तो धन आगे काम नहीं आएगा । धन तो पीछे (दूसरों के) काम आएगा, आगे काम आएंगे पाप ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*प्रातः लेई जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा !!* (मानस सुंदर कांड ७/४) । यह हनुमान जी की नम्रता हैं, अन्यथा वे तो "मंगल मूर्ति रूप हैं" उनका स्मरण करने से अमंगल कैसे होगा ?
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*प्रातः लेई जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा !!* (मानस सुंदर कांड ७/४) । यह हनुमान जी की नम्रता हैं, अन्यथा वे तो "मंगल मूर्ति रूप हैं" उनका स्मरण करने से अमंगल कैसे होगा ?
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अगर भीतर में राग - द्वेष है तो साधु बनने पर, संन्यास लेने पर भी मुक्ति नहीं होगी* । मुक्ति के लिए राग - द्वेष का त्याग करने की जरूरत है, साधु बनने, कपड़ों का रंग बदलने की जरूरत नहीं है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*अगर भीतर में राग - द्वेष है तो साधु बनने पर, संन्यास लेने पर भी मुक्ति नहीं होगी* । मुक्ति के लिए राग - द्वेष का त्याग करने की जरूरत है, साधु बनने, कपड़ों का रंग बदलने की जरूरत नहीं है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
हम संसार को जितना अपना मानते हैं, उतना भगवान् से अपनापन हट जाता है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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हम संसार को जितना अपना मानते हैं, उतना भगवान् से अपनापन हट जाता है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
दूसरों का हित करने में जो घाटा आ जाए, वह घाटा भी बड़े काम का है - (रघुवंश ५/१६)
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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दूसरों का हित करने में जो घाटा आ जाए, वह घाटा भी बड़े काम का है - (रघुवंश ५/१६)
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परिस्थिति का सदुपयोग करें, उसे बदलने की चेष्टा न करें । परिस्थिति को बदल तो नहीं सकते, पर सदुपयोग कर सकते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परिस्थिति का सदुपयोग करें, उसे बदलने की चेष्टा न करें । परिस्थिति को बदल तो नहीं सकते, पर सदुपयोग कर सकते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*🍁 श्रद्धेय स्वामी शरणानन्दजी महाराज*
ज्ञानपूर्वक अनुभव करें कि *सृष्टि में मेरा कुछ नहीं है!* सृष्टि से सम्बन्ध तोड़ने की प्रेरणा और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की प्रेरणा स्वधर्म देता है!
*स्वधर्म का मतलब है, स्व का धर्म!* श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सर्वधर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा!
ज्ञानपूर्वक अनुभव करें कि *सृष्टि में मेरा कुछ नहीं है!* सृष्टि से सम्बन्ध तोड़ने की प्रेरणा और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की प्रेरणा स्वधर्म देता है!
*स्वधर्म का मतलब है, स्व का धर्म!* श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सर्वधर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
' भगवत् कृपा ही जिनकी प्राप्ति का कारण है, वे मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व (मुक्ति की इच्छा) और महापुरुषों का संग - ये तीनों ही दुर्लभ हैं ।'
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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' भगवत् कृपा ही जिनकी प्राप्ति का कारण है, वे मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व (मुक्ति की इच्छा) और महापुरुषों का संग - ये तीनों ही दुर्लभ हैं ।'
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
भोगी की कभी पूर्ति नहीं होती और त्यागी को कभी कमी नहीं होती ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भोगी की कभी पूर्ति नहीं होती और त्यागी को कभी कमी नहीं होती ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*क्रिया, चिंतन और स्थिरता से अलग होकर चुप हो जाओ, तब अनुभव हो जायेगा, नहीं तो बातें सीख जाओगे । मुझे तो सबसे बढ़िया बात यह लगती है कि "हे नाथ ! हे मेरे नाथ !" कहते रहो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*क्रिया, चिंतन और स्थिरता से अलग होकर चुप हो जाओ, तब अनुभव हो जायेगा, नहीं तो बातें सीख जाओगे । मुझे तो सबसे बढ़िया बात यह लगती है कि "हे नाथ ! हे मेरे नाथ !" कहते रहो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
भगवान् से प्रार्थना करने पर भी संकल्प - विकल्प न मिटे तो इसमें हमारे विश्वास की कमी है । वास्तव में मिटे या न मिटे, हमें क्या मतलब ? भगवान् को कहकर निश्चिंत हो जाओ ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भगवान् से प्रार्थना करने पर भी संकल्प - विकल्प न मिटे तो इसमें हमारे विश्वास की कमी है । वास्तव में मिटे या न मिटे, हमें क्या मतलब ? भगवान् को कहकर निश्चिंत हो जाओ ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् के साथ किसी भी तरह जोड़ा गया संबंध सदा कल्याण करने वाला ही होता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*भगवान् के साथ किसी भी तरह जोड़ा गया संबंध सदा कल्याण करने वाला ही होता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् श्वास से भी सस्ते हैं ! श्वास भी लेने पड़ते हैं, पर भगवान् लेने नहीं पड़ते ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*भगवान् श्वास से भी सस्ते हैं ! श्वास भी लेने पड़ते हैं, पर भगवान् लेने नहीं पड़ते ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
जिस वस्तु की सत्ता है, उसे लेते नहीं और जिस वस्तु की सत्ता नहीं है, उसे लेना चाहते हैं - यह समस्या है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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जिस वस्तु की सत्ता है, उसे लेते नहीं और जिस वस्तु की सत्ता नहीं है, उसे लेना चाहते हैं - यह समस्या है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*प्रेम की प्राप्ति में युक्ति काम नहीं करती, लगन काम करती है* ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*प्रेम की प्राप्ति में युक्ति काम नहीं करती, लगन काम करती है* ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
तत्वज्ञान होने के बाद महापुरुष अपनी आयु दूसरे को दे सकता है । दूसरे को संपत्ति देने का अधिकार बालिग को होता है । नाबालिग को नहीं । जब तक तत्व ज्ञान न हो तब तक सब नाबालिग हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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तत्वज्ञान होने के बाद महापुरुष अपनी आयु दूसरे को दे सकता है । दूसरे को संपत्ति देने का अधिकार बालिग को होता है । नाबालिग को नहीं । जब तक तत्व ज्ञान न हो तब तक सब नाबालिग हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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