भगवान् कृष्ण ने कह कर बता दिया । यहां जो आते हैं, उनकी ठीक से भोजन की व्यवस्था, रहने की व्यवस्था हो, ऐसी चेष्टा हो । आने वाले को प्रेम से ऐसे बैठाना है कि मैं कसूरवार हूं । इनके मैं बाधा दे रहा हूं, ये कहीं भी बैठे । ऐसे प्रेम से उनको लाकर बिठाओ । प्रेम से, नम्रता से, आदर पूर्वक उनके साथ व्यवहार करो । आने वालों को भी चाहिए कि विचारे कि राजाओं को भी बाहर जाने पर कष्ट उठाना पड़ता है, तो कष्ट सहे और अधिक से अधिक लाभ लेवे ।
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!!!
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नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!!!
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
दूसरों का हित करने वाला दु:खी नहीं हो सकता । दूसरों को तृप्त करने से अपनी तृप्ति स्वत: होती है । स्वार्थी की तृप्ति कभी हो सकती ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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दूसरों का हित करने वाला दु:खी नहीं हो सकता । दूसरों को तृप्त करने से अपनी तृप्ति स्वत: होती है । स्वार्थी की तृप्ति कभी हो सकती ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७०*
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श्रीभाईजीके नित्य स्मरणीय अमृत वचन
जीवन का जो क्षण, जो विचार, जो कार्य भगवान् की सेवा में लगता है,वह वास्तविक "अर्थ" है--यह अर्थ ही परमार्थ है।
*पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*
गीतावाटिका प्रकाशन
जीवन का जो क्षण, जो विचार, जो कार्य भगवान् की सेवा में लगता है,वह वास्तविक "अर्थ" है--यह अर्थ ही परमार्थ है।
*पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*
गीतावाटिका प्रकाशन
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परमात्मा बहुत दूर हैं, संसार हमारे साथ है - यह धारणा गलत है । *परमात्मा "मैं हूं" से भी ज्यादा नजदीक है और अपने हैं* । परमात्मा वही हो सकते हैं, जो सबके हों, सब समय हों, सब में हों ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परमात्मा बहुत दूर हैं, संसार हमारे साथ है - यह धारणा गलत है । *परमात्मा "मैं हूं" से भी ज्यादा नजदीक है और अपने हैं* । परमात्मा वही हो सकते हैं, जो सबके हों, सब समय हों, सब में हों ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*आपके पास जो अधिक सामग्री आई है, वह उदार बनाने के लिए आई है ।* अतः उससे अभावग्रस्त की सेवा करो । सेवा करना और भजन करना - दोनों का फल एक है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*आपके पास जो अधिक सामग्री आई है, वह उदार बनाने के लिए आई है ।* अतः उससे अभावग्रस्त की सेवा करो । सेवा करना और भजन करना - दोनों का फल एक है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
"हूं" जीव है और "है" परमात्मा है । "हूं" मैं ही "है" है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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"हूं" जीव है और "है" परमात्मा है । "हूं" मैं ही "है" है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
धन का संग्रह करते हैं तो धन आगे काम नहीं आएगा । धन तो पीछे (दूसरों के) काम आएगा, आगे काम आएंगे पाप ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
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धन का संग्रह करते हैं तो धन आगे काम नहीं आएगा । धन तो पीछे (दूसरों के) काम आएगा, आगे काम आएंगे पाप ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*प्रातः लेई जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा !!* (मानस सुंदर कांड ७/४) । यह हनुमान जी की नम्रता हैं, अन्यथा वे तो "मंगल मूर्ति रूप हैं" उनका स्मरण करने से अमंगल कैसे होगा ?
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*प्रातः लेई जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा !!* (मानस सुंदर कांड ७/४) । यह हनुमान जी की नम्रता हैं, अन्यथा वे तो "मंगल मूर्ति रूप हैं" उनका स्मरण करने से अमंगल कैसे होगा ?
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८४*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अगर भीतर में राग - द्वेष है तो साधु बनने पर, संन्यास लेने पर भी मुक्ति नहीं होगी* । मुक्ति के लिए राग - द्वेष का त्याग करने की जरूरत है, साधु बनने, कपड़ों का रंग बदलने की जरूरत नहीं है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*अगर भीतर में राग - द्वेष है तो साधु बनने पर, संन्यास लेने पर भी मुक्ति नहीं होगी* । मुक्ति के लिए राग - द्वेष का त्याग करने की जरूरत है, साधु बनने, कपड़ों का रंग बदलने की जरूरत नहीं है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
हम संसार को जितना अपना मानते हैं, उतना भगवान् से अपनापन हट जाता है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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हम संसार को जितना अपना मानते हैं, उतना भगवान् से अपनापन हट जाता है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
दूसरों का हित करने में जो घाटा आ जाए, वह घाटा भी बड़े काम का है - (रघुवंश ५/१६)
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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दूसरों का हित करने में जो घाटा आ जाए, वह घाटा भी बड़े काम का है - (रघुवंश ५/१६)
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परिस्थिति का सदुपयोग करें, उसे बदलने की चेष्टा न करें । परिस्थिति को बदल तो नहीं सकते, पर सदुपयोग कर सकते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परिस्थिति का सदुपयोग करें, उसे बदलने की चेष्टा न करें । परिस्थिति को बदल तो नहीं सकते, पर सदुपयोग कर सकते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*🍁 श्रद्धेय स्वामी शरणानन्दजी महाराज*
ज्ञानपूर्वक अनुभव करें कि *सृष्टि में मेरा कुछ नहीं है!* सृष्टि से सम्बन्ध तोड़ने की प्रेरणा और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की प्रेरणा स्वधर्म देता है!
*स्वधर्म का मतलब है, स्व का धर्म!* श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सर्वधर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा!
ज्ञानपूर्वक अनुभव करें कि *सृष्टि में मेरा कुछ नहीं है!* सृष्टि से सम्बन्ध तोड़ने की प्रेरणा और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की प्रेरणा स्वधर्म देता है!
*स्वधर्म का मतलब है, स्व का धर्म!* श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सर्वधर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
' भगवत् कृपा ही जिनकी प्राप्ति का कारण है, वे मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व (मुक्ति की इच्छा) और महापुरुषों का संग - ये तीनों ही दुर्लभ हैं ।'
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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' भगवत् कृपा ही जिनकी प्राप्ति का कारण है, वे मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व (मुक्ति की इच्छा) और महापुरुषों का संग - ये तीनों ही दुर्लभ हैं ।'
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
भोगी की कभी पूर्ति नहीं होती और त्यागी को कभी कमी नहीं होती ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भोगी की कभी पूर्ति नहीं होती और त्यागी को कभी कमी नहीं होती ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*क्रिया, चिंतन और स्थिरता से अलग होकर चुप हो जाओ, तब अनुभव हो जायेगा, नहीं तो बातें सीख जाओगे । मुझे तो सबसे बढ़िया बात यह लगती है कि "हे नाथ ! हे मेरे नाथ !" कहते रहो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*क्रिया, चिंतन और स्थिरता से अलग होकर चुप हो जाओ, तब अनुभव हो जायेगा, नहीं तो बातें सीख जाओगे । मुझे तो सबसे बढ़िया बात यह लगती है कि "हे नाथ ! हे मेरे नाथ !" कहते रहो ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
भगवान् से प्रार्थना करने पर भी संकल्प - विकल्प न मिटे तो इसमें हमारे विश्वास की कमी है । वास्तव में मिटे या न मिटे, हमें क्या मतलब ? भगवान् को कहकर निश्चिंत हो जाओ ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भगवान् से प्रार्थना करने पर भी संकल्प - विकल्प न मिटे तो इसमें हमारे विश्वास की कमी है । वास्तव में मिटे या न मिटे, हमें क्या मतलब ? भगवान् को कहकर निश्चिंत हो जाओ ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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