।।श्रीहरि:।।💐
सब कुछ वासुदेव ही है।
जो भी मनमें आ जाय, *तरह-तरहकी बातें मनमें आ जायँ तो उनको भगवत्स्वरूप समझकर 'भगवते नमः' कह दे।*
🌟 *सत्संग के अमृत-कण* पृष्ठ १४७ गीता प्रकाशन *परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज* नारायण! नारायण!नारायण! नारायण!
सब कुछ वासुदेव ही है।
जो भी मनमें आ जाय, *तरह-तरहकी बातें मनमें आ जायँ तो उनको भगवत्स्वरूप समझकर 'भगवते नमः' कह दे।*
🌟 *सत्संग के अमृत-कण* पृष्ठ १४७ गीता प्रकाशन *परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज* नारायण! नारायण!नारायण! नारायण!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
संसार का वियोग नित्य है, परमात्मा का योग नित्य है । संसार नदी की तरह निरंतर बह रहा है और परमात्मा शीला की तरह निरंतर अचल हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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संसार का वियोग नित्य है, परमात्मा का योग नित्य है । संसार नदी की तरह निरंतर बह रहा है और परमात्मा शीला की तरह निरंतर अचल हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
शास्त्रों को समझना हो तो अच्छे जानकार पुरुषों से समझें । *हमारे भीतर राग - द्वेष होंगे तो शास्त्रों में भी हमें वैसा ही दीखेगा।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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शास्त्रों को समझना हो तो अच्छे जानकार पुरुषों से समझें । *हमारे भीतर राग - द्वेष होंगे तो शास्त्रों में भी हमें वैसा ही दीखेगा।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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Document from Chandan Kumar
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
ग्राहक कम होते हैं तो वस्तु सस्ती हो जाती है । आजकल भगवान् के ग्राहक कम हैं, इसलिए भगवान् आजकल सस्ते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ६३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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ग्राहक कम होते हैं तो वस्तु सस्ती हो जाती है । आजकल भगवान् के ग्राहक कम हैं, इसलिए भगवान् आजकल सस्ते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ६३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
स्वरूप की प्राप्ति में जिज्ञासा मुख्य है और ईश्वर की प्राप्ति में विश्वास मुख्य है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ६३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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स्वरूप की प्राप्ति में जिज्ञासा मुख्य है और ईश्वर की प्राप्ति में विश्वास मुख्य है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ६३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भगवान् कृष्ण ने कह कर बता दिया । यहां जो आते हैं, उनकी ठीक से भोजन की व्यवस्था, रहने की व्यवस्था हो, ऐसी चेष्टा हो । आने वाले को प्रेम से ऐसे बैठाना है कि मैं कसूरवार हूं । इनके मैं बाधा दे रहा हूं, ये कहीं भी बैठे । ऐसे प्रेम से उनको लाकर बिठाओ । प्रेम से, नम्रता से, आदर पूर्वक उनके साथ व्यवहार करो । आने वालों को भी चाहिए कि विचारे कि राजाओं को भी बाहर जाने पर कष्ट उठाना पड़ता है, तो कष्ट सहे और अधिक से अधिक लाभ लेवे ।
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!!!
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नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!!!
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
दूसरों का हित करने वाला दु:खी नहीं हो सकता । दूसरों को तृप्त करने से अपनी तृप्ति स्वत: होती है । स्वार्थी की तृप्ति कभी हो सकती ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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दूसरों का हित करने वाला दु:खी नहीं हो सकता । दूसरों को तृप्त करने से अपनी तृप्ति स्वत: होती है । स्वार्थी की तृप्ति कभी हो सकती ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७०*
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श्रीभाईजीके नित्य स्मरणीय अमृत वचन
जीवन का जो क्षण, जो विचार, जो कार्य भगवान् की सेवा में लगता है,वह वास्तविक "अर्थ" है--यह अर्थ ही परमार्थ है।
*पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*
गीतावाटिका प्रकाशन
जीवन का जो क्षण, जो विचार, जो कार्य भगवान् की सेवा में लगता है,वह वास्तविक "अर्थ" है--यह अर्थ ही परमार्थ है।
*पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*
गीतावाटिका प्रकाशन
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परमात्मा बहुत दूर हैं, संसार हमारे साथ है - यह धारणा गलत है । *परमात्मा "मैं हूं" से भी ज्यादा नजदीक है और अपने हैं* । परमात्मा वही हो सकते हैं, जो सबके हों, सब समय हों, सब में हों ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परमात्मा बहुत दूर हैं, संसार हमारे साथ है - यह धारणा गलत है । *परमात्मा "मैं हूं" से भी ज्यादा नजदीक है और अपने हैं* । परमात्मा वही हो सकते हैं, जो सबके हों, सब समय हों, सब में हों ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*आपके पास जो अधिक सामग्री आई है, वह उदार बनाने के लिए आई है ।* अतः उससे अभावग्रस्त की सेवा करो । सेवा करना और भजन करना - दोनों का फल एक है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*आपके पास जो अधिक सामग्री आई है, वह उदार बनाने के लिए आई है ।* अतः उससे अभावग्रस्त की सेवा करो । सेवा करना और भजन करना - दोनों का फल एक है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
"हूं" जीव है और "है" परमात्मा है । "हूं" मैं ही "है" है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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"हूं" जीव है और "है" परमात्मा है । "हूं" मैं ही "है" है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
धन का संग्रह करते हैं तो धन आगे काम नहीं आएगा । धन तो पीछे (दूसरों के) काम आएगा, आगे काम आएंगे पाप ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
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धन का संग्रह करते हैं तो धन आगे काम नहीं आएगा । धन तो पीछे (दूसरों के) काम आएगा, आगे काम आएंगे पाप ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*प्रातः लेई जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा !!* (मानस सुंदर कांड ७/४) । यह हनुमान जी की नम्रता हैं, अन्यथा वे तो "मंगल मूर्ति रूप हैं" उनका स्मरण करने से अमंगल कैसे होगा ?
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*प्रातः लेई जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा !!* (मानस सुंदर कांड ७/४) । यह हनुमान जी की नम्रता हैं, अन्यथा वे तो "मंगल मूर्ति रूप हैं" उनका स्मरण करने से अमंगल कैसे होगा ?
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८४*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अगर भीतर में राग - द्वेष है तो साधु बनने पर, संन्यास लेने पर भी मुक्ति नहीं होगी* । मुक्ति के लिए राग - द्वेष का त्याग करने की जरूरत है, साधु बनने, कपड़ों का रंग बदलने की जरूरत नहीं है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*अगर भीतर में राग - द्वेष है तो साधु बनने पर, संन्यास लेने पर भी मुक्ति नहीं होगी* । मुक्ति के लिए राग - द्वेष का त्याग करने की जरूरत है, साधु बनने, कपड़ों का रंग बदलने की जरूरत नहीं है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
हम संसार को जितना अपना मानते हैं, उतना भगवान् से अपनापन हट जाता है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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हम संसार को जितना अपना मानते हैं, उतना भगवान् से अपनापन हट जाता है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
दूसरों का हित करने में जो घाटा आ जाए, वह घाटा भी बड़े काम का है - (रघुवंश ५/१६)
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
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दूसरों का हित करने में जो घाटा आ जाए, वह घाटा भी बड़े काम का है - (रघुवंश ५/१६)
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परिस्थिति का सदुपयोग करें, उसे बदलने की चेष्टा न करें । परिस्थिति को बदल तो नहीं सकते, पर सदुपयोग कर सकते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परिस्थिति का सदुपयोग करें, उसे बदलने की चेष्टा न करें । परिस्थिति को बदल तो नहीं सकते, पर सदुपयोग कर सकते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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