राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
कामना न रखने से वस्तु आपकी गज करेगी । *कामना, ममता, आसक्ति न रखने से नया प्रारब्ध बन जाता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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कामना न रखने से वस्तु आपकी गज करेगी । *कामना, ममता, आसक्ति न रखने से नया प्रारब्ध बन जाता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*🍁🍁 स्वामी श्रीशरणानन्दजी महाराज*
प्राण-शक्ति का व्यय हो जाना और इच्छाओं का शेष रह जाना ही मृत्यु है! *जीवन में ही मृत्यु का अनुभव करने के लिए साधक को प्राणों के रहते हुए ही इच्छाओं का अन्त करना होगा!*
इच्छाओं का अन्त होते ही देहाभिमान गल जाता है; फिर सभी अवस्थाओं से अतीत, जो सभी अवस्थाओं का प्रकाशक है, उस स्वयं प्रकाश नित्य-जीवन से अभिन्नता हो जाती है!
प्राण-शक्ति का व्यय हो जाना और इच्छाओं का शेष रह जाना ही मृत्यु है! *जीवन में ही मृत्यु का अनुभव करने के लिए साधक को प्राणों के रहते हुए ही इच्छाओं का अन्त करना होगा!*
इच्छाओं का अन्त होते ही देहाभिमान गल जाता है; फिर सभी अवस्थाओं से अतीत, जो सभी अवस्थाओं का प्रकाशक है, उस स्वयं प्रकाश नित्य-जीवन से अभिन्नता हो जाती है!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*यह बड़े आश्चर्य की बात है कि परमात्मा की दी हुई चीज तो अच्छी लगती है, पर परमात्मा स्वयं अच्छे नहीं लगते ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५२*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*यह बड़े आश्चर्य की बात है कि परमात्मा की दी हुई चीज तो अच्छी लगती है, पर परमात्मा स्वयं अच्छे नहीं लगते ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५२*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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।।श्रीहरि:।।💐
सब कुछ वासुदेव ही है।
जो भी मनमें आ जाय, *तरह-तरहकी बातें मनमें आ जायँ तो उनको भगवत्स्वरूप समझकर 'भगवते नमः' कह दे।*
🌟 *सत्संग के अमृत-कण* पृष्ठ १४७ गीता प्रकाशन *परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज* नारायण! नारायण!नारायण! नारायण!
सब कुछ वासुदेव ही है।
जो भी मनमें आ जाय, *तरह-तरहकी बातें मनमें आ जायँ तो उनको भगवत्स्वरूप समझकर 'भगवते नमः' कह दे।*
🌟 *सत्संग के अमृत-कण* पृष्ठ १४७ गीता प्रकाशन *परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज* नारायण! नारायण!नारायण! नारायण!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
संसार का वियोग नित्य है, परमात्मा का योग नित्य है । संसार नदी की तरह निरंतर बह रहा है और परमात्मा शीला की तरह निरंतर अचल हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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संसार का वियोग नित्य है, परमात्मा का योग नित्य है । संसार नदी की तरह निरंतर बह रहा है और परमात्मा शीला की तरह निरंतर अचल हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
शास्त्रों को समझना हो तो अच्छे जानकार पुरुषों से समझें । *हमारे भीतर राग - द्वेष होंगे तो शास्त्रों में भी हमें वैसा ही दीखेगा।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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शास्त्रों को समझना हो तो अच्छे जानकार पुरुषों से समझें । *हमारे भीतर राग - द्वेष होंगे तो शास्त्रों में भी हमें वैसा ही दीखेगा।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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Document from Chandan Kumar
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
ग्राहक कम होते हैं तो वस्तु सस्ती हो जाती है । आजकल भगवान् के ग्राहक कम हैं, इसलिए भगवान् आजकल सस्ते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ६३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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ग्राहक कम होते हैं तो वस्तु सस्ती हो जाती है । आजकल भगवान् के ग्राहक कम हैं, इसलिए भगवान् आजकल सस्ते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ६३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
स्वरूप की प्राप्ति में जिज्ञासा मुख्य है और ईश्वर की प्राप्ति में विश्वास मुख्य है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ६३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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स्वरूप की प्राप्ति में जिज्ञासा मुख्य है और ईश्वर की प्राप्ति में विश्वास मुख्य है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ६३*
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भगवान् कृष्ण ने कह कर बता दिया । यहां जो आते हैं, उनकी ठीक से भोजन की व्यवस्था, रहने की व्यवस्था हो, ऐसी चेष्टा हो । आने वाले को प्रेम से ऐसे बैठाना है कि मैं कसूरवार हूं । इनके मैं बाधा दे रहा हूं, ये कहीं भी बैठे । ऐसे प्रेम से उनको लाकर बिठाओ । प्रेम से, नम्रता से, आदर पूर्वक उनके साथ व्यवहार करो । आने वालों को भी चाहिए कि विचारे कि राजाओं को भी बाहर जाने पर कष्ट उठाना पड़ता है, तो कष्ट सहे और अधिक से अधिक लाभ लेवे ।
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!!!
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नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!!!
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
दूसरों का हित करने वाला दु:खी नहीं हो सकता । दूसरों को तृप्त करने से अपनी तृप्ति स्वत: होती है । स्वार्थी की तृप्ति कभी हो सकती ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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दूसरों का हित करने वाला दु:खी नहीं हो सकता । दूसरों को तृप्त करने से अपनी तृप्ति स्वत: होती है । स्वार्थी की तृप्ति कभी हो सकती ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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श्रीभाईजीके नित्य स्मरणीय अमृत वचन
जीवन का जो क्षण, जो विचार, जो कार्य भगवान् की सेवा में लगता है,वह वास्तविक "अर्थ" है--यह अर्थ ही परमार्थ है।
*पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*
गीतावाटिका प्रकाशन
जीवन का जो क्षण, जो विचार, जो कार्य भगवान् की सेवा में लगता है,वह वास्तविक "अर्थ" है--यह अर्थ ही परमार्थ है।
*पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार*
गीतावाटिका प्रकाशन
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परमात्मा बहुत दूर हैं, संसार हमारे साथ है - यह धारणा गलत है । *परमात्मा "मैं हूं" से भी ज्यादा नजदीक है और अपने हैं* । परमात्मा वही हो सकते हैं, जो सबके हों, सब समय हों, सब में हों ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परमात्मा बहुत दूर हैं, संसार हमारे साथ है - यह धारणा गलत है । *परमात्मा "मैं हूं" से भी ज्यादा नजदीक है और अपने हैं* । परमात्मा वही हो सकते हैं, जो सबके हों, सब समय हों, सब में हों ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*आपके पास जो अधिक सामग्री आई है, वह उदार बनाने के लिए आई है ।* अतः उससे अभावग्रस्त की सेवा करो । सेवा करना और भजन करना - दोनों का फल एक है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*आपके पास जो अधिक सामग्री आई है, वह उदार बनाने के लिए आई है ।* अतः उससे अभावग्रस्त की सेवा करो । सेवा करना और भजन करना - दोनों का फल एक है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ७५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
"हूं" जीव है और "है" परमात्मा है । "हूं" मैं ही "है" है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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"हूं" जीव है और "है" परमात्मा है । "हूं" मैं ही "है" है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
धन का संग्रह करते हैं तो धन आगे काम नहीं आएगा । धन तो पीछे (दूसरों के) काम आएगा, आगे काम आएंगे पाप ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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धन का संग्रह करते हैं तो धन आगे काम नहीं आएगा । धन तो पीछे (दूसरों के) काम आएगा, आगे काम आएंगे पाप ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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