राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
सांसारिक सुख क्यों नहीं टिकता ? क्योंकि वह आपका है ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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सांसारिक सुख क्यों नहीं टिकता ? क्योंकि वह आपका है ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परमात्मा मैं - पन से भी नजदीक हैं । मैं - पन आपसे दूर है । मैं - पन के साथ आप निरंतर नहीं रह सकते । सुषुप्ति में मैं- पन नहीं रहता । परंतु परमात्मा के साथ आप निरंतर रहते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २८*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परमात्मा मैं - पन से भी नजदीक हैं । मैं - पन आपसे दूर है । मैं - पन के साथ आप निरंतर नहीं रह सकते । सुषुप्ति में मैं- पन नहीं रहता । परंतु परमात्मा के साथ आप निरंतर रहते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २८*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
जैसे प्यास और जल, भूख और अन्न एक चीज है, ऐसे ही परमात्मा की भूख और परमात्मा एक चीज है । अन्न, जल सब जगह नहीं मिलते, पर परमात्मा सब जगह हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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जैसे प्यास और जल, भूख और अन्न एक चीज है, ऐसे ही परमात्मा की भूख और परमात्मा एक चीज है । अन्न, जल सब जगह नहीं मिलते, पर परमात्मा सब जगह हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
संसार हमारे में गुण अधिक मानता है और अवगुण कम । अतः लोग दूसरे को जल्दी ज्ञानी मान लेते हैं । पर वास्तव में वह ज्ञानी है या अज्ञानी - इसका पता नहीं लगता ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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संसार हमारे में गुण अधिक मानता है और अवगुण कम । अतः लोग दूसरे को जल्दी ज्ञानी मान लेते हैं । पर वास्तव में वह ज्ञानी है या अज्ञानी - इसका पता नहीं लगता ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
भीतर में कोई आशा न रखना सत्संग है । आशा रखना असत् का संग है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३२*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भीतर में कोई आशा न रखना सत्संग है । आशा रखना असत् का संग है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३२*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
शरीर अपना नहीं दीखे तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-तीनों सुगम हो जायँगे। *इतने वर्ष सत्संग करके भी शरीरको संसारका और अपनेको भगवान् का नहीं माना तो क्या किया !*
परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज' *नये रास्ते, नयी दिशाएँ'* पुस्तकसे 🙏
शरीर अपना नहीं दीखे तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-तीनों सुगम हो जायँगे। *इतने वर्ष सत्संग करके भी शरीरको संसारका और अपनेको भगवान् का नहीं माना तो क्या किया !*
परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज' *नये रास्ते, नयी दिशाएँ'* पुस्तकसे 🙏
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*हमारा फिर जन्म होगा - ऐसे अपने पुनर्जन्म को निमंत्रण मत देना ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*हमारा फिर जन्म होगा - ऐसे अपने पुनर्जन्म को निमंत्रण मत देना ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
भाव शब्द से भी अधिक व्यापक है । भाव त्रिलोकी तक पहुंचता है । इसलिए सबके हित का भाव रखें - यह बड़ा भारी पुण्य है । भावों को शुद्ध बनाए रखना बड़ी तपस्या है - (गीता १७/१६) ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भाव शब्द से भी अधिक व्यापक है । भाव त्रिलोकी तक पहुंचता है । इसलिए सबके हित का भाव रखें - यह बड़ा भारी पुण्य है । भावों को शुद्ध बनाए रखना बड़ी तपस्या है - (गीता १७/१६) ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*चेला बनने पर ही बात बताएं - यह सांप्रदायिक चीज हो सकती है । पर महात्माओं की यह रीति नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*चेला बनने पर ही बात बताएं - यह सांप्रदायिक चीज हो सकती है । पर महात्माओं की यह रीति नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३७*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
" यह" कहलाने वाली चीज सेवा के लिए है- ऐसा मान लोगे तो उद्धार हो जाएगा । परंतु "यह" कहलाने वाली चीज परमात्म प्राप्ति में सहायक है - ऐसा मानोगे तो तत्व प्राप्ति में देरी हो जाएगी ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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" यह" कहलाने वाली चीज सेवा के लिए है- ऐसा मान लोगे तो उद्धार हो जाएगा । परंतु "यह" कहलाने वाली चीज परमात्म प्राप्ति में सहायक है - ऐसा मानोगे तो तत्व प्राप्ति में देरी हो जाएगी ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४०*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
कामना न रखने से वस्तु आपकी गज करेगी । *कामना, ममता, आसक्ति न रखने से नया प्रारब्ध बन जाता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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कामना न रखने से वस्तु आपकी गज करेगी । *कामना, ममता, आसक्ति न रखने से नया प्रारब्ध बन जाता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*🍁🍁 स्वामी श्रीशरणानन्दजी महाराज*
प्राण-शक्ति का व्यय हो जाना और इच्छाओं का शेष रह जाना ही मृत्यु है! *जीवन में ही मृत्यु का अनुभव करने के लिए साधक को प्राणों के रहते हुए ही इच्छाओं का अन्त करना होगा!*
इच्छाओं का अन्त होते ही देहाभिमान गल जाता है; फिर सभी अवस्थाओं से अतीत, जो सभी अवस्थाओं का प्रकाशक है, उस स्वयं प्रकाश नित्य-जीवन से अभिन्नता हो जाती है!
प्राण-शक्ति का व्यय हो जाना और इच्छाओं का शेष रह जाना ही मृत्यु है! *जीवन में ही मृत्यु का अनुभव करने के लिए साधक को प्राणों के रहते हुए ही इच्छाओं का अन्त करना होगा!*
इच्छाओं का अन्त होते ही देहाभिमान गल जाता है; फिर सभी अवस्थाओं से अतीत, जो सभी अवस्थाओं का प्रकाशक है, उस स्वयं प्रकाश नित्य-जीवन से अभिन्नता हो जाती है!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*यह बड़े आश्चर्य की बात है कि परमात्मा की दी हुई चीज तो अच्छी लगती है, पर परमात्मा स्वयं अच्छे नहीं लगते ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५२*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*यह बड़े आश्चर्य की बात है कि परमात्मा की दी हुई चीज तो अच्छी लगती है, पर परमात्मा स्वयं अच्छे नहीं लगते ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५२*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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।।श्रीहरि:।।💐
सब कुछ वासुदेव ही है।
जो भी मनमें आ जाय, *तरह-तरहकी बातें मनमें आ जायँ तो उनको भगवत्स्वरूप समझकर 'भगवते नमः' कह दे।*
🌟 *सत्संग के अमृत-कण* पृष्ठ १४७ गीता प्रकाशन *परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज* नारायण! नारायण!नारायण! नारायण!
सब कुछ वासुदेव ही है।
जो भी मनमें आ जाय, *तरह-तरहकी बातें मनमें आ जायँ तो उनको भगवत्स्वरूप समझकर 'भगवते नमः' कह दे।*
🌟 *सत्संग के अमृत-कण* पृष्ठ १४७ गीता प्रकाशन *परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज* नारायण! नारायण!नारायण! नारायण!
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
संसार का वियोग नित्य है, परमात्मा का योग नित्य है । संसार नदी की तरह निरंतर बह रहा है और परमात्मा शीला की तरह निरंतर अचल हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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संसार का वियोग नित्य है, परमात्मा का योग नित्य है । संसार नदी की तरह निरंतर बह रहा है और परमात्मा शीला की तरह निरंतर अचल हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
शास्त्रों को समझना हो तो अच्छे जानकार पुरुषों से समझें । *हमारे भीतर राग - द्वेष होंगे तो शास्त्रों में भी हमें वैसा ही दीखेगा।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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शास्त्रों को समझना हो तो अच्छे जानकार पुरुषों से समझें । *हमारे भीतर राग - द्वेष होंगे तो शास्त्रों में भी हमें वैसा ही दीखेगा।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ५९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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