राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
असत् को सत्ता देना, महत्ता देना और अपना मानना - ये तीन बाधाएं हैं । इन तीन बाधाओं के रहते कितना ही साधन करो, वहीं - के - वहीं रहोगे, जैसे - रस्सी नौका से बंधी रहे तो रात भर नौका चलाते रहो, वहीं - के - वहीं रहोगे ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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असत् को सत्ता देना, महत्ता देना और अपना मानना - ये तीन बाधाएं हैं । इन तीन बाधाओं के रहते कितना ही साधन करो, वहीं - के - वहीं रहोगे, जैसे - रस्सी नौका से बंधी रहे तो रात भर नौका चलाते रहो, वहीं - के - वहीं रहोगे ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*मुक्ति स्वर्ग आदि लोकों की तरह एक स्थान विशेष में नहीं है । मुक्त आप हैं ही । मिटने वाले से अलग हो जाओ तो मुक्ति स्वत: सिद्ध है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*मुक्ति स्वर्ग आदि लोकों की तरह एक स्थान विशेष में नहीं है । मुक्त आप हैं ही । मिटने वाले से अलग हो जाओ तो मुक्ति स्वत: सिद्ध है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
संसार की प्राप्ति में तो भाई-भाई में लड़ाई हो जाती है, पर परमात्मा की प्राप्ति में दुनिया मात्र सहायक हो जाती है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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संसार की प्राप्ति में तो भाई-भाई में लड़ाई हो जाती है, पर परमात्मा की प्राप्ति में दुनिया मात्र सहायक हो जाती है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
सांसारिक सुख क्यों नहीं टिकता ? क्योंकि वह आपका है ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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सांसारिक सुख क्यों नहीं टिकता ? क्योंकि वह आपका है ही नहीं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परमात्मा मैं - पन से भी नजदीक हैं । मैं - पन आपसे दूर है । मैं - पन के साथ आप निरंतर नहीं रह सकते । सुषुप्ति में मैं- पन नहीं रहता । परंतु परमात्मा के साथ आप निरंतर रहते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २८*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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परमात्मा मैं - पन से भी नजदीक हैं । मैं - पन आपसे दूर है । मैं - पन के साथ आप निरंतर नहीं रह सकते । सुषुप्ति में मैं- पन नहीं रहता । परंतु परमात्मा के साथ आप निरंतर रहते हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २८*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
जैसे प्यास और जल, भूख और अन्न एक चीज है, ऐसे ही परमात्मा की भूख और परमात्मा एक चीज है । अन्न, जल सब जगह नहीं मिलते, पर परमात्मा सब जगह हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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जैसे प्यास और जल, भूख और अन्न एक चीज है, ऐसे ही परमात्मा की भूख और परमात्मा एक चीज है । अन्न, जल सब जगह नहीं मिलते, पर परमात्मा सब जगह हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
संसार हमारे में गुण अधिक मानता है और अवगुण कम । अतः लोग दूसरे को जल्दी ज्ञानी मान लेते हैं । पर वास्तव में वह ज्ञानी है या अज्ञानी - इसका पता नहीं लगता ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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संसार हमारे में गुण अधिक मानता है और अवगुण कम । अतः लोग दूसरे को जल्दी ज्ञानी मान लेते हैं । पर वास्तव में वह ज्ञानी है या अज्ञानी - इसका पता नहीं लगता ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
भीतर में कोई आशा न रखना सत्संग है । आशा रखना असत् का संग है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३२*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भीतर में कोई आशा न रखना सत्संग है । आशा रखना असत् का संग है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३२*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
शरीर अपना नहीं दीखे तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-तीनों सुगम हो जायँगे। *इतने वर्ष सत्संग करके भी शरीरको संसारका और अपनेको भगवान् का नहीं माना तो क्या किया !*
परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज' *नये रास्ते, नयी दिशाएँ'* पुस्तकसे 🙏
शरीर अपना नहीं दीखे तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-तीनों सुगम हो जायँगे। *इतने वर्ष सत्संग करके भी शरीरको संसारका और अपनेको भगवान् का नहीं माना तो क्या किया !*
परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज' *नये रास्ते, नयी दिशाएँ'* पुस्तकसे 🙏
राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*हमारा फिर जन्म होगा - ऐसे अपने पुनर्जन्म को निमंत्रण मत देना ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*हमारा फिर जन्म होगा - ऐसे अपने पुनर्जन्म को निमंत्रण मत देना ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
भाव शब्द से भी अधिक व्यापक है । भाव त्रिलोकी तक पहुंचता है । इसलिए सबके हित का भाव रखें - यह बड़ा भारी पुण्य है । भावों को शुद्ध बनाए रखना बड़ी तपस्या है - (गीता १७/१६) ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३३*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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भाव शब्द से भी अधिक व्यापक है । भाव त्रिलोकी तक पहुंचता है । इसलिए सबके हित का भाव रखें - यह बड़ा भारी पुण्य है । भावों को शुद्ध बनाए रखना बड़ी तपस्या है - (गीता १७/१६) ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३३*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*चेला बनने पर ही बात बताएं - यह सांप्रदायिक चीज हो सकती है । पर महात्माओं की यह रीति नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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*चेला बनने पर ही बात बताएं - यह सांप्रदायिक चीज हो सकती है । पर महात्माओं की यह रीति नहीं है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ३७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
" यह" कहलाने वाली चीज सेवा के लिए है- ऐसा मान लोगे तो उद्धार हो जाएगा । परंतु "यह" कहलाने वाली चीज परमात्म प्राप्ति में सहायक है - ऐसा मानोगे तो तत्व प्राप्ति में देरी हो जाएगी ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४०*
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" यह" कहलाने वाली चीज सेवा के लिए है- ऐसा मान लोगे तो उद्धार हो जाएगा । परंतु "यह" कहलाने वाली चीज परमात्म प्राप्ति में सहायक है - ऐसा मानोगे तो तत्व प्राप्ति में देरी हो जाएगी ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४०*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
कामना न रखने से वस्तु आपकी गज करेगी । *कामना, ममता, आसक्ति न रखने से नया प्रारब्ध बन जाता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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कामना न रखने से वस्तु आपकी गज करेगी । *कामना, ममता, आसक्ति न रखने से नया प्रारब्ध बन जाता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ४५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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